माँ का अधूरा प्यार

 

An emotional Indian mother hugs her adult daughter near the front door as the daughter holds a suitcase, symbolizing forgiveness, family reunion, and unconditional love in a modern home.


"जिस बेटी को आपने हमेशा दूसरों से कम समझा... आज वही इस घर को हमेशा के लिए छोड़कर जा रही है।"


इतना कहते ही नंदिनी ने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।


उसकी माँ कविता उसके सामने आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।


"कहाँ जा रही हो, नंदिनी? बिना कुछ बताए घर छोड़कर चली जाओगी?"


नंदिनी ने बिना उनकी तरफ देखे कहा, "मुझे पता था कि आप यही पूछेंगी। लेकिन आज मेरे पास जवाब देने के लिए सिर्फ सच बचा है।"


"क्या कमी रह गई तुम्हारे लिए? मैंने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया। आखिर ऐसी कौन-सी तकलीफ दे दी मैंने?" कविता की आवाज़ काँप रही थी।


नंदिनी हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द छिपा था।


"आपने मुझे कभी बेटी माना ही नहीं, माँ। आपने मुझे सिर्फ एक ज़िम्मेदारी समझा, जिसे किसी तरह निभाना था।"


इतना सुनते ही कविता का धैर्य टूट गया।


"बस! बहुत हो गया। माँ से ऐसे बात करते हैं?"


नंदिनी की आँखों से आँसू निकल पड़े।


"अगर आज भी मैं सच नहीं कहूँगी, तो शायद कभी कह नहीं पाऊँगी।"


घर में खामोशी फैल गई।


नंदिनी अपने माता-पिता की पहली संतान थी। उसके जन्म के कुछ साल बाद उसके छोटे भाई आदित्य का जन्म हुआ।


आदित्य के आने के बाद जैसे पूरे घर की दुनिया बदल गई।


हर खुशी उसी के नाम होने लगी।


नए कपड़े आते तो पहले आदित्य के लिए।


अच्छा स्कूल चुनना होता तो पहले आदित्य के लिए।


घूमने जाना होता तो उसकी पसंद पूछी जाती।


नंदिनी को हमेशा यही कहा जाता—


"तुम तो बड़ी हो... थोड़ा समझौता करना सीखो।"


धीरे-धीरे यह समझौता उसकी आदत बन गया।


उसने कभी खिलौनों की ज़िद नहीं की।


कभी महंगे कपड़ों की माँग नहीं की।


कभी अपनी पसंद का कॉलेज नहीं माँगा।


उसे लगता था कि शायद एक दिन माँ खुद उसकी भावनाएँ समझ जाएँगी।


लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।


एक बार स्कूल में नंदिनी पूरे जिले में प्रथम आई थी।


उसे सम्मानित करने के लिए मंच पर बुलाया गया।


उसने खुशी-खुशी घर फोन किया।


"माँ, आज मेरा सम्मान समारोह है। आप ज़रूर आइएगा।"


कविता ने जवाब दिया—


"नंदिनी, आज आदित्य का मैच है। हम सब उसी के साथ जा रहे हैं। तुम्हारा सर्टिफिकेट तो तुम घर लेकर ही आओगी, बाद में आराम से देख लेंगे।"


उस दिन मंच पर खड़े होकर नंदिनी ने पूरे हॉल में अपनी माँ को ढूँढ़ा था।


लेकिन सामने सिर्फ खाली कुर्सियाँ थीं...


उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद उसकी खुशियाँ किसी के लिए मायने नहीं रखतीं।


समय बीतता गया।


नंदिनी ने पढ़ाई में खुद को पूरी तरह झोंक दिया।


दिन-रात मेहनत की।


स्कॉलरशिप मिली।


उसने उच्च शिक्षा पूरी की और एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शोध छात्रा बन गई।


उधर घर में आदित्य की हर इच्छा पूरी होती रही।


लेकिन वह पढ़ाई में कभी गंभीर नहीं रहा।


कई बार व्यापार शुरू किया, हर बार नुकसान हुआ।


फिर भी घरवालों ने उसे ही सहारा दिया।


एक दिन नंदिनी को विदेश की एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी से रिसर्च फेलोशिप का प्रस्ताव मिला।


पूरे शहर में उसकी चर्चा होने लगी।


अखबारों में उसकी तस्वीर छपी।


लोग घर आकर कविता को बधाई देने लगे।


कविता मुस्कुराती रहीं, लेकिन हर बधाई उनके दिल पर एक सवाल बनकर गिर रही थी—


जिस बेटी पर आज मुझे गर्व हो रहा है... क्या मैंने कभी उसे गर्व करने का मौका दिया था?


