बहन की ज़िद, भाई का जवाब
"जिस बहन ने अपने भाई से कहा था— 'मेरी खुशी के लिए अपनी मंगेतर को छोड़ दो'… उसी एक सवाल ने पूरे परिवार को रिश्तों की असली मर्यादा समझा दी।"
राकेश अपने कमरे में बैठा शादी के कार्ड का डिज़ाइन देख रहा था। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। कुछ ही दिनों बाद उसकी शादी आकांक्षा से होने वाली थी। दोनों बचपन के दोस्त थे और कई सालों से एक-दूसरे को पसंद करते थे। दोनों परिवार भी इस रिश्ते से खुश थे।
तभी उसकी माँ सावित्री देवी तेज़ कदमों से कमरे में आईं। उनके पीछे उसकी बड़ी बहन पूजा भी खड़ी थी। दोनों के चेहरे पर गंभीरता साफ दिखाई दे रही थी।
सावित्री देवी ने बिना किसी भूमिका के कहा,
"बेटा, हमें तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है।"
राकेश मुस्कुराकर बोला,
"कहिए माँ, क्या बात है?"
माँ ने गहरी साँस लेते हुए कहा,
"तुम अपनी सगाई आकांक्षा से तोड़ दो।"
राकेश के हाथ से कार्ड नीचे गिर गया।
उसे लगा शायद उसने कुछ गलत सुन लिया।
"क्या कहा आपने?"
माँ ने फिर दोहराया,
"हाँ, यह रिश्ता खत्म कर दो।"
राकेश हैरान होकर माँ का चेहरा देखने लगा।
"लेकिन क्यों माँ? आखिर वजह क्या है?"
इस बार पूजा आगे बढ़ी।
"मुझे आकांक्षा बिल्कुल पसंद नहीं है। मैं नहीं चाहती कि वह इस घर की बहू बने।"
राकेश ने शांत स्वर में पूछा,
"दीदी, उसने आपका क्या बिगाड़ा है?"
पूजा बोली,
"बस मुझे उसका स्वभाव अच्छा नहीं लगता। मुझे लगता है वह इस घर में फिट नहीं बैठेगी।"
राकेश ने कहा,
"लेकिन शादी मेरी हो रही है, मेरी ज़िंदगी है।"
माँ बोलीं,
"तेरी बहन की खुशी सबसे पहले है।"
राकेश कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
"माँ, आप जानती हैं कि मैं आकांक्षा से कितना प्यार करता हूँ। बचपन से हम साथ हैं। मैं उसे छोड़ नहीं सकता।"
माँ की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।
"खून के रिश्तों की कीमत समझो। बहन के लिए इतना भी नहीं कर सकते?"
राकेश ने माँ की ओर देखा।
फिर बहुत शांत स्वर में बोला,
"ठीक है माँ… अगर यही आपकी इच्छा है, तो मैं आकांक्षा से रिश्ता तोड़ देता हूँ।"
यह सुनकर माँ और पूजा दोनों के चेहरे पर राहत आ गई।
लेकिन अगले ही पल राकेश ने कहा,
"लेकिन मेरी भी एक शर्त है।"
पूजा ने पूछा,
"कैसी शर्त?"
राकेश बोला,
"दीदी, आप आज ही अपने पति से तलाक ले लीजिए।"
पूजा चौंक गई।
"क्या बकवास कर रहे हो?"
राकेश बिल्कुल शांत था।
"मुझे जीजाजी बिल्कुल पसंद नहीं हैं। इसलिए आप उन्हें छोड़ दीजिए।"
पूजा गुस्से से बोली,
"तुम पागल हो गए हो क्या? सिर्फ तुम्हें पसंद नहीं हैं, इसलिए मैं अपना घर तोड़ दूँ?"
राकेश ने कहा,
"क्यों? अभी तो आप यही कह रही थीं कि आपकी खुशी के लिए मैं अपनी होने वाली पत्नी छोड़ दूँ।"
पूजा चुप हो गई।
राकेश आगे बोला,
"अगर मेरी ज़िंदगी का फैसला आप कर सकती हैं, तो आपकी ज़िंदगी का फैसला मैं क्यों नहीं कर सकता?"
