अधिकार चाहिए, तो कर्तव्य भी निभाओ
"बहू, अगर तुम्हें लगता है कि इस घर में तुम्हारी कोई इज्जत नहीं है, तो आज ही अपना फैसला कर लो... लेकिन फैसला लेने से पहले पूरी सच्चाई जान लेना।"
यह कहते हुए सास शारदा देवी ने अपनी बहू रिद्धिमा की ओर देखा।
रिद्धिमा कुछ पल के लिए चुप रह गई।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर सास ऐसा क्यों कह रही हैं।
दरअसल पिछले कुछ महीनों से रिद्धिमा का व्यवहार बदलने लगा था।
शादी के शुरुआती दिनों में वह बहुत समझदार और मिलनसार थी। घर के सभी लोगों का सम्मान करती थी।
लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में यह बात बैठने लगी कि ससुराल वाले उसे उसका हक नहीं दे रहे।
इस सोच के पीछे कोई और नहीं, बल्कि उसका पति करण था।
करण हमेशा उसे भड़काता रहता।
वह कहता,
"देखो रिद्धिमा, मेरे बड़े भाई और भाभी तो पूरा घर संभाल रहे हैं। अगर अभी से अपना अधिकार नहीं मांगा तो बाद में कुछ नहीं मिलेगा।"
रिद्धिमा पहले उसकी बातों पर ध्यान नहीं देती थी।
लेकिन बार-बार एक ही बात सुनते-सुनते उसके मन में भी शंका पैदा हो गई।
एक दिन करण ने कहा,
"तुम मम्मी जी से साफ-साफ कह दो कि हमें अलग हिस्सा चाहिए। ऊपर वाला मकान हमारे नाम कर दें। आखिर इस घर पर मेरा भी अधिकार है।"
रिद्धिमा ने वही किया।
रात के खाने के बाद पूरे परिवार के सामने उसने कहा,
"मम्मी जी, अब हम अलग रहना चाहते हैं। हमें भी घर का हिस्सा चाहिए।"
उसकी बात सुनकर सब हैरान रह गए।
बड़े भाई मोहित ने कुछ नहीं कहा।
भाभी कविता भी चुप रहीं।
लेकिन शारदा देवी सब समझ गईं।
उन्हें महसूस हो गया कि यह रिद्धिमा की नहीं, बल्कि करण की सोच है।
उन्होंने उसी समय कोई बहस नहीं की।
बस मुस्कुराकर बोलीं,
"ठीक है बेटा, अगर तुम्हें हिस्सा चाहिए तो मिल जाएगा।"
करण के चेहरे पर खुशी आ गई।
उसे लगा कि उसकी योजना सफल हो गई।
कुछ ही दिनों में ऊपर का पूरा फ्लोर उन्हें रहने के लिए दे दिया गया।
करण और रिद्धिमा खुशी-खुशी वहाँ शिफ्ट हो गए।
उन्हें लग रहा था कि अब वे अपने मन के मालिक हैं।
लेकिन असली सीख अभी बाकी थी।
शिफ्ट होने के दो दिन बाद शारदा देवी ऊपर पहुँचीं।
उन्होंने दोनों को बुलाया और बोलीं,
"बेटा, अब जब तुम लोग अलग रह रहे हो तो कुछ नई जिम्मेदारियाँ भी होंगी।"
करण मुस्कुराकर बोला,
"जी मम्मी जी, बताइए।"
शारदा देवी ने कहा,
"अब तक पूरे घर का बिजली बिल, पानी का बिल, टैक्स और मरम्मत का खर्च तुम्हारे बड़े भाई उठाते थे।"
"लेकिन अब ऊपर का फ्लोर तुम्हारे पास है, इसलिए कुल खर्च का आधा हिस्सा तुम्हें देना होगा।"
करण का चेहरा थोड़ा उतर गया।
शारदा देवी आगे बोलीं,
"और हां, नीचे मैं और तुम्हारे पिताजी रहते हैं। उम्र हो गई है। कभी अस्पताल जाना पड़े या कोई काम हो तो महीने में आधी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी।"
करण चुप हो गया।
रिद्धिमा भी कुछ नहीं बोली।
