ममता का असली रिश्ता
"जिस बच्ची को सबने मनहूस कहा... उसी ने एक दिन पूरे परिवार की किस्मत बदल दी"
बरसात की हल्की फुहार पड़ रही थी। गाँव के छोटे से घर के आँगन में लोग चुपचाप खड़े थे। बीच आँगन में सफेद चादर से ढका हुआ एक शरीर रखा था।
सिर्फ तेरह साल की आरती उस चादर के पास बैठी फूट-फूटकर रो रही थी।
"दादी... मुझे छोड़कर मत जाओ... अब मेरा कौन है?"
लेकिन उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था।
घर के बाकी लोग अंतिम संस्कार की तैयारी में लगे थे, मगर किसी की नज़र उस मासूम बच्ची पर नहीं थी।
आरती को याद आने लगा कि जब वह इस दुनिया में आई थी, तभी उसकी माँ ने अंतिम साँस ली थी। डॉक्टरों ने कहा था कि प्रसव के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ गई थी, लेकिन पूरे गाँव ने फैसला सुना दिया...
"यह लड़की मनहूस है... आते ही अपनी माँ को खा गई।"
उस दिन से वह बच्ची कभी बेटी नहीं बन पाई।
उसके पिता रघुवीर ने उसे कभी गोद में नहीं उठाया। कभी प्यार से सिर पर हाथ नहीं फेरा। उनके लिए आरती हमेशा अपशकुन थी।
घर में अगर कुछ अच्छा नहीं होता तो दोष आरती का।
फसल खराब हो जाए तो आरती मनहूस।
गाय बीमार पड़ जाए तो आरती मनहूस।
पिता की नौकरी छूट जाए तो आरती मनहूस।
बस हर बात का कारण वही थी।
सिर्फ एक इंसान था जो उसे सीने से लगाकर कहता था—
"मेरी बच्ची किसी का दुर्भाग्य नहीं, भगवान की सबसे सुंदर देन है।"
वह थीं उसकी दादी शांति देवी।
दादी ही उसके लिए माँ भी थीं और पूरी दुनिया भी।
लेकिन वक्त ने वह सहारा भी छीन लिया।
दादी के जाने के कुछ ही महीनों बाद रघुवीर ने दूसरी शादी कर ली।
नई पत्नी कमला घर में आई।
शुरुआत में उसने मीठी बातें कीं, लेकिन कुछ ही दिनों में उसका असली स्वभाव सामने आ गया।
"सुबह चार बजे उठना... पूरे घर में झाड़ू लगाना... बर्तन माँजना... खाना बनाना... और हाँ, स्कूल जाने का सपना भूल जाना।"
आरती घबरा गई।
"माँ... मुझे पढ़ना है।"
कमला ने गुस्से से उसकी किताबें उठाईं और आँगन में फेंक दीं।
"लड़कियाँ पढ़कर अफसर नहीं बनतीं। उन्हें घर संभालना सीखना चाहिए।"
आरती दौड़कर किताबें उठाने लगी।
उन किताबों पर धूल लग गई थी, लेकिन उसने उन्हें ऐसे साफ किया जैसे कोई अपना घायल दोस्त संभालता है।
उसने उम्मीद से पिता की ओर देखा।
उसे लगा शायद आज पिता उसका साथ देंगे।
लेकिन रघुवीर ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
"कमला जो कह रही है, वही होगा।"
उस दिन पहली बार आरती को समझ आया कि इस घर में उसका कोई नहीं है।
दिन बीतते गए।
कमला के दो बच्चे हुए।
अब आरती की जिम्मेदारियाँ और बढ़ गईं।
छोटे बच्चों को संभालना, खाना बनाना, कपड़े धोना, खेत से चारा लाना...
उसकी उम्र खेलने की थी, लेकिन वह पूरे घर की नौकरानी बन चुकी थी।
कई बार वह रात को चुपचाप रोती।
दादी की पुरानी तस्वीर सीने से लगाकर कहती—
"दादी... आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?"
