ये घर आपका है, माँ

 

Emotional Indian family celebrating a housewarming ceremony as a son honors his parents by gifting them a beautiful new home during a festive puja.


"माँ, इस बार गृहप्रवेश की पूजा में आपको सिर्फ मेहमान बनकर नहीं आना है... घर की पहली आरती भी आपको ही करनी है।"


यह कहते हुए आदित्य ने अपनी माँ निर्मला देवी के हाथ में पूजा की थाली रख दी।


निर्मला देवी कुछ क्षण तक बेटे का चेहरा देखती रह गईं।


उन्हें समझ नहीं आया कि अचानक आदित्य ऐसा क्यों कह रहा है।


पिछले एक साल से उनके मन में एक चिंता घर किए हुए थी।


आदित्य उनका इकलौता बेटा था।


पति रामनारायण जी ने पूरी जिंदगी मेहनत करके उसे पढ़ाया-लिखाया था।


आज आदित्य एक बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर काम करता था।


उसकी पत्नी साक्षी भी पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी।


शादी के बाद से घर में कभी कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ था।


फिर भी पिछले एक साल से निर्मला देवी का मन बुझा-बुझा रहता था।


कारण था आदित्य का नया घर।


जब आदित्य ने शहर के पॉश इलाके में जमीन खरीदी और नया मकान बनवाना शुरू किया, तब से निर्मला देवी के मन में एक डर बैठ गया था।


उन्हें लगता था कि जैसे ही घर तैयार होगा, बेटा उन्हें छोड़कर अलग रहने चला जाएगा।


शुरुआत में उन्होंने इस बात को नजरअंदाज किया।


लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि घर की हर चर्चा आदित्य और साक्षी के बीच होती थी।


कभी इंटीरियर की बात।


कभी फर्नीचर की बात।


कभी पेंट के रंग की बात।


निर्मला देवी कई बार पास बैठी रहतीं, लेकिन कोई उनसे राय नहीं पूछता।


वह चुपचाप सुनती रहतीं।


एक दिन उन्होंने हिम्मत करके पूछा भी—


"बेटा, घर में पूजा का कमरा कहाँ बनवा रहे हो?"


आदित्य ने जल्दी में जवाब दिया—


"माँ, सब प्लान हो गया है। आप चिंता मत करो।"


बस इतना कहकर वह ऑफिस चला गया।


निर्मला देवी का मन उदास हो गया।


उन्हें लगा शायद अब उनकी जरूरत नहीं रही।


रात को उन्होंने रामनारायण जी से कहा—


"लगता है हमारा समय पूरा हो गया। अब बच्चों की अपनी दुनिया है।"


रामनारायण जी मुस्कुरा दिए।


"तुम हर बात दिल पर ले लेती हो।"


लेकिन सच तो यह था कि उनके मन में भी कहीं न कहीं वही डर था।


समय बीतता गया।


घर लगभग बनकर तैयार हो गया।


साक्षी और आदित्य हर सप्ताह वहाँ जाते।


फोटो खींचते।


वीडियो बनाते।


नई-नई चीजें खरीदते।


गृहप्रवेश की तारीख भी तय हो गई।


पूरे परिवार में उत्साह था।


सिर्फ निर्मला देवी ही थीं जिनके चेहरे पर खुशी दिखाई नहीं देती थी।


उन्हें लगता था कि यह गृहप्रवेश नहीं, बल्कि उनसे दूर जाने की तैयारी है।


आखिर वह दिन भी आ गया।


सुबह-सुबह साक्षी एक सुंदर पैकेट लेकर उनके कमरे में आई।


"माँ, आपके लिए।"


निर्मला देवी ने पैकेट खोला।


अंदर उनकी पसंद की गुलाबी बनारसी साड़ी थी।


बिल्कुल वैसी जैसी उन्हें हमेशा पसंद थी।


"बहुत सुंदर है बेटा।"


उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।


लेकिन आँखों की नमी छिप नहीं सकी।


कुछ देर बाद सभी नए घर के लिए निकल पड़े।


करीब आधे घंटे बाद गाड़ी एक बड़ी और खूबसूरत कोठी के सामने रुकी।


घर सचमुच बहुत सुंदर था।


सफेद रंग की दीवारें।


हरा-भरा लॉन।


सामने फूलों की कतार।


निर्मला देवी ने एक लंबी साँस ली।


उन्होंने मन ही मन खुद को मजबूत किया।


तभी उनकी नजर मुख्य द्वार पर लगी नेमप्लेट पर पड़ी।


और अगले ही पल उनके कदम वहीं रुक गए।


नेमप्लेट पर लिखा था—


"निर्मला-रामनारायण सदन"


उनकी आँखें फैल गईं।


"ये...?"


आवाज गले में ही अटक गई।


आदित्य मुस्कुरा रहा था।


साक्षी भी उन्हें ही देख रही थी।


निर्मला देवी कुछ समझ नहीं पा रही थीं।


तभी साक्षी ने आगे बढ़कर घर की चाबियाँ उनके हाथ में रख दीं।


"माँ, ये घर आपका है।"


निर्मला देवी ने चौंककर उसकी ओर देखा।


"मेरा...?" निर्मला देवी के होंठ काँप उठे। उनकी आँखों में अविश्वास और भावनाओं का सैलाब उमड़ आया।


"हाँ माँ..." आदित्य ने आगे बढ़कर उनका हाथ थाम लिया। उसकी आँखें भी नम थीं।


"जिस घर में हम आज रह रहे हैं, माँ, वह सिर्फ एक मकान नहीं है... वह मेरा बचपन है, मेरी यादें हैं, आपकी ममता और पापा की मेहनत की पहचान है। उसे छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता।"


निर्मला देवी ने हैरानी से बेटे की ओर देखा।


"तो फिर ये नया घर किसके लिए है, बेटा?"


