दो घर, एक बचपन
"माँ, क्या किसी बच्चे का दिल भी दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है... जैसे आपने और पापा ने अपना घर बाँट लिया?"
आरव के मुँह से निकले ये शब्द सुनते ही पूजा के हाथ में पकड़ा पानी का गिलास फर्श पर गिर गया।
गिलास टूट गया।
लेकिन उस पल किसी को उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दी।
पूजा बस अपने दस साल के बेटे को देखती रह गई।
उसे लगा जैसे पहली बार वह अपने बेटे का चेहरा नहीं, उसका दर्द देख रही हो।
आरव की आँखें लाल थीं, लेकिन उनमें आँसू नहीं थे।
शायद आँसू भी एक दिन खत्म हो जाते हैं।
कुछ पल तक कमरे में कोई कुछ नहीं बोला।
फिर आरव ने धीमी आवाज़ में कहा,
"माँ... जवाब दो ना।"
पूजा के होंठ काँपे।
"बेटा..."
"नहीं माँ। आज मुझे छोटा मत समझना। आज मैं सब समझना चाहता हूँ।"
उसने अपना स्कूल बैग धीरे से नीचे रखा।
बैग खोलकर उसने दो नोटबुक निकालीं।
पहली नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा था—
"मम्मी वाला घर।"
दूसरी पर लिखा था—
"पापा वाला घर।"
पूजा हैरान होकर उसे देखने लगी।
आरव ने पहली कॉपी खोली।
उसमें स्कूल का होमवर्क था।
कुछ ड्रॉइंग थीं।
कुछ जगह टीचर के स्टार बने थे।
फिर उसने दूसरी कॉपी खोली।
उसमें भी लगभग वही सब था।
बस लिखावट थोड़ी अलग थी।
पूजा ने पूछा,
"ये क्या है बेटा?"
आरव हल्का-सा मुस्कुराया।
लेकिन वह मुस्कान किसी बूढ़े इंसान जैसी थकी हुई थी।
"ये मेरी दो ज़िंदगियाँ हैं, माँ।"
"जब मैं तुम्हारे पास रहता हूँ, तब इस कॉपी में लिखता हूँ।"
"और जब पापा के पास जाता हूँ, तब दूसरी कॉपी में।"
पूजा का दिल जैसे बैठ गया।
"क्यों?"
आरव ने बहुत मासूमियत से जवाब दिया,
"क्योंकि कई बार जल्दी में कॉपी यहीं रह जाती है।"
"फिर टीचर डाँटती हैं।"
"इसलिए मैंने दो-दो कॉपियाँ रख लीं।"
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला,
"अब मैं चीज़ें भूलने नहीं देता।"
"लेकिन माँ..."
"...मैं खुद को कहाँ रखूँ?"
पूजा की आँखों से आँसू बह निकले।
आरव आगे बोला,
"मेरे दो टूथब्रश हैं।"
"दो पानी की बोतलें हैं।"
"दो स्कूल ड्रेस हैं।"
"दो चप्पलें हैं।"
"दो तकिए हैं।"
"लेकिन दिल..."
उसने अपने सीने पर हाथ रखा।
"दिल तो एक ही है ना?"
पूजा अब खुद को संभाल नहीं पा रही थी।
उसने आरव को गले लगाने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन आरव धीरे से पीछे हट गया।
"पहले मेरी बात पूरी सुन लो।"
उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी।
सिर्फ़ थकान थी।
ऐसी थकान जो किसी बच्चे की नहीं होनी चाहिए।
"आज स्कूल में टीचर ने पूछा था..."
"'बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?'"
"सबने अलग-अलग जवाब दिए।"
"कोई डॉक्टर बनेगा।"
"कोई पुलिस वाला।"
"कोई क्रिकेटर।"
"जब मेरी बारी आई..."
"...तो मैंने कहा—"
"मैं बड़ा होकर जज बनना चाहता हूँ।"
पूजा ने हैरानी से पूछा,
"क्यों?"
