दुआओँ की खीर
"आज पहली बार खीर बना रही थी बेटे की ज़िद पर। उसे चावल की खीर बहुत पसंद थी।"
पसंद का नाम आते ही जैसे मन कई साल पीछे लौट गया। मेरी नानी को भी चावल की खीर बहुत पसंद थी। फर्क बस इतना था कि वह अपने लिए कभी खीर नहीं बनाती थीं। हमेशा कहती थीं, "जिस मिठाई में अपनों की मुस्कान घुल जाए, वही सबसे मीठी होती है।"
बचपन में जब भी घर में कोई खुशी होती, नानी सबसे पहले खीर बनातीं। चाहे किसी का जन्मदिन हो, परीक्षा में अच्छे नंबर आए हों या खेत की अच्छी फसल हुई हो, उनके चूल्हे पर दूध चढ़ ही जाता था। लेकिन मैंने उन्हें कभी अकेले बैठकर खीर खाते नहीं देखा।
एक बार मैंने पूछ लिया था, "नानी, आपको खीर इतनी पसंद है, फिर आप सबसे कम क्यों खाती हैं?"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, "बेटी, अपने हिस्से की मिठास तो दूसरों के चेहरे पर मुस्कान देखकर ही मिल जाती है।"
उस समय उनकी बात समझ नहीं आई थी। आज बरसों बाद अपने ही घर की रसोई में खड़ी थी, तो वही शब्द कानों में गूँज रहे थे।
मेरा बारह साल का बेटा आरव कई दिनों से कह रहा था, "मम्मी, इस रविवार वही खीर बनाइए ना, जिसकी कहानी आप अपनी नानी के बारे में सुनाती हैं।"
मैं हर बार टाल देती।
कभी काम का बहाना, कभी समय का।
लेकिन इस बार उसकी ज़िद के आगे हार माननी ही पड़ी।
दूध उबल रहा था। चावल धीरे-धीरे गल रहे थे। इलायची की खुशबू पूरे घर में फैल गई थी। ऊपर से थोड़ा-सा केसर और कटे हुए बादाम डालते ही खीर बिल्कुल वैसी लगने लगी, जैसी नानी बनाया करती थीं।
इतने में आरव रसोई में आ गया।
"मम्मी... बन गई क्या?"
मैं मुस्कुराकर बोली, "अभी नहीं बेटा, थोड़ा धैर्य रखो।"
वह हँसने लगा।
"आप भी ना... हमेशा इंतज़ार करवाती हैं।"
मैंने मुस्कुराकर उसके गाल पर हल्की-सी चपत लगा दी।
उसी समय दरवाज़े पर किसी ने धीरे-धीरे दस्तक दी।
पहले लगा शायद कोई सामान बेचने वाला होगा।
मैंने ध्यान नहीं दिया।
लेकिन कुछ पल बाद फिर वही दस्तक हुई।
इस बार मैं बाहर निकल आई।
दरवाज़े के सामने करीब सत्तर-पचहत्तर साल की एक बुज़ुर्ग महिला खड़ी थीं। सफ़ेद बाल बिखरे हुए थे। पैरों में टूटी हुई चप्पल थी। हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला था।
उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
"बेटी... अगर थोड़ा-सा खाना मिल जाए तो..."
उनकी आँखों में झिझक थी।
जैसे माँगना उनकी मजबूरी हो, आदत नहीं।
मैंने सहज ही कहा,
"अम्मा, आप बैठिए... मैं अभी कुछ लाती हूँ।"
अंदर आई तो देखा, आज रोटियाँ बनी ही नहीं थीं।
सब्ज़ी भी खत्म हो चुकी थी।
बस ताज़ी बनी खीर थी।
मन में हल्का-सा द्वंद्व शुरू हो गया।
इतनी मेहनत से पहली बार बनाई थी।
अभी तक घर में किसी ने चखी भी नहीं थी।
तभी आरव बोला,
"मम्मी... क्या हुआ?"
