जिस बेटे पर शक किया, वही सहारा बन गया
"माँ, अब इस घर की चाबी आप ही संभालिए... हमसे नहीं होगा इतना बड़ा जिम्मा।"
यह कहते हुए अमित ने अलमारी की चाबी अपनी माँ सुशीला देवी के हाथ में रख दी।
सुशीला देवी ने बेटे की ओर देखा और हल्का-सा मुस्कुरा दीं।
पति के निधन को अभी छह महीने ही हुए थे।
पैंतीस साल का साथ एक पल में छूट गया था।
घर वही था, लोग वही थे, लेकिन जीवन जैसे बदल गया था।
सुशीला देवी का एक बेटा अमित था और एक बेटी पूजा।
अमित अपने माता-पिता के साथ ही रहता था।
बहू नेहा भी सुशीला देवी का बहुत सम्मान करती थी।
लेकिन पति के जाने के बाद सुशीला देवी अंदर से टूट गई थीं।
उन्हें हर समय किसी सहारे की जरूरत महसूस होती थी।
ऐसे में बेटी पूजा और उसके पति विकास का घर में आना-जाना बढ़ गया।
वे हर दूसरे दिन मिलने आ जाते।
पहले-पहल तो सुशीला देवी को अच्छा लगा।
उन्हें लगा कि बेटी उनका दुख बाँटना चाहती है।
एक दिन पूजा माँ के पास बैठी और बोली—
"मम्मी, अब आपको बहुत संभलकर रहना होगा।"
"क्यों बेटा?" सुशीला देवी ने पूछा।
"दुनिया बदल जाती है मम्मी। जब तक पापा थे, सब ठीक था। अब आपको अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी।"
सुशीला देवी कुछ समझ नहीं पाईं।
लेकिन अगले कुछ दिनों में पूजा बार-बार ऐसी बातें करने लगी।
"मम्मी, आपने कभी सोचा है... अगर कल को भैया और भाभी ने सारी संपत्ति अपने नाम कर ली, तो आपका क्या होगा?"
सुशीला देवी ने तुरंत कहा—
"नहीं बेटा, अमित ऐसा कभी नहीं कर सकता। मुझे अपने बेटे पर पूरा भरोसा है।"
पूजा हल्की मुस्कान के साथ बोली—
"मम्मी, हर माँ को अपने बच्चों पर भरोसा होता है... लेकिन समय और हालात इंसान को कब बदल दें, कोई नहीं जानता। इसलिए सावधान रहना भी जरूरी है।"
धीरे-धीरे पूजा की बातें सुशीला देवी के मन में घर करने लगीं।
अब जब भी अमित बैंक का कोई काम बताता, उन्हें शक होने लगता।
जब भी बहू नेहा घर के खर्चों की बात करती, उन्हें लगता शायद कोई स्वार्थ है।
उधर अमित और नेहा समझ नहीं पा रहे थे कि माँ अचानक इतनी बदली-बदली क्यों हो गई हैं।
एक दिन अमित ने कहा—
"माँ, बैंक चलना है। पापा के कुछ कागज पूरे करने हैं।"
सुशीला देवी तुरंत बोलीं—
"मुझे सब समझ आता है। बार-बार बैंक ले जाने की जरूरत नहीं।"
अमित चौंक गया।
उसने पहली बार माँ के स्वर में अविश्वास महसूस किया।
धीरे-धीरे माँ और बेटे के बीच दूरी बढ़ती गई।
फिर एक दिन पूजा और विकास ने नया सुझाव दिया।
"मम्मी, अब आपको अपने भविष्य के बारे में सोच लेना चाहिए।"
सुशीला देवी ने हैरानी से पूछा, "क्या मतलब बेटा?"
पूजा उनकी बगल में बैठ गई और धीरे से बोली, "मम्मी, जो कुछ भी पापा ने आपके लिए छोड़ा है, उसे किसी भरोसेमंद इंसान के नाम कर दीजिए, ताकि आगे चलकर कोई परेशानी न हो।"
"लेकिन मैं किस पर भरोसा करूँ?" सुशीला देवी ने उलझन भरे स्वर में पूछा।
पूजा ने उनका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, "मम्मी, हमसे ज़्यादा आपका अपना कौन है? मैं आपकी बेटी हूँ, और विकास आपके दामाद। हम कभी आपका बुरा नहीं सोच सकते। आपकी खुशियाँ और आपकी सुरक्षा ही हमारे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं।"
माँ ने भावुक होकर बेटी की ओर देखा। उन्हें लगा कि बेटी सचमुच उनकी चिंता कर रही है। यहीं से उनके मन का भरोसा धीरे-धीरे बेटी और दामाद की ओर झुकने लगा।
उन्हें लगा बेटी ही तो सबसे ज्यादा चिंता कर रही है।
कुछ ही महीनों में घर, जमीन और बैंक की जमा पूंजी का बड़ा हिस्सा पूजा और विकास के नाम हो गया।
अमित को जब यह बात पता चली तो उसने सिर्फ इतना कहा—
"माँ, जो आपको सही लगे वही कीजिए।"
उसने कोई झगड़ा नहीं किया।
कोई सवाल नहीं पूछा।
लेकिन उसके चेहरे की उदासी माँ ने पहली बार देखी।
समय बीतता गया।
अब पूजा और विकास का व्यवहार बदलने लगा।
पहले जो रोज फोन करते थे, अब हफ्तों तक खबर नहीं लेते।
पहले जो हर बात पर माँ-माँ करते थे, अब मिलने आने से भी कतराने लगे।
एक दिन सुशीला देवी बेटी के घर पहुँचीं।
उन्होंने देखा कि पूजा और विकास कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं।
"बेटा, मैं दो-चार दिन तुम्हारे पास रह जाऊँ?"
