जब बहू ने सास को रिश्तों की असली कीमत सिखाई
"बहू, इस घर की बहुएँ शादी के बाद अपने मायके का बोझ ससुराल पर नहीं डालतीं... तुम्हारे पिता की मदद करने के लिए जो पैसा खर्च हुआ है, उसका हिसाब एक दिन तुम्हें जरूर चुकाना पड़ेगा।"
सास सावित्री देवी की यह बात सुनकर पूजा के हाथ कांप गए।
अभी कुछ ही देर पहले वह अपने पिता से फोन पर बात करके आई थी।
उसके पिता अस्पताल में भर्ती थे।
दिल का ऑपरेशन होना था।
डॉक्टरों ने जल्दी पैसे जमा करने को कहा था।
पूजा अपने पति अमित से मदद मांगना चाहती थी, लेकिन उससे पहले ही सावित्री देवी ने सबके सामने यह बात कह दी।
बैठक में रिश्तेदार बैठे थे।
सभी की नजरें पूजा पर टिक गईं।
पूजा ने सिर झुका लिया।
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
उसे अच्छी तरह याद था कि शादी के समय उसके पिता ने अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च किया था।
फिर भी ससुराल वालों को कभी संतोष नहीं हुआ।
हर बार उन्हें लगता था कि कुछ न कुछ कम रह गया।
पूजा एक साधारण परिवार की लड़की थी।
उसके पिता रमेश बाबू सरकारी स्कूल में शिक्षक थे।
वे इतने ईमानदार थे कि पूरी नौकरी के दौरान उन्होंने कभी एक भी रुपया गलत तरीके से नहीं कमाया था।
वहीं अमित का परिवार शहर के बड़े व्यापारियों में गिना जाता था।
अमित पढ़ा-लिखा और समझदार लड़का था।
वह पूजा से प्रेम करता था।
दोनों की मुलाकात एक सामाजिक कार्यक्रम में हुई थी।
धीरे-धीरे दोस्ती हुई और फिर शादी की बात आगे बढ़ी।
अमित ने घर वालों से साफ कह दिया था कि वह शादी करेगा तो सिर्फ पूजा से।
सावित्री देवी इस रिश्ते से खुश नहीं थीं।
उन्हें अपने बेटे के लिए किसी अमीर घर की लड़की चाहिए थी।
लेकिन बेटे की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा।
हालांकि उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था कि शादी में लड़की वालों से जितना हो सकेगा, उतना खर्च करवाया जाएगा।
रिश्ता तय होने के बाद छोटी-छोटी मांगें शुरू हो गईं।
कभी महंगे फर्नीचर की बात।
कभी सोने के गहनों की।
कभी रिश्तेदारों के लिए विशेष उपहारों की।
रमेश बाबू हर बार मुस्कुराकर कहते,
"बेटी की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।"
और अपनी बचत से पैसे निकालते जाते।
पूजा को इन बातों का अंदाजा था।
लेकिन पिता हमेशा कहते,
"तू चिंता मत कर बिटिया।"
शादी धूमधाम से हुई।
पूजा अपने नए घर आ गई।
शुरू के कुछ दिन अच्छे रहे।
फिर धीरे-धीरे सावित्री देवी का असली स्वभाव सामने आने लगा।
हर बात में तुलना।
हर बात में ताना।
"अरे बहू, तुम्हारे मायके वालों ने दिया ही क्या है?"
"इतने बड़े घर में शादी हुई है तुम्हारी, लेकिन तुम्हारे घर वालों ने हमारे मान-सम्मान के लायक कुछ भी नहीं किया।"
"शर्मा जी की बहू तो कार लेकर आई थी, और गुप्ता जी की बहू इतने गहने लाई थी कि सब देखते रह गए थे... और तुम?"