मैंने कहा,
"बाहर एक अम्मा हैं। भूखी लग रही हैं।"
रसोई के दरवाज़े पर खड़ा मेरा बारह साल का बेटा आरव तुरंत बोला, "तो उन्हें खीर दे दीजिए, मम्मी।"
उसने ऐसे कहा जैसे यह दुनिया का सबसे आसान काम हो।
मैंने धीमे से कहा,
"पहले तुम तो खा लो बेटा।"
वह मुस्कुराया।
"अगर मैं दस मिनट बाद खाऊँगा तो मुझे सिर्फ़ इंतज़ार करना पड़ेगा... लेकिन अगर उन्हें अभी नहीं मिली, तो शायद उन्हें भूखा रहना पड़े।"
उसके शब्द सुनकर मैं चुप हो गई।
यही बातें तो मैं उसे बचपन से सिखाती आई थी।
आज परीक्षा मेरी थी।
मैंने अलमारी से सबसे सुंदर कटोरी निकाली।
खीर डाली।
ऊपर थोड़ा मेवा रखा।
चम्मच रखा और बाहर चली गई।
अम्मा दरवाज़े के पास ही ज़मीन पर बैठ गई थीं।
मैंने कटोरी उनके हाथ में दी।
उन्होंने पहले मेरी तरफ़ देखा।
फिर खीर की तरफ़।
जैसे उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई उन्हें इतना अच्छा खाना दे सकता है।
पहला चम्मच मुँह में रखते ही उनकी आँखें बंद हो गईं।
चेहरे पर एक अजीब-सी शांति उतर आई।
मैं दूर खड़ी उन्हें देखती रही।
आरव भी मेरे पास आकर खड़ा हो गया।
धीरे से बोला,
"मम्मी... लगता है इन्हें बहुत पसंद आई।"
मैंने सिर्फ़ मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
खीर खत्म करने के बाद अम्मा ने कटोरी दोनों हाथों से पकड़कर कहा,
"बेटी... कई साल बाद इतनी स्वाद वाली खीर खाई है।"
मैंने पूछा,
"आप कहाँ रहती हैं?"
उन्होंने सामने सड़क के उस पार बने पुराने मंदिर की ओर इशारा किया।
"वहीं बरामदे में रात काट लेती हूँ।"
यह सुनकर मैंने संकोच से पूछा,
"आपका कोई अपना नहीं है, अम्मा?"
कुछ पल तक वह चुप रहीं।
फिर बोलीं,
"था... बहुत बड़ा परिवार था।"
इतना कहकर उनकी आवाज़ भर्रा गई।
उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा।
मैंने भी ज़्यादा पूछना ठीक नहीं समझा।
उन्होंने मुझे ढेर सारी दुआएँ दीं और धीरे-धीरे मंदिर की तरफ़ चली गईं।
मैं वापस घर आई।
आरव ने तुरंत पूछा,
"अब मेरी खीर?"
मैं हँस पड़ी।
"हाँ महाराज... अब आपकी बारी।"
हम दोनों खाने बैठे।
सच कहूँ...
आज खीर का स्वाद कुछ अलग ही था।
जैसे उसमें सिर्फ़ चीनी नहीं, किसी की दुआ भी घुल गई हो।
रात को जब सब सो गए, तब भी बार-बार वही अम्मा याद आती रहीं।
उनकी आँखें...
उनकी मुस्कान...
और उनका वह अधूरा जवाब—
"था... बहुत बड़ा परिवार था..."
आख़िर ऐसा क्या हुआ होगा कि इतनी उम्र में उन्हें मंदिर के बरामदे में रात बितानी पड़ रही है?
मुझे नहीं पता था कि यह मुलाक़ात यहीं खत्म नहीं हुई है।
असल कहानी तो अगले ही दिन शुरू होने वाली थी...