तस्वीर तो चुप रहती, लेकिन उसे लगता जैसे दादी कह रही हों—
"बेटी... हिम्मत मत हारना।"
एक दिन उसने पड़ोस के मास्टर जी से पुरानी किताबें माँग लीं।
रात को सबके सो जाने के बाद वह मिट्टी के दीये की रोशनी में पढ़ने लगी।
यही उसकी सबसे बड़ी खुशी थी।
लेकिन एक रात कमला ने उसे पढ़ते हुए देख लिया।
उसने गुस्से में सारी किताबें फाड़ दीं।
आरती बस उन्हें देखती रह गई।
उस रात उसने बहुत रोया।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
अब वह फटे हुए पन्ने जोड़कर पढ़ने लगी।
कुछ साल बीते।
आरती सोलह साल की हुई तो कमला ने फैसला सुना दिया।
"तेरी शादी तय कर दी है।"
आरती चौंक गई।
"लेकिन मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।"
"चुप।"
कमला ने डाँटते हुए कहा—
"लड़का विधुर है। उसकी एक छह साल की बेटी भी है। दहेज भी नहीं देना पड़ेगा। इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा।"
आरती ने पिता की ओर देखा।
रघुवीर चुप रहे।
उनकी चुप्पी ही उनकी मंजूरी थी।
कुछ दिनों बाद शादी हो गई।
विदाई के समय किसी की आँखें नम नहीं थीं।
जैसे घर से बेटी नहीं, बोझ जा रहा हो।
ससुराल पहुँचकर आरती को कमरे में बैठा दिया गया।
बाहर औरतें बातें कर रही थीं।
"बेचारी बच्ची..."
"अब इसे किसी और की बेटी की माँ बनना होगा।"
"सौतेली माँ चाहे कितनी भी अच्छी हो, माँ कभी नहीं बन सकती।"
यह शब्द सुनकर आरती का दिल काँप गया।
"सौतेली माँ..."
यही शब्द तो उसने बचपन से झेला था।
क्या अब वही दर्द किसी और बच्ची को मिलेगा?
उसी समय दरवाजे पर एक छोटी-सी लड़की खड़ी दिखाई दी।
उसकी उम्र शायद छह साल रही होगी।
डरी हुई...
सहमी हुई...
बिल्कुल वैसी ही, जैसी कभी आरती थी।
लड़की धीरे से बोली—
"क्या... आप भी मुझे मारोगी?"
यह सुनते ही आरती की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने बच्ची को अपने पास बुलाया।
लड़की डरते-डरते आगे बढ़ी।
आरती ने उसे सीने से लगा लिया।
"नहीं बेटा। मैं तुम्हारी माँ बनने की कोशिश करूँगी... सौतेली माँ नहीं।"
इतना सुनते ही बच्ची फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसने पहली बार किसी को "माँ" कहकर पुकारा।
उस एक शब्द ने आरती के बरसों पुराने घाव भरने शुरू कर दिए।
उसने उसी दिन मन ही मन एक वचन लिया—
"जिस दर्द ने मेरा बचपन छीन लिया... वही दर्द मैं इस बच्ची के जीवन में कभी नहीं आने दूँगी।"
यहीं से एक नई कहानी शुरू हुई...
एक ऐसी कहानी, जिसमें खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन ममता सबसे बड़ी थी।
और शायद पहली बार...
