कन्यादान का असली हकदार
"जैसे ही वसीयत पढ़ने के लिए वकील ने फाइल खोली, कमरे में बैठे सभी रिश्तेदारों की निगाहें ललिता देवी पर टिक गईं, लेकिन उन्होंने जो फैसला सुनाया, उसने वर्षों से रिश्तों के बारे में सबकी सोच बदल दी।"
ललिता देवी एक साधारण गृहिणी थीं। उनका छोटा-सा परिवार था। पति महेश जी, दो बेटे विनय और दीपक, और सबसे छोटी बेटी नेहा।
महेश जी शहर के बाजार में कपड़ों की छोटी-सी दुकान चलाते थे। मेहनती इंसान थे और हमेशा कहते थे, "रिश्तों की असली पूँजी पैसा नहीं, साथ निभाने की नीयत होती है।"
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।
एक दिन अचानक हार्ट अटैक आने से महेश जी का निधन हो गया।
उस समय विनय बी.कॉम. के अंतिम वर्ष में था। दीपक बारहवीं कक्षा में पढ़ता था और नेहा आठवीं में।
महेश जी के जाने के बाद घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
ललिता देवी की दुनिया जैसे उजड़ गई थी। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की थी।
विनय ने माँ का हाथ पकड़कर कहा, "माँ, आप चिंता मत करो। मैं नौकरी कर लूँगा।"
लेकिन दीपक ने तुरंत कहा, "भैया की पढ़ाई पूरी होने वाली है। अगर अभी उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी तो उनकी मेहनत बेकार हो जाएगी। दुकान मैं संभाल लूँगा।"
"लेकिन बेटा, तुम्हारी पढ़ाई?" ललिता देवी ने पूछा।
दीपक मुस्कराया।
"मैं प्राइवेट पढ़ाई कर लूँगा माँ। अभी घर को मेरी जरूरत है।"
उस दिन से सत्रह साल का दीपक सुबह दुकान खोलता, ग्राहकों को संभालता और रात को पढ़ाई करता।
धीरे-धीरे घर की गाड़ी पटरी पर आने लगी।
विनय की पढ़ाई पूरी हो गई। कॉलेज में उसकी दोस्ती पूजा नाम की लड़की से हुई थी। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे।
पूजा के पिता बड़े व्यापारी थे।
उन्होंने विनय की योग्यता देखकर अपनी कंपनी में नौकरी दे दी।
कुछ समय बाद दोनों परिवारों की सहमति से विनय और पूजा की शादी हो गई।
शादी के बाद पूजा के माता-पिता ने कहा, "यहीं रहो बेटा। ऑफिस भी पास रहेगा।"
धीरे-धीरे विनय ससुराल में ही बस गया।
शुरुआत में वह हर सप्ताह घर आता था।
फिर महीने में एक बार।
फिर त्योहारों तक सीमित हो गया।
धीरे-धीरे विनय के घर आने की जगह सिर्फ फोन आने लगे। वह हर बार एक ही बात कहता, 'माँ, काम बहुत बढ़ गया है... इस बार भी घर नहीं आ पाऊँगा। आप अपना ध्यान रखना, जल्दी मिलने की कोशिश करूँगा।
ललिता देवी हर बार मुस्कराकर कहतीं, "कोई बात नहीं बेटा, अपना ध्यान रखना।"
लेकिन फोन रखने के बाद उनकी आँखें नम हो जाती थीं।
उधर दीपक बिना किसी शिकायत के सब संभाल रहा था।
उसने दुकान को बढ़ाया।
माँ की दवाइयों का ध्यान रखा।
नेहा की पढ़ाई का खर्च उठाया।
कभी उसे महसूस नहीं होने दिया कि पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
कुछ वर्षों बाद दीपक की शादी संध्या से हुई।
संध्या बेहद सरल और समझदार लड़की थी।
शादी के बाद उसने घर को अपना मान लिया।
वह ललिता देवी का पूरा ध्यान रखती।
नेहा के साथ बहन जैसा रिश्ता बना लिया।
नेहा प्यार से उसे "भाभी माँ" कहकर बुलाती थी।
दोनों साथ बाजार जातीं, साथ खाना बनातीं और एक-दूसरे के सुख-दुख बाँटतीं।
समय बीतता गया।
दीपक और संध्या के यहाँ एक बेटा हुआ।
लेकिन संध्या हमेशा कहती, "हमारे दो बच्चे हैं। एक हमारा बेटा और दूसरी हमारी नेहा।"
नेहा की पढ़ाई पूरी हो गई।
