जब रिश्तों की परिभाषा बदल गई

 

An elderly Indian mother sharing an emotional moment with her son, daughter-in-law, and grandchildren in a warm and loving family home.


"तुम्हारी बहू ने तुम्हें वृद्धाश्रम भेजने की बात की है, और तुम अब भी उसके लिए सफाई दे रही हो?"


फोन पर अपनी छोटी बहन की बात सुनकर कमला देवी कुछ पल के लिए चुप रह गईं।


उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "नहीं री, ऐसी बात नहीं है। बहू बुरी नहीं है। बस... परिस्थितियां ऐसी बन गई हैं।"


"परिस्थितियां नहीं दीदी, लोग बदल गए हैं," उधर से जवाब आया।


कमला देवी ने बात बदल दी, लेकिन फोन रखने के बाद उनकी आंखें भर आईं।


सामने दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पति रमेश जी की तस्वीर को देखते हुए उन्हें लगा जैसे बीते हुए साल एक-एक कर उनके सामने खड़े हो गए हों।


एक समय था जब इसी घर में उनकी चलती थी।


घर का हर छोटा-बड़ा फैसला उनसे पूछकर होता था।


उनके पति सरकारी नौकरी में थे। कमला देवी ने अपनी पूरी जिंदगी घर और बच्चों के लिए खपा दी थी।


तीन बच्चों में सबसे छोटा बेटा अमित उनका सबसे लाड़ला था।


जब अमित छोटा था तो कमला देवी उसे गोद में लेकर घंटों बैठी रहती थीं।


बेटे को जरा सी खांसी आती तो पूरी रात जागकर उसके सिरहाने बैठी रहतीं।


पति कई बार मजाक में कहते, "कमला, लगता है तुम्हें हमसे ज्यादा अपने बेटे की चिंता रहती है।"


और कमला देवी हंसकर जवाब देतीं, "बच्चे ही तो हमारी असली पूंजी हैं।"


समय के साथ दोनों बेटियों की शादी हो गई और वे अपने ससुराल चली गईं। अब कमला देवी की सारी उम्मीदें अपने इकलौते बेटे अमित से जुड़ गई थीं।


अमित इंजीनियर बन गया और शहर की बड़ी कंपनी में नौकरी करने लगा।


कमला देवी को लगता था कि अब उनकी सारी मेहनत रंग ला रही है।


फिर अमित की शादी का समय आया।


रिश्ता एक बहुत पढ़ी-लिखी लड़की से आया था।


उसका नाम नेहा था।


सुंदर, आत्मविश्वासी और बड़े कारोबारी परिवार की बेटी।


रिश्ता देखने के बाद अमित ने तुरंत हां कर दी।


कमला देवी को लड़की पसंद तो आई, लेकिन मन के किसी कोने में हल्की चिंता भी थी।


उन्होंने बेटे से कहा था,


"बेटा, लड़की बहुत अच्छे घर की है। हमारी और उनकी परवरिश में फर्क है। कहीं बाद में परेशानी न हो।"


अमित हंस पड़ा।


"मां, अब जमाना बदल गया है। इंसान देखा जाता है, पैसा नहीं।"


कमला देवी चुप हो गईं।


शादी धूमधाम से हुई।


नेहा बहू बनकर घर आई।


शुरू के कुछ महीने सब ठीक चला।


नेहा सभी से प्यार से बात करती।


कमला देवी भी उसे बेटी की तरह मानती थीं।


लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस होने लगा कि नेहा को घर के कामों या पारिवारिक जिम्मेदारियों में ज्यादा रुचि नहीं थी।


वह हर काम के लिए नौकरों पर निर्भर रहती।


कभी बाजार, कभी दोस्तों की पार्टी, कभी क्लब, कभी कोई नया कोर्स।


उसका कार्यक्रम हमेशा भरा रहता।


कमला देवी सोचतीं कि नई पीढ़ी का तरीका अलग है, इसलिए वे कुछ नहीं कहती थीं।


उधर अमित अपनी पत्नी पर जान छिड़कता था।


नेहा जो कहती, वही होता।


धीरे-धीरे घर की सारी जिम्मेदारियां फिर कमला देवी के कंधों पर आ गईं।


रसोई से लेकर राशन तक, बिजली के बिल से लेकर बच्चों की देखभाल तक।


जब तक शरीर साथ देता रहा, उन्होंने शिकायत नहीं की।


फिर नेहा के दो बच्चे हुए।


कमला देवी ने सोचा अब बहू जिम्मेदार हो जाएगी।


लेकिन हुआ उल्टा।


अब बच्चों की पूरी जिम्मेदारी भी उन्हीं के हिस्से आ गई।


स्कूल छोड़ना, लाना, होमवर्क कराना, खाना खिलाना।


सब कुछ।


एक दिन उनकी बड़ी बेटी मिलने आई।


मां को बच्चों के पीछे भागते देखकर बोली,


"मां, आप कब तक ये सब करती रहेंगी?"


