उम्रभर का साथ
"अजी सुनते हो... आज मैं तुमसे एक वादा माँगने आई हूँ।"
रघुवीर जी बरामदे में बैठकर अपने पुराने चश्मे से अख़बार पढ़ रहे थे। आवाज़ सुनकर उन्होंने चश्मा उतारा और मुस्कुराते हुए अपनी पत्नी शांता देवी की ओर देखा।
"अरे, इतने सालों बाद आज वादा माँग रही हो? कहो, क्या बात है?"
शांता देवी ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा उनके सामने रख दिया।
"पहले यह खोलो... फिर जवाब देना।"
रघुवीर जी ने धीरे-धीरे डिब्बा खोला।
अंदर एक सूखी हुई चमेली का फूल, एक टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा, एक पुराना सिक्का और एक छोटी-सी पर्ची रखी थी।
उन्होंने हैरानी से पूछा, "अरे... यह सब तुमने इतने सालों तक संभालकर रखा?"
शांता देवी हल्का-सा मुस्कुराईं।
"हाँ... क्योंकि यह सामान नहीं, हमारी पूरी ज़िंदगी है।"
रघुवीर जी ने फूल उठाया।
"यह वही फूल है ना... जो पहली बार मेले से लौटते समय तुम्हारे बालों में लगाया था?"
शांता ने सिर हिलाया।
"और यह टूटी चूड़ी?"
"हमारी शादी के दूसरे साल टूट गई थी। तुमने कहा था, नई दिला दूँगा। लेकिन घर की हालत ऐसी थी कि पहले राशन खरीदना ज़रूरी था।"
दोनों मुस्कुरा दिए।
रघुवीर जी ने पुराना सिक्का हाथ में लिया।
"इसे क्यों रखा?"
शांता बोली, "याद है... हमारे पास सिर्फ एक रुपया बचा था। तुमने कहा था इससे दवा ले लेते हैं। लेकिन मैंने उससे आधा किलो आटा खरीद लिया था।"
"उस रात हमने सूखी रोटी खाई थी... मगर अगले दिन तुम काम पर जा सके थे।"
रघुवीर जी की आँखें भर आईं।
उन्होंने धीरे से कहा, "तुमने कभी मुझे एहसास ही नहीं होने दिया कि घर कितनी मुश्किल से चल रहा था।"
शांता हँस पड़ी।
"अगर उस समय मैं भी शिकायत करती, तो हमारा घर कैसे चलता?"
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर शांता ने वह छोटी पर्ची उनकी ओर बढ़ाई।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
"अगर मैं पहले चली जाऊँ, तो रोना मत।"
रघुवीर जी ने जैसे ही पढ़ा, उनका चेहरा उतर गया।
"यह कैसी बात लिख दी तुमने?"
शांता बोली, "अब उम्र हो गई है। पता नहीं पहले कौन जाएगा। इसलिए सोचा, जो मन में है, आज कह दूँ।"
रघुवीर जी ने तुरंत पर्ची मोड़ दी।
"नहीं... आज ऐसी बातें नहीं करेंगे।"
शांता मुस्कुराईं।
"पूरी बात तो सुन लो।"
"मैं चाहती हूँ कि मेरे जाने के बाद तुम अकेले मत बैठना। रोज़ मंदिर चले जाना। बच्चों से बातें करना। पोते-पोतियों को कहानियाँ सुनाना।"
"और सबसे ज़रूरी... अपने खाने का ध्यान रखना।"
रघुवीर जी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने कहा, "तुम्हें लगता है मैं तुम्हारे बिना रह पाऊँगा?"
शांता ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"जब हमारी शादी हुई थी, तब हम एक-दूसरे को जानते भी नहीं थे।"
"धीरे-धीरे दोस्त बने।"
"फिर साथी बने।"
"फिर बच्चों के माँ-बाप बने।"
"अब एक-दूसरे की आदत बन गए हैं।"
"लेकिन जीवन का नियम है... एक दिन किसी एक को पहले जाना ही होगा।"
रघुवीर जी ने धीमे स्वर में कहा, "अगर भगवान मुझसे कुछ माँगने को कहे, तो मैं बस इतना माँगूँगा कि तुम्हारे बिना जीने की नौबत ही न आए।"
शांता ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "और मैं भगवान से कहूँगी कि अगर अगला जन्म हो... तो फिर से तुम्हारे घर ही भेजना।"
उसी समय उनका बड़ा बेटा कमरे में आया।
उसने देखा कि दोनों की आँखें नम हैं।
वह घबरा गया।
"क्या हुआ?"
