माँ की पुरानी साड़ी

 

Indian daughter gifting her first salary saree to her emotional mother in a middle-class home, celebrating sacrifice, love, and family success.


आँगन में फैले कपड़ों को तह करते हुए ममता देवी की उंगलियाँ अचानक अपनी हल्की फीकी पड़ चुकी नीली साड़ी पर ठहर गईं। साड़ी का किनारा कई जगह से घिस चुका था। पल्लू के पास छोटा-सा पैबंद भी लगा था, जिसे उन्होंने इतने सफाई से टांका था कि दूर से कोई पहचान न सके।


उन्होंने साड़ी को पलटकर देखा और मुस्कुरा दीं।


"अभी तो अच्छी है... दो-चार साल और चल जाएगी," उन्होंने खुद से कहा।


तभी उनकी बेटी काव्या कॉलेज से लौटकर आई।


"माँ, आप फिर वही साड़ी पहन रही हो? पिछले महीने भी तो यही पहनी थी।"


ममता देवी ने सहजता से जवाब दिया, "अरे, साड़ी में क्या रखा है? साफ-सुथरी होनी चाहिए, नई हो या पुरानी, इससे क्या फर्क पड़ता है?"


काव्या कुछ कहना चाहती थी, लेकिन चुप रह गई।


ममता देवी के पति रमेश जी एक छोटी किराने की दुकान पर नौकरी करते थे। सुबह से रात तक हिसाब-किताब संभालते और महीने के आखिर में इतनी तनख्वाह मिलती कि घर का खर्च किसी तरह चल जाता।


घर में बूढ़ी सास की दवाइयाँ, बेटे आरव की स्कूल फीस और काव्या की कॉलेज की पढ़ाई थी।


इन सबके बीच ममता देवी की जरूरतें हमेशा पीछे छूट जाती थीं।


कभी नई चप्पल की जरूरत होती तो वह कहतीं, "पुरानी अभी ठीक है।"


कभी ब्लाउज सिलवाने की बात आती तो जवाब होता, "पहले बच्चों का काम जरूरी है।"


कभी रमेश जी कहते, "तुम्हारे लिए इस बार अच्छी साड़ी ले लेते हैं।"


तो वह हँसकर टाल देतीं।


"इतनी भी क्या जल्दी है? अगले त्योहार पर देख लेंगे।"


लेकिन वह अगला त्योहार कभी नहीं आता था।


उस दिन काव्या बहुत उदास थी।


रात का खाना खाते हुए उसने धीरे से कहा, "माँ, कॉलेज में अगले हफ्ते इंटरव्यू है। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ आएंगी। सबको फॉर्मल कपड़े पहनकर जाना होगा। मेरी सहेलियाँ नए कपड़े खरीद रही हैं।"


उसकी आवाज धीमी पड़ गई।


"मेरे पास पहनने के लिए कुछ अच्छा नहीं है।"


रमेश जी ने तुरंत कहा, "अरे, इसमें परेशान होने की क्या बात है? कल चलकर ले आएंगे।"


लेकिन इतना कहते ही उनकी आवाज धीमी हो गई।


उन्हें याद आया कि जेब में कुल दो हजार रुपये बचे हैं।


उसी पैसे से महीने भर का राशन भी आना था।


ममता देवी ने बिना कुछ कहे खाना परोसा।


रात को सब सो गए, लेकिन उन्हें नींद नहीं आई।


उन्होंने अपनी पुरानी लोहे की अलमारी खोली।


एक कपड़े की छोटी पोटली निकाली।


उसमें कुछ मुड़े हुए नोट रखे थे।


यह वही पैसे थे जिन्हें उन्होंने महीनों से थोड़ा-थोड़ा बचाकर रखा था।


कभी सब्जी वाले से बचे दस रुपये।


कभी दूध के पैसों में बचत।


कभी अपने लिए चुन्नी न खरीदकर बचाए हुए पैसे।


कुल मिलाकर ढाई हजार रुपये थे।


इन पैसों से वह वर्षों बाद अपने लिए एक अच्छी साड़ी खरीदना चाहती थीं।


उन्होंने नोटों को हाथ में लिया।


फिर अलमारी में रखी अपनी पुरानी नीली साड़ी को देखा।


उनकी आँखों के सामने काव्या का उदास चेहरा घूम गया।


उन्होंने बिना देर किए पैसे वापस पोटली में रखे और मन ही मन फैसला कर लिया।


अगले दिन ममता देवी ने अलमारी बंद की और सामान्य बनने की कोशिश करते हुए काव्या के पास आकर बोलीं,


"चलो बेटा, तैयार हो जाओ। हमें बाजार जाना है।"


काव्या ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।


"बाजार? किसलिए माँ?"


ममता देवी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "तुम्हारे इंटरव्यू के लिए अच्छे कपड़े लेने हैं।"


काव्या की आँखें झट से झुक गईं।


"लेकिन माँ, इतने पैसे कहाँ से आएँगे? घर के खर्चे भी तो हैं। रहने दीजिए, मैं अपनी पुरानी ड्रेस पहन लूँगी।"


"नहीं बेटा," ममता देवी ने दृढ़ आवाज़ में कहा, "जीवन में कुछ मौके बार-बार नहीं आते। यह तुम्हारे सपनों की पहली सीढ़ी है। उस पर तुम्हें पूरे आत्मविश्वास के साथ कदम रखना होगा।"


काव्या ने धीरे से कहा, "माँ, सच में जरूरत नहीं है। मैं किसी सहेली से कपड़े ले लूँगी। आप अपने लिए भी तो वर्षों से कुछ नहीं खरीद पाईं।"


