जब मां ने चुप रहना छोड़ दिया

 

Elderly Indian mother forgiving her son and daughter-in-law in an emotional family reunion inside a warm and beautiful home.


“कई बार इंसान यह सोच लेता है कि जिस घर को उसने अपने त्याग, मेहनत और संघर्ष से बनाया है, उस घर में उसका सम्मान हमेशा बना रहेगा। उसे लगता है कि अपने बच्चे कभी उसका दिल नहीं दुखाएंगे। लेकिन समय जब करवट बदलता है, तब कई बार अपने ही लोग ऐसे शब्द कह जाते हैं जो किसी पराए के तानों से भी ज्यादा चोट पहुंचाते हैं।”


कमला देवी बरामदे में बैठी ऊन का गोला लपेट रही थीं। उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन उन लकीरों में संघर्ष और आत्मसम्मान की चमक भी साफ दिखाई देती थी।


उनके पति को गुजरे हुए करीब दस साल हो चुके थे। पति के जाने के बाद उन्होंने अकेले ही अपने बेटे अमन को पढ़ाया-लिखाया, उसे नौकरी के लायक बनाया और जिंदगी की हर मुश्किल से बचाकर रखा।


अमन भी कभी अपनी मां से बहुत प्यार करता था। लेकिन शादी के बाद धीरे-धीरे सब बदलने लगा।


रश्मि घर की बहू बनकर आई तो कमला देवी ने उसे बेटी की तरह अपनाया। उसकी पसंद का खाना बनातीं, उसके लिए नए कपड़े खरीदतीं और हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखतीं।


लेकिन रश्मि को यह सब कभी दिखाई नहीं दिया।


उसे लगता था कि सास का मतलब सिर्फ पुरानी सोच और दखलअंदाजी है।


धीरे-धीरे उसने अमन को भी अपनी तरफ कर लिया।


अगर कमला देवी कोई सलाह देतीं तो रश्मि कहती,


“मम्मी जी, जमाना बदल गया है।”


अगर किसी बात पर आपत्ति करतीं तो जवाब मिलता,


“आप हर बात में टांग मत अड़ाइए।”


कमला देवी चुप रह जातीं।


वह सिर्फ घर में शांति चाहती थीं।


लेकिन जिस दिन रश्मि ने अपनी सहेलियों के सामने उनका मजाक उड़ाया, उस दिन उनके सब्र का बांध टूट गया।



जब अमन ने भी बिना उनकी बात सुने सारा दोष उन्हीं पर डाल दिया और यह तक कह दिया कि अगर उन्हें इस घर में रहना है तो उन्हीं के नियमों के अनुसार रहना होगा, तब कमला देवी के दिल को गहरी ठेस पहुंची। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था, आज वही उनकी भावनाओं और सम्मान की कोई कीमत नहीं समझ रहा था। उसी क्षण उन्हें एहसास हुआ कि उनकी वर्षों की चुप्पी को सहनशीलता नहीं, बल्कि कमजोरी समझ लिया गया है। उन्होंने मन ही मन एक बड़ा फैसला कर लिया। शांत स्वर में उन्होंने अमन और रश्मि की तरफ देखा और कहा, 'मैं तुम दोनों को सात दिनों का समय देती हूं। इस दौरान अपने रहने का कोई दूसरा इंतजाम कर लो। अब मैं अपने आत्मसम्मान से समझौता करके नहीं जी सकती।


अमन और रश्मि को पूरा विश्वास था कि मां सिर्फ गुस्से में बोल रही हैं।


रश्मि तो अपनी सहेलियों से कहती फिर रही थी,


“देखना, दो दिन बाद खुद ही बुला लेंगी।”


लेकिन दो दिन बीते।


फिर चार दिन बीते।


फिर पूरा सप्ताह गुजर गया।


कमला देवी अपने फैसले पर अडिग रहीं।


आठवें दिन उन्होंने साफ शब्दों में कहा,


“बेटा, अब तुम्हें अपना अलग इंतजाम कर लेना चाहिए।”


अमन को पहली बार लगा कि मां सचमुच गंभीर हैं।


वह बोला,


“मां, लोग क्या कहेंगे?”


कमला देवी मुस्कुराईं।


“जब मेरी बेइज्जती हो रही थी तब लोगों की चिंता नहीं थी। अब क्यों है?”


अमन के पास कोई जवाब नहीं था।


कुछ ही दिनों में अमन और रश्मि किराए के फ्लैट में रहने चले गए।


जाते समय रश्मि के चेहरे पर अब भी घमंड था।


उसे पूरा विश्वास था कि कमला देवी ज्यादा दिन अकेली नहीं रह पाएंगी।


लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा।


कमला देवी ने अपने बड़े घर की ऊपर वाली मंजिल किराए पर दे दी।


एक अच्छा परिवार वहां रहने आ गया।


घर में फिर से रौनक लौट आई।


किराएदारों की छोटी बेटी अक्सर कमला देवी के पास आकर बैठती।


उन्हें दादी कहकर बुलाती।


कमला देवी का खालीपन धीरे-धीरे भरने लगा।


उधर अमन और रश्मि की जिंदगी मुश्किल होती जा रही थी।


पहले उन्हें लगता था कि घर चलाना बहुत आसान है।


लेकिन अब हर महीने किराया देना पड़ता था।


बिजली का बिल अलग।


पानी का खर्च अलग।


सोसाइटी मेंटेनेंस अलग।


ऊपर से रश्मि की नौकरी भी नहीं थी।


अमन की पूरी तनख्वाह खर्चों में निकल जाती।


जिस जिंदगी को वे आजादी समझ रहे थे, वही अब बोझ लगने लगी थी।


एक दिन मकान मालिक किराया लेने आया।


अमन ने दो दिन की मोहलत मांगी।


मकान मालिक ने सबके सामने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई।


अमन को पहली बार अपनी मां की याद आई।


उसे याद आया कि जब वह छोटा था और फीस भरने के पैसे नहीं होते थे, तब उसकी मां अपने गहने गिरवी रख देती थीं।


