"माँ की आखिरी चिट्ठी: जिसे लालची समझा गया, उसने ही सबसे ज्यादा दिया था"

 

Rajni tearfully apologizes to Neha inside a traditional Rajput haveli as Amit stands nearby, while the late Sharda Devi's framed photograph and glowing diya symbolize love, forgiveness, and family reunion.


"तुम्हारी ननद का फिर फोन आया है," सास की बात सुनते ही रजनी के चेहरे पर नाराज़गी साफ़ झलकने लगी। वह बड़बड़ाई, "पता नहीं, शादी के इतने साल बाद भी उसे हर दूसरे दिन इस घर की याद क्यों आ जाती है।"


जयपुर के पास बसे एक पुराने राजपूती घर में उस दिन भी वही तनाव पसरा हुआ था जो पिछले कई वर्षों से उस परिवार का हिस्सा बन चुका था।


रजनी रसोई में खड़ी सब्ज़ी काट रही थी। उसके चेहरे पर झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी। तभी बैठक से मोबाइल की घंटी सुनाई दी।


"माँ जी, आपकी बेटी नेहा का फोन है," उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "सच कहूँ तो मुझे समझ नहीं आता कि शादी के बाद भी कोई लड़की अपने मायके की इतनी चिंता क्यों करती है।"


सोफे पर बैठे उसके पति अमित ने अखबार मोड़ते हुए कहा, "रजनी, नेहा माँ की बेटी है। अगर वह उनका हाल पूछ लेती है तो इसमें गलत क्या है?"


रजनी तुनककर बोली, "गलत? आपको दिखाई नहीं देता। हर दूसरे दिन फोन, हर हफ्ते हालचाल... मुझे तो उसकी नीयत ठीक नहीं लगती। उसे इस घर की जमीन-जायदाद से बहुत लगाव है।"


अमित ने गहरी साँस ली। वह जानता था कि इस विषय पर बहस का कोई फायदा नहीं।


उधर कमरे में बैठी शारदा देवी सब सुन रही थीं। पति के जाने के बाद यही घर उनका सहारा था। उम्र बढ़ने के साथ घुटनों का दर्द, कमज़ोर आँखें और बढ़ती बीमारी ने उन्हें थका दिया था। लेकिन बेटी नेहा की आवाज़ सुनते ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।


उन्होंने फोन उठाया।


"माँ, दवा समय पर ली ना?" नेहा ने पूछा।


"हाँ बेटी," शारदा देवी बोलीं।


"खाना खाया?"


"खा लिया।"


तभी पीछे से रजनी की आवाज़ आई, "इतनी चिंता है तो अपने घर का काम छोड़कर यहीं आ जाओ।"


नेहा कुछ पल के लिए चुप हो गई।


फिर मुस्कुराकर बोली, "भाभी, माँ हमारी भी हैं।"


लेकिन जवाब में केवल खामोशी मिली।


नेहा का विवाह एक साधारण परिवार में हुआ था। उसके पति दीपक एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे। आमदनी सीमित थी, फिर भी नेहा हर महीने कुछ पैसे बचाकर माँ की दवाइयों के लिए भेज देती थी। उसने कभी इस बात का ज़िक्र नहीं किया।


उसे डर था कि कहीं उसकी वजह से भाई-भाभी के बीच विवाद न बढ़ जाए।


समय बीतता गया।


रजनी का शक भी बढ़ता गया।


जब भी नेहा मायके आती, वह उसे ऐसे देखती जैसे कोई बाहरी व्यक्ति घर में घुस आया हो।


एक दिन करवा चौथ का त्योहार था।


शारदा देवी ने अलमारी खोली, उसमें तह करके रखा अपना पुराना रेशमी दुपट्टा निकाला और प्यार से बोलीं, "नेहा बेटी, इसे ओढ़ ले। तेरे पिताजी को तुझे इस दुपट्टे में देखना बहुत अच्छा लगता था। जब भी तू इसे पहनती थी, उनकी आँखों में अलग ही चमक आ जाती थी।"


नेहा ने मना किया।


लेकिन माँ के बार-बार कहने पर उसने दुपट्टा ले लिया।


बस फिर क्या था।


रजनी भड़क उठी।


"वाह! अब अलमारी की चीज़ें भी निकालने लगीं?"


नेहा घबरा गई।


"भाभी, माँ ने दिया है।"


"माँ ने दिया तो सब ले जाओगी? तुम्हारी नज़र शुरू से इसी घर पर रही है।"


शारदा देवी की आँखों में आँसू आ गए।


उन्होंने पहली बार सख्त स्वर में कहा, "बहू, बेटी को उसकी माँ का दिया पहनने से मत रोको।"


लेकिन रजनी बोली, "शादी के बाद लड़की का मायके पर क्या हक?"


