सात साल का त्याग, एक झूठ और फिर इंसाफ की जीत
"जिस घर को बचाने के लिए मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा दी, उसी घर की रजिस्ट्री वाले दिन मेरी सास ने सबके सामने कहा — इस औरत का इस मकान पर कोई हक नहीं है।"
उनकी यह बात सुनकर मेरे हाथ में पकड़ी मिठाई की थाली जमीन पर गिर गई।
मेहमानों से भरा हॉल एकदम शांत हो गया।
मैंने अविश्वास से अपनी सास शारदा देवी की तरफ देखा।
"माँ जी, आप क्या कह रही हैं?" मेरी आवाज काँप रही थी।
शारदा देवी ने तिरस्कार से मेरी तरफ देखा।
"सही कह रही हूँ। इस घर की मालकिन मैं हूँ। तू तो बस यहाँ रहने वाली एक पराई औरत है।"
उनके शब्द मेरे सीने में तीर की तरह चुभ गए।
सात साल पहले जब मेरे पति निखिल की हार्ट अटैक से अचानक मौत हुई थी, तब मैं सिर्फ चौबीस साल की थी।
निखिल के जाने के बाद घर पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था।
ससुर जी पहले ही गुजर चुके थे।
घर में सिर्फ मैं, सास शारदा देवी और मेरा देवर करण रह गए थे।
निखिल एक छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक्स दुकान चलाते थे।
उनकी मौत के बाद दुकान पर भी संकट आ गया।
उसी समय शारदा देवी ने मुझे रोते हुए बताया था कि दुकान और मकान दोनों पर भारी कर्ज है।
उन्होंने कहा था कि अगर पैसे नहीं चुकाए गए तो बैंक सब कुछ जब्त कर लेगा।
मैं डर गई थी।
निखिल की आखिरी निशानी को बचाने के लिए मैंने हर संभव कोशिश करने का फैसला किया।
मैंने अपनी बीए की पढ़ाई छोड़ दी।
घरों में ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।
रात को एक कॉल सेंटर में पार्ट टाइम काम करने लगी।
कई-कई दिन ऐसे गुजरते जब मैं सिर्फ चाय और बिस्कुट खाकर काम करती थी।
मेरी कमाई का एक-एक रुपया शारदा देवी को दे देती।
वे कहतीं, "बहू, तेरे कारण ही यह घर बच रहा है।"
मैं खुश हो जाती।
मुझे लगता था कि मैं अपने पति का सपना बचा रही हूँ।
उधर करण की जिंदगी मजे में गुजर रही थी।
वह नई बाइक खरीदता।
महंगे कपड़े पहनता।
दोस्तों के साथ घूमता।
जब मैं पूछती कि इतने पैसे कहाँ से आते हैं, तो सास कहतीं, "तेरे देवर की किस्मत अच्छी है, उसे स्कॉलरशिप मिली है।"
मैं चुप हो जाती।
साल दर साल गुजरते गए।
मैंने अपनी जवानी काम करते हुए बिता दी।
कई अच्छे रिश्ते आए, लेकिन मैंने दूसरी शादी के बारे में सोचा तक नहीं।
मुझे सिर्फ एक चिंता थी — निखिल का घर बचाना।
और आखिर वह दिन आ गया जब शारदा देवी ने घोषणा की कि सारा कर्ज खत्म हो चुका है।
घर की रजिस्ट्री दोबारा परिवार के नाम होने वाली थी।
मैं बहुत खुश थी।
मुझे लगा अब पहली बार मुझे सम्मान मिलेगा।
लेकिन रजिस्ट्री ऑफिस में मेरे साथ वही हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
शारदा देवी ने सबके सामने कहा कि इस घर में मेरा कोई अधिकार नहीं है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मकान सिर्फ उनके और करण के नाम होगा।
मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
"लेकिन माँ जी, मैंने सात साल तक..." मैं बोल भी नहीं पाई।
"तो क्या हुआ?" उन्होंने मेरी बात काट दी।
"तूने जो किया, अपना फर्ज निभाया। उसका मतलब यह नहीं कि तू हमारी जायदाद की मालकिन बन जाएगी।"
करण भी वहीं खड़ा था।
उसने मेरी तरफ देखा तक नहीं।
उसी रात मैं अपना सामान लेकर किराए के एक छोटे से कमरे में चली गई।
मैंने तय कर लिया कि अब कभी पीछे मुड़कर नहीं देखूँगी।
धीरे-धीरे मैंने अपनी जिंदगी फिर से शुरू की।
एक महिला समूह की मदद से मैंने ऑनलाइन हस्तनिर्मित सजावटी सामान बेचना शुरू किया।
शुरुआत में मुश्किलें आईं।
लेकिन मेरा काम लोगों को पसंद आने लगा।
दो साल के अंदर मेरा छोटा सा कारोबार शहर के कई स्टोर्स तक पहुँच गया।
अब मैं पहले से कई गुना ज्यादा कमाने लगी थी।
मेरे पास अपनी कार थी।
अपना छोटा सा ऑफिस था।
और सबसे बड़ी बात, मेरे पास आत्मसम्मान था।
एक दिन मेरे ऑफिस में एक आदमी आया।
उसे देखकर मैं चौंक गई।
वह करण था।
उसका चेहरा बुझा हुआ था।
कपड़े भी साधारण थे।
मैंने पूछा, "क्यों आए हो?"
