"मुझे अपनी बहू पर गर्व है" — जब सास ने बेटे से सबके सामने मंगवाई माफी

 

An emotional Indian family moment at an engagement celebration, where a mother-in-law stands beside her daughter-in-law with support and encouragement as family members look on.


"बहनजी, सच कहूँ तो आपकी बहू जैसी बहू हर किसी के नसीब में नहीं होती।"


पूरे हॉल में बैठे लोगों की नज़रें एक साथ सरला देवी की तरफ उठ गईं। सरला देवी की आँखें नम थीं, लेकिन चेहरे पर गर्व साफ दिखाई दे रहा था।


उन्होंने सीना तानकर कहा, "आज मुझे अपनी बहू आरती पर उतना ही गर्व है, जितना अपने बच्चों पर भी नहीं हुआ।"


लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।


आख़िर ऐसी क्या बात हो गई थी कि जो सास कभी अपने बेटे की हर गलती पर पर्दा डाल देती थी, वही आज सबके सामने अपनी बहू का साथ दे रही थी?


कुछ हफ्ते पहले...


आरती इस घर में शादी करके आई थी। पढ़ी-लिखी, समझदार और संस्कारी लड़की थी। घर के हर सदस्य का ध्यान रखती थी।


सरला देवी भी उसे बहू नहीं, बेटी की तरह मानती थीं।


वह अक्सर कहतीं, "मैंने अपनी सास के साथ बहुत कुछ सहा है। इसलिए मैंने ठान लिया है कि मेरी बहू कभी अकेली महसूस नहीं करेगी।"


एक दिन घर में छोटे बेटे की सगाई की तैयारी चल रही थी।


सरला देवी बाजार से ढेर सारे कपड़े लेकर आईं।


"आरती बेटा, देखो इनमें से कौन-सी साड़ी लोगी?"


आरती मुस्कुराकर बोली, "माँ, ये गुलाबी वाली बहुत अच्छी है।"


"बस एक?" सरला देवी हँसते हुए बोलीं, "दो-तीन और रख लो। घर में खुशी का मौका है।"


आरती की आँखों में चमक आ गई।


उसे अपनी माँ की याद आ गई, जो हमेशा कहती थीं कि शादी के बाद लड़की को अगर सास का प्यार मिल जाए, तो उसका आधा डर अपने आप खत्म हो जाता है।


उधर उसका पति अमित दफ्तर के काम में इतना व्यस्त रहता था कि अक्सर आरती की छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दे पाता था।


आरती कभी शिकायत नहीं करती।


वह सोचती, "जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं। समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।"


देखते ही देखते सगाई का दिन आ गया।


घर मेहमानों से भरा हुआ था।


आरती उसी गुलाबी साड़ी में तैयार होकर बाहर आई।


सरला देवी उसे देखते ही बोलीं, "हाय राम! मेरी बेटी को किसी की नज़र न लग जाए। कितनी सुंदर लग रही है।"


उन्होंने तुरंत काला टीका लगा दिया।


आरती मुस्कुरा दी।


लेकिन उसकी नज़र बार-बार दरवाज़े की तरफ उठ रही थी।


वह अमित के मुँह से सुनना चाहती थी कि वह कैसी लग रही है।


थोड़ी देर बाद अमित आया।


उसने एक नज़र आरती को देखा और बोला,


"इतनी महँगी साड़ी पहनने की क्या ज़रूरत थी? पैसे क्या पेड़ों पर उगते हैं?"


आरती का चेहरा उतर गया।


सरला देवी ने सब देख लिया, लेकिन मेहमानों के कारण चुप रह गईं।


कुछ देर बाद अमित के दोस्त भी आ गए।


हँसी-मज़ाक का दौर शुरू हुआ।


दोस्तों के कहने पर अमित ने शराब पीनी शुरू कर दी।


एक के बाद एक गिलास खाली होते गए।


आरती चिंतित होकर उसके पास आई।


धीरे से बोली,


"बस कीजिए अमित। आपकी तबीयत खराब हो जाएगी। चलिए, थोड़ा आराम कर लीजिए।"


अमित का दोस्त हँसते हुए बोला,


"अरे भाभी! कॉलेज में तो ये इससे दुगुनी पी जाता था।"


सभी लोग हँसने लगे।


अमित को शायद अपनी छवि खराब होती महसूस हुई।


उसने गुस्से में आरती का हाथ झटक दिया।


"हर बात में टोकना ज़रूरी है क्या? मेरी ज़िंदगी खराब करने के लिए ही आई हो तुम। तुमसे शादी करना मेरी सबसे बड़ी गलती थी।"


पूरा हॉल शांत हो गया।


आरती की आँखों में आँसू आ गए।


तभी...


"बस!"


सरला देवी की तेज आवाज पूरे हॉल में गूँज उठी।


उन्होंने अपने बेटे की तरफ देखा।


"एक शब्द और नहीं अमित।"


अमित हैरान रह गया।


"माँ... आप?"


सरला देवी बोलीं,


"हाँ, मैं। आज अगर मैं चुप रही तो मैं भी उतनी ही गलत हो जाऊँगी जितना तुम हो।"


एक रिश्तेदार बीच में बोले,


"अरे बहनजी, मर्द लोग थोड़ा बहुत गुस्सा कर ही देते हैं। इसमें इतना क्या?"


सरला देवी उनकी तरफ मुड़ीं।


"यही सोच तो गलत है। पत्नी कोई सामान नहीं होती जिस पर जब चाहो गुस्सा निकाल दो। वह जीवनसाथी होती है।"


उन्होंने आगे कहा,


"ये लड़की इस घर के लिए अपना परिवार छोड़कर आई है। तुम्हारी पसंद-नापसंद सीखी, तुम्हारे माता-पिता को अपना माना, तुम्हारी खुशियों को अपनी खुशी समझा। और बदले में उसे क्या मिला? सबके सामने अपमान?"


पूरा माहौल शांत हो गया।


"अगर आरती तुम्हें शराब पीने से रोक रही थी, तो इसलिए क्योंकि उसे तुम्हारी चिंता थी। जो इंसान परवाह करता है, वही टोकता है।"


सरला देवी की आँखें भर आईं।


"मैं अपने समय में अपने लिए आवाज़ नहीं उठा सकी थी। कई बार गलत बातें सहती रही। लेकिन आज मैं अपनी बहू के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी।"


उन्होंने अमित से कहा,


"अभी और इसी वक्त अपनी पत्नी से माफी माँगो।"


अमित का सिर झुक गया।


उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था।


वह आरती के सामने आया।


"मुझे माफ कर दो। मैंने गुस्से में बहुत गलत बातें कह दीं।"


आरती ने आँसू पोंछे।


"गलती इंसान से होती है अमित, लेकिन रिश्ते तभी बचते हैं जब इंसान अपनी गलती मान ले।"


अमित ने पहली बार महसूस किया कि उसकी पत्नी केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा सहारा है।


उस दिन के बाद उसने आरती का सम्मान करना सीखा।


और सरला देवी को यह संतोष मिला कि जो साहस वह अपने लिए कभी नहीं जुटा पाईं, वही साहस उन्होंने अपनी बहू के लिए दिखा दिया।


कहते हैं, घर दीवारों से नहीं, रिश्तों के सम्मान से बनता है।


जहाँ बहू को बेटी समझा जाता है और बेटे को उसकी गलती का एहसास कराया जाता है, वहीं सच्चे संस्कार दिखाई देते हैं।


आपको क्या लगता है, क्या सरला देवी ने अपने बेटे का विरोध करके सही किया?



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