फिर शारदा देवी ने एक फाइल उनके सामने रख दी।
उसमें पिछले कई सालों के खर्च का हिसाब था।
घर की मरम्मत, टैक्स, पिताजी के इलाज, बहन की पढ़ाई और कई अन्य खर्च।
रिद्धिमा हैरान रह गई।
उसे पहली बार पता चला कि घर चलाना सिर्फ अधिकार लेने का नाम नहीं होता।
उस रात उसने देखा कि बड़े भाई मोहित देर रात तक ऑफिस का काम कर रहे थे।
सुबह पाँच बजे उठकर पिताजी को डॉक्टर के पास भी वही ले गए।
भाभी कविता पूरे परिवार का ध्यान रख रही थीं।
लेकिन कभी किसी ने अपने त्याग का हिसाब नहीं गिनाया।
धीरे-धीरे रिद्धिमा को अपनी गलती समझ आने लगी।
एक दिन उसने करण से कहा,
"हमने कभी सोचा ही नहीं कि इस घर के लिए भैया-भाभी कितना कुछ करते हैं।"
लेकिन करण का अहंकार अभी भी कम नहीं हुआ था।
वह बोला,
"यह सब उनका कर्तव्य है।"
कुछ ही हफ्तों बाद एक नई समस्या खड़ी हो गई।
मकान की छत से बरसात का पानी टपकने लगा था।
मरम्मत का खर्च लगभग डेढ़ लाख रुपये था।
शारदा देवी ने कहा,
"अब आधा हिस्सा तुम्हारा है, इसलिए आधा खर्च भी तुम्हें देना होगा।"
यह सुनते ही करण के होश उड़ गए।
उसके पास इतनी बचत नहीं थी।
वह खर्च से बचने के बहाने ढूंढ़ने लगा।
तब पहली बार रिद्धिमा ने उसका विरोध किया।
उसने कहा,
"जब हिस्सा लेने में हम पीछे नहीं हटे थे, तो जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं?"
करण चुप हो गया।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे।
उसी शाम रिद्धिमा नीचे गई।
उसने शारदा देवी के सामने हाथ जोड़ दिए।
उसकी आंखों में आंसू थे।
वह बोली,
"मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने बिना सोचे-समझे अधिकार मांग लिया। लेकिन अब समझ आया है कि परिवार सिर्फ हिस्सों से नहीं चलता, जिम्मेदारियों से चलता है।"
शारदा देवी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।
"गलती हर इंसान से होती है बेटा। लेकिन जो अपनी गलती समझ ले, वही सबसे समझदार होता है।"
इतने में करण भी नीचे आ गया।
उसका सिर झुका हुआ था।
वह बोला,
"मम्मी जी, मुझे भी माफ कर दीजिए। लालच में आकर मैंने रिश्तों की कीमत भूल गया था।"
शारदा देवी मुस्कुरा दीं।
उन्होंने कहा,
"बेटा, घर दीवारों से नहीं, दिलों से बनता है। जिस दिन लोग घर को संपत्ति समझने लगते हैं, उस दिन रिश्ते कमजोर होने लगते हैं।"
कुछ दिनों बाद करण और रिद्धिमा फिर से पूरे परिवार के साथ रहने लगे।
अब वे अधिकार से ज्यादा अपने कर्तव्यों की बात करते थे।
घर का माहौल फिर से खुशियों से भर गया।
और उस दिन सभी ने एक बात अच्छी तरह समझ ली—
"जो व्यक्ति केवल अपना हक देखता है, वह रिश्ते खो देता है। लेकिन जो अपने कर्तव्य निभाता है, उसे सम्मान और प्यार दोनों मिलते हैं।"
कहानी की सीख:
हक और अधिकार मांगना गलत नहीं है, लेकिन हर अधिकार के साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। जो इंसान जिम्मेदारियों से भागता है, वह अंततः सम्मान भी खो देता है।

Post a Comment