एक फैसला, आत्मसम्मान के लिए
"मम्मी... क्या मैं भी नई साइकिल लेकर स्कूल जा सकती हूँ?"
आठ साल की सिया ने मासूमियत से पूछा।
उसकी माँ कविता कुछ पल चुप रही। उसने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा,
"ज़रूर जाओगी बेटा... लेकिन थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा।"
पास ही बैठी चाची मुस्कुरा दी।
"अरे सिया! इतनी ज़िद अच्छी नहीं होती। तुम्हारे चचेरे भाई आरव के पापा कमाते हैं, तभी तो उसके लिए नई चीज़ें आती हैं।"
सिया कुछ समझी नहीं, लेकिन कविता का दिल अंदर तक टूट गया।
यह पहली बार नहीं था।
जब भी घर में कोई नई चीज़ आती, पहले आरव और तनु के लिए खरीदी जाती। कुछ महीनों बाद वही चीज़ें पुरानी होने पर सिया के हिस्से में आ जातीं।
कभी स्कूल बैग... कभी जूते... कभी स्वेटर... और कभी खिलौने।
सबका एक ही जवाब होता—
"अरे, तीनों बच्चे ही तो हैं। नई चीज़ें लेने की क्या ज़रूरत है? आरव और तनु की पुरानी चीज़ें सिया आराम से इस्तेमाल कर लेगी।"
लेकिन कविता जानती थी कि फर्क चीज़ों से नहीं... बराबरी के एहसास से पड़ता है।
तीन साल पहले तक सब कुछ अलग था।
कविता के पति नीरज अपने शहर के सबसे ईमानदार इलेक्ट्रिशियन थे।
कम कमाते थे, लेकिन बेटी की हर छोटी खुशी पूरी करते थे।
वह अक्सर कहते,
"मेरी सिया कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएगी।"
लेकिन किस्मत को कुछ और मंज़ूर था।
एक दिन काम करते समय करंट लगने से नीरज की मौत हो गई।
पूरे परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा।
छोटे देवर दीपक ने कहा,
"भाभी, आप कहीं नहीं जाएँगी। यह घर आपका है।"
ससुर भी बोले,
"तुम हमारी बेटी जैसी हो।"
कविता ने भी यही सोचकर मायके जाने से इनकार कर दिया।
उसे लगा था कि यह घर उसकी बेटी का भविष्य सुरक्षित रखेगा।
लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा।
पहले सम्मान कम हुआ...
फिर अधिकार...
और आखिर में बेटी की बराबरी भी।
होली आई।
दीपक अपने बेटे आरव के लिए महँगी साइकिल लेकर आया।
आरव खुशी से पूरे मोहल्ले में घूमने लगा।
सिया बस उसे देखती रही।
शाम को चाची ने कहा,
"आरव जब बड़ी साइकिल ले लेगा, तब यह सिया चला लेगी।"
सिया खुशी से बोली,
"सच मम्मी?"
कविता ने मुस्कुराने की कोशिश की।
लेकिन रात भर तकिया आँसुओं से भीगता रहा।
अगले दिन ससुर ने कहा,
"बहू, ज़िंदगी समझौते से चलती है।"
कविता ने धीरे से पूछा,
"क्या समझौता हमेशा उसी को करना पड़ता है जिसके सिर से पति का साया उठ जाए?"
घर में सन्नाटा छा गया।
कुछ दिनों बाद स्कूल में पैरेंट्स मीटिंग थी।
सिया की क्लास टीचर ने कविता से कहा,
"आपकी बेटी बहुत होशियार है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसका आत्मविश्वास कम हो गया है।
वह हर बात पर यही कहती है—
'मैं बाद में ले लूँगी... पहले भैया ले लें।'
यह सुनते ही कविता की आँखें भर आईं।
उसे समझ आ गया कि भेदभाव अब केवल घर तक नहीं रहा...