अगले दिन भी जाने क्यों मेरा ध्यान बार-बार उसी मंदिर की ओर जा रहा था।
काम करते-करते कई बार नज़र खिड़की से बाहर चली जाती। मंदिर का बरामदा हमारे घर से साफ़ दिखाई देता था। वहाँ वही बुज़ुर्ग अम्मा चुपचाप बैठी थीं। सामने पीतल का एक छोटा-सा लोटा रखा था। पास में कपड़ों की एक गठरी और एक पुरानी चादर।
उन्हें देखकर मन बेचैन हो उठा।
दोपहर का खाना बनाते समय मैंने थोड़ा ज़्यादा बना लिया।
दाल, चावल, आलू-टमाटर की सब्ज़ी और दो गरम रोटियाँ।
थाली सजाकर मैं मंदिर पहुँच गई।
मुझे देखते ही अम्मा थोड़ा झिझक गईं।
"अरे बेटी... कल ही तो खाया था। आज फिर क्यों तकलीफ़ की?"
मैं मुस्कुराकर बोली,
"तकलीफ़ नहीं अम्मा... मन था कि आपके साथ थोड़ा बैठूँ।"
उन्होंने धीरे से थाली ले ली।
इस बार उन्होंने जल्दी-जल्दी खाने के बजाय हर निवाला आराम से खाया।
मैं वहीं सीढ़ी पर बैठ गई।
कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे।
फिर मैंने धीरे से पूछा,
"अगर बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ?"
उन्होंने मेरी ओर देखा।
"पूछो बेटी।"
"कल आपने कहा था... आपका बड़ा परिवार था।"
इतना सुनते ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
कुछ देर तक वह मंदिर के आँगन में खेलते बच्चों को देखती रहीं।
फिर बोलीं,
"हर कहानी सुनाने लायक नहीं होती।"
मैंने धीरे से कहा,
"लेकिन कभी-कभी मन हल्का हो जाता है।"
उन्होंने गहरी साँस ली।
"मेरा नाम शारदा है।"
मैंने पहली बार उनका नाम सुना।
"मेरे पति स्कूल में मास्टर थे। बहुत ईमानदार आदमी थे। पैसा ज़्यादा नहीं कमाया, लेकिन इज़्ज़त बहुत कमाई। हमारे दो बेटे और एक बेटी थी।"
उनकी आँखों में पुराने दिनों की चमक लौट आई।
"हमारा छोटा-सा घर था। बरामदे में तुलसी का चौरा। पीछे अमरूद का पेड़। त्योहारों पर पूरा घर हँसी से भर जाता था।"
वह मुस्कुराईं।
फिर अचानक मुस्कान गायब हो गई।
"समय बदल गया। बच्चे बड़े हो गए। पढ़-लिखकर शहर चले गए।"
मैं चुपचाप सुनती रही।
"पति के जाने के बाद सब बदल गया।"
उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं।
"पहले बड़ा बेटा बोला—'माँ, आप हमारे साथ चलिए।'"
"मैं चली गई।"
"कुछ महीने सब ठीक रहा। फिर बहू को मेरी हर बात खटकने लगी।"
"'माँ, दवा इतनी महँगी क्यों आती है?'"
"'माँ, आप अकेली घर पर रहती हैं, हमें बाहर भी नहीं जाने देतीं।'"
"'माँ, गाँव में ही रहना आपको अच्छा लगता था ना?'"
हर वाक्य के साथ उनकी आवाज़ और धीमी होती जा रही थी।
"एक दिन बेटे ने कहा—'कुछ दिन छोटे भाई के पास चली जाओ।'"
मैं समझ गई...
उनका सफ़र यहीं से शुरू हुआ होगा।
उन्होंने आगे कहा,
"छोटे बेटे के घर गई। वहाँ भी कुछ महीने बाद वही बातें शुरू हो गईं।"
"एक घर से दूसरे घर। फिर दूसरे से पहले घर।"
"मैं माँ कम... ज़िम्मेदारी ज़्यादा बन गई थी।"
मेरी आँखें भीग गईं।
मैंने धीरे से पूछा,
"फिर?"
