जो है, वही काफी है
"कब तक ऐसे ही चलेगा, आकाश?"
नेहा ने अलमारी का दरवाज़ा ज़ोर से बंद करते हुए कहा।
"हर महीने वही हिसाब... वही बचत... वही समझौते। कभी अपने लिए कुछ खरीदने का मन करता है तो पहले बिजली का बिल सामने आ जाता है।"
आकाश चुपचाप लैपटॉप पर ऑफिस का काम कर रहा था।
वह जानता था कि नेहा गलत नहीं थी।
लेकिन वह क्या करता?
एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। जितनी तनख्वाह आती, उतने में ही पूरे घर का खर्च किसी तरह चलता।
उनकी सात साल की बेटी परी सरकारी स्कूल में पढ़ती थी।
नेहा अक्सर कहती,
"मेरी सहेली की बेटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ती है। हर साल नई साइकिल... नया टैबलेट... विदेश घूमने जाती है। और हमारी बेटी..."
आकाश हर बार मुस्कुरा देता।
"परी खुश तो है ना?"
लेकिन नेहा को यह जवाब कभी संतुष्ट नहीं करता।
एक रविवार की सुबह परी ने कहा,
"मम्मी... मेरे स्कूल में कल ड्राइंग प्रतियोगिता है। मुझे रंग चाहिए।"
नेहा ने पर्स खोला।
सिर्फ दो सौ रुपये थे।
उसे याद आया कि गैस सिलेंडर भी भरवाना है।
वह झुंझलाकर बोली,
"हर समय कुछ न कुछ चाहिए होता है।"
परी चुप हो गई।
उसने धीरे से कहा,
"कोई बात नहीं मम्मी... मैं दोस्त के रंग ले लूँगी।"
उसकी आवाज़ सुनकर आकाश का दिल भर आया।
शाम को ऑफिस से लौटते समय उसने अपने लिए रखे लंच के पैसे बचाकर परी के लिए रंग खरीद लिए।
परी की खुशी देखने लायक थी।
लेकिन नेहा फिर बोली,
"इतने सस्ते रंग लाए हो? थोड़े अच्छे नहीं मिलते?"
आकाश कुछ नहीं बोला।
अगले दिन ऑफिस जाते समय रास्ते में अचानक उसकी बाइक पंचर हो गई।
पास ही एक छोटी-सी दुकान थी।
वहीं बाइक ठीक होने का इंतज़ार करते हुए उसकी नज़र सामने बने पुनर्वास केंद्र पर पड़ी।
वहाँ कई बच्चे व्हीलचेयर पर खेल रहे थे।
उसी समय एक छोटी लड़की ज़मीन पर बैठी दोनों हाथों से रंग भर रही थी।
उसके पैर नहीं थे।
फिर भी उसके चेहरे पर इतनी बड़ी मुस्कान थी कि देखकर कोई भी ठहर जाए।
आकाश कुछ देर उसे देखता रहा।
उसी समय नेहा का फोन आया।
"शाम को आते समय नया मिक्सर भी देख लेना।"
आकाश ने धीरे से कहा,
"अभी पैसे नहीं हैं नेहा।"
फोन कट गया।
उस शाम उसने नेहा से कहा,
"कल मेरे साथ कहीं चलोगी?"
नेहा ने अनमने मन से हाँ कर दी।
अगले दिन दोनों उसी पुनर्वास केंद्र पहुँचे।
अंदर बच्चों की पेंटिंग प्रदर्शनी लगी थी।
नेहा हैरान रह गई।
एक से बढ़कर एक सुंदर चित्र।
उसने पूछा,
"ये सब किसने बनाए?"
एक शिक्षिका मुस्कुराई।
"इन बच्चों ने।"
नेहा ने देखा...
जिस लड़की के पैर नहीं थे...
उसी ने सबसे सुंदर पेंटिंग बनाई थी।
नेहा उसके पास गई।
"बेटा... तुम्हारा नाम क्या है?"
