घर की असली ताकत
संगीत की तेज आवाज पूरे घर में गूंज रही थी। घर में खुशी का माहौल था क्योंकि परिवार में एक बड़ी पूजा का आयोजन रखा गया था। रिश्तेदारों और पड़ोसियों का आना-जाना लगा हुआ था।
लेकिन इसी भीड़ और चहल-पहल के बीच घर की बड़ी बहू आरती की आंखें नम थीं।
वह रसोई में खड़ी चुपचाप काम कर रही थी।
उधर उसकी सास लता देवी अपनी छोटी बेटी रश्मि के साथ बैठी हुई थीं।
रश्मि बोली, "मम्मी, आप देख रही हैं ना, भाभी अब पहले जैसी नहीं रही। आजकल तो इन्हें किसी की परवाह ही नहीं है।"
लता देवी ने लंबी सांस लेते हुए कहा, "मैं तो कब से देख रही हूं। शादी के बाद कुछ साल तो ठीक रही, लेकिन अब इसे अपने कमाने का घमंड हो गया है।"
दोनों मां-बेटी की बातें आरती ने सुन लीं।
उसका दिल दुख से भर गया।
जिस परिवार के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया था, आज वही लोग उसके बारे में ऐसी बातें कर रहे थे।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
वह चुपचाप अपना काम करती रही।
कुछ देर बाद पूजा शुरू हुई।
सभी रिश्तेदार बैठे हुए थे।
तभी लता देवी ने सबके सामने कहा, "आजकल की बहुओं को सिर्फ नौकरी करनी आती है। घर संभालना तो इनके बस की बात नहीं।"
सभी लोगों की नजर आरती पर चली गई।
आरती समझ गई कि यह ताना उसी के लिए था।
फिर भी उसने चुप रहना बेहतर समझा।
लेकिन रश्मि यहीं नहीं रुकी।
वह बोली, "कुछ लोग तो घर वालों का सम्मान करना भी भूल जाते हैं।"
अब आरती का धैर्य टूटने लगा था।
फिर भी उसने अपने पति विकास की तरफ देखा।
उसे उम्मीद थी कि विकास उसका साथ देगा।
लेकिन विकास चुप बैठा रहा।
उसकी चुप्पी ने आरती को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई।
पूजा खत्म होने के बाद आरती अपने कमरे में चली गई।
उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।
तभी दरवाजा खुला।
अंदर उसके ससुर हरिराम जी आए।
उन्होंने आरती को रोते देखा तो परेशान हो गए।
"क्या हुआ बेटा?"
उन्होंने प्यार से पूछा।
आरती कुछ देर तक चुप रही।
फिर उसके आंसुओं का बांध टूट गया।
उसने पिछले कई महीनों की सारी बातें बता दीं।
कैसे हर छोटी बात पर उसे ताने दिए जाते थे।
कैसे उसकी नौकरी को लेकर उसे अपमानित किया जाता था।
कैसे उसकी हर सफलता कुछ लोगों को चुभती थी।
हरिराम जी सब कुछ सुनते रहे।
उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
लेकिन उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा।
अगले दिन घर में एक और बड़ा कार्यक्रम था।
सभी रिश्तेदार मौजूद थे।
तभी हरिराम जी खड़े हो गए।
उन्होंने ऊंची आवाज में कहा, "आज मैं अपने परिवार से कुछ कहना चाहता हूं।"
पूरा घर शांत हो गया।
सब उनकी तरफ देखने लगे।
हरिराम जी बोले,
"जिस लड़की को तुम लोग रोज ताने देते हो, क्या कभी किसी ने सोचा है कि उसने इस घर के लिए कितना त्याग किया है?"
लता देवी और रश्मि एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
हरिराम जी आगे बोले,
"जब विकास की नौकरी चली गई थी, तब इसी बहू ने पूरे घर का खर्च उठाया था।"
"जब मेरी तबीयत खराब हुई थी, तब अस्पताल में रात-रात भर जागकर मेरी सेवा इसी ने की थी।"
"जब घर पर आर्थिक संकट आया था, तब इसी बहू ने अपनी जमा पूंजी निकालकर परिवार को संभाला था।"
अब पूरे घर में सन्नाटा था।
हरिराम जी की आवाज और सख्त हो गई।
"लेकिन बदले में इसे क्या मिला?"
"ताने, अपमान और आरोप।"
किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
फिर उन्होंने अपने बेटे विकास की तरफ देखा।
"और तुम..."
"तुम सबसे ज्यादा दोषी हो।"
विकास हैरान रह गया।
"पापा, मैंने क्या किया?"
हरिराम जी बोले,
"पति का पहला कर्तव्य अपनी पत्नी का सम्मान करना होता है।"
"जब तुम्हारी पत्नी पर गलत आरोप लगाए गए तब तुम चुप रहे।"
"जब उसका अपमान हुआ तब तुम चुप रहे।"
"आज तुम्हारी यही चुप्पी सबसे बड़ा अपराध है।"
विकास की आंखें झुक गईं।
उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा।
हरिराम जी फिर बोले,
"आज मैं एक फैसला सुनाता हूं।"
"आरती अपनी नौकरी पहले की तरह जारी रखेगी।"
"घर का काम सिर्फ उसी की जिम्मेदारी नहीं होगा।"
"इस घर में रहने वाला हर सदस्य अपनी जिम्मेदारी खुद निभाएगा।"
"और अगर किसी ने आगे से मेरी बहू का अपमान किया तो उसे मुझसे जवाब देना होगा।"
लता देवी की आंखें भर आईं।
उन्हें अपनी गलती समझ आने लगी थी।
रश्मि भी शर्म से सिर झुकाकर खड़ी थी।
उधर विकास सीधे आरती के पास गया।
उसने सबके सामने हाथ जोड़ दिए।
"मुझे माफ कर दो आरती।"
"मैं अच्छा पति नहीं बन पाया।"
आरती की आंखों में फिर आंसू आ गए।
लेकिन इस बार ये दर्द के नहीं बल्कि सम्मान मिलने के आंसू थे।
कुछ दिनों बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।
अब लता देवी आरती का सम्मान करती थीं।
रश्मि भी उसे बड़ी बहन की तरह मानने लगी थी।
विकास हर काम में उसका साथ देता था।
और हरिराम जी जब भी किसी से अपनी बहू के बारे में बात करते, गर्व से कहते,
"बहू नहीं, मेरे घर की असली लक्ष्मी है वह।"
क्योंकि समय ने सबको सिखा दिया था कि इंसान की कीमत उसके मायके, पैसे या दिखावे से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, मेहनत और दिल की अच्छाई से होती है।
शिक्षा:
जो लोग चुपचाप परिवार के लिए त्याग करते हैं, उनकी कद्र समय जरूर करवाता है। सम्मान मांगने से नहीं, अपने कर्मों से मिलता है।

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