भरोसे का गुनहगार
"अगर इस घर में मेरी बेटी की इज़्ज़त नहीं है... तो यह रिश्ता भी आज से खत्म समझिए।"
इतना कहते ही सावित्री देवी ने अपने गले का मंगलसूत्र कसकर पकड़ लिया। बैठक में बैठे सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हमेशा शांत रहने वाली सावित्री देवी ने इतनी बड़ी बात क्यों कह दी।
उनकी बेटी काव्या सिर झुकाए खड़ी थी। आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे, लेकिन उसने एक शब्द भी नहीं कहा। सामने बैठे लड़के वाले बिना कुछ बोले उठे और बाहर निकल गए।
दरवाज़ा बंद होते ही घर में सन्नाटा छा गया।
काव्या के पिता महेश जी ने भारी आवाज़ में पूछा, "सावित्री, आखिर तुमने ऐसा क्यों किया? इतने अच्छे लोग थे।"
सावित्री देवी ने गहरी साँस ली।
"अच्छे लोग? जो लड़की को इंसान नहीं, सामान समझें... क्या उन्हें अच्छा कहते हैं?"
किसी के पास इसका जवाब नहीं था।
काव्या पढ़ी-लिखी थी। एक सरकारी बैंक में अधिकारी थी। स्वभाव से शांत, संस्कारी और आत्मनिर्भर। बस उसका रंग साँवला था। यही एक बात हर रिश्ता टूटने का कारण बन जाती।
कभी कोई कहता, "लड़की अच्छी है, लेकिन रंग थोड़ा दबा हुआ है।"
कोई कहता, "अगर दहेज थोड़ा ज़्यादा दे दें तो बात बन सकती है।"
कोई मुस्कुराकर चला जाता और फिर कभी लौटकर नहीं आता।
हर बार काव्या मुस्कुरा देती, लेकिन उसके कमरे का बंद दरवाज़ा उसके आँसुओं का गवाह बन जाता।
महेश जी और सावित्री देवी उसे समझाते, "बेटा, भगवान ने जो लिखा है वही होगा।"
वह भी मुस्कुरा देती, मगर अंदर ही अंदर टूटती जा रही थी।
उसी घर में महेश जी का छोटा बेटा आदित्य भी रहता था। उसकी पत्नी नंदिनी इस घर की बहू थी।
नंदिनी ने शादी के बाद कभी काव्या को ननद नहीं समझा। वह उसे अपनी बड़ी बहन मानती थी।
दोनों साथ खाना बनातीं, बाज़ार जातीं, बातें करतीं और एक-दूसरे का मन हल्का करतीं।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से नंदिनी ने महसूस किया कि काव्या पहले जैसी नहीं रही।
वह देर तक कमरे में बंद रहती।
फोन आते ही बाहर चली जाती।
खाना भी ठीक से नहीं खाती।
चेहरे की मुस्कान जैसे कहीं खो गई थी।
एक बार नंदिनी ने प्यार से पूछा, "दीदी, कोई बात है क्या?"
काव्या ने मुस्कुराकर कहा, "नहीं पगली... बस काम का थोड़ा दबाव है।"
लेकिन नंदिनी को उसकी मुस्कान बनावटी लगी।
कुछ दिनों बाद काव्या ने बताया कि बैंक में नए रीजनल मैनेजर आए हैं।
उनका नाम था विक्रम।
वे सबकी मदद करते थे। सभी कर्मचारी उनकी तारीफ़ करते थे।
धीरे-धीरे काव्या भी उनका सम्मान करने लगी।
इसके बाद काव्या अक्सर ऑफिस का काम बताकर देर से घर आने लगी।
नंदिनी को चिंता होने लगी।
एक शाम उसने खिड़की से देखा कि एक सफेद कार घर के सामने रुकी।
काव्या उतरी।
ड्राइवर सीट पर बैठा व्यक्ति कुछ देर तक उससे बातें करता रहा।
फिर कार चली गई।
नंदिनी ने सिर्फ़ उसकी धुँधली-सी शक्ल देखी।
घर में आने पर काव्या सामान्य बनने की कोशिश कर रही थी, लेकिन नंदिनी ने काव्या के चेहरे को गौर से देखा। उसकी आँखें लाल थीं और पलकों पर नमी साफ़ दिखाई दे रही थी।
नंदिनी ने चिंता भरे स्वर में पूछा, "दीदी... सब ठीक है?"
काव्या ने जबरन मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ... बिल्कुल ठीक हूँ।"
नंदिनी ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया और बोली, "अगर सब ठीक है, तो आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं? आप रोई हैं न?"
