डर से नहीं, भरोसे से जीना सीखा उसने
रमेश बाबू अपने आँगन में रखी कुर्सी पर बैठे चुपचाप सामने देख रहे थे।
घर में सब कुछ था।
बड़ा बेटा अजय अपने परिवार के साथ ऊपर वाले हिस्से में रहता था।
दूसरा बेटा विजय भी नौकरी करता था और उसकी पत्नी पूरे घर का काम संभालती थी।
दोनों बेटों की शादियाँ हो चुकी थीं।
घर में पोते-पोतियों की आवाज़ें गूंजती रहती थीं।
लेकिन रमेश बाबू की चिंता खत्म नहीं हुई थी।
उनकी चिंता थी सबसे छोटे बेटे करण की।
करण परिवार का सबसे पढ़ा-लिखा लड़का था।
अच्छी नौकरी करता था।
एक बड़े शहर में रहता था।
कमाई भी शानदार थी।
लेकिन उसने साफ कह रखा था कि उसे शादी नहीं करनी।
जब भी घर आता, रमेश बाबू किसी न किसी तरह शादी की बात छेड़ देते।
और हर बार करण वही जवाब देता।
"पापा, मैं अभी खुश हूँ। मुझे किसी रिश्ते की ज़रूरत नहीं है।"
शुरुआत में सभी को लगा कि समय के साथ उसका विचार बदल जाएगा।
लेकिन साल दर साल बीतते गए।
करण की उम्र भी बढ़ती गई।
फिर भी उसका फैसला नहीं बदला।
एक दिन परिवार में एक शादी थी।
सभी रिश्तेदार इकट्ठा हुए थे।
खाने की मेज पर बैठे-बैठे एक चाची ने मुस्कुराते हुए पूछा—
"करण बेटा, अब तुम्हारी शादी कब होगी?"
करण ने मुस्कुराकर बात टाल दी।
लेकिन दूसरी तरफ बैठे एक मामा बोल पड़े—
"इतनी पढ़ाई-लिखाई भी किस काम की, अगर घर ही न बसाओ।"
सभी हँसने लगे।
करण भी हल्का सा मुस्कुरा दिया।
लेकिन रमेश बाबू ने उसके चेहरे पर आई उदासी देख ली।
उस रात जब सब सो गए, रमेश बाबू उसके पास आकर बैठ गए।
"बुरा लगा क्या?"
करण ने सिर हिलाया।
"नहीं पापा। आदत हो गई है।"
"फिर शादी से इतनी दूरी क्यों?"
इस बार करण कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
"क्योंकि मैंने बहुत कुछ देखा है।"
रमेश बाबू ध्यान से सुनने लगे।
"ऑफिस में दोस्त की शादी टूटी। एक रिश्तेदार कोर्ट के चक्कर काट रहा है। किसी का घर बिखर गया, किसी की जिंदगी बर्बाद हो गई।"
उसने गहरी साँस ली।
"मैं डरता हूँ पापा।"
रमेश बाबू पहली बार उसके मन का सच सुन रहे थे।
उन्हें लगा था कि बेटा ज़िद्दी है।
लेकिन असल में वह डरा हुआ था।
उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"डर गलत नहीं होता बेटा।"
"लेकिन डर को जीवन का मालिक बना देना गलत होता है।"
करण कुछ नहीं बोला।
बात वहीं खत्म हो गई।
कुछ महीने बाद रमेश बाबू की तबीयत अचानक खराब हो गई।
उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
अजय और विजय भी पिता की चिंता कर रहे थे।
वे अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के बीच जितना संभव था, उतना साथ दे रहे थे।
लेकिन जैसे ही रमेश बाबू के अस्पताल में भर्ती होने की खबर मिली, सबसे पहले जो घर पहुँचा, वह करण था।
उसने बिना एक पल गंवाए ऑफिस से छुट्टी ली और सीधे अस्पताल पहुँच गया।
पिता के इलाज की पूरी जिम्मेदारी उसने अपने कंधों पर ले ली।
डॉक्टरों से बात करना, दवाइयाँ लाना, रिपोर्टें संभालना, टेस्ट करवाना—हर काम वह खुद कर रहा था।
रात को भी वह अस्पताल की कुर्सी पर बैठा रहता, ताकि पिता को किसी चीज़ की जरूरत पड़े तो तुरंत उनके पास मौजूद हो।
उसे देखकर किसी को नहीं लगता था कि यह वही बेटा है जिसे लोग रिश्तों से दूर रहने वाला कहते थे।
डॉक्टर भी उसकी जिम्मेदारी देखकर प्रभावित थे।
एक दिन अस्पताल के कमरे में रमेश बाबू उसे देख रहे थे।
करण कुर्सी पर बैठा फाइलें देख रहा था।
आँखों में नींद नहीं थी।
चेहरे पर थकान थी।
लेकिन शिकायत नहीं थी।
रमेश बाबू की आँखें भर आईं।
रमेश बाबू ने मुस्कुराते हुए पूछा—
"तू तो कहता था कि रिश्तों की ज़रूरत नहीं होती बेटा।"
करण ने पिता की ओर देखा। उसकी आँखों में अपनापन झलक रहा था।
फिर वह धीमे से बोला—
"पापा, सच कहूँ तो दुनिया के सारे रिश्ते बाद में बने हैं। सबसे पहला रिश्ता तो माँ-बाप से ही मिलता है।"
उसने रमेश बाबू का हाथ अपने हाथ में ले लिया।
"मैंने यह रिश्ता नहीं चुना था, लेकिन भगवान ने मुझे यह सबसे खूबसूरत रिश्ता दिया है। शायद इसी वजह से यह मेरे लिए सबसे ज़्यादा कीमती है।"
रमेश बाबू की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई, लेकिन उस खामोशी में भी एक गहरा सुकून था।