आरव ने बिना पलक झपकाए कहा,
"ताकि किसी भी बच्चे के मम्मी-पापा का तलाक न होने दूँ।"
पूजा की रुलाई फूट पड़ी।
आरव ने पहली बार अपनी माँ को इतना टूटकर रोते देखा।
लेकिन उसके चेहरे पर कोई जीत नहीं थी।
वह धीरे से बोला,
"माँ..."
"मैं तुम्हें रुलाना नहीं चाहता।"
"मैं तो बस यह जानना चाहता हूँ कि मेरी गलती क्या थी।"
"जब आप लोग लड़ते थे..."
"...क्या मैं बहुत शरारती था?"
"क्या मैं पढ़ाई में कमज़ोर था?"
"क्या मैं ज़्यादा रोता था?"
"क्या मैं अच्छा बेटा नहीं था?"
हर सवाल पूजा के दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था।
उसने काँपते हुए आरव का चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।
"नहीं बेटा..."
"तेरी कोई गलती नहीं थी।"
"कभी नहीं थी।"
आरव ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में पूछा,
"फिर गलती किसकी थी, माँ?"
इस बार पूजा के पास जवाब नहीं था।
कमरे की दीवार पर लगी घड़ी लगातार चल रही थी।
लेकिन उस घर में समय जैसे ठहर गया था।
उसी समय दरवाज़े की घंटी बजी।
दोनों समझ गए।
निखिल आ गया था।
हर शनिवार की तरह।
पूजा ने जल्दी से आँसू पोंछे।
आरव दरवाज़े तक गया।
दरवाज़ा खोला।
सामने उसके पापा खड़े थे।
चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
हाथ में एक बड़ा-सा डिब्बा।
"देखो बेटा..."
"तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ।"
आरव ने डिब्बे की तरफ देखा भी नहीं।
उसने सिर्फ़ इतना पूछा—
"पापा..."
"क्या आपके पास पाँच मिनट हैं?"
निखिल मुस्कुरा दिए।
"पूरे दो दिन हैं मेरे पास।"
आरव ने सिर हिलाया।
"नहीं..."
"आज मुझे सिर्फ़ पाँच मिनट चाहिए।"
निखिल ने पहली बार बेटे की आँखों में कुछ अलग देखा।
उन्होंने धीरे से कहा,
"ठीक है बेटा।"
आरव उनका हाथ पकड़कर ड्रॉइंग रूम में ले आया।
पूजा वहीं खड़ी थी।
कमरे में अजीब-सी खामोशी फैल गई।
आरव ने दोनों को आमने-सामने बैठाया।
फिर खुद बीच में खड़ा हो गया।
उसने अपनी जेब से एक सफेद कागज़ निकाला।
उसे बीच से फाड़ दिया।
फिर आधा टुकड़ा माँ को दिया।
आधा पापा को।
दोनों हैरानी से उसे देखने लगे।
आरव की आवाज़ काँप रही थी।
"यह मैं हूँ।"
"आधा माँ के पास।"
"आधा पापा के पास।"
"अब बताइए..."
"क्या इन दोनों टुकड़ों में से कोई भी पूरा है?"
निखिल और पूजा एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।
लेकिन किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
आरव धीरे-धीरे सोफ़े पर बैठ गया।
उसने अपना सिर झुका लिया।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोला—
"मैं अब थक गया हूँ..."
"हर हफ्ते अपना बैग पैक करते-करते नहीं..."
"...हर हफ्ते अपना दिल बाँटते-बाँटते।"
उसके ये शब्द सुनकर निखिल के हाथ से वह गिफ्ट का डिब्बा नीचे गिर गया।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ...
जिस बेटे को वे खिलौनों से खुश करने की कोशिश कर रहे थे...
उसे खिलौनों की नहीं...
