बहू देखने गए थे, लेकिन घर बेटी लेकर लौटे...
"देखिए, हमें बहुत ज़्यादा दिखावा पसंद नहीं है," नीलम जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बस इतनी इच्छा है कि जो भी हमारे घर आए, वह रिश्तों की कद्र करना जानती हो।"
सामने बैठी लड़की की माँ ने हँसते हुए जवाब दिया, "फिर तो आपको पहले से ही बता दूँ, हमारी आरोही बिल्कुल वैसी नहीं है जैसी लोग आदर्श बहू की कल्पना करते हैं।"
नीलम जी ने उत्सुकता से सामने बैठी लड़की की ओर देखा।
ढीली जीन्स, सफेद कुर्ती, खुले बाल और चेहरे पर आत्मविश्वास से भरी मुस्कान।
उसने आते ही कहा, "हेलो आंटी! मुझे औपचारिक बातें कम आती हैं, इसलिए अगर मुझसे कोई गलती हो जाए तो पहले से माफ़ कर दीजिएगा।"
उसकी माँ ने तुरंत टोका।
"अरे बेटा, पैर तो छुओ।"
आरोही थोड़ी असहज हो गई।
नीलम जी ने तुरंत कहा, "रहने दीजिए। सम्मान दिल से होना चाहिए, रस्मों से नहीं।"
आरोही ने राहत की साँस ली।
"थैंक यू आंटी... नहीं तो मम्मी हर जगह मेरी क्लास लगा देती हैं।"
सभी हँस पड़े।
लेकिन नीलम जी के मन में हल्का-सा संशय था।
उन्हें अपने इकलौते बेटे आदित्य के लिए एक ऐसी बहू चाहिए थी जो साड़ी पहने, धीमे बोले, पूजा-पाठ करे, घर के कामों में निपुण हो और हर किसी का मन जीत ले।
आरोही उस कल्पना से बिल्कुल अलग थी।
बात-बात पर तर्क करना, खुलकर हँसना, अपने विचार बेझिझक रखना...
फिर भी आदित्य की आँखों में उसके लिए इतना प्यार था कि नीलम जी कुछ कह नहीं सकीं।
कुछ महीनों बाद दोनों की शादी हो गई।
शादी के बाद जब आरोही पहली बार घर आई तो नीलम जी ने मन ही मन खुद को समझा लिया।
"कोई बात नहीं। जैसी है, वैसी ही स्वीकार करनी होगी। समय के साथ सब सीख जाएगी।"
अगले दिन आदित्य और आरोही दोनों को ऑफिस जाना था।
नीलम जी को उम्मीद नहीं थी कि नई बहू जल्दी उठेगी।
उन्होंने सोचा, "मैं ही सब कर लूँगी। बच्चों को आराम करने दूँगी।"
वह रसोई की तरफ बढ़ीं ही थीं कि उन्हें रसोई से बर्तनों की आवाज़ सुनाई दी।
अंदर जाकर देखा तो आरोही एप्रन पहने खड़ी थी।
उसके हाथ में मोबाइल था, जिसमें कोई रेसिपी वीडियो चल रही थी।
वह बड़ी गंभीरता से कुछ बना रही थी।
नीलम जी ने पूछा, "अरे बेटा, तुम?"
आरोही घबरा गई।
"सॉरी मम्मी... मैं आपको सरप्राइज़ देना चाहती थी। लेकिन लगता है ये उपमा मुझसे नाराज़ हो गया है।"
नीलम जी ने मुस्कुराते हुए कड़ाही में झाँका।
जिसे आरोही बड़े गर्व से उपमा बता रही थी, उसे देखकर समझना मुश्किल था कि वह उपमा है या किसी नई डिश का प्रयोग। उपमा कम और खिचड़ी ज़्यादा लग रहा था।
कुछ पल के लिए नीलम जी उसे देखती रह गईं, फिर उनकी हँसी छूट गई।
आरोही ने मासूमियत से चेहरा बनाते हुए कहा, "हँस लीजिए मम्मी, लेकिन मेरा इरादा सच में बहुत नेक था।"
उसकी बात सुनकर नीलम जी और ज़ोर से हँस पड़ीं।
अगले ही पल आरोही भी उनकी हँसी में शामिल हो गई।
"मुझे सच में खाना बनाना ज़्यादा नहीं आता। लेकिन सीख लूँगी। बस आप डाँटना मत।"
उस दिन दोनों ने मिलकर नाश्ता बनाया।
धीरे-धीरे घर की दिनचर्या बनने लगी।
आरोही को गोल रोटियाँ बनानी नहीं आती थीं।
उसकी रोटियाँ कभी भारत का नक्शा लगतीं, कभी बादलों जैसी।
साड़ी पहनने में उसे आधा घंटा लग जाता था।
घर के रिश्तेदारों के नाम भी वह भूल जाती थी।
लेकिन एक बात नीलम जी ने नोटिस की।
वह हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखती थी।
आदित्य को समय पर दवा देना।
ससुर जी का चश्मा साफ़ करना।
नीलम जी के सिर में दर्द होने पर चुपचाप तेल लेकर बैठ जाना।
वह दिखावा नहीं करती थी।
बस दिल से रिश्ते निभाती थी।
समय यूँ ही बीत रहा था।
फिर एक दिन सब बदल गया।
समय यूँ ही बीत रहा था कि एक दिन नीलम जी की छोटी बहन का घबराया हुआ फोन आया। उनका इकलौता बेटा एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था। खबर सुनते ही नीलम जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वे तुरंत अस्पताल पहुँचीं।