किसी सौतेली माँ ने यह साबित कर दिया कि माँ बनने के लिए जन्म देना नहीं, दिल देना ज़रूरी होता है।
"नहीं बेटा... मैं तुम्हारी माँ बनने की कोशिश करूँगी, सौतेली माँ नहीं।"
इतना कहते ही आरती ने उस नन्ही बच्ची को अपने सीने से लगा लिया।
बच्ची पहले तो सहमी रही, फिर धीरे-धीरे उसने भी अपने छोटे-छोटे हाथ आरती की कमर के चारों ओर लपेट दिए।
कमरे में बैठी औरतें यह दृश्य देखकर एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
"अरे, देखो तो... बच्ची पहली बार किसी के गले लगी है।"
"भगवान करे यह लड़की अपने वचन पर कायम रहे।"
लेकिन आरती के लिए अब किसी की बात मायने नहीं रखती थी।
वह सिर्फ उस मासूम चेहरे को देख रही थी, जिसमें उसे अपना ही बचपन दिखाई दे रहा था।
थोड़ी देर बाद एक बुज़ुर्ग महिला मुस्कुराते हुए बोली,
"बहू, इसका नाम गुड़िया है। जब इसकी माँ चली गई थी तब यह सिर्फ दो साल की थी। तब से यह हर नई औरत को देखकर डर जाती है।"
आरती का दिल भर आया।
उसने प्यार से पूछा,
"गुड़िया... मेरे पास बैठोगी?"
गुड़िया ने धीरे से सिर हिला दिया।
वह आरती के बिल्कुल पास आकर बैठ गई।
उसने पहली बार किसी के चेहरे को इतने ध्यान से देखा।
जैसे वह समझने की कोशिश कर रही हो कि यह औरत भी बाकी लोगों जैसी है या सचमुच अलग।
शाम को सारी रस्में खत्म हुईं।
घर के लोग अपने-अपने कमरों में चले गए।
आरती के पति अभय कमरे में आए।
उनकी आँखों में झिझक थी।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
"मुझे पता है... यह शादी तुम्हारी इच्छा से नहीं हुई। शायद मेरी भी नहीं। लेकिन मैं तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं दूँगा।"
आरती चुप रही।
अभय ने फिर कहा,
"बस... मेरी एक ही चिंता है... मेरी बेटी। उसने बहुत दुख देखा है।"
आरती की आँखें भर आईं।
"मैं भी तो वही दुख जीकर आई हूँ।"
अभय ने पहली बार उसकी ओर गौर से देखा।
"क्या मतलब?"
आरती ने अपने बचपन की पूरी कहानी सुना दी।
कैसे माँ जन्म देते ही चली गई।
कैसे पिता ने कभी प्यार नहीं दिया।
कैसे सौतेली माँ ने पढ़ाई छुड़वा दी।
कैसे हर गलती का दोष उसी पर लगाया गया।
कैसे उसने दादी की गोद में ही माँ का प्यार पाया।
सब सुनकर अभय की आँखें भी नम हो गईं।
उन्होंने कहा,
"अब समझ आया कि तुमने गुड़िया को देखते ही गले क्यों लगा लिया।"
आरती मुस्कुरा दी।
"क्योंकि मैं नहीं चाहती कि कोई और बच्ची वही दर्द सहे जो मैंने सहा है।"
उसी समय दरवाज़े पर हल्की-सी आहट हुई।
दोनों ने देखा...
गुड़िया चुपचाप खड़ी थी।
शायद उसने उनकी सारी बातें सुन ली थीं।
वह धीरे-धीरे चलकर आरती के पास आई।
फिर बोली,
"अगर... अगर मैं रात को डर जाऊँ... तो क्या आपके पास आ सकती हूँ?"
आरती का दिल भर आया।
उसने तुरंत उसे अपनी गोद में उठा लिया।
"जब भी डर लगे... बिना पूछे आ जाना।"
गुड़िया पहली बार हल्का-सा मुस्कुराई।
लेकिन यह खुशी ज़्यादा देर तक नहीं टिक सकी।
अगली सुबह अभय की बड़ी चाची ने ताना मारते हुए कहा,
"अरे बहू... अभी तो बहुत प्यार उमड़ रहा है। दो दिन बाद देखेंगे। सौतेली माँ का असली रंग जल्दी ही सामने आ जाता है।"
आरती ने मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहा,
"रिश्ते खून से नहीं... व्यवहार से बनते हैं, चाची जी।"
चाची ने होंठ सिकोड़ लिए।
उन्हें विश्वास ही नहीं था कि कोई सौतेली माँ सचमुच माँ बन सकती है।
उधर गुड़िया दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी।
उसके चेहरे पर फिर डर लौट आया।
उसे लगा...
