सात साल का इंतज़ार
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में एक पुराना दोमंज़िला घर था।
घर के सामने एक नीम का पेड़ खड़ा था।
उस घर में सिर्फ दो लोग रहते थे—75 साल के रघुनाथ बाबू और 71 साल की उनकी पत्नी कमला।
हर सुबह ठीक 5:30 बजे कमला जी उठतीं।
रसोई में चाय चढ़ातीं।
और फिर घर की सबसे बड़ी खिड़की खोल देतीं।
वही खिड़की जो सड़क की तरफ खुलती थी।
रघुनाथ बाबू कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ जाते।
दो कप चाय।
दो बूढ़े लोग।
और खुली खिड़की।
मोहल्ले वालों को यह आदत अजीब लगती थी।
बारिश हो, ठंड हो या गर्मी।
खिड़की हर हाल में खुलती थी।
एक दिन पड़ोस की रीना ने पूछ ही लिया—
"काकी, इतनी सुबह खिड़की क्यों खोलती हो?"
कमला मुस्कुरा दीं।
"क्योंकि बेटे का इंतज़ार उम्र के साथ खत्म नहीं होता, बस खिड़कियों और आँखों में बस जाता है।"
रीना चौंक गई।
क्योंकि उनका बेटा तो पिछले सात साल से कनाडा में रहता था।
बेटा जो हमेशा जल्दी उठता था...
उनका बेटा विवेक बचपन से ही अलग था।
सुबह सबसे पहले उठना।
छत पर दौड़ लगाना।
फिर नीम के पेड़ पर बैठे तोतों को देखना।
स्कूल जाने से पहले माँ के हाथ की चाय की एक घूंट पीना।
कमला हर बार डाँटतीं—
"अरे, बच्चे चाय नहीं पीते।"
विवेक हँसकर कहता—
"मैं बच्चा कहाँ हूँ?"
और फिर स्कूल भाग जाता।
रघुनाथ बाबू सरकारी स्कूल में अध्यापक थे।
पैसे ज्यादा नहीं थे।
लेकिन उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कभी कमी नहीं आने दी।
रात को खुद ट्यूशन पढ़ाते।
दिन में स्कूल जाते।
और जो बचता, वह विवेक की किताबों पर खर्च हो जाता।
विवेक पढ़ाई में तेज था।
इंजीनियरिंग में चयन हुआ।
फिर छात्रवृत्ति मिली।
और कुछ साल बाद नौकरी के लिए कनाडा चला गया।
पूरा मोहल्ला स्टेशन तक छोड़ने आया था।
कमला रो रही थीं।
विवेक ने हँसते हुए कहा—
"माँ, ऐसे मत रोओ। वीडियो कॉल है, फोन है। मैं रोज़ बात करूँगा।"
कमला ने सिर हिलाया।
लेकिन उन्हें पता था—
फोन की आवाज़ और सामने बैठे बेटे की आवाज़ में बहुत फर्क होता है।
शुरुआती साल...
पहले कुछ साल सब ठीक चला।
रोज़ फोन।
हर रविवार वीडियो कॉल।
त्योहार पर लंबी बातें।
विवेक अपने नए घर की तस्वीरें भेजता।
बर्फ दिखाता।
नई नौकरी की बातें करता।
कमला पूरे मोहल्ले को तस्वीरें दिखातीं।
"देखो, मेरा बेटा कितना अच्छा लग रहा है।"
रघुनाथ बाबू चुपचाप मुस्कुराते।
फिर जिंदगी तेज होने लगी।
विवेक की शादी हो गई।
बच्चे हो गए।
काम बढ़ गया।
फोन कम होने लगे।
पहले रोज़।
फिर हफ्ते में।
फिर महीने में।
फिर कभी-कभी।
कमला शिकायत नहीं करती थीं।
लेकिन हर शाम फोन की तरफ देखती जरूर थीं।
एक दिन कमला पुराने एल्बम देख रही थीं।
उन्हें एक तस्वीर मिली।
दस साल का विवेक।
नीम के पेड़ के नीचे खड़ा।
हाथ में स्कूल बैग।
चेहरे पर मुस्कान।
तस्वीर देखते ही उनकी आँखें भर आईं।
अगली सुबह उन्होंने खिड़की खोल दी।
वही खिड़की जिसके पास खड़े होकर विवेक स्कूल बस का इंतज़ार करता था।
वह सड़क को देखने लगीं।
कुछ नहीं था।
बस खाली सड़क।
लेकिन उन्हें लगा जैसे अभी विवेक दौड़ता हुआ आएगा और कहेगा—
"माँ, जल्दी करो, बस आ गई।"
उस दिन से खिड़की रोज़ खुलने लगी।
मोहल्ले की आदत...
धीरे-धीरे यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई।
बच्चे स्कूल जाते हुए हाथ हिलाते।
दूधवाला नमस्ते करता।
अखबार वाला मुस्कुराता।
रघुनाथ बाबू सबको जवाब देते।
लेकिन उनकी नजर अक्सर सड़क पर ही रहती।
जैसे किसी का इंतज़ार हो।
एक अनजान मुलाकात...
