जब परिवार ने बहू को उसके सपने लौटा दिए
बरसात की हल्की फुहारें खिड़की के शीशों पर दस्तक दे रही थीं।
सुबह के सात बजे थे।
घर के बाकी लोग अभी नींद में थे, लेकिन पूजा की सुबह हमेशा की तरह शुरू हो चुकी थी।
रसोई में गैस पर चाय चढ़ी हुई थी।
एक तरफ नाश्ते की तैयारी चल रही थी, दूसरी तरफ बच्चों के टिफिन बन रहे थे।
पूजा के हाथ लगातार काम कर रहे थे, लेकिन उसकी नजर बार-बार रसोई के कोने में रखी एक पुरानी सिलाई मशीन पर जा रही थी।
वह मशीन पिछले कई वर्षों से वहीं रखी थी।
उस पर अब धूल की एक मोटी परत जम चुकी थी।
कभी वह मशीन पूजा की सबसे प्यारी साथी हुआ करती थी।
शादी से पहले पूरे मोहल्ले में पूजा के बनाए कपड़ों की चर्चा होती थी।
किसी की फ्रॉक हो, किसी का सूट या किसी की शादी का लहंगा...
पूजा अपने हुनर से साधारण कपड़े को भी खूबसूरत बना देती थी।
उसका सपना था कि एक दिन उसका अपना छोटा सा बुटीक होगा।
लेकिन शादी के बाद जिंदगी बदल गई।
घर, जिम्मेदारियां, बच्चे, बुजुर्गों की देखभाल...
धीरे-धीरे सिलाई मशीन पर कपड़े कम और धूल ज्यादा जमा होने लगी।
और एक दिन ऐसा आया जब पूजा ने खुद ही मान लिया कि अब वह सपना सिर्फ सपना ही रहेगा।
उसी दिन दोपहर को उसकी दस साल की बेटी सिया स्कूल से लौटी।
स्कूल में अगले सप्ताह "मदर्स टैलेंट डे" होने वाला था।
सिया खुशी-खुशी दौड़ती हुई रसोई में आई।
"मम्मी, हमारी मैडम ने कहा है कि हर बच्चा अपनी मम्मी का कोई टैलेंट स्टेज पर बताएगा।"
पूजा मुस्कुराई।
"अच्छा? तो तुम क्या बताओगी?"
सिया कुछ पल चुप रही।
फिर मासूमियत से बोली,
"मम्मी... आपके अंदर कौन सा टैलेंट है?"
यह सवाल सुनकर पूजा जैसे कुछ पल के लिए जम गई।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल की सबसे पुरानी किताब खोल दी हो।
लेकिन अगले ही पल उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
"अरे बेटा, मम्मियां कोई टैलेंट नहीं करतीं। हम तो बस घर संभालते हैं।"
सिया ने तुरंत सिर हिलाया।
"नहीं मम्मी, सबकी मम्मियों का कोई ना कोई टैलेंट है। कोई गाती है, कोई पेंटिंग बनाती है, कोई डांस करती है। आपका क्या है?"
पूजा के पास जवाब नहीं था।
वह सिर्फ मुस्कुरा दी।
लेकिन यह बातचीत उसके पति रोहन ने भी सुन ली थी।
रात को जब सभी सो गए, तब रोहन देर तक जागता रहा।
उसे याद आया कि शादी के शुरुआती दिनों में पूजा घंटों सिलाई किया करती थी।
नए-नए डिजाइन बनाती थी।
कपड़ों पर कढ़ाई करती थी।
और हर बार उसकी आंखों में एक अलग चमक दिखाई देती थी।
लेकिन पिछले कई वर्षों से वह चमक कहीं गायब हो गई थी।
अगली सुबह रोहन ऑफिस जाने के बजाय बाजार चला गया।
दोपहर तक वह घर लौटा तो उसके साथ दो लोग और थे।
उनके हाथों में बड़े-बड़े डिब्बे थे।
पूजा हैरानी से देखने लगी।
"यह सब क्या है?"
रोहन मुस्कुराया।
"खोलकर देख लो।"
जब डिब्बे खुले तो पूजा की आंखें फैल गईं।
अंदर नई डिजाइनिंग किट, रंग-बिरंगे धागे, कढ़ाई के फ्रेम और एक बिल्कुल नई इलेक्ट्रिक सिलाई मशीन थी।
पूजा कुछ समझ नहीं पा रही थी।
"इतना सब क्यों?"
रोहन ने धीरे से कहा,
"क्योंकि मैं नहीं चाहता कि सिया अगले हफ्ते स्कूल में जाकर यह कहे कि उसकी मम्मी के पास कोई टैलेंट नहीं है।"
पूजा की आंखें भर आईं।
लेकिन रोहन अभी रुका नहीं।
उसने एक और कागज पूजा के हाथ में रखा।
वह पास के सामुदायिक केंद्र में होने वाले फैशन और डिजाइनिंग मेले का पंजीकरण फॉर्म था।
"मैंने तुम्हारा नाम लिखवा दिया है।"
पूजा चौंक गई।
"मैं? इतने साल बाद?" पूजा ने अविश्वास से पूछा।
"हाँ, तुम।" रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा।
"लेकिन घर का काम?" पूजा की आवाज़ में झिझक थी।
"घर सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है, पूजा। हम सब मिलकर संभाल लेंगे।" रोहन ने भरोसा दिलाया।
"और बच्चे?"
