सम्मान का असली स्वाद
"बहू, ये मिठाई का डिब्बा अलग रख दो... ड्राइवर और चौकीदार को इतनी महंगी मिठाई देने की क्या ज़रूरत है?"
रिया के हाथ वहीं रुक गए।
अभी कुछ देर पहले ही उसके पति प्रमोद बड़ी खुशी से ऑफिस से लौटे थे। उन्हें प्रमोशन मिला था और पूरे घर में जश्न का माहौल था। ड्रॉइंग रूम रंग-बिरंगी लाइटों से सजा था। रिश्तेदारों के फोन लगातार आ रहे थे और रसोई से तरह-तरह के पकवानों की खुशबू फैल रही थी।
रिया मिठाई के डिब्बे अलग-अलग पैक कर रही थी।
एक डिब्बा पड़ोसियों के लिए, एक रिश्तेदारों के लिए और कुछ उन लोगों के लिए जो सालों से इस घर से जुड़े हुए थे—ड्राइवर रमेश, चौकीदार हरि काका, और कूड़ा उठाने वाली शांति।
तभी उसकी सास, सावित्री देवी ने कहा,
"अरे बहू, इन लोगों को साधारण मिठाई दे दो। इतने महंगे डिब्बे उन पर क्यों खर्च कर रही हो?"
रिया ने धीरे से पूछा, "क्यों मम्मी जी?"
"क्योंकि उनकी औकात के हिसाब से देना चाहिए। आदत खराब हो जाती है।"
इतने में दरवाजे की घंटी बजी।
बाहर रमेश खड़ा था।
"मैडम, साहब की गाड़ी धो दी है। और कल सुबह उन्हें जल्दी निकलना है, तो मैंने पेट्रोल भी भरवा दिया है।"
रिया मुस्कुरा दी।
"अंदर आइए रमेश भैया।"
लेकिन सावित्री देवी का चेहरा उतर गया।
"नहीं-नहीं, बाहर ही रहने दो। काम करके चला जाएगा।"
रमेश ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। वह सिर झुकाकर बोला,
"साहब को प्रमोशन की बहुत-बहुत बधाई।"
उसकी आँखों में सच्ची खुशी थी।
वह चला गया।
रिया कुछ देर तक सोचती रही।
उसे याद आया कि पिछले साल जब प्रमोद का एक्सीडेंट हुआ था, तो सबसे पहले अस्पताल कौन पहुंचा था।
रमेश।
पूरी रात अस्पताल के बाहर बैठा रहा था।
जब रिया घबराकर रो रही थी, तब हरि काका ने बच्चों को स्कूल पहुंचाया था।
और जब रिया की सास बीमार थीं, तब शांति रोज़ काम खत्म करके उनके लिए खिचड़ी बनाकर रख जाती थी।
उनमें से किसी ने कभी अपने काम से ज्यादा किए गए इन एहसानों का हिसाब नहीं मांगा था।
लेकिन आज उनकी खुशी में उन्हें बराबरी का सम्मान देना भारी लग रहा था।
रात को पार्टी खत्म हुई।
टेबल पर बहुत सारा खाना बच गया।
कई रिश्तेदार आधी प्लेट छोड़कर चले गए थे।
सावित्री देवी बोलीं,
"इतना खाना फेंक देना पड़ेगा।"
रिया से रहा नहीं गया।
"मम्मी जी, जिन लोगों ने हमारे मुश्किल समय में साथ दिया, उन्हें मिठाई देने में आपको तकलीफ हो रही थी। लेकिन इतना खाना बर्बाद होने पर दुख नहीं हो रहा?"
सावित्री देवी चुप हो गईं।
अगली सुबह हरि काका की तबीयत खराब थी।
फिर भी वे ड्यूटी पर बैठे थे।
रिया ने पूछा, "आप घर क्यों नहीं गए?"
हरि काका मुस्कुरा दिए।
"बिटिया, छुट्टी करेंगे तो उस दिन की तनख्वाह कट जाएगी। घर में पोते की दवा चल रही है।"
रिया का दिल भर आया।
उसी दिन उसने प्रमोद से कहा,
"क्या हम सच में बड़े लोग हैं?"
प्रमोद ने हैरानी से पूछा, "मतलब?"
रिया बोली,
"बड़ा घर, बड़ी गाड़ी और बड़ी तनख्वाह से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा वह होता है जो दूसरों की मेहनत और इंसानियत की कीमत समझे।"
प्रमोद कुछ देर तक चुप रहे।
फिर बोले,
"शायद तुम सही कह रही हो।"
उस शाम रिया ने फिर मिठाई के डिब्बे निकाले।
लेकिन इस बार उसने सिर्फ मिठाई नहीं रखी।
हर डिब्बे में एक धन्यवाद-पत्र भी रखा।
सबसे पहले वह रमेश के घर गई।
छोटा-सा किराए का कमरा था।
उसकी बेटी जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रही थी।
रिया ने मिठाई और लिफाफा देते हुए कहा,
"ये प्रमोशन की खुशी में है... और उस साथ के लिए भी जो आपने हमेशा दिया।"
रमेश घबरा गया।
"मैडम, इसकी क्या जरूरत थी?"
रिया मुस्कुरा दी।
"जरूरत थी। धन्यवाद कहना भी सीखना चाहिए।"
फिर वह हरि काका के पास गई।
उन्होंने कांपते हाथों से मिठाई ली और बोले,
"पहली बार किसी ने हमें भी अपने परिवार की खुशी में शामिल किया है।"
आखिर में वह शांति के घर पहुंची।
शांति की बूढ़ी मां ने कहा,
"बेटी, लोग काम करवाते हैं, पर इंसान समझकर बहुत कम बुलाते हैं।"
रिया की आँखें नम हो गईं।
घर लौटते समय उसे लगा जैसे उसके भीतर कुछ बदल गया हो।
अगले दिन से घर के नियम बदल गए।
काम करने वालों को नाम लेकर बुलाया जाने लगा।
समय पर मेहनताना दिया जाने लगा।
त्योहारों में उन्हें भी परिवार का हिस्सा माना जाने लगा।
सावित्री देवी भी अब चाय बनाते समय पूछ लेती थीं,
"हरि काका को भी एक कप दे देना।"
धीरे-धीरे घर का माहौल बदल गया।
सम्मान देने से किसी का कद छोटा नहीं होता, बल्कि इंसान खुद बड़ा हो जाता है।
क्योंकि सच तो यह है कि समाज सिर्फ डॉक्टर, इंजीनियर और अफसरों की मेहनत से नहीं चलता।
उसे चलाने में उस चौकीदार का भी हाथ होता है जो रात भर जागता है, उस ड्राइवर का भी जो हमें सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाता है, उस सफाईकर्मी का भी जो हमारी गंदगी साफ करता है, और उस कामवाली का भी जो हमारे घर को घर बनाए रखती है।
मेहनत का कोई छोटा-बड़ा दर्जा नहीं होता।
छोटी होती है सिर्फ हमारी सोच।
और जिस दिन हम हर मेहनतकश इंसान को उसका सम्मान देना सीख जाएंगे, उस दिन हमारे घर ही नहीं, हमारा समाज भी सचमुच बड़ा बन जाएगा।

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