हर बार बहू ही गलत नहीं होती
बरामदे में रखी पुरानी लोहे की संदूक बंद करते समय कविता के हाथ अचानक रुक गए।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"अरे... ये कैसे हो सकता है?" उसने घबराते हुए बुदबुदाया।
उसी समय उसकी सास शारदा देवी कमरे में आईं और बोलीं, "क्या हुआ बहू? इतनी परेशान क्यों दिख रही हो?"
कविता ने कांपती आवाज़ में कहा, "मम्मी जी... आपका पुश्तैनी हार... जो आपने मुझे संभालने के लिए दिया था... वह संदूकची में नहीं मिल रहा।"
शारदा देवी के चेहरे की रंगत बदल गई।
वह हार कोई साधारण गहना नहीं था। वह उनके परिवार की कई पीढ़ियों की निशानी था। शादी-ब्याह और खास अवसरों पर ही वह हार निकाला जाता था। शारदा देवी की सास ने वह हार उन्हें सौंपते हुए कहा था, "इसे सिर्फ गहना मत समझना, यह हमारे परिवार का विश्वास है।"
शारदा देवी घबराकर बोलीं, "अच्छी तरह देखो बहू। कहीं दूसरी जगह रख दिया होगा।"
कविता ने पूरा कमरा छान मारा। अलमारी, लॉकर, दराज, कपड़ों की तह, यहाँ तक कि संदूकची के कोने-कोने तक देख लिया। लेकिन हार कहीं नहीं मिला।
कुछ देर बाद उसने हिम्मत करके कहा, "मम्मी जी, मुझे याद है पिछली बार तीज की पूजा में रीमा दीदी ने वह हार पहनने के लिए मुझसे मांगा था। उसके बाद शायद वह मुझे वापस देना भूल गई हों।"
इतना सुनते ही शारदा देवी का चेहरा सख्त हो गया।
"कविता! सोच-समझकर बात करो। तुम मेरी बेटी पर इल्जाम लगा रही हो?"
"नहीं मम्मी जी," कविता घबराकर बोली, "मैं सिर्फ इतना कह रही हूँ कि शायद उनसे भूल हो गई हो।"
"भूल?" शारदा देवी बोलीं, "मेरी बेटी से? और जिम्मेदारी मैंने तुम्हें दी थी। हार तुम्हारी निगरानी में था।"
कविता चुप हो गई।
शारदा देवी ने तुरंत अपनी बेटी रीमा को फोन लगाया।
"रीमा, क्या तुम वह हार अपने साथ ले गई हो?"
उधर से रीमा की आवाज़ आई, "मम्मी! आप भी कैसी बातें कर रही हैं? हाँ, मैंने हार पहना था, लेकिन उसी दिन कविता भाभी को वापस कर दिया था।"
फिर वह बोली, "मम्मी, मैंने पहले भी कहा था कि भाभी पर इतना भरोसा मत किया करो। आखिर गरीब घर से आई हैं। इतनी कीमती चीज़ों की अहमियत उन्हें क्या पता होगी?"
रीमा की बातें शारदा देवी के मन में घर करने लगीं।
उन्होंने गुस्से में कविता से कहा, "तुम्हारे मायके में शायद ऐसा हार कभी किसी ने नहीं देखा होगा। मैंने तुम्हें बेटी समझकर सब कुछ सौंप दिया, लेकिन लगता है मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।"
ये शब्द कविता के दिल में तीर की तरह चुभ गए।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
उसे याद आया जब वह इस घर में नई-नई आई थी।
एक साधारण परिवार की लड़की होकर भी उसने पूरे दिल से इस घर को अपनाया था।
वह सबसे पहले उठती।
सास-ससुर की दवाइयों का ध्यान रखती।
सबकी पसंद का खाना बनाती।
घर के हर सदस्य की जरूरत का ख्याल रखती।
लेकिन रीमा को उसकी हर अच्छाई से परेशानी होती थी।
जब कोई कहता, "कविता बहुत अच्छी बहू है," तो रीमा तुरंत बोल पड़ती, "अरे, दिखावा करती हैं सबके सामने अच्छा बनने का।"
कविता सब सुनकर भी चुप रहती।
वह सोचती थी कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
उसी समय कविता के पति अभिषेक ऑफिस से घर लौटे।
घर का माहौल देखकर उन्होंने पूछा, "क्या हुआ?"
शारदा देवी ने पूरी बात बता दी।
अभिषेक ने कविता की ओर देखा।
"तुम सच कह रही हो?"
