मां का आख़िरी मैसेज नहीं... सबसे बड़ा सबक
सुबह के सात बजे थे। शहर की सड़कों पर हलचल शुरू हो चुकी थी। आदित्य जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था। उसकी पत्नी सिया रसोई में नाश्ता बना रही थी।
तभी आदित्य के मोबाइल पर एक मैसेज आया।
"बेटा, समय मिले तो बात कर लेना।"
मैसेज उसकी मां, सावित्री देवी का था।
आदित्य ने स्क्रीन देखी और बिना जवाब दिए मोबाइल जेब में रख लिया।
सिया ने पूछा, "किसका मैसेज था?"
आदित्य ने जवाब दिया, "मां का।"
सिया ने फिर पूछा, "फिर क्या हुआ? जवाब क्यों नहीं दिया?"
आदित्य मुस्कुराते हुए बोला, "शाम को बात कर लूंगा। अभी ऑफिस के लिए देर हो रही है।"
सिया मुस्कुराकर बोली, "मां तो रोज़ ही फोन या मैसेज करती हैं।"
आदित्य भी हंस दिया।
"हां, उन्हें आदत है।"
दोनों ऑफिस चले गए।
दोपहर में ऑफिस में एक बहुत बड़ी मीटिंग चल रही थी।
उसी समय आदित्य के फोन पर मां की तीन मिस्ड कॉल आ गईं।
फिर एक मैसेज आया—
"बेटा, ज़रूरी बात करनी है।"
आदित्य ने मोबाइल देखा।
एक पल के लिए मन हुआ कि फोन कर ले।
लेकिन फिर उसने सोचा—
"मीटिंग खत्म होने दो।"
उसने फोन फिर जेब में रख लिया।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि कुछ घंटों बाद वही फैसला उसकी सोच हमेशा के लिए बदल देगा।
शाम करीब पांच बजे मीटिंग खत्म हुई।
आदित्य ने राहत की सांस ली।
तभी छोटे भाई अमन का फोन आया।
उसकी आवाज़ कांप रही थी।
"भैया... जल्दी अस्पताल आ जाओ।"
आदित्य घबराकर बोला, "अमन, क्या हुआ? सब ठीक तो है?"
अमन रोते हुए बोला, "भैया... सुबह पापा को अचानक ब्रेन स्ट्रोक आया था। मां उन्हें अस्पताल लेकर जाने की कोशिश कर रही थीं। उन्होंने आपको कई बार फोन किया, लेकिन आपका फोन नहीं लगा। पड़ोसियों की मदद से हम उन्हें अस्पताल लेकर आए... लेकिन अब डॉक्टर कह रहे हैं कि हालत बहुत गंभीर है।"
आदित्य के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह बिना कुछ बोले ऑफिस से भागा।
जब तक अस्पताल पहुंचा...
डॉक्टर बाहर आ चुके थे।
"हमें अफसोस है... हमने पूरी कोशिश की।"
आदित्य वहीं कुर्सी पर बैठ गया।
उसे बार-बार मोबाइल की स्क्रीन याद आने लगी—
"बेटा, ज़रूरी बात करनी है।"
उसकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे।
समय बीत गया।
पापा के जाने के बाद मां बिल्कुल अकेली हो गईं।
आदित्य ने उन्हें अपने साथ शहर ले आने की बहुत कोशिश की।
लेकिन मां ने कहा—
"मैं इस घर को छोड़कर नहीं जा सकती। यहीं तुम्हारे पापा की यादें हैं।"
अब आदित्य रोज़ सुबह और रात मां से बात करता।
अगर कभी मीटिंग होती, तो पहले एक छोटा-सा मैसेज भेज देता—
"मां, आधे घंटे बाद कॉल करता हूं।"
मां भी मुस्कुरा देतीं।
करीब एक साल बाद।
आदित्य और सिया की शादी की सालगिरह थी।
दोनों पहली बार दो दिन के लिए बाहर घूमने गए।
पहाड़ों के बीच एक सुंदर रिसॉर्ट था।
दोनों झील के किनारे बैठे थे।
तभी सिया का फोन बजा।
स्क्रीन पर लिखा था—
"मां कॉलिंग..."
