जब बहू ने कहा – अब याद आई कि मैं इस घर की बहू हूँ?
"बहू, पूजा की थाली तैयार कर लो... आज से इस घर की तिजोरी की चाबी तुम्हारे हाथ में रहेगी।"
यह कहते हुए सास उर्मिला देवी ने अलमारी की ओर देखा।
लेकिन उनकी बात सुनकर बहू स्वाति के चेहरे पर कोई खुशी नहीं आई।
वह कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से मुस्कुरा दी।
उस मुस्कान में सम्मान नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा का दर्द छिपा था।
उर्मिला देवी को उसकी मुस्कान कुछ अजीब लगी।
उन्होंने पूछा, "क्या हुआ बहू? तुम्हें खुशी नहीं हुई क्या?"
स्वाति ने उनकी ओर देखा और बोली,
"मम्मी जी, आज अचानक आपको याद आ गया कि मैं इस घर की बहू हूं?"
उर्मिला देवी चौंक गईं।
उन्हें समझ नहीं आया कि स्वाति ऐसा क्यों कह रही है।
दरअसल, स्वाति की शादी को छह साल हो चुके थे।
जब वह इस घर में आई थी तो उसने पूरे मन से परिवार को अपनाने की कोशिश की थी।
हर त्योहार, हर कार्यक्रम और हर फैसले में वह भाग लेना चाहती थी।
उसे लगता था कि धीरे-धीरे वह भी इस घर का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएगी।
लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
घर में कोई भी बड़ा फैसला होता तो उर्मिला देवी अपनी बड़ी बेटी रचना को बुला लेतीं।
रचना शादीशुदा थी और दूसरे शहर में रहती थी।
फिर भी घर की हर खरीदारी, हर निवेश और हर पारिवारिक निर्णय उसी की सलाह से होता था।
स्वाति सिर्फ सुनती रहती।
उससे कभी राय नहीं पूछी जाती।
अगर वह कुछ सुझाव देती तो कह दिया जाता,
"तुम अभी नई हो, तुम्हें इन बातों का अनुभव नहीं है।"
धीरे-धीरे स्वाति ने बोलना कम कर दिया।
फिर एक दिन घर में बड़ी खुशी का मौका आया।
उर्मिला देवी के पति रिटायर हुए थे और परिवार ने उनके सम्मान में एक बड़ा समारोह रखने का फैसला किया।
स्वाति ने सोचा कि इस बार शायद उसे जिम्मेदारी मिलेगी।
उसने कई अच्छे सुझाव भी तैयार किए।
लेकिन हमेशा की तरह सारी व्यवस्था रचना के हाथों में दे दी गई।
सजावट से लेकर मेहमानों की सूची तक सब कुछ वही तय कर रही थी।
स्वाति को सिर्फ रसोई संभालने को कहा गया।
तीन दिनों तक वह सुबह से रात तक काम करती रही।
मेहमानों के लिए नाश्ता, खाना, चाय, मिठाई—सब उसी ने संभाला।
लेकिन जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो सब लोग रचना की तारीफ कर रहे थे।
"वाह बेटा, तुमने तो पूरा कार्यक्रम शानदार बना दिया।"
"तुम्हारे बिना यह सब संभव नहीं था।"
स्वाति एक कोने में खड़ी सब सुन रही थी।
उसके हिस्से में सिर्फ थकान आई थी।
किसी ने यह तक नहीं पूछा कि वह कैसी है।
उस दिन उसके मन में पहली बार गहरी चोट लगी।
उसने महसूस किया कि इस घर में उससे सिर्फ काम लिया जाता है।
उसे सम्मान या अधिकार नहीं दिया जाता।
समय बीतता गया।
कुछ महीनों बाद उर्मिला देवी और उनके पति को एक महीने के लिए तीर्थ यात्रा पर जाना था।
यात्रा पर जाने से पहले उन्होंने परिवार को बैठक के लिए बुलाया।
सब लोग ड्राइंग रूम में बैठे थे।
उर्मिला देवी ने अलमारी से तिजोरी की चाबी निकाली और स्वाति की ओर बढ़ा दी।
"लो बहू, अब घर की सारी जिम्मेदारी तुम्हारे हाथ में रहेगी।"
स्वाति ने चाबी की ओर देखा लेकिन हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उर्मिला देवी ने पूछा,
"क्या हुआ? चाबी क्यों नहीं ले रही?"
स्वाति ने उर्मिला देवी की ओर देखा। उसकी आंखों में वर्षों से दबा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
वह शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोली,
"मम्मी जी, आज अचानक यह जिम्मेदारी मुझे क्यों दी जा रही है?"