पूजा का चेहरा उतर गया।
"मम्मी, अभी घर में बहुत काम है। बाद में आ जाइए।"
सुशीला देवी को अजीब लगा।
लेकिन वे चुप रहीं।
कुछ महीने और बीते।
एक दिन विकास उन्हें कार में बैठाकर कहीं ले गया।
सुशीला देवी ने पूछा—
"बेटा, कहाँ जा रहे हैं?"
"बस, एक अच्छी जगह दिखानी है।"
थोड़ी देर बाद कार एक वृद्धाश्रम के सामने रुकी।
सुशीला देवी का दिल धक से रह गया।
"यहाँ क्यों आए हैं?"
विकास ने नजरें झुका लीं।
तभी पूजा भी कार से उतरी।
उसने धीरे से कहा—
"मम्मी, अब हम आपको अपने साथ नहीं रख सकते।"
सुशीला देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"लेकिन क्यों बेटा...?" सुशीला देवी की आवाज़ कांप रही थी।
"मम्मी, हमारी भी अपनी ज़िंदगी है... अपनी जिम्मेदारियाँ हैं। अब हम आपका बोझ नहीं उठा सकते।" पूजा ने नज़रें झुकाकर कहा।
सुशीला देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
"बोझ...? मैं बोझ बन गई हूँ तुम्हारे लिए? मैंने तो अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हारी खुशियों के लिए लगा दी... जो कुछ था, सब तुम्हें सौंप दिया..."
पूजा के होंठ हिले, लेकिन उसके पास कोई जवाब नहीं था।
वह चुपचाप नज़रें फेरकर खड़ी रही।
उसकी खामोशी ही इस बात का सबसे बड़ा सबूत थी कि स्वार्थ के आगे रिश्तों की कीमत उसके लिए अब कुछ भी नहीं रह गई थी।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ देर बाद वृद्धाश्रम का दरवाजा बंद हो गया।
और सुशीला देवी अंदर एक कमरे में बैठी रह गईं।
उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
उन्हें अपने पति की बातें याद आने लगीं।
एक बार पति ने कहा था—
"रिश्तों की पहचान मुश्किल समय में होती है।"
उस समय उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था।
लेकिन आज हर शब्द सच लग रहा था।
उधर जब अमित को माँ के वृद्धाश्रम में होने की खबर मिली तो वह तुरंत वहाँ पहुँचा।
माँ उसे देखकर फूट-फूटकर रो पड़ीं।
"बेटा, मुझे माफ कर दे। मैंने तुझ पर भरोसा नहीं किया।"
अमित भी रो पड़ा।
उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"माँ, जब बच्चों से गलती होती है तो माँ उन्हें बिना शर्त माफ कर देती है। फिर अगर माँ से कोई गलती हो जाए, तो बेटा उसे माफ करने से कैसे पीछे हट सकता है?"
सुशीला देवी की आँखें भर आईं।
"मैंने तुम्हें बहुत गलत समझा।"
अमित बोला—
"अब पुरानी बातें भूल जाइए। घर चलिए।"
"लेकिन मेरे पास अब कुछ भी नहीं बचा बेटा।"
अमित मुस्कुराया।
"मुझे आपकी जरूरत है माँ, आपकी संपत्ति की नहीं।"
उस दिन अमित अपनी माँ को वापस घर ले आया।
नेहा ने दरवाजे पर आरती की थाली लेकर उनका स्वागत किया।
माँ शर्मिंदा थीं।
लेकिन बहू ने उनके पैर छूकर कहा—
"माँ, घर आपके बिना कभी पूरा नहीं था।"
सुशीला देवी रो पड़ीं।
उन्हें पहली बार समझ आया कि सच्चे रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से पहचाने जाते हैं।
बेटी और दामाद ने जिस संपत्ति को अपना सहारा समझा था, वही बाद में उनके परिवार में झगड़ों का कारण बन गई।
और जिस बेटे-बहू पर उन्होंने शक किया था, वही उनके बुढ़ापे का सबसे बड़ा सहारा बने।
उस दिन सुशीला देवी ने अपनी डायरी में एक बात लिखी—
"रिश्तों की पहचान लालच से नहीं, समय से होती है। जो लोग दुख में साथ खड़े रहें, वही वास्तव में अपने होते हैं। भरोसा जरूर कीजिए, लेकिन किसी की बातों में आकर अपने सच्चे रिश्तों को कभी मत खोइए।"

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