रघुवीर जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ नहीं बेटा... बस पुरानी यादें देख रहे थे।"
बेटा भी उनके पास बैठ गया।
"पिताजी, एक बात पूछूँ?"
"हाँ बेटा, पूछो।"
बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा, "आप और माँ इतने सालों से साथ हैं... क्या आप दोनों के बीच कभी झगड़ा नहीं हुआ?"
यह सुनते ही रघुवीर जी और शांता देवी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
अगले ही पल दोनों ज़ोर से हँस पड़े।
रघुवीर जी मुस्कुराकर बोले, "अरे बेटा, ऐसा कौन-सा पति-पत्नी होगा जिसके बीच कभी नोकझोंक न हुई हो?"
शांता देवी ने हँसते हुए बात पूरी की, "झगड़े तो इतने हुए हैं कि अगर उन्हें लिखने बैठें, तो पूरी किताब तैयार हो जाए।"
रघुवीर जी हल्के से मुस्कुराए और बोले,
"हमने शादी के कुछ ही दिनों बाद एक छोटा-सा नियम बना लिया था।"
शांता देवी ने उनकी बात आगे बढ़ाई,
"हमने तय किया था कि चाहे दिन कितना भी कठिन क्यों न हो, चाहे कितना भी मनमुटाव हो जाए, लेकिन रात को सोने से पहले एक-दूसरे से बात ज़रूर करेंगे।"
रघुवीर जी बोले,
"गलती किसकी है, यह साबित करने से ज़्यादा ज़रूरी रिश्ता बचाना होता है। इसलिए हम दोनों में से कोई न कोई पहले चुप्पी तोड़ देता था।"
शांता देवी मुस्कुराकर बोलीं,
"कभी ये मुझे मना लेते थे, तो कभी मैं इन्हें। लेकिन हमने अपने अहंकार को कभी अपने रिश्ते से बड़ा नहीं होने दिया।"
रघुवीर जी ने बेटे की ओर देखते हुए कहा,
"शायद यही वजह है कि इतने उतार-चढ़ाव आने के बाद भी हमारा साथ आज तक बना हुआ है।"
बेटा चुपचाप सुनता रहा।
उसे पहली बार समझ आया कि मजबूत रिश्ते अपने आप नहीं बनते।
उन्हें रोज़ निभाना पड़ता है।
कुछ दिनों बाद पूरे परिवार ने रघुवीर जी और शांता देवी की शादी की साठवीं सालगिरह मनाई।
केक काटा गया।
पोते-पोतियों ने तालियाँ बजाईं।
सबने उनसे एक-एक बात सीखने की इच्छा जताई।
सबसे छोटी पोती ने पूछा,
"दादी... दादाजी... इतने साल साथ रहने का सबसे बड़ा राज़ क्या है?"
शांता देवी ने रघुवीर जी की ओर देखा।
फिर बोलीं,
"रिश्ता जीतने से नहीं... निभाने से चलता है।"
रघुवीर जी ने मुस्कुराकर कहा,
"और जीवनसाथी कभी पराया नहीं होता।"
"जब वह रोए... तो उसके आँसू अपने समझो।"
"जब वह थक जाए... तो उसका हाथ पकड़ लो।"
"जब वह गलती करे... तो उसे अपमान नहीं, समझ दो।"
"यही प्यार है।"
पूरा परिवार भावुक हो गया।
रात को सब सो गए।
बरामदे में दोनों फिर साथ बैठे थे।
आसमान में चाँद चमक रहा था।
रघुवीर जी ने धीरे से पूछा,
"अच्छा... आज जो वादा माँग रही थीं, वह तो बताया ही नहीं।"
शांता देवी मुस्कुराईं।
"वादा बस इतना है..."
"जब तक साँस है, एक-दूसरे का हाथ कभी मत छोड़ना।"
रघुवीर जी ने बिना कुछ कहे उनका हाथ अपने दोनों हाथों में कसकर पकड़ लिया।
दोनों मुस्कुरा रहे थे।
उनके चेहरों की झुर्रियों में बीते हुए साठ वर्षों की कहानी लिखी थी।
उन्हें अब किसी दौलत की ज़रूरत नहीं थी।
उनके पास सबसे कीमती ख़ज़ाना था—एक-दूसरे का साथ।
सीख:
पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ प्रेम से नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान, धैर्य और हर परिस्थिति में साथ निभाने से मजबूत होता है। जीवन के अंत में इंसान को सबसे ज़्यादा सुकून न धन देता है, न शोहरत, बल्कि वह हाथ देता है जो पूरी उम्र बिना शर्त उसके साथ चला हो। यही साथ जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।

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