शायद सचमुच एक दिन यह नई माँ भी बदल जाएगी।
लेकिन उसी शाम जब गुड़िया खेलते-खेलते गिर गई और उसके घुटने से खून निकलने लगा, तो पूरे घर में सबसे पहले आरती ही दौड़कर पहुँची।
उसने तुरंत उसे गोद में उठाया।
अपने आँचल से खून साफ किया।
दवा लगाई।
फिर उसके माथे को चूमते हुए बोली,
"दर्द कम हुआ मेरी बेटी?"
"मेरी बेटी..."
यह शब्द सुनते ही गुड़िया फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसने कसकर आरती का हाथ पकड़ लिया।
"माँ... आप मुझे कभी छोड़कर तो नहीं जाओगी?"
आरती की आँखों से भी आँसू बह निकले।
उसने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे कहीं दूर उसकी दादी मुस्कुरा रही हों।
आरती ने मन ही मन प्रण लिया—
"जिस प्यार के लिए मैं बचपन भर तरसती रही... वही प्यार मैं अपनी बेटी को इतना दूँगी कि उसे कभी किसी कमी का एहसास न हो।"
लेकिन उसे नहीं पता था...
उसके इस फैसले की सबसे कठिन परीक्षा अभी बाकी थी।
आरती ने गुड़िया को सीने से लगाया हुआ था। उस मासूम की सिसकियाँ धीरे-धीरे थम रही थीं, लेकिन उसका डर अभी भी खत्म नहीं हुआ था।
उस रात गुड़िया पहली बार आरती के पास ही सोई।
सोते-सोते उसने धीरे से पूछा,
"माँ... क्या आप भी मेरी पहली माँ की तरह भगवान के पास चली जाओगी?"
यह सुनते ही आरती का दिल भर आया।
उसने गुड़िया के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा,
"नहीं बेटा। जब तक मेरी साँसें चलेंगी, मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगी।"
गुड़िया ने उसकी उँगली कसकर पकड़ ली और निश्चिंत होकर सो गई।
लेकिन कमरे के बाहर खड़ी अभय की बड़ी चाची यह सब देख रही थीं।
उन्होंने मन ही मन कहा,
"देखते हैं, यह प्यार कब तक चलता है।"
अगली सुबह आरती सूरज निकलने से पहले उठ गई।
उसने पूरे घर का काम संभाल लिया। रसोई में नाश्ता बनाया, ससुर के लिए चाय बनाई और गुड़िया के लिए उसकी पसंद का मीठा दलिया तैयार किया।
जब गुड़िया उठी तो पहली बार किसी ने मुस्कुराकर कहा,
"आओ बेटा, पहले नाश्ता कर लो।"
गुड़िया हैरान रह गई।
अब तक उसे हमेशा डाँटकर जगाया जाता था।
उसने धीरे-धीरे खाना शुरू किया।
तभी बड़ी चाची ने ताना मारा,
"बहुत लाड़ मत करो बहू। बच्चे सिर पर चढ़ जाते हैं।"
आरती मुस्कुराकर बोली,
"जिसे बचपन में प्यार नहीं मिला, वह प्यार की कीमत सबसे अच्छी तरह समझता है।"
घर में कुछ लोग उसकी बात सुनकर चुप हो गए।
दिन बीतने लगे।
आरती हर काम के साथ गुड़िया का भी पूरा ध्यान रखती।
उसे नहलाती, बाल बनाती, कहानियाँ सुनाती और रात को लोरी गाकर सुलाती।
धीरे-धीरे गुड़िया के चेहरे पर मुस्कान लौटने लगी।
एक दिन आरती ने देखा कि गुड़िया घर के बाहर खड़े बच्चों को स्कूल जाते हुए उदास होकर देख रही है।
उसने पूछा,
"क्या हुआ बेटा?"
गुड़िया बोली,
"मुझे भी पढ़ना है... लेकिन दादी कहती हैं कि लड़कियाँ ज़्यादा पढ़कर बिगड़ जाती हैं।"
आरती को अपना बचपन याद आ गया।
वही टूटी हुई किताबें...