"उनकी चिंता भी छोड़ दो। स्कूल, होमवर्क और बाकी काम मैं देख लूँगा।"
पूजा कुछ पल चुप रही। फिर धीमे से बोली,
"लेकिन मां जी... उन्हें यह सब अच्छा लगेगा?"
तभी पीछे से एक स्नेहभरी आवाज़ सुनाई दी।
"क्यों नहीं अच्छा लगेगा, बहू?"
पूजा ने मुड़कर देखा। दरवाज़े पर उसकी सास खड़ी थीं। उनके चेहरे पर अपनापन और गर्व साफ झलक रहा था। वे आगे बढ़ीं, पूजा के कंधे पर हाथ रखा और बोलीं,
"बेटी, तुमने इस घर और परिवार के लिए बहुत कुछ किया है। अब समय आ गया है कि तुम अपने लिए भी थोड़ा जीओ। तुम्हारे सपने सिर्फ तुम्हारे नहीं हैं, अब वे हम सबके सपने हैं।"
यह सुनते ही पूजा रो पड़ी।
सालों से दबा हुआ सपना पहली बार उसे फिर से दिखाई देने लगा था।
उस रात उसने धूल से ढकी पुरानी मशीन साफ की।
नई मशीन के साथ उसे भी रखा।
और कई साल बाद उसने फिर से कपड़ा काटा।
धागा पिरोया।
पहला टांका लगाया।
ऐसा लगा जैसे उसके सपनों की बंद पड़ी खिड़की फिर से खुल गई हो।
.......
...उस रात पूजा देर तक जागती रही।
सालों बाद उसके हाथों में फिर वही उत्साह था जो शादी से पहले हुआ करता था।
नई मशीन के पास बैठकर उसने पुराने डिजाइनों की अपनी एक डायरी निकाली।
डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन उन पन्नों में दर्ज सपने अभी भी ताज़ा थे।
कहीं बच्चों के कपड़ों के डिजाइन बने थे, कहीं सूट और कुर्तियों की कढ़ाई के नमूने।
पन्ने पलटते-पलटते पूजा की आंखें नम हो गईं।
उसे लगा जैसे वह अपनी पुरानी पहचान से दोबारा मिल रही हो।
अगले दिन से घर में एक नया बदलाव शुरू हुआ।
सुबह रोहन बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करवाने लगा।
सासू मां रसोई में हाथ बंटाने लगीं।
और पूजा को रोज दो घंटे अपने काम के लिए मिलने लगे।
शुरुआत में उसे बहुत झिझक होती थी।
कई बार मशीन के सामने बैठते ही वह सोचने लगती—
"इतने साल बाद क्या मैं पहले जैसा काम कर पाऊंगी?"
लेकिन फिर वह खुद को समझाती।
"कोशिश किए बिना कैसे पता चलेगा?"
धीरे-धीरे उसके हाथ फिर से चलने लगे।
पुरानी लय वापस आने लगी।
कुछ ही दिनों में उसने अपने लिए और सिया के लिए दो सुंदर कुर्तियां तैयार कर दीं।
जब सिया उन्हें पहनकर स्कूल गई, तो उसकी सहेलियां उसकी ड्रेस की तारीफ करने लगीं।
एक अध्यापिका ने भी पूछा,
"यह ड्रेस कहां से खरीदी?"
सिया गर्व से बोली,
"खरीदी नहीं है मैडम, मेरी मम्मी ने बनाई है।"
उस दिन पहली बार पूजा को लगा कि उसका हुनर अभी जिंदा है।
कुछ दिनों बाद मोहल्ले की एक पड़ोसन घर आई।
उसने सिया की ड्रेस देखी थी।
वह बोली,
"पूजा, मेरी बेटी के लिए भी ऐसी ही एक ड्रेस बना दोगी?"