उसकी बेटी के मन तक पहुँच चुका है।
उस रात कविता सो नहीं सकी।
सुबह चार बजे उठकर उसने अपने पति की पुरानी डायरी निकाली।
उसमें नीरज ने एक बात लिखी थी—
"अगर मैं कभी साथ न रहूँ... तो सिया को किसी का एहसान मत बनने देना।"
बस...
यही एक पंक्ति कविता की ज़िंदगी बदल गई।
सुबह उसने सबके सामने कहा,
"पिताजी... मैं फिर से काम करना चाहती हूँ।"
सास चौंक गईं।
"इतने साल बाद? अब क्या ज़रूरत है?"
कविता बोली,
"ज़रूरत रोटी की नहीं... आत्मसम्मान की है।"
देवर हँस पड़ा।
"भाभी, आपको नौकरी कौन देगा?"
कविता शांत रही।
"अगर कोई नहीं देगा... तो मैं खुद अपना काम शुरू करूँगी।"
उसने घर के बरामदे में सिलाई मशीन रखी।
पहले पड़ोस की दो औरतों के कपड़े सिले।
फिर स्कूल यूनिफॉर्म की सिलाई मिलने लगी।
धीरे-धीरे उसके हाथ की सिलाई पूरे शहर में मशहूर हो गई।
एक साल के भीतर उसने चार मशीनें खरीद लीं।
दो जरूरतमंद महिलाओं को काम भी दे दिया।
पहली कमाई से उसने क्या खरीदा?
अपने लिए साड़ी नहीं...
सिया के लिए नई साइकिल।
सिया खुशी से रो पड़ी।
"मम्मी... ये सच में मेरी है?"
कविता ने बेटी को गले लगाते हुए कहा,
"हाँ... और याद रखना...
तुम किसी की पुरानी खुशियों की हकदार नहीं हो।
तुम्हारा अपना हक है।"
समय बीतता गया।
सिया पढ़ाई में अव्वल आने लगी।
उधर कविता का छोटा-सा सिलाई सेंटर अब एक बुटीक बन चुका था।
शहर की महिलाएँ उसी के डिज़ाइन पहनने लगीं।
एक दिन वही चाची अपनी बेटी को लेकर कविता के पास आई।
"भाभी... तनु भी सिलाई सीखना चाहती है। क्या उसे सिखा दोगी?"
कविता मुस्कुराई।
"क्यों नहीं?"
उसने पुराने दिनों का एक भी ताना याद नहीं दिलाया।
उस शाम ससुर बरामदे में बैठे थे।
उन्होंने सिया को नई साइकिल चलाते देखा।
धीरे से बोले,
"बहू... हमसे गलती हो गई थी।
हमने तुम्हें सहारा दिया... लेकिन बराबरी नहीं दी।"
कविता ने उनके पैर छुए।
"गलती मान लेने वाला इंसान छोटा नहीं होता, पिताजी।"
ससुर की आँखें भर आईं।
कुछ वर्षों बाद...
सिया ने फैशन डिज़ाइन की पढ़ाई पूरी की।
उसने अपनी माँ के छोटे बुटीक को एक बड़े ब्रांड में बदल दिया।
उद्घाटन के दिन उसने सबसे पहले अपनी माँ का हाथ पकड़कर मंच पर बुलाया।
माइक पर उसने कहा,
"लोग कहते हैं कि मेरी सफलता मेरी मेहनत है।
लेकिन सच यह है कि...
जिस दिन मेरी माँ ने दूसरों के पुराने कपड़े लेना बंद किया...
उसी दिन उन्होंने मेरे सपनों को नया जीवन दे दिया।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
कविता की आँखों में आँसू थे...
लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं...
आत्मसम्मान की जीत के थे।
सीख:
दूसरों के सहारे पर जीने से बेहतर है अपने पैरों पर खड़ा होना। आत्मसम्मान से लिया गया एक सही निर्णय केवल एक व्यक्ति की नहीं, आने वाली पीढ़ियों की किस्मत बदल सकता है।

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