जिस माँ ने पूरी उम्र घर बसाया, उसी के लिए घर में जगह कम पड़ गई
"माँ, आप कुछ दिन बड़े भैया के पास रह लो, फिर अगले महीने हमारे यहाँ आ जाना।"
राकेश ने अपनी माँ शांति देवी से कहा।
शांति देवी ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
अब उन्हें आदत हो चुकी थी।
पति के जाने के बाद पिछले पाँच वर्षों से उनका जीवन इसी तरह बीत रहा था।
कभी बड़े बेटे के घर, कभी छोटे बेटे के घर।
कागजों में दोनों बेटे उनके अपने थे, लेकिन सच्चाई यह थी कि अब वह किसी भी घर की स्थायी सदस्य नहीं थीं।
एक समय था जब इस परिवार की धुरी शांति देवी ही थीं।
उनके पति रामनारायण जी शहर के सम्मानित व्यापारी थे।
घर में चारों तरफ उनकी इज्जत थी।
कोई भी फैसला उनकी राय के बिना नहीं लिया जाता था।
कौन-सी जमीन खरीदनी है, किस बच्चे को किस स्कूल में पढ़ाना है, घर में कौन-सा काम करवाना है, हर बात में उनकी सलाह ली जाती थी।
लेकिन पति के निधन के बाद सब कुछ बदल गया।
धीरे-धीरे व्यापार दोनों बेटों के हाथ में चला गया।
घर के फैसले बहुओं के हाथ में आ गए।
और शांति देवी का महत्व केवल पूजा-पाठ और बच्चों को कहानियाँ सुनाने तक सीमित रह गया।
फिर एक दिन दोनों बेटों ने संपत्ति का बंटवारा कर लिया।
दोनों ने अपने-अपने शानदार मकान बनवा लिए।
घर बड़े थे।
कमरे भी बहुत थे।
लेकिन उन कमरों में माँ के लिए कोई कमरा नहीं था।
जब शांति देवी ने एक बार हँसते हुए पूछा था,
"अरे बेटा, मेरे लिए कौन-सा कमरा है?"
तो सब हँस दिए थे।
लेकिन उस हँसी के पीछे छिपा सच केवल शांति देवी ही समझ पाई थीं।
उस दिन पहली बार उन्हें महसूस हुआ था कि अब वे इस घर की मालकिन नहीं, बल्कि मेहमान बन चुकी हैं।
बड़ा बेटा उन्हें अपने घर ले जाता।
कुछ दिन बाद कहता,
"माँ, अब छोटे के यहाँ भी हो आओ। वह भी आपका इंतजार कर रहा होगा।"
फिर छोटा बेटा कुछ सप्ताह बाद वही बात दोहरा देता।
धीरे-धीरे शांति देवी समझ गईं कि कोई भी उनका इंतजार नहीं करता था।
सब केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे थे।
जैसे कोई सामान कुछ दिनों के लिए एक जगह रखा जाए और फिर दूसरी जगह भेज दिया जाए।
उनकी बेटी सुनीता यह सब देखकर अंदर ही अंदर टूटती रहती थी।
वह जब भी मायके आती, माँ की आँखों में छिपा अकेलापन साफ दिखाई देता।
लेकिन वह भी विवाहित थी।
ससुराल की जिम्मेदारियाँ थीं।
वह चाहकर भी माँ को अपने साथ नहीं रख सकती थी।
एक दिन सुनीता अपनी माँ से मिलने गई।
उसने देखा कि शांति देवी बरामदे में अकेली बैठी थीं।
हाथ में पुरानी फोटो एलबम थी।
वह अपने पति की तस्वीर को बार-बार देख रही थीं।
सुनीता उनके पास बैठ गई।
"क्या देख रही हो माँ?"