आदित्य मुस्कुराया, फिर धीरे से माँ के हाथ अपने हाथों में लेकर बोला—


"माँ, ये घर मैंने अपने लिए नहीं बनवाया... ये घर मैंने आपके और पापा के लिए बनवाया है। जीवन भर आपने हमारी खुशियों के लिए अपने सपनों से समझौता किया। अब आपकी बारी है अपने सपनों का घर जीने की।"


इतना सुनते ही निर्मला देवी की आँखें भर आईं। वर्षों का दर्द, शिकायत और मन की सारी गलतफहमियाँ आँसुओं के साथ बह निकलीं। वह कुछ कह न सकीं, बस बेटे का चेहरा निहारती रह गईं।


उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था।


आदित्य उन्हें अंदर ले गया।


सबसे पहले उसने एक बड़ा कमरा दिखाया।


कमरे में उनकी पसंद की लकड़ी की अलमारी थी।


एक बड़ी खिड़की थी जहाँ से सुबह का सूरज साफ दिखाई देता था।


पास ही छोटा-सा मंदिर बना था।


और बाहर बालकनी में तुलसी का चौरा।


निर्मला देवी स्तब्ध रह गईं।


"तुम्हें याद था...?"


आदित्य हँस पड़ा।


"माँ, आपको लगता है मैं भूल सकता हूँ?"


फिर वह उन्हें घर के पीछे ले गया।


वहाँ एक छोटा-सा बगीचा था।


गुलाब।


मोगरा।


चमेली।


और कोने में आम का पौधा।


निर्मला देवी की आँखें भर आईं।


सालों पहले उन्होंने कहा था कि रिटायरमेंट के बाद वह एक छोटा-सा बगीचा चाहती हैं।


आदित्य ने वह बात भी याद रखी थी।


उसी समय रामनारायण जी भी वहाँ आ गए।


उन्होंने भावुक होकर पूछा—


"लेकिन बेटा, तुम लोग कहाँ रहोगे?"


आदित्य मुस्कुराया।


"यहीं रहेंगे पापा।"


रामनारायण जी ने हैरानी से पूछा, "मतलब?"


आदित्य मुस्कुराया और बोला, "मतलब यह कि परिवार कहीं बंट नहीं रहा है, पापा। यह नया घर सिर्फ सुविधा के लिए है। मेरे ऑफिस से यह घर काफी पास है, इसलिए काम वाले दिनों में हम यहाँ रहेंगे। लेकिन हमारा पुराना घर हमेशा हमारा ही रहेगा।"


फिर उसने आगे कहा, "हर सप्ताहांत, त्योहार और खास मौके हम सब वहीं साथ बिताएँगे। न आप हमसे दूर होंगे, न हम आपसे। घर बदल सकता है पापा, लेकिन परिवार नहीं।"


यह सुनकर रामनारायण जी की आँखें नम हो गईं। उन्हें एहसास हो गया कि बेटे ने नया घर तो बनाया है, लेकिन रिश्तों की नींव पहले से भी ज्यादा मजबूत रखी है। 


साक्षी ने हँसते हुए कहा—


"और सच बताऊँ पापा, मैं तो दोनों घर छोड़ना ही नहीं चाहती।"


सब हँस पड़े।


तभी उनका सात साल का बेटा आरव दौड़ता हुआ आया।


वह सीधे दादी से लिपट गया।


"दादी, मेरा कमरा देखा आपने?"


"नहीं बेटा।"


"चलो दिखाता हूँ।"


आरव उन्हें ऊपर ले गया।


कमरे में खिलौनों के साथ एक छोटा-सा पलंग भी था।


निर्मला देवी ने पूछा—


"ये दूसरा पलंग किसके लिए है?"


आरव ने तुरंत जवाब दिया—


"आपके लिए।"


"मेरे लिए?"


"हाँ। मैं हर रात आपके साथ कहानी सुनकर सोऊँगा।"


बस।


इतना सुनना था कि निर्मला देवी की आँखों से आँसू बह निकले।


उन्होंने आरव को सीने से लगा लिया।


नीचे पूजा का समय हो गया था।


पंडित जी ने आवाज लगाई—


"गृहलक्ष्मी को बुलाइए।"


निर्मला देवी पीछे हटने लगीं।


"साक्षी करेगी।"


लेकिन साक्षी ने उनका हाथ पकड़ लिया।


"नहीं माँ। इस घर की पहली आरती आप करेंगी।"


आदित्य और रामनारायण जी भी उनके पास आकर खड़े हो गए।


निर्मला देवी ने काँपते हाथों से दीपक उठाया।


उस क्षण उन्हें लगा जैसे वर्षों पहले इस घर में आई उनकी सास का आशीर्वाद आज भी उनके सिर पर है।


उन्होंने भगवान के सामने दीप घुमाया।


मन ही मन कहा—


"हे प्रभु, हर माँ को ऐसा बेटा और हर घर को ऐसा प्यार देना।"


आरती की लौ चमक रही थी।


और उस रोशनी में निर्मला देवी का चेहरा पहली बार पूरी तरह खिल उठा था।


उन्हें समझ आ गया था कि सच्चे संस्कार कभी घर नहीं छोड़ते।


वे तो पीढ़ियों के साथ चलते रहते हैं। 



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