सामने वाले घर में नया किरायेदार आया।
नाम था रोहित।
वह आईटी कंपनी में काम करता था।
घर से दूर रहता था।
एक दिन उसने पूछा—
"काका, आप रोज़ इस सड़क को इतनी देर तक क्यों देखते रहते हैं?"
रघुनाथ बाबू ने सड़क पर टिकाई अपनी नज़रें हटाए बिना मुस्कुराकर कहा,
"क्योंकि मेरा बेटा इसी रास्ते से होकर स्कूल जाता था... फिर कॉलेज गया... और एक दिन इसी रास्ते से अपने सपनों की उड़ान भरने निकल गया।"
रोहित ने हैरानी से पूछा,
"लेकिन वो तो अब विदेश में रहता है न?"
रघुनाथ बाबू ने गहरी साँस ली और धीरे से बोले,
"हाँ बेटा, वह विदेश में है... लेकिन कुछ रास्ते कभी खाली नहीं होते। उन पर चलने वाले लोग भले दूर चले जाएँ, उनकी यादें रोज़ लौट आती हैं।"
रोहित कुछ नहीं बोला।
उस दिन पहली बार उसने अपनी माँ को फोन किया।
एक अधूरा त्योहार...
2024 की दिवाली थी।
विवेक ने आने का वादा किया था।
कमला ने उसके पसंद के लड्डू बनाए।
कमरा साफ किया।
नई चादर बिछाई।
लेकिन आखिरी समय पर फोन आया।
"माँ, छुट्टी नहीं मिली।"
कमला ने कहा—
"कोई बात नहीं बेटा।"
फोन कटते ही वह रसोई में चली गईं।
और चुपचाप बैठ गईं।
रघुनाथ बाबू ने पहली बार देखा कि लड्डुओं की थाली पर आँसू गिर रहे हैं।
रोहित का फैसला...
उस शाम रोहित मिठाई लेकर आया।
उसने कहा—
"काकी, अगर बुरा न मानो तो मैं थोड़ी देर बैठ जाऊँ?"
कमला ने सिर हिला दिया।
तीनों ने साथ चाय पी।
बातें कीं।
और कई साल बाद घर में फिर से हँसी सुनाई दी।
उस दिन के बाद रोहित रोज़ कुछ देर उनके पास बैठने लगा।
वह सुबह...
जनवरी 2026।
ठंडी सुबह थी।
कमला बीमार पड़ गईं।
डॉक्टर ने आराम करने को कहा।
लेकिन अगले दिन भी उन्होंने खिड़की खोली।
रघुनाथ बाबू ने कहा—
"आज मत खोलो।"
कमला मुस्कुराईं।
"अगर मैं नहीं खोलूँगी तो विवेक को कैसे पता चलेगा कि घर जाग गया है?"
वापसी...
मार्च 2026।
एक सुबह हमेशा की तरह खिड़की खुली।
दो कप चाय रखी गई।
रघुनाथ बाबू कुर्सी पर बैठे।
कमला सड़क देखने लगीं।
तभी एक टैक्सी आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
एक आदमी उतरा।
साथ में एक छोटी बच्ची।
कमला कुछ सेकंड तक देखती रहीं।
फिर उनके हाथ से कप छूट गया।
"विवेक..."
सात साल बाद बेटा सामने खड़ा था।
बालों में हल्की सफेदी।
आँखों में नमी।
वह दौड़कर आया और माँ को गले लगा लिया।
उस शाम विवेक ने कहा—
"माँ, मैं वापस आ गया हूँ।"
कमला ने पूछा—
"हमेशा के लिए?"
विवेक ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
रघुनाथ बाबू ने पहली बार खुलकर रोया।
उन्होंने कहा—
"बेटा, हमें तुमसे पैसे नहीं चाहिए थे। बस कभी-कभी खिड़की के सामने खड़ा हो जाया करो।"
विवेक कुछ नहीं बोल पाया।
आज भी उस घर की खिड़की सुबह 5:30 बजे खुलती है।
फर्क सिर्फ इतना है कि अब वहाँ तीन कप चाय रखे जाते हैं।
कभी-कभी चौथा कप भी।
क्योंकि अब छोटी पोती भी साथ बैठती है।
मोहल्ले वाले पूछते हैं—
"काका, अब भी खिड़की क्यों खोलते हो?"
रघुनाथ बाबू मुस्कुरा देते हैं।
"पहले इंतज़ार के लिए खोलते थे, अब शुक्रिया कहने के लिए खोलते हैं।"
इस कहानी का सार सिर्फ इतना है—
बूढ़े माँ-बाप को हमेशा पैसों की जरूरत नहीं होती।
उन्हें यह एहसास चाहिए कि उनका बच्चा उन्हें भूला नहीं है।
कई घरों में दरवाज़े बंद नहीं होते, खिड़कियाँ खुली रहती हैं।
क्योंकि कोई माँ अब भी सड़क की तरफ देखती है।
और कोई पिता अब भी यह सोचता है कि शायद आज बेटे का फोन जल्दी आ जाए।

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