जिसे बोझ कहा, वही निकला घर का मालिक
उस दिन पूजा की थाली सजाते हुए मेरे हाथ अचानक कांप गए, क्योंकि जिस बेटे को मेरे ही रिश्तेदारों ने सबके सामने अपमानित करके घर से निकाल दिया था, उसी के नाम का सच कुछ ही देर बाद पूरे परिवार की दुनिया बदल देने वाला था।
मेरा नाम मीरा है।
आज से चार साल पहले मेरे पति अरविंद की हार्ट अटैक से अचानक मौत हो गई थी। उस समय मेरा बेटा निखिल सिर्फ आठ साल का था। पति के जाने के बाद जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई थी। लेकिन असली दर्द तब हुआ जब अपने ही लोगों ने पराया बना दिया।
मेरे जेठ महेश और जेठानी कविता ने साफ शब्दों में कह दिया था, "अब तुम्हारा और तुम्हारे बेटे का इस घर से क्या रिश्ता? अपने मायके चली जाओ।"
मैंने उस दिन भी कोई जवाब नहीं दिया।
मैं अपने बेटे का हाथ पकड़कर किराए के छोटे से मकान में रहने लगी। सिलाई मशीन पर दिन-रात काम करती थी। पड़ोस की महिलाओं के कपड़े सिलती, बच्चों की यूनिफॉर्म ठीक करती और त्योहारों में मेहंदी लगाती थी।
दिन भर काम और रात भर चिंता।
लेकिन मैंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।
निखिल बहुत समझदार था। वह स्कूल से लौटकर खुद अपना बैग रखता और पूछता, "मां, आज कितने कपड़े सिलने हैं? मैं धागे काट दूं?"
उसकी बातें सुनकर मेरा दिल भर आता था।
मेरे ससुर शिवनाथ जी अक्सर चोरी-छिपे मुझसे मिलने आते थे। वे निखिल के लिए फल लेकर आते और कहते, "बेटी, हिम्मत मत हारना। भगवान सब देख रहा है।"
जब उन्हें लकवा मार गया, तब घर में कोई उनकी देखभाल के लिए तैयार नहीं था।
जेठानी कविता ने बहाना बना दिया कि उसे शहर वापस जाना है।
जेठ बोले कि उन्हें व्यापार संभालना है।
तब मैंने निखिल को साथ लिया और ससुर जी की सेवा में लग गई।
मैं उन्हें खाना खिलाती।
दवाइयां देती।
रात में कई-कई बार उठकर उनके कपड़े बदलती।
कई बार उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा था, "बेटी, मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगा।"
मैं मुस्कुरा देती।
"पिताजी, आप मेरे पिता जैसे हैं। सेवा करना मेरा फर्ज है।"
समय बीतता गया।
निखिल पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसने जिला स्तर की परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त किया। स्कूल में उसका सम्मान हुआ।
मुझे लगा कि अब जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आ रही है।
तभी एक दिन गांव के चौकीदार ने आकर कहा, "मीरा बहू, बड़े घर में सबको बुलाया गया है। पुरानी जमीन-जायदाद का हिसाब होना है।"
मैं जाना नहीं चाहती थी।
लेकिन निखिल ने कहा, "मां, अगर पापा का हिस्सा है तो हमें डरना क्यों चाहिए?"
मैं उसके साथ हवेली पहुंच गई।
हवेली में पहले से रिश्तेदारों की भीड़ लगी हुई थी।
महेश आगे वाली कुर्सी पर बैठे थे।
कविता भारी बनारसी साड़ी पहनकर सबको अपने बेटे की विदेश की नौकरी के बारे में बता रही थी।
हमें देखकर उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"तुम यहां क्यों आई हो?" उसने तिरस्कार से पूछा।
मैंने शांत स्वर में कहा, "बुलावा आया था।"
निखिल चुपचाप एक कोने में बैठ गया।
वह अपने पिता की पुरानी घड़ी हमेशा जेब में रखता था। उसने उसे निकालकर देखने लगा।
इतने में कविता की नजर उस पर पड़ी।
वह तेज कदमों से उसके पास आई।
"उठो यहां से," उसने कहा।
निखिल ने घबराकर पूछा, "क्यों चाची?"
"क्योंकि इस परिवार के फैसलों में तुम्हारी कोई जगह नहीं है।"
"लेकिन ये मेरे दादाजी का घर है," निखिल बोला।
कविता का गुस्सा बढ़ गया।
उसने निखिल की बांह पकड़ ली।
"बहुत जुबान चलने लगी है!"
मैं दौड़कर आगे बढ़ी।
"कविता जी, बच्चा है..."
लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ और कह पाती, उसने निखिल को सबके सामने जोरदार थप्पड़ मार दिया।
पूरा कमरा सन्न रह गया।
निखिल की आंखों में आंसू आ गए।
उसने अपने गाल पर हाथ रखा, लेकिन रोया नहीं।
वह बस मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया।
उसने धीमी आवाज में पूछा, "मां, क्या हम सच में इस घर के नहीं हैं?"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
उसी समय गांव के पुराने वकील त्रिपाठी जी अंदर आए।
उन्होंने अपनी फाइल खोली।
"शिवनाथ प्रसाद जी की अंतिम इच्छा के अनुसार संपत्ति का विवरण पढ़ा जाएगा।"
सब लोग ध्यान से सुनने लगे।
वकील साहब पढ़ते-पढ़ते अचानक रुक गए।
उन्होंने चश्मा उतारा।
फिर दोबारा कागज देखा।
उनके चेहरे पर हैरानी साफ दिखाई दे रही थी।
महेश बेचैन होकर बोले, "क्या हुआ वकील साहब? पढ़िए।"
उन्होंने गहरी सांस ली।
"यहां लिखा है कि..."
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"शिवनाथ प्रसाद जी ने अपनी आधी संपत्ति पहले ही अपने पोते निखिल के नाम कर दी थी।"
कविता के हाथ से पानी का गिलास गिर गया।
महेश खड़े हो गए।
"ये असंभव है!"
वकील साहब ने दूसरा कागज निकाला।
"और यह भी लिखा है कि बाकी आधी संपत्ति की देखरेख की जिम्मेदारी मीरा जी को दी जाती है, जब तक निखिल बालिग नहीं हो जाता।"
रिश्तेदार एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
कविता चीख पड़ी।
"झूठ! ये सब झूठ है!"
त्रिपाठी जी शांत स्वर में बोले, "ये रजिस्टर्ड दस्तावेज हैं।"
महेश ने गुस्से में कहा, "मीरा ने पिताजी को बहकाया होगा!"
तभी पीछे बैठी बुजुर्ग ताई बोलीं, "जब शिवनाथ बीमार थे, तब मीरा ने सेवा की थी। तुम लोगों ने तो मुड़कर भी नहीं देखा था।"
पूरा कमरा खामोश हो गया।
निखिल मेरी ओर देखने लगा।
"मां, दादाजी ने हमें याद रखा था?"
मेरी आंखों से आंसू बह निकले।
"हां बेटा।"
वकील साहब ने एक पुराना लिफाफा मेरी ओर बढ़ाया।
"ये पत्र भी शिवनाथ जी ने छोड़ा था।"
मैंने कांपते हाथों से पत्र खोला।
उसमें लिखा था—
"बेटी मीरा,
जब सबने मुझे अकेला छोड़ दिया था, तब तुमने बिना शिकायत मेरी सेवा की। निखिल ने मुझे दवा दी, मेरे पैर दबाए और मुझे हंसाने की कोशिश की।
मैंने अपने जीवन में बहुत गलतियां कीं, लेकिन यह फैसला सोच-समझकर लिया है।
यह संपत्ति उस बच्चे की है जिसने अपने दादा को बोझ नहीं समझा।
निखिल को अच्छे संस्कार देना।
उसे बताना कि इंसान की पहचान उसके धन से नहीं, उसके व्यवहार से होती है।
तुम मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी हो।
— शिवनाथ प्रसाद"
पत्र पढ़ते-पढ़ते मेरी आवाज भर्रा गई।
कविता पहली बार चुप हो गई।
महेश की आंखें झुक गईं।
निखिल मेरे पास आया और बोला, "मां, दादाजी मुझसे प्यार करते थे न?"
मैंने उसे सीने से लगा लिया।
"बहुत प्यार करते थे बेटा।"
कविता धीरे से बोली, "हमसे गलती हो गई।"
मैंने उसकी ओर देखा।
"गलती वह होती है, जो इंसान अनजाने में कर बैठता है। लेकिन किसी मासूम बच्चे का सबके सामने अपमान करना गलती नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया गया एक गलत फैसला होता है।"
किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
थोड़ी देर बाद सब लोग धीरे-धीरे वहां से चले गए।
हवेली के आंगन में सिर्फ मैं और निखिल रह गए।
निखिल ने अपनी जेब से अपने पिता की पुरानी घड़ी निकाली।
"मां, पापा अगर आज होते तो क्या कहते?"
मैं मुस्कुराई और आंसू पोंछते हुए बोली,
"वो कहते कि बेटा, कभी किसी के साथ वैसा मत करना जैसा लोगों ने तुम्हारे साथ किया।"
निखिल ने सिर हिलाया।
"मैं बड़ा होकर अच्छा इंसान बनूंगा।"
मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा।
उस दिन मुझे समझ आया कि न्याय हमेशा शोर मचाकर नहीं आता।
कभी-कभी वह चुपचाप उन हाथों तक पहुंचता है जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के सेवा की होती है।
धन से बड़ा सम्मान होता है।
और रिश्तों से बड़ा कोई खजाना नहीं।
जिस बच्चे को सबके सामने ठुकरा दिया गया था, उसी बच्चे ने उस हवेली को फिर से घर बना दिया।
उस रात मेरे दिल में पहली बार डर नहीं था।
सिर्फ सुकून था।
और विश्वास था कि देर भले हो जाए, लेकिन ईश्वर के घर न्याय जरूर होता है।

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