पूजा ने हिचकते हुए हां कह दी।
ड्रेस तैयार हुई तो पड़ोसन बहुत खुश हुई।
उसने पूजा को पैसे देने चाहे।
लेकिन पूजा ने मना कर दिया।
तभी सासू मां ने प्यार से कहा,
"बहू, मेहनत का सम्मान लेना सीखो।"
पूजा ने पहली बार अपने हुनर से कमाए हुए पैसे हाथ में लिए।
रकम बहुत छोटी थी।
लेकिन उसके लिए वह किसी खजाने से कम नहीं थी।
उसने वह पैसे संभालकर अपनी डायरी में रख दिए।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
अब मोहल्ले में लोगों को पता चलने लगा कि पूजा बहुत अच्छा सिलाई और डिजाइनिंग का काम करती है।
किसी ने सूट सिलवाया।
किसी ने बच्चों की फ्रॉक।
किसी ने ब्लाउज।
काम बढ़ने लगा।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि पूजा के चेहरे पर मुस्कान भी बढ़ने लगी थी।
वह अब पहले जैसी थकी और बुझी हुई नहीं दिखती थी।
उसकी आंखों में फिर से चमक लौट आई थी।
फिर वह दिन भी आ गया जिसका सिया को बेसब्री से इंतजार था।
स्कूल का "मदर्स टैलेंट डे"।
स्कूल का सभागार बच्चों और अभिभावकों से भरा हुआ था।
एक-एक करके बच्चे मंच पर जा रहे थे और अपनी मांओं के बारे में बता रहे थे।
जब सिया का नाम पुकारा गया, तो वह आत्मविश्वास से मंच पर पहुंची।
माइक के सामने खड़ी होकर उसने मुस्कुराते हुए कहा,
"सब लोग कहते हैं कि मेरी मम्मी बहुत अच्छा खाना बनाती हैं और हमारा घर संभालती हैं।"
कुछ पल रुककर वह आगे बोली,
"लेकिन मेरी मम्मी सिर्फ इतना ही नहीं करतीं।"
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया।
सिया ने गर्व से कहा,
"मेरी मम्मी एक बहुत अच्छी डिजाइनर हैं। वह साधारण कपड़ों को खूबसूरत बना देती हैं। उन्होंने अपना सपना कभी छोड़ा नहीं था, बस कुछ समय के लिए उसे संभाल कर रख दिया था।"
यह सुनकर सामने बैठी पूजा की आंखें भर आईं।
सिया आगे बोली,
"मैं बड़ी होकर अपनी मम्मी जैसी बनना चाहती हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे सिखाया है कि परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए भी अपने सपनों को जिंदा रखा जा सकता है।"
पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
पूजा के आंसू अब रुक नहीं रहे थे।
लेकिन ये आंसू खुशी के थे।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद कई लोग उससे मिलने आए।
किसी ने उसके काम की तारीफ की।
किसी ने उसके बनाए कपड़ों की तस्वीरें मांगीं।
स्कूल की प्रिंसिपल ने भी कहा,
"आपको अपनी कला को और आगे ले जाना चाहिए।"
उस दिन पूजा पहली बार खुद पर गर्व महसूस कर रही थी।
कुछ महीनों बाद उसी सामुदायिक केंद्र में डिजाइनिंग मेला आयोजित हुआ, जिसके लिए रोहन ने उसका नाम लिखवाया था।
पूजा ने अपनी मेहनत से तैयार किए हुए कपड़ों का छोटा सा स्टॉल लगाया।
शुरुआत में वह बहुत घबराई हुई थी।
लेकिन जैसे-जैसे लोग उसके डिजाइनों को देखने लगे, उसकी घबराहट कम होती गई।
दिन खत्म होने तक उसके ज्यादातर डिजाइन बिक चुके थे।
कई लोगों ने आगे भी काम देने का वादा किया।
जब शाम को स्टॉल बंद हुआ, तो पूजा की आंखों में फिर से वही चमक थी जो कभी कॉलेज के दिनों में हुआ करती थी।
घर लौटते समय कार में सन्नाटा था।
लेकिन वह सन्नाटा खुशी से भरा हुआ था।
अचानक पूजा ने रोहन की ओर देखा और बोली,
"धन्यवाद।"
रोहन मुस्कुरा दिया।
"किस बात का?"
"मुझे फिर से मुझसे मिलवाने के लिए।"
रोहन ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
"मैंने कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ वह दरवाजा खोला है, जिसे तुमने जिम्मेदारियों की वजह से बंद कर दिया था।"
पीछे बैठी सासू मां मुस्कुरा रही थीं।
सिया खुशी से ताली बजा रही थी।
उस पल पूजा को महसूस हुआ कि सपने पूरे करने के लिए हमेशा बड़े चमत्कारों की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी सिर्फ परिवार का थोड़ा सा साथ, थोड़ा सा सम्मान और थोड़ा सा समय ही काफी होता है।
खिड़की के बाहर डूबता हुआ सूरज आसमान को सुनहरे रंगों से भर रहा था।
और पूजा को लग रहा था कि उसकी जिंदगी का सूरज अब डूब नहीं रहा था।
बल्कि बरसों बाद एक नई सुबह बनकर उग रहा था।
कहानी से सीख:
घर की महिलाओं के सपने और शौक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी उनकी जिम्मेदारियां। परिवार का थोड़ा सा सहयोग किसी की खोई हुई पहचान और आत्मविश्वास वापस लौटा सकता है। कभी-कभी सबसे बड़ा उपहार किसी को उसका अपना सपना वापस देना होता है।
आपको क्या लगता है? क्या परिवार के हर सदस्य को घर की महिलाओं के सपनों और प्रतिभा को आगे बढ़ाने में सहयोग करना चाहिए? अपनी राय जरूर बताइए।

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