जब उसे नई किताबें चाहिए होती थीं, तब वह खुद पुरानी साड़ी पहन लेती थीं।


लेकिन उसने कभी उनकी कीमत नहीं समझी।


उधर रश्मि भी परेशान रहने लगी थी।


अब घर का सारा काम उसे खुद करना पड़ता था।


सहेलियां भी धीरे-धीरे दूर होने लगी थीं।


जिनके सामने वह अपनी सास का मजाक उड़ाती थी, वही अब उसकी परेशानी सुनकर विषय बदल देती थीं।


एक दिन रश्मि की तबीयत खराब हो गई।


उसे तेज बुखार था।


अमन ऑफिस गया हुआ था।


पूरे दिन वह अकेली पड़ी रही।


उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि कमला देवी होतीं तो सिरहाने बैठी रहतीं।


शाम को अमन घर लौटा।


रश्मि रो रही थी।


“क्या हुआ?” अमन ने पूछा।


रश्मि बोली,


“हमने बहुत गलत किया है।”


अमन की आंखें भी भर आईं।


वह बोला,


“मुझे भी यही लगता है।”


अगले ही दिन दोनों कमला देवी के घर पहुंचे।


दरवाजा खुला।


कमला देवी सामने खड़ी थीं।


दोनों ने उनके पैर पकड़ लिए।


“मां, हमें माफ कर दीजिए।”


कमला देवी कुछ नहीं बोलीं।


अमन रोते हुए बोला,


“मां, मैं बहुत बड़ा स्वार्थी बेटा निकला। आपने पूरी जिंदगी मेरे लिए लगा दी और मैंने आपकी इज्जत तक नहीं की।”


रश्मि भी रोते हुए बोली,


“मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपके प्यार को कभी समझा ही नहीं।”


कमला देवी की आंखें भी नम हो गईं।


लेकिन इस बार उन्होंने तुरंत माफ नहीं किया।


उन्होंने शांत स्वर में कहा,


“गलती करना बुरा नहीं होता। गलती मानना भी अच्छी बात है। लेकिन विश्वास टूट जाए तो उसे जोड़ने में समय लगता है।”


दोनों सिर झुकाकर खड़े रहे।


कमला देवी आगे बोलीं,


“मैं तुम्हें माफ करती हूं। क्योंकि दिल में नफरत रखकर कोई खुश नहीं रह सकता। लेकिन अब कुछ बातें बदलेंगी।”


दोनों ने उनकी तरफ देखा।


“सम्मान मांगने की चीज नहीं है। दिया जाता है। अगर तुम इस घर में वापस आना चाहते हो तो पहले रिश्तों की कीमत समझनी होगी।”


अमन और रश्मि ने तुरंत हामी भर दी।


अगले कई महीनों तक दोनों ने अपने व्यवहार से साबित किया कि वे सचमुच बदल चुके हैं।


रश्मि अब कमला देवी के साथ बैठती, बातें करती और उनका सम्मान करती।


अमन भी मां के साथ समय बिताने लगा।


धीरे-धीरे घर का पुराना प्यार लौट आया।


एक दिन वही सहेलियां फिर घर आईं।


इस बार उन्होंने देखा कि रश्मि अपनी सास के साथ बैठकर चाय पी रही है।


एक सहेली ने मजाक में पूछा,


“क्या बात है? अब तो तुम अपनी सास की बहुत तारीफ करती हो।”


रश्मि मुस्कुराई।


फिर उसने कमला देवी का हाथ पकड़कर कहा,


“पहले मैं इन्हें सिर्फ अपनी सास समझती थी। अब मैं इन्हें अपनी दूसरी मां मानती हूं। और सच कहूं तो जिस दिन मैंने इनका सम्मान करना सीखा, उसी दिन मेरे घर में खुशियां लौट आईं।”


कमला देवी की आंखें भर आईं।


उन्होंने रश्मि के सिर पर हाथ फेर दिया।


उस पल घर में मौजूद हर व्यक्ति समझ गया कि रिश्ते अधिकार से नहीं, सम्मान और प्रेम से चलते हैं।


क्योंकि घर ईंटों और दीवारों से नहीं बनता, घर उन लोगों से बनता है जो एक-दूसरे का सम्मान करना जानते हैं।


शिक्षा:

जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता, वहां सुख ज्यादा दिन नहीं टिकता। आत्मसम्मान हर इंसान का अधिकार है, चाहे वह मां हो, पिता हो या घर का कोई भी सदस्य। 



No comments

Powered by Blogger.