फिर दोनों हल्के से मुस्कुरा दिए।
उस मुस्कान में शब्द कम थे, लेकिन अपनापन बहुत था।
कुछ दिनों बाद रमेश बाबू ठीक होकर घर लौट आए।
घर में फिर से रौनक आ गई।
लेकिन उस बीमारी ने पूरे परिवार को एक नई बात समझा दी थी।
करण अकेला जरूर था।
पर स्वार्थी नहीं था।
वह रिश्तों से भाग नहीं रहा था।
वह सिर्फ गलत रिश्तों से डरता था।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा।
एक दिन करण अपने पुराने कॉलेज के कार्यक्रम में गया।
वहाँ उसकी मुलाकात नंदिता से हुई।
नंदिता उसकी सहपाठी रह चुकी थी।
दोनों ने वर्षों बाद एक-दूसरे को देखा।
बातचीत शुरू हुई।
फिर कभी-कभी फोन पर बातें होने लगीं।
फिर दोस्ती गहरी हो गई।
नंदिता भी जीवन को बहुत व्यावहारिक नज़र से देखती थी।
वह किसी पर अपनी सोच थोपती नहीं थी।
करण को पहली बार लगा कि हर रिश्ता बोझ नहीं होता।
कुछ रिश्ते सुकून भी देते हैं।
करीब एक साल तक दोनों एक-दूसरे को समझते रहे।
कोई जल्दबाज़ी नहीं थी।
कोई दबाव नहीं था।
फिर एक दिन करण घर आया।
रमेश बाबू अखबार पढ़ रहे थे।
करण उनके सामने बैठ गया।
"पापा, एक बात करनी है।"
रमेश बाबू ने चश्मा उतारा।
"हाँ बेटा?"
करण हल्का सा मुस्कुराया।
"अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो मैं किसी से मिलवाना चाहता हूँ।"
कुछ पल के लिए रमेश बाबू समझ ही नहीं पाए।
फिर अचानक उनकी आँखें चमक उठीं।
"मतलब?"
करण हँस पड़ा।
"मतलब वही जो आप पिछले कई सालों से सुनना चाहते थे।"
रमेश बाबू की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया।
"बेटा, फैसला तेरा है।"
"मैं बस इतना चाहता हूँ कि तू खुश रहे।"
कुछ दिनों बाद नंदिता पूरे परिवार से मिली।
सभी को वह पसंद आई।
सबसे ज्यादा खुश थीं करण की माँ शारदा देवी।
क्योंकि उन्होंने कभी बेटे पर दबाव नहीं बनाया था।
उन्होंने सिर्फ इंतजार किया था।
और शायद इसी वजह से बेटा अपने फैसले तक खुद पहुँच पाया।
कुछ महीनों बाद सादगी से शादी हुई।
कोई दिखावा नहीं।
कोई शोर नहीं।
बस अपने लोग और ढेर सारी खुशियाँ।
शादी के बाद एक दिन करण छत पर खड़ा था।
रमेश बाबू उसके पास आए।
"एक बात पूछूँ, बेटा?" रमेश बाबू ने धीमे स्वर में कहा।
"जी पापा, पूछिए।" करण मुस्कुराते हुए बोला।
रमेश बाबू कुछ क्षण उसे देखते रहे, फिर बोले,
"क्या अब तुम्हारा डर पूरी तरह खत्म हो गया है?"
करण हल्के से मुस्कुराया और सिर हिला दिया।
"नहीं पापा, डर आज भी है।"
रमेश बाबू हैरानी से उसकी ओर देखने लगे।
"अगर डर अब भी है, तो फिर शादी का फैसला कैसे कर लिया?"
करण ने कुछ पल आसमान की ओर देखा, जैसे अपने भीतर झाँक रहा हो।
फिर शांत स्वर में बोला,
"पहले मैं सोचता था कि डर से बचने का सबसे अच्छा तरीका है किसी रिश्ते में ही न पड़ना। लेकिन अब समझ आया है कि डर से भागकर कोई भी इंसान सुकून नहीं पा सकता।"
वह आगे बोला,
"जिंदगी में हर चीज़ के साथ जोखिम जुड़ा होता है। दोस्ती में भी, कारोबार में भी, और रिश्तों में भी। अगर सिर्फ डर के कारण फैसले लेने लगें, तो हम बहुत कुछ खो देते हैं।"
रमेश बाबू ध्यान से उसकी बात सुनते रहे।
करण ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अब मैंने समझ लिया है कि जिंदगी डर देखकर नहीं, भरोसा करके जी जाती है। हर रिश्ता सफल होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। लेकिन बिना भरोसा किए कोई रिश्ता शुरू भी नहीं हो सकता।"
रमेश बाबू की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने आगे बढ़कर बेटे के कंधे पर हाथ रखा और गर्व से मुस्कुरा दिए।
उन्हें लगा, आज उनका बेटा सिर्फ बड़ा नहीं हुआ है, बल्कि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात भी समझ गया है।
उनकी वर्षों पुरानी चिंता समाप्त हो चुकी थी।
उन्हें बहू मिलने की खुशी जरूर थी।
लेकिन उससे भी बड़ी खुशी इस बात की थी कि उनका बेटा अब डर से नहीं, समझदारी से फैसले लेने लगा था।
और शायद यही हर माता-पिता की सबसे बड़ी जीत होती है—
जब बच्चे उनकी बात मानें नहीं,
बल्कि जीवन को समझकर अपना सही रास्ता खुद चुनें।

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