"मैं बेरोजगार नहीं हूँ... बाबूजी का यह जवाब सुनकर मेरी आँखें भर आईं"

 

An emotional Indian family scene where an elderly father-in-law defends his homemaker daughter-in-law in front of relatives. The tearful woman holds a tea tray while family members listen in silence inside a traditional middle-class living room.


"जब रिश्तेदारों ने सबके सामने कहा, 'साक्षी तो कुछ करती ही नहीं है', तब बाबूजी ने मेरी ओर देखकर जो जवाब दिया, उसने मेरी बरसों की दबी हुई पीड़ा को आँसुओं में बदल दिया।"


मेरे हाथ में मेहमानों के लिए रखी चाय की ट्रे थी।


ड्रॉइंग रूम में रिश्तेदारों की आवाज़ें गूँज रही थीं। घर में छोटे देवर की सगाई की तैयारियाँ चल रही थीं। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त था। कोई सजावट देख रहा था, कोई मिठाइयों की गिनती कर रहा था।


मैं साक्षी हूँ।


इस घर में आए मुझे तेरह साल हो चुके थे।


तेरह साल से मेरी दुनिया लगभग एक जैसी ही थी।


सबकी पसंद का खाना याद रखना।


बच्चे की पढ़ाई का ध्यान रखना।


पति की परेशानियाँ बिना कहे समझ लेना।


बाबूजी की दवाइयों का समय याद रखना।


मेहमानों के आने से पहले घर को व्यवस्थित करना।


और जब कोई पूछे कि मैं क्या करती हूँ, तो मुस्कुराकर कहना—


"कुछ नहीं... बस घर संभालती हूँ।"


शुरुआत में यह वाक्य मुझे सामान्य लगता था।


लेकिन धीरे-धीरे यह मेरे अस्तित्व पर लगा एक ठप्पा बन गया।


मैंने बी.एड. किया था।


शादी से पहले स्कूल में पढ़ाने का सपना देखा था।


बच्चों के बीच खड़े होकर ब्लैकबोर्ड पर लिखना मुझे अच्छा लगता था।


लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद अरुण की नौकरी दूसरे शहर में चली गई। फिर विशाल का जन्म हुआ। उसके बाद सासू माँ की तबीयत खराब रहने लगी।


मैंने सोचा था, थोड़ा समय परिवार को दे देती हूँ।


फिर नौकरी कर लूँगी।


लेकिन वह "थोड़ा समय" कब तेरह साल में बदल गया, मुझे खुद पता नहीं चला।


मैंने कभी शिकायत नहीं की।


क्योंकि मुझे लगता था कि परिवार भी एक जिम्मेदारी है।


लेकिन समाज जिम्मेदारियों को नहीं, केवल तनख्वाह को पहचानता है।


उस दिन घर में कई रिश्तेदार आए हुए थे।


अरुण के चाचा, बुआ, मौसी और कुछ दूर के संबंधी।


सब हँस-बोल रहे थे।


तभी चाची जी ने मुस्कुराते हुए पूछा,


"अरे साक्षी, तुम आजकल करती क्या हो?"


मैंने आदतन वही जवाब दिया,


"कुछ नहीं चाची जी... बस घर ही संभालती हूँ।"


उन्होंने तुरंत दूसरी महिला की ओर देखकर कहा,


"आजकल तो हर लड़की नौकरी करती है। खाली घर बैठने से क्या फायदा? पढ़ाई-लिखाई का भी तो उपयोग होना चाहिए।"


पास बैठी एक रिश्तेदार हँसते हुए बोली,


"हाँ, साक्षी की तो किस्मत अच्छी है। आराम से घर में रहती है। बाहर की टेंशन ही नहीं।"


सब हल्का-हल्का मुस्कुरा दिए।


किसी ने शायद मजाक में कहा था।


लेकिन मेरे भीतर जैसे किसी ने पुराना घाव कुरेद दिया।


क्या सचमुच मैं आराम करती थी?


क्या घर अपने आप चलता था?


क्या विशाल की पढ़ाई अपने आप हो जाती थी?


क्या बाबूजी समय पर दवाइयाँ खुद याद रखते थे?


क्या अरुण की हर छोटी-बड़ी जरूरत बिना किसी मेहनत के पूरी हो जाती थी?


मैंने चुपचाप सिर झुका लिया।


मेरे हाथों की पकड़ ट्रे पर कस गई।


तभी बाबूजी ने अखबार मोड़कर मेज पर रख दिया।


उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें ऐसी दृढ़ता थी कि पूरा कमरा चुप हो गया।


उन्होंने कहा,


"अभी किसने कहा कि साक्षी कुछ नहीं करती?"