अब उसके विवाह की चर्चा होने लगी।
रिश्ते आने लगे।
संध्या ने अपने दूर के रिश्तेदारों के माध्यम से एक अच्छा रिश्ता ढूँढ़ा।
लड़का पढ़ा-लिखा, संस्कारी और अच्छे परिवार से था।
नेहा को भी रिश्ता पसंद आया।
जल्द ही शादी तय हो गई।
पूरे घर में खुशियों का माहौल था।
दीपक दिन-रात तैयारियों में लगा रहता।
संध्या ने नेहा के लिए अपनी पसंद से कपड़े और गहने चुने।
ललिता देवी अपनी बेटी को खुश देखकर भगवान का धन्यवाद करतीं।
इसी बीच एक दिन विनय अचानक घर आया।
कई महीनों बाद उसे देखकर सब हैरान रह गए।
उसके साथ पूजा भी थी।
बैठक में चाय पीते हुए विनय ने कहा,
"माँ, नेहा की शादी में कन्यादान मैं करूँगा। आखिर मैं बड़ा भाई हूँ।"
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
दीपक चुप रहा।
संध्या भी कुछ नहीं बोली।
तभी ललिता देवी ने शांत स्वर में पूछा,
"विनय, तुम्हें याद है नेहा की कॉलेज की फीस किसने भरी थी?"
विनय चुप रहा।
"जब मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, तब रात-रात भर कौन बैठा था?"
उसने नजरें झुका लीं।
"नेहा के जन्मदिन पर पिछले पाँच साल में कितनी बार तुम आए थे?"
अब विनय के पास कोई जवाब नहीं था।
ललिता देवी की आवाज भर्रा गई।
"बेटा, बड़ा होने का अधिकार जन्म से मिल जाता है, लेकिन उस अधिकार का सम्मान केवल वही पाता है, जो अपने फ़र्ज़ और कर्मों से उसे निभाता है।"
कमरे में बैठे सभी लोग उन्हें देख रहे थे।
उन्होंने आगे कहा,
"जब तुम्हारे पिता चले गए थे, तब इस घर का सहारा दीपक बना था।"
"इसने अपनी उम्र से पहले जिम्मेदारियाँ उठाईं।"
"संध्या ने इस घर को टूटने नहीं दिया।"
"नेहा को बेटी बनाकर पाला।"
"आज अगर मेरी बेटी मुस्कुरा रही है तो इन दोनों की वजह से।"
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा,
"इसलिए नेहा का कन्यादान दीपक और संध्या ही करेंगे। यही मेरा फैसला है।"
पूजा की आँखें नम हो गईं।
विनय का सिर झुक गया।
शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि रिश्ते केवल खून से नहीं चलते।
उन्हें समय, त्याग और जिम्मेदारी की जरूरत होती है।
शादी का दिन आ गया।
नेहा दुल्हन बनी बैठी थी।
विदाई से पहले उसने दीपक और संध्या के पैरों को छू लिया।
रोते हुए बोली,
"भैया, आपने कभी पापा की कमी महसूस नहीं होने दी। भाभी माँ, आपने मुझे बेटी से बढ़कर प्यार दिया। आज जो मैं हूँ, आपकी वजह से हूँ।"
संध्या ने उसे गले लगा लिया।
दीपक की आँखों से भी आँसू बह निकले।
मंडप में पूरे विधि-विधान से दीपक और संध्या ने नेहा का कन्यादान किया।
ललिता देवी दूर बैठी भगवान का धन्यवाद कर रही थीं।
विनय भी चुपचाप यह सब देख रहा था।
विदाई के समय वह दीपक के पास आया।
भर्राई आवाज में बोला,
"मुझे माफ कर दो छोटे। मैं बड़ा भाई था, लेकिन बड़े होने का फर्ज निभा नहीं पाया।"
दीपक ने उसे गले लगा लिया।
"भैया, घर के दरवाजे कभी बंद नहीं हुए थे। बस आपको लौटने में देर हो गई।"
दोनों भाइयों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
ललिता देवी मुस्कुरा उठीं।
उन्हें लगा कि शायद आज उनका परिवार फिर से पूरा हो गया है।
कहते हैं, रिश्ते हमें जन्म से मिल जाते हैं, लेकिन उन्हें निभाने का सम्मान हमारे कर्म तय करते हैं।
जो मुश्किल समय में साथ खड़े रहते हैं, वही सच मायनों में अपने कहलाने का अधिकार कमाते हैं।

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