उसी रात उन्होंने पहली बार नंदिनी की पुरानी अलमारी खोली।


अंदर बचपन की कॉपियाँ, मेडल, प्रमाणपत्र और एक छोटी-सी डायरी रखी थी।


कविता ने काँपते हाथों से डायरी खोली।


पहले पन्ने पर लिखा था—


"मुझे माँ से कोई शिकायत नहीं है। बस एक बार वह मुझे वैसे गले लगा लें जैसे आदित्य को लगाती हैं... शायद उसी दिन मुझे लगेगा कि मैं भी इस घर की बेटी हूँ।"


दूसरे पन्ने पर लिखा था—


"आज मेरा जन्मदिन है। माँ ने कहा, अगले महीने मना लेंगे क्योंकि आदित्य की कोचिंग की फीस भरनी है। शायद मेरा जन्मदिन इतना ज़रूरी नहीं था।"


हर पन्ना पढ़ते-पढ़ते कविता की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।


उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उन्होंने बेटी को कभी प्यार से नहीं समझा, बल्कि उसकी भावनाओं को बार-बार अनदेखा किया था।


कुछ दिनों बाद नंदिनी विदेश जाने की तैयारी कर रही थी।


कविता उसके पास पहुँचीं।


उनके हाथ काँप रहे थे।


"बेटी... क्या मुझे दो मिनट दोगी?"


नंदिनी चुपचाप उनकी ओर देखने लगी।


कविता की आवाज़ भर्रा गई।


"मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं। मुझे लगता था कि बड़ी बेटी सब सह लेती है। लेकिन मैं भूल गई कि बड़ी बेटी का दिल भी उतना ही छोटा होता है जितना छोटे बच्चे का।"


नंदिनी की आँखें नम हो गईं।


कविता आगे बोलीं—


"मैंने बेटे को भविष्य समझा और बेटी को समझौता। आज समझ आया कि सबसे बड़ा सहारा वही बेटी बन गई, जिसे मैंने सबसे कम अपनापन दिया।"


यह सुनकर वर्षों से जमा दर्द नंदिनी की आँखों से आँसुओं की तरह बह निकला।


वह धीरे-धीरे माँ के पास आई।


"माँ... मैंने आपको कभी नफरत नहीं की। मैं सिर्फ आपका थोड़ा-सा प्यार चाहती थी।"


कविता फूट-फूटकर रो पड़ीं।


उन्होंने नंदिनी को अपनी बाँहों में भर लिया।


"मुझे माफ़ कर दो, बेटी। मैं अपने ही घर की सबसे अनमोल दौलत को पहचान नहीं पाई।"


नंदिनी ने भी माँ को कसकर गले लगा लिया।


वर्षों की दूरियाँ आँसुओं में बह गईं।


कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस उन्हें समय पर प्यार नहीं मिल पाता।


विदेश जाने से पहले नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—


"माँ, अब मैं जा रही हूँ... लेकिन इस बार किसी दर्द के साथ नहीं। इस बार मैं आपकी दुआ लेकर जा रही हूँ।"


कविता ने उसके सिर पर हाथ रखा।


"जहाँ भी रहना, खुश रहना। और जब भी लौटना... इस बार मेहमान बनकर नहीं, अपनी माँ की बेटी बनकर लौटना।"


नंदिनी मुस्कुरा दी।


उसके कदम अब पहले से कहीं ज़्यादा हल्के थे।


उसे महसूस हो रहा था कि जीवन की सबसे बड़ी जीत कोई पुरस्कार या नौकरी नहीं होती, बल्कि वह अपनापन होता है जो वर्षों बाद भी रिश्तों को फिर से जीवित कर देता है।


सीख:

कभी-कभी बच्चों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत महँगे उपहारों की नहीं, बल्कि माता-पिता के बराबर प्यार और अपनापन की होती है। जिस घर में बेटे और बेटी के बीच भेदभाव नहीं होता, वही घर सच मायनों में खुशहाल बनता है।



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