"हर बार तुम्हारे मायके का नाम आते ही हमें शर्मिंदगी महसूस होती है।"
सावित्री देवी के ऐसे ताने लगभग रोज़ सुनने को मिलते थे।
कभी सुबह की चाय पर, कभी रसोई में काम करते समय और कभी रिश्तेदारों के सामने।
पूजा सब कुछ चुपचाप सुन लेती।
वह जानती थी कि उसकी एक बात भी घर में नया विवाद खड़ा कर सकती है।
इसलिए वह अपने मन का दर्द अपने तक ही सीमित रखती और बिना कुछ कहे अपने काम में लगी रहती।
उसे लगता था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
एक दिन रमेश बाबू को अचानक सीने में दर्द उठा।
उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
डॉक्टर ने बताया कि जल्द ऑपरेशन करना होगा।
खर्च बहुत ज्यादा था।
पूजा की मां घबरा गईं।
छोटा भाई अभी कॉलेज में पढ़ रहा था।
घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी।
पूजा को जब यह खबर मिली तो उसकी दुनिया हिल गई।
उसने तुरंत अमित को फोन किया।
अमित ने बिना देर किए कहा,
"पापा हमारे भी हैं। इलाज जरूर होगा।"
लेकिन यह बात सावित्री देवी को पसंद नहीं आई।
उन्होंने साफ कह दिया,
"हम कोई बैंक नहीं हैं जो हर समय पैसे बांटते रहें।"
अमित हैरान रह गया।
"मां, इंसानियत भी कोई चीज होती है।"
लेकिन सावित्री देवी नहीं मानीं।
उस रात पूजा बहुत रोई।
उसे अपने पिता का चेहरा याद आ रहा था।
वह पिता जिसने उसकी हर इच्छा पूरी की थी।
जिसने खुद पुराने कपड़े पहने लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कभी कमी नहीं आने दी।
अगली सुबह पूजा ने एक फैसला लिया।
उसने अपने सारे गहने निकाल लिए।
शादी में मिले लगभग सभी गहने।
कुछ उसकी मां ने दिए थे।
कुछ नानी ने।
कुछ रिश्तेदारों ने।
वह उन्हें बेचकर पिता का इलाज करवाना चाहती थी।
जब सावित्री देवी को यह बात पता चली तो घर में तूफान आ गया।
"यह सब इस घर की इज्जत है।"
"तुम गहने नहीं बेच सकती।"
सावित्री देवी चिल्लाईं।
लेकिन इस बार पूजा चुप नहीं रही।
उसने पहली बार सास की आंखों में आंखें डालकर कहा,
"मां जी, इन गहनों की कीमत मेरे पिता की जिंदगी से ज्यादा नहीं है। जिन्होंने मुझे चलना सिखाया, पढ़ाया-लिखाया और हर मुश्किल में मेरा साथ दिया, आज अगर उनकी जान बचाने के लिए मुझे सब कुछ बेचना पड़े, तो मैं एक पल भी नहीं सोचूंगी।"
अमित ने भी पत्नी का साथ दिया।
दोनों ने गहने बेच दिए।
इलाज शुरू हो गया।
कुछ दिनों बाद ऑपरेशन सफल रहा।
रमेश बाबू खतरे से बाहर थे।
पूजा और अमित ने राहत की सांस ली।
लेकिन घर लौटने पर उनके लिए एक और मुश्किल इंतजार कर रही थी।
सावित्री देवी ने पूरे परिवार के सामने घोषणा कर दी,
"अगर बहू को अपने मायके की इतनी ही चिंता है तो वह वहीं जाकर रहे।"
पूरा घर सन्न रह गया।
अमित ने शांत स्वर में कहा,
"मां, आपने मुझे हमेशा परिवार की कीमत सिखाई थी।"
"आज मैं वही कर रहा हूं।"
"अगर पत्नी अपने पिता की मदद करे तो वह गलत कैसे हो गई?"
सावित्री देवी के पास कोई जवाब नहीं था।
उन्होंने गुस्से में मुंह फेर लिया।
कुछ महीनों बाद रमेश बाबू पूरी तरह स्वस्थ हो गए।
उधर अमित और पूजा ने मेहनत करके अपना अलग घर बसाया।
दोनों नौकरी करते थे।
धीरे-धीरे उनकी जिंदगी फिर से सामान्य होने लगी।
समय बीतता गया।
फिर एक दिन सावित्री देवी अचानक बीमार पड़ गईं।
उन्हें देखभाल की जरूरत थी।
जिन रिश्तेदारों पर उन्हें बड़ा भरोसा था, वे धीरे-धीरे दूर हो गए।
तब सबसे पहले अस्पताल पहुंचने वाली कोई और नहीं, बल्कि पूजा थी।
पूजा ने दिन-रात उनकी सेवा की।
दवाइयों से लेकर अस्पताल के खर्च तक सब संभाला।
एक दिन सावित्री देवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।
उन्होंने पूजा का हाथ पकड़कर कहा,
"बहू, मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया।"
"फिर भी तुमने मेरा साथ नहीं छोड़ा।"
पूजा मुस्कुराई।
"मां, रिश्ते हिसाब-किताब से नहीं चलते।"
"अगर चलते, तो शायद आज मैं यहां नहीं होती।"
सावित्री देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
उन्हें पहली बार समझ आया कि बेटी और बहू में फर्क करने वाले लोग अक्सर रिश्तों की असली कीमत कभी नहीं समझ पाते।
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
सावित्री देवी ने हर जगह स्वीकार किया कि बहू कोई पराई नहीं होती।
और पूजा ने साबित कर दिया कि सम्मान दहेज से नहीं, बल्कि इंसानियत और प्रेम से कमाया जाता है।
शिक्षा:
दहेज, दिखावा और पैसों का घमंड रिश्तों को कमजोर कर देता है। सच्चा परिवार वही है जो मुश्किल समय में साथ खड़ा रहे। बेटी हो या बहू, उनका सम्मान करना ही घर की सबसे बड़ी संपत्ति है।

Post a Comment