सबकी नजरें उनकी ओर उठ गईं।


चाची जी थोड़ा सकपका गईं।


"अरे भैया, हमने तो ऐसे ही कह दिया। हमारा मतलब था कि नौकरी नहीं करती।"


बाबूजी ने साक्षी की ओर देखा।


फिर बोले,


"नौकरी नहीं करती, इसका मतलब यह नहीं कि काम नहीं करती।"


कमरे में सन्नाटा फैल गया।


उन्होंने धीरे-धीरे कहना शुरू किया,


"मेरी पत्नी के जाने के बाद अगर इस घर को किसी ने टूटने नहीं दिया, तो वह साक्षी है।"


"जब मैं बीमारी से जूझ रहा था, रात-रात भर जागकर मेरे सिरहाने कौन बैठा था?"


"जब अरुण नौकरी के तनाव में टूटने लगता था, उसे संभालने वाला कौन था?"


"जब विशाल को पढ़ाई में परेशानी होती थी, उसके साथ बैठने वाला कौन था?"


"इस घर के हर सदस्य की पसंद-नापसंद किसे याद रहती है?"


"किसी का जन्मदिन भूल जाए, लेकिन दवा का समय न भूले, वह कौन है?"


किसी के पास जवाब नहीं था।


बाबूजी की आवाज़ भर्रा गई।


"समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उस काम की कीमत समझता है, जिसके बदले पैसे मिलते हैं।"


"लेकिन जिस औरत के कारण घर के बाकी लोग बाहर जाकर काम कर पाते हैं, उसकी मेहनत को 'कुछ नहीं करती' कह दिया जाता है।"


मेरी आँखें भर आईं।


मैंने तुरंत दूसरी तरफ देखने की कोशिश की।


लेकिन वर्षों से दबे हुए शब्द जैसे बाहर आने को बेचैन थे।


बाबूजी आगे बोले,


"अगर साक्षी एक दिन के लिए भी यह घर छोड़ दे, तो पता चल जाएगा कि घर चलाना कितना बड़ा काम होता है।"


"यह बहू बेरोजगार नहीं है।"


"यह मेरे बेटे के सपनों की रखवाली करती है।"


"यह मेरे पोते का भविष्य सँवारती है।"


"यह इस घर की धड़कनों को व्यवस्थित रखती है।"


"और जो इंसान पूरे परिवार की साँसों को संभालता हो, उसे 'कुछ नहीं करती' कहना सबसे बड़ा अन्याय है।"


अब मेरी आँखों से आँसू बहने लगे थे।


मैंने जल्दी से पल्लू आँखों पर रख लिया।


तेरह साल में पहली बार किसी ने मेरे काम को नाम दिया था।


पहली बार किसी ने मेरी चुप्पी के पीछे की थकान को समझा था।


अरुण भी चुप बैठा था।


वह धीरे से मेरे पास आया।


उसने सबके सामने कहा,


"शायद गलती मेरी भी थी, साक्षी। मैंने कभी तुम्हें धन्यवाद नहीं कहा। मैं बाहर की जिम्मेदारियों में उलझा रहा, लेकिन यह भूल गया कि मेरी हर सफलता के पीछे तुम्हारा हिस्सा भी है।"


मैंने उसकी ओर देखा।


उसकी आँखों में सच्चा पछतावा था।


विशाल, जो पास ही खड़ा सब सुन रहा था, अचानक मेरे गले लग गया।


वह बोला,


"मम्मा, स्कूल में जब टीचर पूछेंगी कि आपकी मम्मी क्या करती हैं, तो मैं कहूँगा—मेरी मम्मी हमारा पूरा घर संभालती हैं।"


उसकी बात सुनकर कमरे का माहौल बदल गया।


कई रिश्तेदारों ने नजरें झुका लीं।


चाची जी मेरे पास आकर बोलीं,


"साक्षी, अगर हमारी बात से तुम्हें बुरा लगा हो तो माफ कर देना। सच कहूँ, हमने कभी इस नजरिए से सोचा ही नहीं।"


मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,


"कोई बात नहीं चाची जी। शायद हम औरतें भी खुद को 'बस हाउसवाइफ' कहकर अपने काम को छोटा कर देती हैं।"


बाबूजी ने मुस्कुराकर कहा,


"आज के बाद इस घर में कोई यह नहीं कहेगा कि साक्षी कुछ नहीं करती।"


उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा,


"बेटा, अपना परिचय देते समय कभी मत कहना कि तुम कुछ नहीं करती। कहना—मैं अपने परिवार का जीवन व्यवस्थित रखती हूँ।"


मैं रोते हुए हँस पड़ी।


उस दिन पहली बार मुझे लगा कि मेरी पहचान केवल किसी की पत्नी, बहू या माँ होने तक सीमित नहीं है।


मैं एक ऐसी स्त्री हूँ, जो बिना छुट्टी, बिना वेतन और बिना प्रशंसा के भी अपने परिवार को टूटने नहीं देती।


और शायद दुनिया की लाखों गृहिणियों की तरह मैं भी सच में 'कुछ नहीं' नहीं करती थी।


मैं हर दिन प्रेम, जिम्मेदारी और त्याग से एक पूरे घर को जीवित रखती थी।



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