उन्होंने हल्की-सी हँसी हँसी।
"एक दिन मैंने ही दोनों बेटों से कह दिया—अब तुम लोग परेशान मत हो। मैं अपने भगवान के भरोसे रह लूँगी।"
मैंने हैरानी से पूछा, "फिर... आप यहाँ आ गईं?"
शारदा अम्मा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया और बोलीं, "हाँ बेटी। मंदिर के पुजारी ने बरामदे में रहने की अनुमति दे दी। लोग कभी खाना दे देते हैं, कभी नहीं। बस, जैसे-तैसे दिन कट जाते हैं।"
इतना कहते-कहते उन्होंने थाली खाली कर दी।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा,
"लेकिन बेटी... मैं किसी से शिकायत नहीं करती। शायद मेरे बच्चों की भी अपनी मजबूरियाँ होंगी।"
उनकी यह बात मेरे दिल में उतर गई।
जिस माँ को अपने बच्चों से शिकायत करने का पूरा अधिकार था...
वह आज भी उनके लिए सफ़ाई दे रही थी।
घर लौटकर मेरा मन किसी काम में नहीं लगा।
आरव स्कूल से आया तो उसने पूछा,
"मम्मी... आज अम्मा मिली थीं?"
मैंने सारी बात उसे बता दी।
वह कुछ देर तक चुप रहा।
फिर बोला,
"क्या उनके बच्चे कभी मिलने नहीं आते?"
"शायद नहीं बेटा।" मैंने धीमे स्वर में जवाब दिया।
उसने मासूमियत से कहा,
"अगर मेरी वजह से आपको कभी दुख हुआ ना... तो आप मुझे ज़रूर डाँटना। लेकिन मुझे कभी छोड़कर मत जाना।"
मैंने उसे कसकर गले लगा लिया।
उसकी यह बात सुनकर आँखों से आँसू निकल पड़े।
अगले कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा।
मैं रोज़ थोड़ा-सा खाना लेकर मंदिर चली जाती।
कभी खिचड़ी...
कभी दाल-चावल...
कभी सब्ज़ी-रोटी...
और कभी आरव की ज़िद पर खीर।
धीरे-धीरे अम्मा खुलने लगीं।
अब वह मुझे अपनी बेटी कहकर बुलाती थीं।
आरव को देखकर कहतीं,
"आ जा बेटा... भगवान तुझे हमेशा खुश रखे।"
आरव भी उनके पास बैठकर स्कूल की बातें करता।
कभी अपनी कॉपी दिखाता।
कभी परीक्षा के नंबर।
अम्मा हर बार उसके सिर पर हाथ फेरतीं।
एक दिन उन्होंने अपने पुराने थैले से कपड़े में लिपटी हुई एक छोटी-सी चीज़ निकाली।
वह चाँदी की एक पुरानी पायल थी।
उन्होंने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा,
"बेटी... इसे रख लो।"
मैं चौंक गई।
"नहीं अम्मा, यह मैं कैसे ले सकती हूँ?"
वह बोलीं,
"यह मेरी बेटी की है। उसके जाने के बाद मैंने इसे हमेशा संभालकर रखा।"
मैंने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।
"यह आपकी आख़िरी निशानी है। इसे मैं कभी नहीं लूँगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ बहुत देर तक देखा।
फिर बोलीं,
"तुमने मुझे खाना नहीं दिया बेटी..."
"तुमने मुझे फिर से अपना होने का एहसास दिया है।"
मैं कुछ बोल ही नहीं पाई।
उसी समय मंदिर के बाहर एक सफ़ेद कार आकर रुकी।
उसमें से लगभग पचास साल का एक आदमी उतरा।
उसकी नज़र सीधे शारदा अम्मा पर पड़ी।
वह कुछ पल तक उन्हें देखता रहा...