छोटी बच्ची मुस्कुराकर बोली, "आर्या।"
नेहा ने हैरानी से फिर पूछा, "तुम इतनी खुश कैसे रहती हो?"
लड़की मुस्कुराई।
"क्यों नहीं रहूँ?"
"भगवान ने मुझे हाथ दिए हैं...
आँखें दी हैं...
मम्मी-पापा दिए हैं...
स्कूल दिया है...
दोस्त दिए हैं...
मैं बहुत अमीर हूँ।"
नेहा की आँखें फैल गईं।
"लेकिन... तुम्हें कभी अपने पैरों की कमी महसूस नहीं होती?"
आर्या ने धीरे से कहा,
"पहले होती थी।
फिर मैंने अस्पताल में एक ऐसे बच्चे को देखा...
जो देख भी नहीं सकता था...
सुन भी नहीं सकता था...
उस दिन समझ आया...
मेरे पास जो नहीं है...
उससे ज़्यादा मेरे पास बहुत कुछ है।"
नेहा के गले से आवाज़ नहीं निकली।
उसे याद आने लगा...
वह हर दिन किस बात पर नाराज़ होती थी।
कभी छोटे घर पर...
कभी पुरानी बाइक पर...
कभी पुराने फोन पर...
कभी साधारण कपड़ों पर...
लेकिन उसने कभी यह नहीं सोचा...
कि उसकी बेटी स्वस्थ है...
पति ईमानदार है...
पूरा परिवार साथ है।
घर लौटते समय रास्ते में बारिश शुरू हो गई।
आकाश बोला,
"किसी दुकान के नीचे रुक जाएँ?"
नेहा मुस्कुराई।
"नहीं...
चलो भीगते हुए चलते हैं।"
आकाश ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
नेहा बोली,
"आज समझ आया...
ज़िंदगी की खुशी चीज़ों में नहीं...
साथ में होती है।"
उसने पहली बार बाइक पर बैठकर शिकायत नहीं की।
बल्कि रास्ते भर बारिश की बूंदों को हथेली में पकड़ती रही।
घर पहुँचकर उसने सबसे पहले परी को गले लगा लिया।
फिर नेहा ने अलमारी खोली। नई साड़ी पर एक नज़र डाली, फिर मुस्कुराकर उसे वापस तह करके रख दिया। अब उसे नई चीज़ों की नहीं, अपने परिवार के साथ छोटी-छोटी खुशियों की ज़्यादा कीमत समझ आने लगी थी।
उसने कहा,
"नई साड़ी की जल्दी नहीं है। उसे अगले महीने ले लेंगे। आज की शाम अपने परिवार के नाम।"
लेकिन आज हम सब साथ बैठकर पकौड़े खाएँगे।"
परी खुशी से उछल पड़ी।
आकाश चुपचाप नेहा को देख रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक दिन में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया।
रात को सोने से पहले नेहा ने भगवान के सामने हाथ जोड़कर कहा,
"मैं हमेशा उन चीज़ों के पीछे भागती रही...
जो मेरे पास नहीं थीं।
आज पहली बार उन चीज़ों के लिए धन्यवाद कह रही हूँ...
जो बिना माँगे आपने मुझे दे दीं।"
उस रात कई महीनों बाद नेहा को बिना किसी शिकायत के गहरी नींद आई।
उसे समझ आ चुका था—
दुनिया का सबसे अमीर इंसान वह नहीं जिसके पास सबसे ज़्यादा चीज़ें हों... बल्कि वह है जो अपने पास मौजूद चीज़ों की कीमत समझता हो।
सीख:
हम अक्सर अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को सबसे बड़ा दुख समझ लेते हैं। लेकिन जब हम दूसरों के संघर्ष देखते हैं, तब एहसास होता है कि जिन बातों की हम शिकायत करते हैं, वही किसी और की सबसे बड़ी दुआ होती हैं।
क्या आपने भी कभी किसी ऐसी घटना के बाद अपनी सोच बदली है? कमेंट में अपना अनुभव ज़रूर साझा करें।

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