कमला देवी मुस्कुरा दीं।


"जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, तब तक काम करने में क्या बुराई है?"


बेटी ने मां का चेहरा गौर से देखा।


वह समझ गई कि मां थक चुकी हैं।


लेकिन स्वीकार नहीं करना चाहतीं।


कुछ साल और बीत गए।


अब कमला देवी के घुटनों में दर्द रहने लगा था।


सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल हो गया था।


कभी-कभी उन्हें चीजें भूलने भी लगी थीं।


एक दिन गैस बंद करना भूल गईं।


सौभाग्य से कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ।


लेकिन उस दिन पहली बार नेहा ने तेज आवाज में कहा,


"मम्मीजी, अब आपसे घर नहीं संभलता।"


यह सुनकर कमला देवी का दिल बैठ गया।


जिस घर को उन्होंने चालीस साल तक संभाला था, उसी घर में आज उन्हें अयोग्य कहा जा रहा था।


उन्होंने कुछ नहीं कहा।


लेकिन उस रात उन्हें नींद नहीं आई।


इसके बाद धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।


पहले उनसे सलाह ली जाती थी।


अब उन्हें सिर्फ सूचना दी जाती थी।


पहले उनका कमरा घर के बीच में था।


अब उन्हें ऊपर वाले छोटे कमरे में भेज दिया गया।


कहा गया कि नीचे बच्चों को पढ़ाई में परेशानी होती है।


कमला देवी सब समझ रही थीं।


लेकिन चुप थीं।


उन्हें डर था कि कहीं बेटे की जिंदगी में तनाव न आ जाए।


फिर एक दिन उन्होंने अनजाने में एक ऐसी बात सुन ली जिसने उनकी दुनिया हिला दी...


जिस बात को सुनकर कमला देवी की दुनिया हिल गई थी, वह उनके कानों में बार-बार गूंज रही थी।


वह अपने कमरे से नीचे उतर रही थीं। तभी ड्राइंग रूम से नेहा की आवाज आई।


"अमित, मैं अब और नहीं कर सकती। मम्मीजी की देखभाल के लिए किसी व्यवस्था की जरूरत है।"


कमला देवी सीढ़ियों पर ही रुक गईं।


अमित ने धीरे से पूछा, "तुम क्या कहना चाहती हो?"


"मैं बस इतना कह रही हूं कि किसी अच्छे वृद्धाश्रम में इनके रहने की व्यवस्था कर देते हैं। वहां डॉक्टर होंगे, देखभाल होगी। यहां दिनभर हम दोनों काम में लगे रहते हैं।"


कमला देवी का दिल धक से रह गया।


आगे की बातें सुनने की हिम्मत नहीं हुई।


वह चुपचाप वापस अपने कमरे में लौट आईं।


उस रात उन्होंने खाना भी नहीं खाया।


उन्हें लग रहा था कि जिस घर के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, आज उसी घर में उनके लिए जगह कम पड़ गई है।


अगले कुछ दिनों तक वह और भी शांत रहने लगीं।


पहले जहां पोते-पोतियों के साथ बैठती थीं, अब ज्यादातर अपने कमरे में ही रहतीं।


बच्चों ने भी महसूस किया कि दादी पहले जैसी नहीं रहीं।


एक दिन उनकी पोती अनुष्का उनके पास आई।


"दादी, आप मुझसे नाराज हैं क्या?"


"नहीं बेटा।"


"फिर आप मेरे साथ कहानियां क्यों नहीं सुनातीं?"


कमला देवी ने उसे सीने से लगा लिया।


आंखों से आंसू निकल पड़े।


"बस बेटा, थोड़ी थक गई हूं।"


अनुष्का छोटी थी, लेकिन दादी का दर्द समझ गई।


उसी शाम उसने अपने पिता अमित से पूछा,


"पापा, क्या दादी कहीं जा रही हैं?"