फिर काँपती आवाज़ में बोला—
"माँ...!"
मैं और अम्मा दोनों एक साथ उसकी तरफ़ देखने लगे।
अम्मा के हाथ से पायल ज़मीन पर गिर चुकी थी...
"माँ...!"
उस आदमी की आवाज़ सुनते ही मंदिर के आँगन में जैसे सन्नाटा छा गया।
शारदा अम्मा की उँगलियाँ काँपने लगीं।
उन्होंने कई पल तक उस आदमी को ध्यान से देखा।
फिर धीरे से बोलीं,
"संदीप...?"
आदमी की आँखों से आँसू बह निकले।
वह दौड़कर अम्मा के पैरों में बैठ गया।
"माँ... मुझे माफ़ कर दो।"
मैं कुछ दूरी पर खड़ी सब देख रही थी।
आरव भी स्कूल से लौटते समय वहीं आ गया था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
संदीप बार-बार रोए जा रहा था।
"माँ... मैं आपको बहुत ढूँढ़ता रहा।"
अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बेटा... इतने साल बाद अपनी माँ की याद आई?"
संदीप ने सिर झुका लिया।
"माँ... गलती मेरी थी। बहुत बड़ी गलती।"
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर मैंने धीरे से कहा,
"अगर आप लोग चाहें तो घर चलकर बैठते हैं।"
सभी हमारे घर आ गए।
मैंने चाय बनाई।
आरव ने पानी लाकर रखा।
काफी देर तक कमरे में चुप्पी रही।
आख़िर संदीप ने बोलना शुरू किया।
"माँ... जिस दिन आप घर छोड़कर गई थीं, मुझे लगा था दो-चार दिन में वापस आ जाएँगी।"
"मैंने बहुत ढूँढ़ा। गाँव गया। रिश्तेदारों से पूछा। पुलिस में भी सूचना दी।"
"लेकिन आपका कोई पता नहीं चला।"
अम्मा शांत बैठी सुनती रहीं।
संदीप ने आगे कहा,
"फिर छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियों में ऐसा उलझा कि हर दिन खुद को यही समझाता रहा कि एक दिन ज़रूर मिल जाएँगी।"
"लेकिन हर गुज़रते साल के साथ मेरा अपराधबोध बढ़ता गया।"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"माँ... मैंने आपको कभी घर से निकालना नहीं चाहा था।"
अम्मा ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
"बेटा... निकालने के लिए सिर्फ़ दरवाज़ा बंद करना ज़रूरी नहीं होता।"
"कई बार अपनेपन का दरवाज़ा बंद हो जाए, तब भी इंसान घर छोड़ देता है।"
संदीप फूट-फूटकर रो पड़ा।
"माँ... मैं शर्मिंदा हूँ।"
"हर त्योहार पर आपकी खाली कुर्सी देखकर लगता था जैसे घर अधूरा है।"
"मेरे बच्चे रोज़ पूछते थे—दादी कहाँ हैं?"