ये शब्द शारदा देवी के दिल में तीर की तरह उतर गए।


उस दिन नेहा बिना कुछ बोले अपने घर लौट गई।


अब उसने मायके आना लगभग बंद कर दिया।


सिर्फ फोन करके माँ का हाल पूछती।


लेकिन कई बार रजनी फोन उठाकर कह देती, "माँ आराम कर रही हैं।"


जबकि सच यह होता कि शारदा देवी दरवाजे की तरफ देखते हुए बेटी का इंतज़ार कर रही होतीं।


कुछ महीनों बाद शारदा देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई।


उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।


नेहा सब छोड़कर दौड़ी चली आई।


उसने अस्पताल में रातें जागकर बिताईं।


माँ को दवा दी, खाना खिलाया, डॉक्टरों से बात की।


लेकिन घर लौटते ही रजनी फिर बोली, "बहुत सेवा हो रही है। कोई मतलब तो होगा।"


नेहा की आँखों में आँसू आ गए।


उसने माँ का हाथ पकड़कर कहा, "माँ, मैं अब कम आया करूँगी। मेरी वजह से घर में रोज़ झगड़ा होता है।"


शारदा देवी रो पड़ीं।


"मत जा बेटी।"


लेकिन नेहा चली गई।


अब शारदा देवी और अकेली हो गईं।


कई बार वे कमरे में बैठी बेटी की पुरानी तस्वीरें देखतीं और चुपचाप रो लेतीं।


एक दिन उन्होंने अमित से कहा, "बेटा, अगर मैं न रहूँ तो नेहा का ध्यान रखना।"


अमित का दिल बैठ गया।


"माँ, ऐसी बातें मत करो।"


लेकिन शायद माँ को आने वाले समय का आभास हो चुका था।


कुछ दिनों बाद उनकी तबीयत फिर बिगड़ गई।


उन्होंने कई बार नेहा को बुलाने की इच्छा जताई।


लेकिन रजनी ने बात टाल दी।


"कल बुला लेंगे... अभी परेशान क्यों करना?"


अगले दिन शारदा देवी की साँसें उखड़ने लगीं।


उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "नेहा... एक बार..."


लेकिन उनकी आवाज़ अधूरी रह गई।


घर में मातम छा गया।


नेहा पहुँची तो माँ के चरणों में गिरकर फूट-फूटकर रो पड़ी।


"माँ... एक बार बुला लेतीं..."


अमित की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।


क्रिया-कर्म के बाद नेहा चुपचाप जाने लगी।


तभी अमित ने उसे रोक लिया।


उसने अलमारी से एक पुरानी डायरी निकाली।


"ये माँ की है," उसने कहा।


डायरी के बीचों-बीच एक पत्र रखा था।


काँपते हाथों से अमित ने पढ़ना शुरू किया—


"मेरे प्यारे बच्चों,


अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो तो शायद मैं तुम्हारे बीच नहीं हूँ।


नेहा ने पिछले आठ वर्षों से चुपचाप मेरे इलाज का खर्च उठाया है। जब तुम्हारे पिताजी की बचत खत्म हो गई थी, तब उसी ने अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ छोड़कर हर महीने पैसे भेजे।


उसने कभी बदले में कुछ नहीं माँगा।


मैंने यह बात इसलिए छिपाई क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि घर में कलह बढ़े।


मेरे पास जो थोड़े बहुत गहने हैं, उनमें से अधिकतर नेहा की कमाई से बने हैं।


लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि उसने मुझे कभी बोझ नहीं समझा।


जिस दिन बेटी का प्यार शक की नजर से देखा जाने लगे, उस दिन घर की नींव कमजोर हो जाती है।


मेरे बाद मेरे दोनों बच्चों को साथ रहना।


और बहू से कहना, रिश्ते जीतने से नहीं, समझने से चलते हैं।"


पत्र पढ़ते-पढ़ते अमित की आवाज़ भर्रा गई।


नेहा रो रही थी।


रजनी के हाथ काँपने लगे।


उसे याद आने लगा कि कैसे उसने हर फोन कॉल में स्वार्थ देखा था, हर मुस्कान में लालच और हर सेवा में दिखावा।


वह धीरे-धीरे नेहा के पास आई।


उसने हाथ जोड़ लिए।


"मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।"


नेहा ने आँसू पोंछे।


"भाभी, अगर माँ होतीं तो यही कहतीं कि परिवार टूटना नहीं चाहिए।"


रजनी फूट पड़ी।


उसने पहली बार नेहा को गले लगा लिया।


उस दिन अमित ने माँ की तस्वीर के सामने दीपक जलाया और मन ही मन सोचा—


"घर को तोड़ने के लिए शक का एक बीज ही काफी होता है, लेकिन उसे बचाने के लिए विश्वास, माफी और अपनापन तीनों का साथ होना जरूरी है।"


उसके बाद हर त्योहार पर नेहा अपने मायके आती रही।


रजनी खुद उसे लेने जाती।


और जब भी घर का मोबाइल बजता और स्क्रीन पर "नेहा दीदी" लिखा दिखाई देता, रजनी मुस्कुराकर कहती—


"माँ तो अब नहीं हैं... लेकिन उनकी बेटी का फोन आया है। जल्दी उठाइए, अपने लोगों की आवाज़ का इंतज़ार नहीं करवाना चाहिए।"


क्योंकि उसे अब समझ आ गया था कि हर बार हाल पूछने वाला इंसान लालची नहीं होता।


कई बार वह सिर्फ अपना रिश्ता निभा रहा होता है।



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