अमित चौंक गया।


"किसने कहा?"


"मैंने मम्मी को किसी से बात करते सुना था।"


अमित कुछ क्षण चुप रहा।


उसने बेटी को बहला दिया, लेकिन उसके मन में भी बेचैनी घर कर गई।


उधर कमला देवी ने एक फैसला कर लिया था।


उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को फोन किया।


"मैं कुछ दिन तुम्हारे पास आना चाहती हूं।"


बेटियां खुश हो गईं।


लेकिन कमला देवी का इरादा कुछ और था।


उन्होंने सोचा कि अब शायद उन्हें सचमुच किसी आश्रम में ही रहना चाहिए।


कम से कम वहां किसी पर बोझ होने का एहसास तो नहीं होगा।


दो दिन बाद उन्होंने अपने पुराने बक्से निकाले।


कपड़े समेटने लगीं।


तभी नेहा कमरे में आई।


"मम्मीजी, आप सामान क्यों पैक कर रही हैं?"


"बस बहू, अब बहुत दिन तुम्हें परेशान कर लिया। कहीं और चली जाऊंगी।"


नेहा एकदम घबरा गई।


"ये आप क्या कह रही हैं?"


कमला देवी पहली बार खुलकर बोलीं।


"मैंने उस दिन सब सुन लिया था। वृद्धाश्रम वाली बात।"


नेहा का चेहरा उतर गया।


उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे।


तभी अमित भी कमरे में आ गया।


कमला देवी बोलीं,


"बेटा, तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हें कठिन स्थिति में नहीं डालूंगी।"


अमित स्तब्ध रह गया।


उसने तुरंत मां का हाथ पकड़ लिया।


"मां, आपने पूरी बात नहीं सुनी थी।"


"क्या फर्क पड़ता है?"


"फर्क पड़ता है मां। बहुत फर्क पड़ता है।"


अमित ने गहरी सांस ली।


"उस दिन नेहा जिस वृद्धाश्रम की बात कर रही थी, वह आपके लिए नहीं थी।"


कमला देवी हैरानी से उसे देखने लगीं।


नेहा की आंखें भी भर आई थीं।


अमित ने मां के पास बैठते हुए कहा,


"मां, आपने उस दिन हमारी बात का सिर्फ एक हिस्सा सुना था। पूरी बात सुन लेतीं तो शायद इतना दुख न होता।"


कमला देवी ने नम आंखों से बेटे की ओर देखा।


"तो फिर सच क्या है, बेटा?"


अमित ने गहरी सांस ली।


"नेहा जिस वृद्धाश्रम की बात कर रही थी, वह आपके बारे में नहीं थी। वह एक संस्था से जुड़ी है जो बेसहारा बुजुर्गों की मदद करती है। उस दिन हम उसी आश्रम के लिए आर्थिक सहायता और कुछ जरूरी सामान भेजने की बात कर रहे थे।"


कमला देवी कुछ पल तक बेटे का चेहरा देखती रहीं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था।


"लेकिन... मुझे तो लगा कि मैं अब तुम लोगों पर बोझ बन गई हूं।"


यह कहते-कहते उनकी आवाज भर्रा गई।


तभी नेहा आगे बढ़ी और उनके पास घुटनों के बल बैठ गई।


उसने प्यार से उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।


"मम्मीजी, अगर आपको ऐसा लगा है तो गलती मेरी है। शायद मैं आपको कभी यह एहसास ही नहीं दिला पाई कि इस घर में आपकी कितनी अहमियत है।"


कमला देवी की आंखों से आंसू बह निकले।


नेहा भी खुद को रोक नहीं पाई।


"आपने इस घर के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। अमित को इस मुकाम तक पहुंचाने में आपका कितना त्याग है, यह मैं अच्छी तरह जानती हूं। आज जो सुख-सुविधाएं हम भोग रहे हैं, उनकी नींव आपने अपने संघर्षों से रखी है।"


कमला देवी कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन शब्द उनका साथ नहीं दे रहे थे।


नेहा ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।


"मम्मीजी, घर की दीवारें ईंटों से बनती हैं, लेकिन घर को परिवार बनाने वाले लोग होते हैं। और इस घर की सबसे मजबूत नींव आप हैं। आपके बिना यह घर कभी पूरा नहीं हो सकता।"