वही अधूरा सपना...
उसने उसी समय निश्चय कर लिया कि गुड़िया की पढ़ाई कभी नहीं रुकेगी।
शाम को उसने अभय से कहा,
"मैं गुड़िया का स्कूल में दाखिला करवाना चाहती हूँ।"
अभय मुस्कुराए।
"मैं भी यही चाहता था, लेकिन घरवालों के डर से कभी हिम्मत नहीं हुई।"
अगले ही दिन दोनों गुड़िया को लेकर स्कूल पहुँचे।
प्रधानाचार्य ने कागज़ देखते हुए कहा,
"बच्ची की पढ़ाई दो साल से रुकी हुई है।"
आरती ने कहा,
"कोई बात नहीं सर, अब इसकी पढ़ाई कभी नहीं रुकेगी।"
गुड़िया खुशी से आरती का हाथ पकड़कर मुस्कुराने लगी।
लेकिन घर लौटते ही तूफ़ान खड़ा हो गया।
बड़ी चाची गुस्से से बोलीं,
"किससे पूछकर लड़की का स्कूल में दाखिला कराया?"
आरती ने शांत स्वर में कहा,
"बच्चों का भविष्य पूछकर नहीं बनाया जाता।"
"बहुत ज़ुबान चलने लगी है बहू!"
"अगर अपनी बेटी को पढ़ाना गुनाह है... तो यह गुनाह मैं बार-बार करूँगी।"
पूरा घर सन्न रह गया।
किसी ने नहीं सोचा था कि हमेशा शांत रहने वाली आरती इतनी दृढ़ता से अपनी बात कहेगी।
अभय पहली बार सबके सामने अपनी पत्नी के साथ खड़े हो गए।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा,
"गुड़िया पढ़ेगी... और यह फैसला अब कोई नहीं बदलेगा।"
उस दिन पहली बार आरती को लगा कि शायद भगवान ने उसके जीवन में कुछ खुशियाँ भी लिखी हैं।
लेकिन उसी रात...
आँगन में खड़ी बड़ी चाची किसी से धीरे-धीरे बात कर रही थीं।
"अगर यह लड़की इसी तरह घर पर राज करने लगी, तो कल सारी जायदाद भी उसी बच्ची के नाम करवा देगी। कुछ करना पड़ेगा..."
आरती को नहीं पता था...
उसकी खुशियों पर किसी की बुरी नज़र पड़ चुकी थी।
समय धीरे-धीरे बीतने लगा।
आरती के प्यार ने गुड़िया की ज़िंदगी बदल दी थी। जो बच्ची पहले हर समय डरी-सहमी रहती थी, अब हँसने लगी थी। स्कूल जाने लगी थी और पढ़ाई में भी बहुत अच्छी थी।
लेकिन बड़ी चाची को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
एक दिन बड़ी चाची ने आरती को बदनाम करने के इरादे से अपने सोने के कंगन खुद ही छिपा दिए और पूरे घर में चोरी का हंगामा मचा दिया।
"मेरे कंगन चोरी हो गए... और घर में नई बहू के अलावा कौन है?"