यह सुनते ही काव्या एक पल के लिए घबरा गई। उसने तुरंत नज़रें झुका लीं और खुद को संभालते हुए बोली, "अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। शायद धूल का कोई कण आँख में चला गया होगा, इसलिए आँखें लाल हो गई हैं।"
नंदिनी ने उनकी बात तो सुन ली, लेकिन उसे महसूस हो गया कि काव्या उससे कोई बड़ा सच छिपा रही है।
उसने किसी से कुछ नहीं कहा।
वह सिर्फ़ काव्या पर नज़र रखने लगी।
कुछ दिनों बाद आदित्य को ऑफिस के सिलसिले में दूसरे शहर जाना पड़ा।
घर में महेश जी, सावित्री देवी, काव्या और नंदिनी ही थे।
काव्या की बेचैनी अब और बढ़ गई थी।
एक रात उसे तेज़ चक्कर आया।
नंदिनी भागकर उसके कमरे में पहुँची।
काव्या फर्श पर बैठी रो रही थी।
नंदिनी ने उसे गले लगाया।
"दीदी... अब और मत छिपाइए। मैं आपकी अपनी हूँ।"
काव्या कुछ देर तक रोती रही।
फिर काँपती आवाज़ में बोली—
"मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी..."
"कैसी गलती?"
"विक्रम ने कहा था कि वह मुझसे शादी करेगा। उसने बताया कि वह अविवाहित है। उसने मुझे अपने परिवार से मिलवाने का वादा किया। मैं उस पर भरोसा कर बैठी।"
नंदिनी का दिल बैठ गया।
"फिर?"
"उसने मुझे एक गेस्ट हाउस बुलाया। कहा कि वहीं उसके माता-पिता आए हैं।"
काव्या फूट-फूटकर रो पड़ी।
"वहाँ कोई नहीं था... सिर्फ़ वह था। उसने मेरे साथ ज़बरदस्ती की... और छिपे कैमरे से वीडियो बना लिया।"
नंदिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"उसने धमकी दी कि अगर मैंने किसी को बताया तो वीडियो इंटरनेट पर डाल देगा।"
काव्या सिसकते हुए बोली—
"मुझे जीने से डर लगने लगा है।"
नंदिनी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
"दीदी... अब डर खत्म। अब वह बचेगा नहीं।"
अगले ही दिन नंदिनी अपनी कॉलेज की मित्र, जो महिला पुलिस अधिकारी थी, उससे मिली।
उसने पूरी बात बताई।
अधिकारी ने कहा—
"सबूत चाहिए। तभी मामला मज़बूत होगा।"
योजना बनाई गई।
काव्या ने विक्रम को संदेश भेजा कि वह उससे मिलना चाहती है।
विक्रम खुशी-खुशी तैयार हो गया।
उसे लगा कि काव्या अभी भी उसके डर में जी रही है।
लेकिन उसे नहीं पता था कि जिस कैफ़े में वह मिलने जा रहा है, वहाँ पहले से पुलिस मौजूद होगी।
विक्रम आया।
बैठते ही बोला—
"अच्छा हुआ समझदारी आ गई।"
काव्या ने डरने का अभिनय किया।
"वो वीडियो... डिलीट कर दीजिए।"
विक्रम हँस पड़ा।
"इतनी आसानी से नहीं। जैसा कहूँ, वैसा करती रहो।"
इतना सुनते ही पास की मेज़ पर बैठे सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उठ खड़े हुए।
महिला अधिकारी सामने आई।
"विक्रम... आपकी बात रिकॉर्ड हो चुकी है।"
विक्रम के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसका मोबाइल जब्त किया गया।
जाँच में कई लड़कियों के वीडियो और तस्वीरें मिलीं।
पूछताछ शुरू हुई तो सच्चाई और भी भयानक निकली।
वह कई शहरों में इसी तरह महिलाओं को शादी का झाँसा देकर ब्लैकमेल कर चुका था।
उसकी गिरफ़्तारी की खबर अख़बारों और टीवी तक पहुँच गई।
कई पीड़ित महिलाएँ सामने आईं।
सबने उसके खिलाफ बयान दिया।
कुछ महीनों बाद अदालत ने उसे कठोर सज़ा सुनाई।
फैसला सुनते समय काव्या की आँखों से आँसू बह रहे थे।
लेकिन इस बार वे दर्द के नहीं, राहत के आँसू थे।
घर लौटते ही उसने सबसे पहले नंदिनी को गले लगा लिया।
"अगर तुम मेरा साथ नहीं देती... तो शायद मैं कभी सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।"
नंदिनी मुस्कुराई।
"रिश्ते सिर्फ़ खून से नहीं बनते... भरोसे से बनते हैं।"
आदित्य ने गर्व से अपनी पत्नी की ओर देखा।
महेश जी की आँखें भर आईं।
सावित्री देवी ने दोनों बेटियों को सीने से लगा लिया।
कुछ महीनों बाद बैंक में काव्या की ईमानदारी और साहस के लिए उसका सम्मान किया गया।
उसने निश्चय किया कि अब वह उन महिलाओं की मदद करेगी जो डर और बदनामी की वजह से चुप रह जाती हैं।
धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी फिर से मुस्कुराने लगी।
इस बार उसकी मुस्कान किसी रिश्ते के मिलने से नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान को वापस पाने से आई थी।
सीख:
गलती उस इंसान की नहीं होती जो विश्वास करता है, बल्कि उस व्यक्ति की होती है जो विश्वास का फायदा उठाकर किसी की ज़िंदगी से खेलता है। अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना ही सबसे बड़ा साहस है।

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