ममता देवी हल्का-सा मुस्कुराईं।


"माँ की खुशियाँ बच्चों की मुस्कान में ही छिपी होती हैं। मेरे लिए सबसे सुंदर कपड़ा वही होगा, जिस दिन मैं तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा देखूँगी। अब ज़्यादा बहस मत करो, जल्दी से तैयार हो जाओ।"


काव्या चुप हो गई। वह समझ गई थी कि माँ ने फैसला कर लिया है। उसकी आँखें नम हो उठीं, लेकिन इस बार उसने मना नहीं किया। वह जानती थी कि माँ जब बच्चों के भविष्य की बात करती हैं, तो उनके हर निर्णय में प्यार और त्याग छिपा होता है।


उन्होंने बेटी के लिए एक सादा लेकिन सुंदर सूट चुना।


उसके साथ जूते भी खरीदे।


काव्या बार-बार कहती रही, "माँ, इतना काफी है।"


लेकिन ममता देवी ने मुस्कुराकर कहा, "इंटरव्यू में आत्मविश्वास भी अच्छा दिखना चाहिए।"


घर लौटते समय काव्या ने देखा कि माँ अपनी पुरानी साड़ी का पल्लू बार-बार ठीक कर रही हैं।


"माँ, आपने अपने लिए कुछ नहीं लिया?"


"मेरे पास बहुत साड़ियाँ हैं," उन्होंने हँसते हुए कहा।


काव्या जानती थी कि यह झूठ है।


घर आकर उसने देखा कि अलमारी की वही पोटली खाली पड़ी थी।


उसकी आँखें भर आईं।


इंटरव्यू वाले दिन काव्या तैयार होकर आई।


वह बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई लग रही थी।


ममता देवी ने उसकी नजर उतारी।


"जाकर पूरी लगन और आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू देना, बेटा। मुझे पूरा भरोसा है कि तुम्हारी मेहनत कभी बेकार नहीं जाएगी।"


काव्या ने मुस्कुराते हुए पूछा, "और अगर मुझे नौकरी मिल गई तो?"


ममता देवी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "तो सबसे पहले घर आकर मुझे गले लगाना... और हाँ, मिठाई लाना मत भूलना। आखिर मेरी बेटी की जीत का जश्न भी तो मनाना है।"


यह सुनकर काव्या की आँखें नम हो गईं। उसने माँ के पैर छुए और बोली, "मिठाई तो ज़रूर लाऊँगी, माँ... लेकिन उससे पहले आपकी सारी अधूरी खुशियाँ पूरी करूँगी।"


कुछ दिनों बाद काव्या दौड़ती हुई घर आई।


"माँ... माँ... मेरा चयन हो गया!"


उसके हाथ में नियुक्ति पत्र था।


रमेश जी खुशी से रो पड़े।


ममता देवी ने काँपते हाथों से बेटी का चेहरा छुआ।


"सच में?" ममता देवी की आवाज़ काँप गई।


"हाँ माँ, सच में! मेरा चयन हो गया," काव्या ने खुशी से नियुक्ति पत्र उनके हाथों में रख दिया।


रमेश जी की आँखें भर आईं। उन्होंने बेटी को गले लगा लिया।


काव्या मुस्कुराई और बोली, "माँ, आपको पता है? मेरी पहली तनख्वाह से मैं सबसे पहला काम क्या करूँगी?"


"क्या करेगी बेटा?" ममता देवी ने प्यार से पूछा।


काव्या ने माँ के हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, "सबसे पहले आपके लिए एक खूबसूरत साड़ी खरीदूँगी। वही साड़ी, जिसे आप हर बार अपनी जरूरतों की सूची से निकाल देती थीं। अब आपकी कोई इच्छा अधूरी नहीं रहेगी।"


ममता देवी की आँखों से आँसू छलक पड़े।


करीब एक महीने बाद, जब काव्या अपनी पहली तनख्वाह लेकर घर लौटी, तो उसके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था।


"माँ, अब अपना वादा पूरा करने का समय आ गया है," उसने मुस्कुराते हुए कहा।


ममता देवी ने पैकेट खोला। अंदर एक सुंदर रेशमी साड़ी रखी थी।


"माँ, आपने अपनी नई साड़ी की खुशी छोड़कर मेरे सपनों को पूरा किया था। यह साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं है, यह आपकी हर उस छोटी-बड़ी इच्छा का धन्यवाद है, जिसे आपने हमारे लिए चुपचाप कुर्बान कर दिया।"


साड़ी को सीने से लगाते हुए ममता देवी रो पड़ीं। उन्हें लगा, वर्षों पहले अलमारी में तह करके रखे गए उनके छोटे-छोटे सपने आज बेटी की पहली कमाई के साथ वापस लौट आए हैं।


वर्षों से उन्होंने अपनी इच्छाओं को तह करके अलमारी में रख दिया था, ताकि बच्चों के सपने खुले आसमान में उड़ सकें।


उस दिन काव्या को सिर्फ नौकरी नहीं मिली थी।


उसने अपनी माँ के त्याग की कीमत समझी थी।


सच तो यही है कि मध्यमवर्गीय माँएँ अपनी खुशियों का हिसाब कभी नहीं रखतीं।


वे अपनी पसंद की साड़ी, अपने नए चश्मे, अपनी चप्पलों और अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को टाल देती हैं, ताकि बच्चों के भविष्य में कोई कमी न रह जाए।


दुनिया को बच्चों की कामयाबी दिखाई देती है, लेकिन उस कामयाबी की नींव में अक्सर किसी माँ की पुरानी साड़ी, अधूरी इच्छाएँ और अनगिनत त्याग छिपे होते हैं।


और शायद इसी त्याग का दूसरा नाम माँ होता है। 



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