कमरे में कुछ क्षणों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया।


फिर कमला देवी ने कांपते हुए हाथ से नेहा के सिर पर हाथ फेर दिया।


बरसों से जमा हुआ दर्द जैसे आंखों के रास्ते बह निकला।


उस पल पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि कभी-कभी गलतफहमियां शब्दों से नहीं, चुप्पियों से पैदा होती हैं।


कुछ देर बाद नेहा बोली,


"सच तो यह है कि मैं आपकी वजह से निश्चिंत होकर नौकरी और बच्चों दोनों को संभाल पाई। आपने जो किया है, उसका ऋण मैं कभी नहीं चुका सकती।"


कमला देवी का कठोर होता मन पिघलने लगा।


तभी पोता और पोती भी कमरे में आ गए।


अनुष्का ने पूछा,


"दादी, आप कहीं नहीं जाएंगी ना?"


कमला देवी ने उसे गले लगा लिया।


"नहीं बेटा, कहीं नहीं जाऊंगी।"


उस दिन के बाद घर में कई बदलाव हुए।


अमित ने एक देखभाल करने वाली सहायिका रख दी ताकि कमला देवी को हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े।


नेहा ने अपने कार्यक्रम कम कर दिए।


अब वह रोज कुछ समय सिर्फ अपनी सास के साथ बिताती।


कभी दोनों साथ बैठकर पुरानी तस्वीरें देखतीं, कभी चाय पीते हुए बातें करतीं।


एक दिन नेहा ने मुस्कुराकर कहा,


"मम्मीजी, आपने अपनी पूरी जिंदगी कभी माता-पिता के लिए, कभी पति के लिए, कभी बच्चों के लिए और फिर पोते-पोतियों के लिए जी दी। लेकिन क्या आपने कभी अपने लिए भी कुछ किया?"


कमला देवी हल्का सा मुस्कुराईं।


"हमारे ज़माने की औरतों के नसीब में अपने लिए जीना कहाँ लिखा था, बहू? ज़िंदगी कब जिम्मेदारियों में निकल गई, पता ही नहीं चला।"


"तो अब समय आ गया है," नेहा ने स्नेह से कहा, "कि आप अपनी अधूरी इच्छाएँ पूरी करें। जो मन करे वो करें, जहाँ जाने का मन हो वहाँ जाएँ, जिन लोगों से मिलना चाहें उनसे मिलें। अब आपको किसी की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"


कमला देवी की आँखें नम हो गईं।


"इस उम्र में भला मैं क्या करूँगी?"


"वही सब, जो आप कभी करना चाहती थीं लेकिन कर नहीं पाईं," नेहा मुस्कुराते हुए बोली।


कुछ दिनों बाद नेहा ने पास के वरिष्ठ नागरिक क्लब में उनका नाम दर्ज करा दिया। वहाँ उनकी उम्र की कई महिलाएँ थीं। धीरे-धीरे कमला देवी की नई सहेलियाँ बन गईं। अब उनके दिन केवल कमरे में बैठे-बैठे नहीं कटते थे, बल्कि हँसी, बातचीत और नई गतिविधियों के बीच बीतने लगे थे।


कभी भजन, कभी यात्रा, कभी सांस्कृतिक कार्यक्रम।


धीरे-धीरे उनके चेहरे की उदासी लौटने लगी।


एक शाम उन्होंने अपने पति की तस्वीर के सामने दीपक जलाया और मुस्कुराते हुए बोलीं,


"देखिए जी, मैं हमेशा सोचती रही कि बुढ़ापा मतलब अकेलापन होता है। लेकिन शायद बुढ़ापा बोझ नहीं, परिवार के प्यार की असली परीक्षा होता है।"


खिड़की से आती हवा ने जैसे उनके शब्दों का समर्थन किया।


कमला देवी ने पहली बार महसूस किया कि सम्मान केवल अधिकार मांगने से नहीं मिलता, बल्कि रिश्तों को समझने और समय के साथ बदलने से भी मिलता है।


और उस दिन उन्हें यह भी समझ आ गया कि हर बहू अपनी सास की दुश्मन नहीं होती।


कभी-कभी वह वही सहारा बन जाती है जिसकी जरूरत बुढ़ापे में सबसे ज्यादा होती है।



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