घर के सभी लोग इकट्ठा हो गए।
आरती हैरान थी।
"मैंने कुछ नहीं लिया, चाची जी।"
लेकिन चाची किसी की सुनने को तैयार नहीं थीं।
उसी समय गुड़िया दौड़ती हुई आई।
उसने कहा,
"झूठ मत बोलिए दादी! मैंने आपको सुबह खुद कंगन मंदिर वाले संदूक में रखते देखा था।"
सब लोग तुरंत मंदिर वाले कमरे में पहुँचे।
संदूक खोला गया तो कंगन वहीं रखे मिले।
बड़ी चाची शर्म से सिर झुका बैठीं।
ससुर ने पहली बार सबके सामने कहा,
"बहू, हमें तुम पर शक नहीं करना चाहिए था। आज तुमने नहीं, तुम्हारे संस्कारों ने जीत हासिल की है।"
अभय गर्व से आरती की ओर देखने लगे।
कुछ महीने बाद एक और खबर आई।
रघुवीर, यानी आरती के पिता, गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे।
कमला ने कई रिश्तेदारों से मदद माँगी, लेकिन किसी ने साथ नहीं दिया।
आखिर मजबूरी में वह आरती के घर पहुँची।
उसे देखकर आरती के बचपन के सारे घाव ताज़ा हो गए।
यही वह औरत थी जिसने उसकी पढ़ाई छुड़वाई थी।
यही वह थी जिसने उसे नौकरानी बनाकर रखा था।
कमला रोते हुए बोली,
"बेटी... तेरे पिताजी की जान बचा ले।"
पूरा घर चुप था।
सबको लगा कि आरती उन्हें लौटा देगी।
लेकिन उसने बिना एक पल सोचे अभय से कहा,
"चलो... अभी अस्पताल चलते हैं।"
अभय मुस्कुरा दिए।
उन्हें पता था, उनकी पत्नी का दिल बहुत बड़ा है।
आरती ने पिता का इलाज करवाया।
दिन-रात अस्पताल में उनकी सेवा की।
जब रघुवीर की आँख खुली तो उन्होंने सबसे पहले आरती को देखा।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने काँपते हाथों से बेटी का हाथ पकड़ लिया।
"बेटी... मैंने सारी उम्र तुझे मनहूस कहा... लेकिन मनहूस तो मेरी सोच थी। मुझे माफ़ कर दे।"
आरती भी रो पड़ी।
"पिताजी... अगर मैं आपको माफ़ नहीं करूँगी तो दादी की सीख का अपमान होगा।"
पिता ने पहली बार अपनी बेटी को गले लगाया।
जिस प्यार के लिए आरती बचपन से तरसती रही थी, वह आज उसे मिल गया।
कुछ साल और बीत गए।
गुड़िया अब बड़ी हो चुकी थी।
वह पढ़ाई में हमेशा प्रथम आती थी।
एक दिन पूरे जिले में उसकी पहली रैंक आई।
स्कूल में सम्मान समारोह रखा गया।
मंच से प्रधानाचार्य ने कहा,
"गुड़िया, अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहोगी?"
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया।
गुड़िया की आँखें भर आईं।
वह मंच से नीचे उतरी।
सीधे आरती के पास पहुँची और सबके सामने उनके चरण छू लिए।
फिर माइक हाथ में लेकर बोली,
"लोग कहते हैं कि सौतेली माँ कभी सगी माँ नहीं बन सकती। लेकिन मेरी माँ ने इस बात को झूठ साबित कर दिया।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
गुड़िया आगे बोली,
"मुझे जन्म देने वाली माँ भगवान के पास चली गई थीं। लेकिन भगवान ने मुझे दूसरी माँ के रूप में आरती माँ दी। इन्होंने मुझे सिर्फ पाला नहीं, जीना सिखाया... सपने देखना सिखाया... और हर मुश्किल में मेरा हाथ थामे रखा।"
आरती की आँखों से आँसू बह निकले।
अभय गर्व से मुस्कुरा रहे थे।
रघुवीर भी वहीं बैठे थे।
उन्होंने सबके सामने कहा,
"जिस बेटी को मैंने कभी बोझ समझा था, आज वही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।"
कमला भी रो रही थी।
वह आरती के पैरों में झुक गई।
"बेटी, मुझे माफ़ कर दे।"
आरती ने तुरंत उन्हें उठाकर गले लगा लिया।
"बीती बातें बीत गईं, माँ। अब हम नया जीवन शुरू करेंगे।"
उस दिन पहली बार उस परिवार में किसी ने "सौतेली" शब्द का ज़िक्र नहीं किया।
क्योंकि अब सब जानते थे—
माँ वह नहीं जो सिर्फ जन्म दे, माँ वह है जो बिना किसी स्वार्थ के अपना पूरा जीवन किसी बच्चे की खुशियों के लिए समर्पित कर दे।
और आरती ने यह बात अपने जीवन से साबित कर दी।

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