पूजा के पास कोई जवाब नहीं था।
माँ बीच में बोलीं,
"बेटा, दोनों बातें अलग हैं।"
राकेश मुस्कुराया।
"कैसे अलग हैं, माँ?"
माँ ने गंभीर स्वर में कहा,
"बेटा, शादी कोई खिलौना नहीं होती कि जब चाहा रिश्ता जोड़ लिया और जब चाहा तोड़ दिया।"
राकेश ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में जवाब दिया,
"बिल्कुल सही कहा आपने, माँ। इसलिए मैं भी यही कह रहा हूँ कि मेरी शादी भी कोई खिलौना नहीं है। अगर दीदी की शादी और उनका रिश्ता सम्मान के लायक है, तो मेरी होने वाली शादी और मेरा रिश्ता भी उतना ही सम्मान के योग्य है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राकेश ने माँ की ओर देखते हुए कहा,
"जब मैं अपनी बहन की खुशी के लिए अपना जीवन बदल दूँ, तब वह मेरी खुशी के लिए मेरी पसंद का सम्मान भी नहीं कर सकती?"
माँ के पास कोई उत्तर नहीं था।
कुछ देर बाद पूजा धीरे से बोली,
"लेकिन मैं अपने पति से बहुत प्यार करती हूँ।"
राकेश ने मुस्कुराकर कहा,
"और मैं आकांक्षा से।"
पूजा की आँखें झुक गईं।
राकेश फिर बोला,
"दीदी, जिस दर्द की कल्पना मात्र से आप घबरा गईं, वही दर्द आप मुझे देना चाहती थीं।"
यह सुनकर पूजा की आँखों में आँसू आ गए।
उसे पहली बार अपनी गलती समझ आने लगी।
उसने धीमे स्वर में कहा,
"भाई... मुझसे गलती हो गई। मैंने सिर्फ अपनी सोच देखी, तुम्हारे दिल की नहीं।"
माँ भी भावुक हो गईं।
उन्होंने राकेश का हाथ पकड़ लिया।
"बेटा, सच कहूँ तो हमसे भी गलती हो गई।"
राकेश बोला,
"माँ, रिश्ते आदेश से नहीं चलते, सम्मान से चलते हैं।"
"अगर हर भाई से यह उम्मीद की जाए कि वह बहन की हर इच्छा पूरी करे, तो क्या बहन की भी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह भाई की खुशियों का सम्मान करे?"
माँ की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने कहा,
"आज तुमने हमें बहुत बड़ी बात सिखा दी।"
कुछ देर बाद पूजा ने खुद आकांक्षा को फोन किया।
उसने कहा,
"आकांक्षा, मुझे माफ़ कर दो। मैंने बिना तुम्हें समझे तुम्हारे बारे में गलत राय बना ली थी।"
आकांक्षा ने मुस्कुराकर कहा,
"कोई बात नहीं दीदी। रिश्ते माफ़ी से ही मजबूत बनते हैं।"
पूजा ने कहा,
"अब मैं खुद तुम्हें इस घर की बहू बनाकर लाऊँगी।"
शादी का दिन आया।
पूजा ने अपनी होने वाली भाभी का सबसे पहले स्वागत किया।
विदाई के बाद जब आकांक्षा घर में प्रवेश कर रही थी, तब पूजा ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
"आज से तुम सिर्फ मेरी भाभी नहीं, मेरी छोटी बहन भी हो।"
आकांक्षा की आँखें भर आईं।
सावित्री देवी दूर खड़ी सब देख रही थीं।
उन्होंने मन ही मन सोचा,
"खून का रिश्ता बहुत बड़ा होता है, लेकिन किसी का जीवन उजाड़कर उसे निभाना नहीं चाहिए। सच्चा रिश्ता वही है, जहाँ अपनी खुशी के साथ सामने वाले की खुशी का भी उतना ही सम्मान किया जाए।"

Post a Comment