उर्मिला देवी ने सहजता से जवाब दिया,
"क्योंकि तुम इस घर की बहू हो, और यह काम घर की बहू का ही होता है।"
स्वाति हल्का सा मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में पीड़ा छिपी थी।
फिर उसने धीरे से कहा,
"सच में मम्मी जी? अगर मैं इस घर की बहू हूं, तो पिछले छह सालों में मुझे यह एहसास कब होने दिया गया?"
"जब घर के बड़े फैसले लिए गए, तब मेरी राय नहीं पूछी गई। जब परिवार की जिम्मेदारियां बांटी गईं, तब मुझे सिर्फ काम सौंपा गया। और जब सम्मान और अधिकार देने की बात आई, तब हमेशा किसी और को आगे रखा गया।"
"आज जब जिम्मेदारी निभाने की बारी आई है, तब आपको याद आ गया कि मैं इस घर की बहू हूं?"
स्वाति की बात सुनकर उर्मिला देवी के चेहरे का रंग उड़ गया।
उनके पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था, क्योंकि पहली बार किसी ने उन्हें उनकी अपनी गलती का आईना दिखाया था।
स्वाति आगे बोली,
"जब घर की खरीदारी होती थी, तब रचना दीदी जिम्मेदार थीं।"
"जब कोई फैसला लेना होता था, तब रचना दीदी जिम्मेदार थीं।"
"जब रिश्तेदारों के सामने परिवार का प्रतिनिधित्व करना होता था, तब भी रचना दीदी जिम्मेदार थीं।"
"और जब दिन-रात मेहनत करके काम करना होता था, तब मैं बहू बन जाती थी।"
कमरे में बैठे सभी लोग चुप थे।
स्वाति पहली बार अपने मन की बात कह रही थी।
उसकी आंखें नम थीं लेकिन आवाज दृढ़ थी।
"मम्मी जी, अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं।"
"अगर किसी को सिर्फ जिम्मेदारियां दी जाएं और अधिकार किसी और को, तो एक दिन उसका मन टूट जाता है।"
उर्मिला देवी के पास कोई जवाब नहीं था।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उन्होंने अनजाने में अपनी बहू के साथ अन्याय किया है।
उन्होंने हमेशा सोचा था कि बेटी से सलाह लेना स्वाभाविक है।
लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि बहू को लगातार किनारे किए जाने से उसे कितना दुख होता होगा।
कुछ देर बाद उर्मिला देवी धीरे से स्वाति के पास आईं।
उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया।
"बहू, शायद मैं सचमुच गलती कर बैठी।"
स्वाति चुप रही।
उर्मिला देवी की आंखें भर आईं।
"मैंने तुम्हें जिम्मेदारियां तो दीं, लेकिन अधिकार नहीं दिए।"
"मुझे लगा था कि तुम समझ जाओगी, लेकिन मैंने कभी तुम्हारे दिल की बात समझने की कोशिश ही नहीं की।"
कमरे में बैठे सभी लोग भावुक हो गए।
रचना भी अपनी जगह से उठी।
वह स्वाति के पास आई और बोली,
"भाभी, मुझे भी माफ कर दीजिए। मुझे कभी एहसास नहीं हुआ कि मेरी वजह से आपको ऐसा महसूस होता होगा।"
स्वाति की आंखों से आंसू बह निकले।
वर्षों का दर्द आज बाहर आ गया था।
उर्मिला देवी ने फिर चाबी उसकी ओर बढ़ाई।
लेकिन इस बार उन्होंने कहा,
"यह चाबी मैं तुम्हें इसलिए नहीं दे रही कि तुम बहू हो।"
"मैं यह चाबी तुम्हें इसलिए दे रही हूं क्योंकि तुमने इस घर के लिए हमेशा ईमानदारी से मेहनत की है और तुम इस सम्मान की हकदार हो।"
स्वाति ने पहली बार मुस्कुराते हुए चाबी स्वीकार कर ली।
उसे चाबी मिलने की खुशी नहीं थी।
खुशी इस बात की थी कि आखिरकार किसी ने उसके योगदान को पहचाना था।
उस दिन के बाद घर में बहुत कुछ बदल गया।
फैसले मिलकर होने लगे।
राय सबकी ली जाने लगी।
और उर्मिला देवी ने एक बात हमेशा के लिए सीख ली—
"बहू को सिर्फ जिम्मेदारियां देकर परिवार नहीं बनाया जा सकता। उसे सम्मान, विश्वास और अधिकार भी देने पड़ते हैं। तभी वह सचमुच उस घर को अपना घर मानती है।"

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