उसने नजरें झुका लीं।
"भाभी... मुझे आपकी मदद चाहिए।"
मैं चुप रही।
तब उसने बताया कि शारदा देवी ने कुछ साल पहले एक बिल्डर के बहकावे में आकर मकान गिरवी रख दिया था।
बिल्डर पैसे लेकर भाग गया।
अब बैंक मकान नीलाम करने वाला था।
मैंने कड़वाहट से कहा, "तो?"
करण की आँखें भर आईं।
"भाभी, मुझे हाल ही में कुछ पुराने दस्तावेज मिले हैं।"
उसने एक फाइल मेरी तरफ बढ़ाई।
मैंने फाइल खोली।
अंदर जो था, उसे देखकर मेरे होश उड़ गए।
वह बैंक का रिकॉर्ड था।
उसमें साफ लिखा था कि निखिल की मौत के समय किसी भी तरह का कोई कर्ज नहीं था।
बल्कि उनके नाम दस लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट थी।
मैं स्तब्ध रह गई।
मतलब सात साल तक मुझसे झूठ बोला गया था।
मेरी मेहनत का सारा पैसा कर्ज चुकाने में नहीं, बल्कि शारदा देवी और करण की ऐशोआराम की जिंदगी में खर्च हुआ था।
मेरी आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन इस बार दर्द के नहीं, सच जान लेने के थे।
मैंने फाइल बंद की और शांत स्वर में कहा,
"अब तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?"
करण रो पड़ा।
"भाभी, माँ बीमार हैं। मकान भी जाने वाला है। हमें बचा लो।"
मैंने कुछ पल उसकी तरफ देखा।
फिर अपनी कुर्सी से उठी।
खिड़की के बाहर देखा।
और कहा,
"जब मुझे घर से निकाला गया था, तब भी मेरे पास कुछ नहीं था। फिर भी मैंने खुद को संभाल लिया था।"
करण सिर झुकाकर खड़ा रहा।
मैंने फाइल उसकी तरफ वापस बढ़ाई।
"तुम्हारी मदद मैं करूँगी, लेकिन मकान बचाने के लिए नहीं।"
वह चौंका।
"फिर किसलिए?"
मैंने दृढ़ आवाज में कहा,
"सच सामने लाने के लिए।"
कुछ महीनों बाद अदालत में पूरा मामला पहुँचा।
बैंक रिकॉर्ड, पुराने लेन-देन और दस्तावेजों ने साबित कर दिया कि वर्षों तक मेरे साथ धोखा किया गया था।
अदालत ने मेरे पक्ष में फैसला दिया।
मुझे मेरे अधिकार का हिस्सा मिला।
लेकिन सबसे बड़ी जीत जमीन या पैसा नहीं थी।
सबसे बड़ी जीत यह थी कि पहली बार किसी ने मेरी मेहनत की कीमत समझी।
अदालत से बाहर निकलते समय शारदा देवी मेरे सामने आईं।
उनकी आँखों में पछतावा था।
उन्होंने धीमे से कहा,
"बहू, मुझे माफ कर दे।"
मैंने उन्हें देखा।
फिर मुस्कुराकर कहा,
"मैंने आपको बहुत पहले माफ कर दिया था। लेकिन जो समय आपने मुझसे छीना, वह कभी वापस नहीं आएगा।"
इतना कहकर मैं आगे बढ़ गई।
अब मेरे कदमों में डर नहीं था।
मेरे सिर पर किसी का एहसान नहीं था।
मेरे पास सिर्फ मेरी मेहनत, मेरा आत्मसम्मान और मेरी अपनी बनाई हुई पहचान थी।
और यही मेरी सबसे बड़ी जीत थी।

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