कविता की आँखों से आँसू बह निकले।
"मैं झूठ क्यों बोलूँगी? मुझे सच में याद है कि मैंने हार रीमा दीदी को पहनने के लिए दिया था।"
अभिषेक कुछ देर चुप रहे।
फिर उन्होंने अपनी माँ की ओर देखकर कहा, "मम्मी, मुझे कविता पर भरोसा है।"
"तुम्हें अपनी पत्नी की बात पर भरोसा है, लेकिन अपनी माँ और बहन की बात पर नहीं?" शारदा देवी बोलीं।
अभिषेक शांत स्वर में बोले, "भरोसा रिश्ते देखकर नहीं, इंसान की सच्चाई देखकर किया जाता है।"
उन्होंने आगे कहा, "आपको याद है शादी से पहले मेरा बटुआ बाजार में गिर गया था? उसमें पैसे और जरूरी कागजात थे। कविता ने ही उसे ढूंढकर मुझे लौटाया था। तब वह मुझे जानती तक नहीं थी। अगर वह लालची होती, तो उस दिन ही सब रख लेती।"
यह सुनकर शारदा देवी चुप हो गईं।
कुछ दिन बाद रीमा अपनी नौ साल की बेटी सान्वी के साथ मायके आई।
सब लोग बैठक में बैठे थे।
सान्वी खेलते-खेलते अभिषेक के मोबाइल में तस्वीरें देखने लगी।
अचानक उसने एक तस्वीर देखकर कहा, "मामा, यह तो वही हार है ना?"
अभिषेक ने पूछा, "कौन-सा हार?"
सान्वी मासूमियत से बोली, "वही जो मम्मी के पास है। मैंने उनसे पूछा था तो उन्होंने कहा था कि यह हमारे घर का पुश्तैनी हार है।"
पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।
रीमा का चेहरा पीला पड़ गया।
अभिषेक ने गंभीर आवाज़ में पूछा, "रीमा, सच क्या है?"
रीमा घबरा गई।
"नहीं... ऐसी कोई बात नहीं है..."
लेकिन सान्वी फिर बोली, "मम्मी ने मुझे कहा था कि किसी को मत बताना।"
अब रीमा के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा था।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
"भैया... मुझे माफ कर दो," वह रोते हुए बोली।
"मैंने ही हार अपने पास रख लिया था।"
शारदा देवी हैरान रह गईं।
"लेकिन क्यों?" उन्होंने टूटी हुई आवाज़ में पूछा।
रीमा फूट-फूटकर रोने लगी।
"क्योंकि मुझे कविता भाभी से जलन होने लगी थी। घर में सब उनकी तारीफ करते थे। मम्मी भी उन्हें बहुत मानने लगी थीं। मुझे लगता था कि मेरी जगह कोई और ले रहा है। इसलिए मैंने हार छिपा दिया, ताकि सबकी नजरों में भाभी गलत साबित हो जाएँ।"
शारदा देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
"रीमा, तूने सिर्फ अपनी भाभी का नहीं, अपने संस्कारों का भी अपमान किया है।"
फिर वे कविता के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं।
"बहू, मुझे माफ कर दो। मैंने बिना सच जाने तुम्हें और तुम्हारे मायके वालों को कितना कुछ सुना दिया।"
कविता घबरा गई।
उसने तुरंत उनके हाथ पकड़ लिए।
"मम्मी जी, ऐसा मत कीजिए। आप बड़ी हैं। आपको जो सच लगा, आपने उसी पर विश्वास किया।"
शारदा देवी रोते हुए बोलीं, "आज मुझे समझ आया कि हर बार बहू गलत नहीं होती। कभी-कभी अपनी बेटी भी गलत हो सकती है।"
कविता ने धीरे से कहा, "माँ का प्यार बेटी और बहू दोनों के लिए बराबर होना चाहिए। अगर सिर्फ एक की बात सुनकर फैसला लिया जाए, तो रिश्तों में दरार आ जाती है।"
रीमा भी कविता के सामने आकर खड़ी हो गई।
"भाभी, अगर हो सके तो मुझे माफ कर दीजिए।"
कविता ने उसे गले लगा लिया।
"गलती इंसान से होती है दीदी। लेकिन अपनी गलती स्वीकार करना बहुत बड़ी बात होती है।"
उस दिन शारदा देवी ने पूरे परिवार से कहा,
"बहू को बेटी कहना आसान है, लेकिन उसे सच में बेटी जैसा सम्मान देना बहुत मुश्किल होता है। और बेटी से प्यार करना गलत नहीं, मगर उसकी हर बात को बिना सोचे-समझे सच मान लेना भी सही नहीं है।"
उन्होंने कविता का हाथ पकड़कर कहा,
"आज से इस घर में किसी के साथ भी न्याय रिश्ते देखकर नहीं, बल्कि सच देखकर होगा।"
कविता की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में दर्द नहीं, अपनापन था।
बैठक में रखी मेज़ पर वह पुश्तैनी हार फिर से चमक रहा था।
लेकिन उस दिन सबसे ज्यादा चमक किसी गहने में नहीं, बल्कि सच, विश्वास और रिश्तों की मर्यादा में दिखाई दे रही थी।
सीख:
हर घर में बहू को कटघरे में खड़ा कर देना आसान होता है, क्योंकि वह बाहर से आई होती है। लेकिन सच यह है कि गलती किसी से भी हो सकती है—बहू से भी और बेटी से भी। इसलिए निर्णय हमेशा न्याय, विश्वास और सच्चाई के आधार पर लेना चाहिए, न कि रिश्तों के नाम पर। तभी परिवार टूटने से बचते हैं और रिश्तों की असली चमक बनी रहती है।

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