इच्छाओं की कोई उम्र नहीं

 

Elderly Indian father receives travel tickets from his son as the family realizes the importance of respecting the dreams and wishes of senior parents.


"जिस बुज़ुर्ग पिता की एक छोटी-सी इच्छा को घरवालों ने फिजूल खर्ची कहकर टाल दिया... उसी एक घटना ने पूरे परिवार को एहसास कराया कि उम्र बढ़ने से इंसान की इच्छाएँ खत्म नहीं होतीं।"


घर के सामने वाली गली में रहने वाले शर्मा जी कई दिनों से बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। जो भी मिलता, मुस्कुराकर उससे दो बातें ज़रूर करते। उनकी खुशी की वजह थी कि उनके पुराने स्कूल के दोस्त लगभग पचास साल बाद एक साथ मिलने वाले थे। सभी ने तय किया था कि इस बार वे पास के पहाड़ी इलाके में तीन दिन का छोटा-सा भ्रमण करेंगे।


शर्मा जी ने यह बात बड़े उत्साह से अपने बेटे और बहू को बताई।


"देखो, मेरे सारे पुराने दोस्त जा रहे हैं। मैं भी उनके साथ जाना चाहता हूँ। ज़िंदगी का क्या भरोसा? पता नहीं फिर ऐसा मौका मिले या नहीं।"


बेटे ने मोबाइल से नज़र उठाकर पूछा, "कितना खर्च आएगा?"


"लगभग सात हजार रुपये।"


इतना सुनते ही बहू बोली, "सात हजार? सिर्फ तीन दिन घूमने के लिए? इस उम्र में जाकर क्या करेंगे? घर पर आराम से रहिए।"


शर्मा जी ने धीरे से कहा, "घूमने नहीं... दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ। कई लोगों से चालीस-पचास साल से मुलाकात नहीं हुई।"


लेकिन बेटे ने भी बात खत्म करते हुए कहा, "पापा, ये सब अब आपकी उम्र में ठीक नहीं लगता। पैसे भी बचाने चाहिए।"


शर्मा जी चुप हो गए।


उन्होंने दोबारा इस विषय पर कुछ नहीं कहा।


कुछ दिनों बाद उनका पुराना दोस्त घर मिलने आया। उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "अरे शर्मा, तैयारी हो गई? इस बार तो सब लोग तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।"


शर्मा जी ने मुस्कुराने की कोशिश की।


"नहीं भाई... इस बार शायद मैं नहीं आ पाऊँगा।"


दोस्त ने हैरानी से पूछा, "अरे, क्यों? तबीयत तो ठीक है ना?"


शर्मा जी ने हल्की-सी मुस्कान ओढ़ते हुए कहा, "हाँ, तबीयत तो ठीक है... बस कुछ मजबूरियाँ हैं।"


दोस्त उनकी आँखों की उदासी पढ़ चुका था। वह समझ गया कि वजह तबीयत नहीं, कुछ और है। इसलिए उसने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा, बस उनके कंधे पर हाथ रखकर चुपचाप वहाँ से चला गया।


उसने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा और चुपचाप चला गया।


उस दिन के बाद शर्मा जी पहले जैसे नहीं रहे।


वे पहले रोज़ पार्क जाते थे, दोस्तों से बातें करते थे, हँसते थे।


अब ज़्यादातर अपने कमरे में ही बैठे रहते।


बहू को लगा कि शायद उम्र का असर है।


लेकिन एक दिन बेटे ने देखा कि पिताजी पुराने एल्बम देख रहे थे।


हर तस्वीर पर देर तक रुक जाते और फिर चुपचाप आँखें पोंछ लेते।


बेटे ने पहली बार महसूस किया कि शायद उसने पिताजी की बात को हल्के में ले लिया।


कुछ दिनों बाद बेटे की कंपनी से बोनस मिला।


घर में सभी खुश थे।


बहू बोली, "इस बार बच्चों को लेकर किसी बड़े रिसॉर्ट चलते हैं।"


बेटा भी तैयार हो गया।


तभी उसकी नज़र पिताजी पर पड़ी।


वे चुपचाप बालकनी में बैठे आसमान देख रहे थे।


अचानक बेटे को अपने ही शब्द याद आ गए।


"इस उम्र में घूमने की क्या ज़रूरत है..."


उसे अपनी बात पर शर्म आने लगी।


उसने उसी समय अपने पिताजी के दोस्त का नंबर ढूँढ़ा।


पता चला कि यात्रा अभी दस दिन बाद थी क्योंकि कुछ लोगों की वजह से तारीख आगे बढ़ गई थी।


बेटे ने तुरंत शर्मा जी का नाम भी शामिल करा दिया।


जब उसने टिकट और यात्रा की रसीद पिताजी के हाथ में रखी, तो शर्मा जी हैरान रह गए।


"ये क्या है?"


बेटे ने सिर झुकाकर कहा, "पापा... इस बार आप अपने दोस्तों के साथ ज़रूर जाइए। गलती मेरी थी। मैंने आपकी इच्छा की कीमत पैसों से लगा दी।"


शर्मा जी की आँखें भर आईं।


उन्होंने बेटे का हाथ पकड़ लिया।


"बेटा... मुझे घूमने का नहीं, अपने लोगों के साथ कुछ पल जीने का मन था।"


यात्रा का दिन आया।


शर्मा जी इतने खुश थे जैसे कोई छोटा बच्चा पहली बार पिकनिक पर जा रहा हो।


वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पुराने दोस्तों के साथ ढेर सारी बातें कीं, पुरानी यादें ताज़ा कीं, तस्वीरें खिंचवाईं और वर्षों बाद खुलकर हँसे।


घर लौटने के बाद उनके चेहरे की चमक ही बदल गई थी।


वे पहले से ज़्यादा उत्साहित रहने लगे।


बहू ने भी महसूस किया कि उन तीन दिनों ने पिताजी को नई ऊर्जा दे दी।


उसने शर्माते हुए कहा, "पिताजी... हमें माफ़ कर दीजिए। हमने सोचा था कि बुढ़ापे में इच्छाएँ खत्म हो जाती हैं।"


शर्मा जी मुस्कुराए।


"उम्र केवल शरीर की बढ़ती है, मन की नहीं। जब तक साँसें चलती हैं, तब तक इंसान के सपने, अपनों से मिलने की चाह और छोटी-छोटी खुशियाँ जीने की इच्छा भी हमेशा ज़िंदा रहती है।"


उस दिन के बाद उस घर में एक नियम बन गया।


घर का बजट बनाते समय बच्चों की ज़रूरतों के साथ-साथ दादा जी की इच्छाओं के लिए भी अलग से पैसे रखे जाने लगे।


क्योंकि पूरे परिवार ने समझ लिया था कि बुज़ुर्गों को सिर्फ दवाइयों की नहीं, सम्मान, अपनापन और अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी करने के अधिकार की भी ज़रूरत होती है।



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