सिया ने फोन देखा और बोली—
"अभी नहीं। बाद में बात कर लूंगी।"
उसने फोन काट दिया।
आदित्य कुछ नहीं बोला।
दो मिनट बाद फिर फोन आया।
सिया ने फिर काट दिया।
तीसरी बार फोन आया।
इस बार आदित्य ने धीरे से कहा—
"सिया... एक बार बात कर लो।"
सिया बोली—
"अरे, मां तो बस पूछेंगी खाना खाया या नहीं।"
आदित्य शांत रहा।
फिर बोला—
"एक बार मेरी भी यही सोच थी।"
उसने पहली बार सिया को अपने पापा वाली पूरी घटना बताई।
सिया की आंखें भर आईं।
उसी समय उसने तुरंत अपनी मां को फोन लगाया।
लेकिन इस बार फोन नहीं उठा।
फिर लगाया।
फिर नहीं उठा।
अब उसका दिल घबराने लगा।
करीब पांच मिनट बाद मां का फोन आया।
"बेटा..."
आवाज़ बहुत घबराई हुई थी।
"तुम्हारे नाना जी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है। हम अस्पताल जा रहे हैं।"
सिया और आदित्य बिना एक पल गंवाए वापस शहर के लिए निकल पड़े।
अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि समय पर इलाज मिलने से नाना जी की जान बच गई।
डॉक्टर ने कहा—
"अगर इन्हें आधा घंटा और देर से लाया जाता, तो हालत गंभीर हो सकती थी।"
सिया की आंखों से आंसू बहने लगे।
उसने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।
"मां... आज अगर मैंने आपका फोन वापस नहीं किया होता, तो शायद मुझे खबर भी देर से मिलती।"
मां मुस्कुराईं।
"बेटी, मां-बाप बार-बार फोन इसलिए नहीं करते कि उन्हें समय बिताना होता है... वे इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों की फिक्र होती है।"
उस घटना के बाद आदित्य और सिया ने अपने घर में एक छोटा-सा नियम बनाया।
कोई भी परिवार का फोन कभी अनदेखा नहीं करेगा।
अगर किसी कारण तुरंत बात नहीं हो सकती, तो जितनी जल्दी हो सके वापस कॉल ज़रूर करेगा।
कुछ साल बाद उनका एक बेटा हुआ।
जब वह कॉलेज पढ़ने दूसरे शहर गया, तो सिया हर शाम उसे फोन करती।
एक दिन बेटा हंसकर बोला—
"मम्मी, आप भी न... रोज़ फोन कर देती हो।"
सिया मुस्कुरा दी।
उसे अपने पुराने दिन याद आ गए।
उसने सिर्फ़ इतना कहा—
"बेटा, जिस दिन तुम पिता बनोगे, उस दिन तुम्हें समझ आएगा कि मां-बाप बार-बार फोन क्यों करते हैं।"
बेटा हंसकर चला गया।
लेकिन कुछ देर बाद उसने खुद मां को फोन किया।
"मम्मी... खाना खा लिया आपने?"
सिया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।
उसे लगा...
शायद आज उसकी सबसे बड़ी सीख अगली पीढ़ी तक पहुंच गई।
सीख:
हर फोन कॉल परेशानी नहीं होती, कई बार वह किसी अपने का प्यार, चिंता या ज़रूरत होती है। अगर किसी कारण तुरंत बात न कर सकें, तो जितनी जल्दी हो सके वापस कॉल ज़रूर करें। कभी-कभी एक छोटी-सी कॉल रिश्तों को भी बचा लेती है और ज़िंदगी भी।

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