शांति देवी ने तस्वीर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"तेरे पापा होते तो शायद ये दिन नहीं देखने पड़ते।"
सुनीता की आँखें भर आईं।
वह चुप रही।
शांति देवी आगे बोलीं,
"जानती है, जब ये घर बन रहा था तो मैंने कितने सपने देखे थे। सोचा था बुढ़ापे में सब बच्चे आसपास होंगे। पोते-पोतियों की आवाजें होंगी।"
उन्होंने गहरी साँस ली।
"लेकिन अब लगता है कि मैं कहीं की नहीं रही।"
सुनीता ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"ऐसा मत कहो माँ।"
शांति देवी मुस्कुरा दीं।
"सच तो यही है बेटी।"
उस रात सुनीता बहुत रोई।
उसे पहली बार समझ आया कि अकेलापन केवल तब नहीं होता जब कोई इंसान अकेला हो।
अकेलापन तब भी होता है जब अपने आसपास हों, लेकिन कोई अपना न लगे।
समय बीतता गया।
शांति देवी की तबीयत धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
घुटनों में दर्द रहने लगा।
चलने-फिरने में परेशानी होने लगी।
लेकिन किसी के पास इतना समय नहीं था कि उनके पास बैठकर दो बातें कर सके।
सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त थे।
एक दिन बड़े बेटे के घर पर परिवार के लोग किसी शादी की तैयारी में लगे थे।
घर में खूब चहल-पहल थी।
लेकिन शांति देवी अपने कमरे के कोने में चुपचाप बैठी थीं।
किसी ने उनसे नहीं पूछा कि उन्होंने खाना खाया या नहीं।
उसी रात उन्होंने अपनी पुरानी डायरी निकाली।
उसमें कुछ पन्ने लिखे।
फिर उसे अपने तकिए के नीचे रख दिया।
अगले दिन उन्होंने छोटे बेटे के घर जाने की इच्छा जताई।
बेटे ने उन्हें छोड़ दिया।
कुछ सप्ताह वहाँ रहीं।
फिर वही कहानी।
वही उपेक्षा।
वही अकेलापन।
एक दिन सुनीता उनसे मिलने पहुँची।
माँ को देखकर उसका दिल बैठ गया।
शांति देवी बहुत कमजोर लग रही थीं।
उसने कहा,
"माँ, डॉक्टर को दिखाते हैं।"
शांति देवी मुस्कुरा दीं।
"अब डॉक्टर क्या करेगा बेटी?"
फिर उन्होंने अचानक कहा,
"अगर मैं चली जाऊँ तो रोना मत। मुझे तेरे पापा के पास जाना है।"
सुनीता ने तुरंत उनका मुँह बंद कर दिया।
"ऐसी बातें मत करो माँ।"
लेकिन उस दिन जाने क्यों शांति देवी बार-बार यही बात दोहराती रहीं।
उस रात सुनीता घर लौट आई।
लेकिन उसका मन बहुत बेचैन था।
उसने मंदिर जाकर भगवान के सामने हाथ जोड़ दिए।
आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह बार-बार एक ही प्रार्थना कर रही थी।
"हे भगवान, मेरी माँ को अब और दुख मत देना।"
"अगर उनके हिस्से में सम्मान नहीं बचा है तो उन्हें अपने पास बुला लो।"
वह काफी देर तक वहीं बैठी रही।
दिल भारी था।
मन घबराया हुआ था।
उसी समय उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर छोटे भाई का नाम चमक रहा था।
सुनीता का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने काँपते हाथों से फोन उठाया।
उधर से धीमी आवाज आई।
"दीदी..."
कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर भाई बोला,
"माँ चली गईं।"
"रात को सोई थीं... फिर उठीं ही नहीं।"
सुनीता के हाथ से फोन छूट गया।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
वह धीरे-धीरे मंदिर के गर्भगृह के सामने जाकर खड़ी हो गई।
हाथ जोड़ लिए।
काफी देर तक कुछ नहीं बोली।
फिर आसमान की ओर देखते हुए फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसके मन में केवल एक ही बात घूम रही थी—
जिस माँ ने पूरी जिंदगी सबको घर दिया, आखिर अपने अंतिम दिनों में उसी के हिस्से एक अपना घर भी नहीं आया।
और शायद भगवान ने उसकी माँ को वह घर दे दिया था...
जहाँ अब किसी को यह तय नहीं करना था कि उन्हें कितने दिन रहना है।

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