नीलम जी की बहन का रो-रोकर बुरा हाल था। बेटे को उस हालत में देखकर मानो उनकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। कभी वे डॉक्टरों से विनती करतीं, तो कभी भगवान के सामने हाथ जोड़कर आँसू बहाने लगतीं। पूरा परिवार चिंता और बेचैनी में डूब गया था।
ऐसे कठिन समय में आरोही ने सबको संभाल लिया। वह अस्पताल के चक्कर लगाती, डॉक्टरों से बात करती, ज़रूरी कागज़ी कार्यवाही पूरी करती और नीलम जी को हिम्मत बँधाती रहती। जब नीलम जी टूटने लगतीं, तो वह उनका हाथ थामकर कहती, "मम्मी, आप मजबूत रहिए। सब ठीक हो जाएगा।"
जब भी नीलम जी खाने से मना कर देतीं, आरोही उनके सामने थाली रखकर दृढ़ स्वर में कहती,
"मम्मी, अगर आप ही हिम्मत हार जाएँगी तो मौसी को संभालेगा कौन? इस समय उन्हें आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इसलिए पहले आप खाना खाइए।"
नीलम जी नम आँखों से सिर हिलाकर कहतीं, "मुझे भूख नहीं है बेटा... गले से निवाला नहीं उतर रहा।"
आरोही उनके पास बैठ जाती, उनका हाथ अपने हाथों में लेकर कहती,
"ठीक है, भूख नहीं है तो मत समझिए कि खाना खा रही हैं। इसे अपनी जिम्मेदारी समझकर खाइए। अपने लिए नहीं, मौसी के लिए... हमारे लिए। अगर आप खुद को ही संभालकर नहीं रखेंगी, तो दूसरों का सहारा कैसे बनेंगी?"
फिर वह हल्की-सी सख्ती के साथ मुस्कुराकर कहती,
"और हाँ, आज बहस बिल्कुल नहीं होगी। मैं अपने हाथों से आपको खाना खिलाऊँगी, और आप बिना कोई बहाना बनाए चुपचाप खाएँगी।"
उसकी आवाज़ में डाँट कम और अपनापन ज़्यादा होता था। उसी पल नीलम जी को महसूस होता कि सामने उनकी बहू नहीं, उनकी अपनी बेटी बैठी है, जो उन्हें टूटने नहीं देना चाहती।
नीलम जी उसे देखती रह जातीं।
जिस लड़की को उन्होंने सिर्फ उसके पहनावे और बोलने के अंदाज़ से आँका था, वही इस मुश्किल समय में सबसे मज़बूत सहारा बन गई थी।
कुछ दिनों बाद लड़का खतरे से बाहर आ गया।
पूरा परिवार राहत की साँस लेने लगा।
उस रात नीलम जी बालकनी में बैठी थीं।
आरोही उनके पास आई।
"क्या सोच रही हैं मम्मी?"
नीलम जी की आँखें भर आईं।
"सोच रही हूँ कि भगवान ने मुझे बेटी क्यों नहीं दी..."
आरोही मुस्कुराई।
"फिर?"
"फिर शायद इसलिए नहीं दी... क्योंकि उन्होंने बेटी को बहू बनाकर भेजने का फैसला पहले से कर रखा था।"
आरोही की आँखें भी नम हो गईं।
उसने धीरे से नीलम जी का हाथ पकड़ लिया।
कुछ महीनों बाद नीलम जी का जन्मदिन आया।
आदित्य ने पूछा,
"माँ, बताइए आपको क्या गिफ्ट चाहिए?"
"मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा।"
जन्मदिन की शाम आरोही एक बड़ा-सा पैकेट लेकर आई।
"ये दुनिया की सबसे प्यारी मम्मी के लिए।"
नीलम जी ने पैकेट खोला।
उसमें हल्के गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी थी।
ठीक वैसी, जैसी वह कई बार दुकान की खिड़की में देखकर लौट आई थीं।
वह हैरान रह गईं।
"तुम्हें कैसे पता?"
आरोही शरारती अंदाज़ में हँस पड़ी।
"आप हर बार उस दुकान के सामने पाँच मिनट ज़रूर रुकती थीं। फिर कहती थीं—'बहुत सुंदर है, लेकिन रहने दो।'"
"मैंने सोचा, जो चीज़ मेरी मम्मी को इतनी पसंद है, वह उन्हें मिलनी चाहिए।"
नीलम जी ने काँपते हाथों से साड़ी को सीने से लगा लिया।
फिर उन्होंने आरोही का चेहरा दोनों हथेलियों में भर लिया।
"तुम वैसी बहू कभी नहीं बनीं, जैसी मैंने अपने सपनों में सोची थी।"
आरोही उदास होकर बोली,
"सॉरी मम्मी... मैंने कोशिश तो की थी।"
नीलम जी ने तुरंत उसके होंठों पर हाथ रख दिया।
"नहीं बेटा। तुम उससे कहीं बेहतर निकलीं। मुझे आदर्श बहू नहीं मिली..."
उन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा,
"मुझे मेरी बेटी मिल गई।"
आरोही ने आँसू पोंछे और अपनी वही बिंदास हँसी हँसते हुए बोली,
"तो फिर सुन लीजिए मम्मी... अब इस बेटी से छुटकारा नहीं मिलने वाला।"
नीलम जी हँसते-हँसते रो पड़ीं।
सच ही तो है...
बेटियाँ हमेशा जन्म लेकर ही घर नहीं आतीं, कभी-कभी वे बहू बनकर आती हैं और अपने व्यवहार से एक माँ के अधूरे स्नेह को पूरा कर जाती हैं।

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