"मेरे पास कोई जवाब नहीं था।"
इतने में आरव धीरे से बोला,
"अम्मा... अब आप इनके साथ चली जाएँगी?"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
शारदा अम्मा ने आरव की ओर देखा।
फिर मेरी तरफ़।
उनकी आँखों में ममता थी।
उन्होंने कहा,
"बेटा... दिल तो कहता है कि अपने बच्चे के साथ चली जाऊँ।"
"लेकिन डर भी लगता है।"
संदीप तुरंत बोला,
"माँ... इस बार आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी।"
"मैं वादा करता हूँ।"
अम्मा मुस्कुराईं।
"बेटा... वादे शब्दों से नहीं, व्यवहार से निभते हैं।"
संदीप ने सिर झुका लिया।
कुछ देर बाद उसने मेरी तरफ़ देखा।
"बहन जी... आपने मेरी माँ को सिर्फ़ खाना नहीं खिलाया।"
"आपने उन्हें जीने की वजह दी।"
"मैं आपका यह एहसान कभी नहीं चुका सकता।"
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"माँ का एहसान कोई नहीं चुकाता। बस उन्हें सम्मान देता है।"
उसी समय आरव अंदर गया।
कुछ देर बाद वह एक छोटा-सा डिब्बा लेकर आया।
उसमें वही स्टील की कटोरी थी, जिसमें पहली बार मैंने अम्मा को खीर खिलाई थी।
उसने कटोरी अम्मा की गोद में रखते हुए कहा,
"यह आपके लिए है।"
अम्मा हैरान रह गईं।
"नहीं बेटा, यह तुम्हारी है।"
आरव बोला,
"जब भी इसमें खीर खाना... हमें याद कर लेना।"
शारदा अम्मा की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने आरव को गले से लगा लिया।
"भगवान करे... तेरे हाथों से कभी किसी भूखे का कटोरा खाली न लौटे।"
अगले दिन संदीप अपनी माँ को घर ले गया।
जाते समय अम्मा बार-बार पीछे मुड़कर हमारे घर को देख रही थीं।
मैंने उनके चरण छुए।
उन्होंने सिर पर हाथ रखकर कहा,
"बेटी... रिश्ते खून से नहीं, व्यवहार से बनते हैं।"
घर फिर पहले जैसा हो गया।
लेकिन कुछ कमी महसूस होती थी।
मंदिर का वह बरामदा अब खाली दिखाई देता था।
आरव भी कई बार खिड़की से उधर देखता रहता।
करीब एक महीने बाद हमारे घर की घंटी बजी।
दरवाज़ा खोला तो सामने शारदा अम्मा थीं।
इस बार उनके चेहरे पर चमक थी।
साफ़ साड़ी पहनी हुई थी।
साथ में संदीप, उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे भी थे।
संदीप की पत्नी मेरी ओर बढ़ी।
उसने हाथ जोड़कर कहा,
"दीदी... मुझे माफ़ कर दीजिए।"
"मैंने माँ को कभी समझा ही नहीं।"
"अगर आप इन्हें सहारा न देतीं तो शायद मैं जीवन भर अपनी गलती नहीं समझ पाती।"
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
"गलती मान लेना ही सबसे बड़ा सुधार होता है।"
शारदा अम्मा मुस्कुराते हुए बोलीं,
"आज मैं अपने पूरे परिवार को लेकर आई हूँ।"
"क्योंकि जिस घर ने मुझे माँ का सम्मान दिया... वह घर अब मेरा भी है।"
मैंने उसी समय रसोई में जाकर खीर बनाई।
इस बार पहले से भी ज़्यादा।
सब लोग एक साथ बैठे।
संदीप...
उसकी पत्नी...
दोनों बच्चे...
आरव...
मैं...
और सबसे बीच में बैठी थीं शारदा अम्मा।
उन्होंने पहला चम्मच खीर का मुँह में रखा।
फिर मुस्कुराकर बोलीं,
"बेटी... अब समझ में आया..."
"खीर मीठी चीनी से नहीं बनती..."
"मीठी बनती है उस प्यार से, जिसमें किसी का स्वार्थ नहीं होता।"
मैंने उनकी बात सुनकर अनायास अपनी नानी को याद किया।
वह भी तो यही कहती थीं—
"अपने हिस्से की मिठास, दूसरों के चेहरे की मुस्कान में मिलती है।"
उस दिन लगा...
शायद इंसान दुनिया से चला जाता है,
लेकिन उसके संस्कार कभी नहीं जाते।
वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक,
बिना शोर किए,
बस प्यार की तरह बहते रहते हैं।
और सच तो यही है...
किसी भूखे को खिलाया गया एक कटोरा भोजन केवल उसका पेट नहीं भरता, वह किसी टूटे हुए दिल में फिर से रिश्तों पर विश्वास भी जगा देता है।

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