एक पूरे परिवार की ज़रूरत थी।
निखिल की आँखें उस गिफ्ट के डिब्बे पर नहीं, अपने बेटे के झुके हुए सिर पर टिकी थीं।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि आरव की उम्र सिर्फ़ दस साल है, लेकिन उसकी बातें किसी ऐसे इंसान जैसी हैं जिसने ज़िंदगी के सबसे कठिन इम्तिहान अकेले दिए हों।
कुछ देर तक कमरे में कोई कुछ नहीं बोला।
आख़िरकार निखिल धीरे से आरव के पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखा।
"बेटा... मेरी तरफ देखो।"
आरव ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में एक ही सवाल था।
"क्या आप दोनों कभी फिर से एक घर में रहोगे?"
निखिल ने गहरी साँस ली।
उन्होंने पूजा की तरफ देखा।
फिर धीमी आवाज़ में बोले,
"इस सवाल का जवाब अभी मेरे पास नहीं है।"
आरव की उम्मीद जैसे एक पल में बुझ गई।
उसने धीरे से कहा,
"फिर मैं भी अब कोई सवाल नहीं पूछूँगा।"
वह उठा, अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर चला गया।
दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।
निखिल और पूजा वहीं बैठे रह गए।
कई मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर पूजा ने पहली बार चुप्पी तोड़ी।
"याद है... जब आरव छोटा था, तो ज़रा-सी चोट लगने पर कैसे रोता था?"
निखिल हल्का-सा मुस्कुराए।
"और तुम उसे गोद में लेकर पूरे घर में घूमती रहती थीं।"
दोनों की मुस्कान अगले ही पल गायब हो गई।
पूजा की आँखें भर आईं।
"आज उसे सबसे बड़ी चोट लगी है..."
"...और हम दोनों उसे मरहम भी नहीं दे पा रहे।"
निखिल ने सिर झुका लिया।
"मैं हर बार सोचता था कि उसे महंगे खिलौने दे दूँगा, घूमाने ले जाऊँगा, तो वह खुश हो जाएगा।"
"लेकिन आज समझ आया..."
"बच्चे खिलौनों से नहीं..."
"...अपने माँ-बाप के व्यवहार से खुश होते हैं।"
इतने में अंदर वाले कमरे से हल्की-सी सिसकियों की आवाज़ आई।
दोनों एक साथ उठे।
दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।
अंदर आरव अपनी पुरानी टेडी बियर को सीने से लगाए बैठा था।
वह उससे बात कर रहा था।
"तुझे पता है टेडी..."
"तू कितना खुशकिस्मत है।"
"तेरे मम्मी-पापा नहीं हैं।"
"इसलिए तुझे किसी एक को चुनना नहीं पड़ता।"
यह सुनकर पूजा अपने आँसू नहीं रोक पाई।
वह दरवाज़े से टिककर रोने लगी।
निखिल ने पहली बार महसूस किया कि उनका बेटा अब अकेले में खिलौनों से बातें करने लगा है।
आरव फिर बोला,
"जब मैं माँ के घर होता हूँ ना..."
"...तो लगता है पापा अकेले होंगे।"
"और जब पापा के घर जाता हूँ..."
"...तो लगता है माँ खाना ठीक से नहीं खाएँगी।"
"मैं किसी के साथ भी पूरा खुश नहीं हो पाता।"
"क्या यही बड़ा होना होता है?"
उसकी हर बात निखिल और पूजा के दिल में उतरती जा रही थी।
कुछ देर बाद आरव ने अपनी स्कूल डायरी निकाली।
उसके बीच में एक कागज़ रखा था।
उसने उसे खोला।
वह एक निबंध था।
विषय लिखा था—
"मेरा परिवार।"
आरव ने लिखना शुरू किया था—
"मेरे परिवार में मेरी माँ, मेरे पापा और मैं हूँ..."
बस इतना ही लिखा था।
उसके बाद पूरा पन्ना खाली था।
नीचे लाल पेन से टीचर ने लिखा था—
"बेटा, निबंध अधूरा क्यों छोड़ दिया?"
उसके नीचे आरव का छोटा-सा जवाब था—
"क्योंकि मेरा परिवार भी अधूरा है, मैडम।"
यह पढ़ते ही निखिल की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने डायरी सीने से लगा ली।
उसी समय उनका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर नाम चमका—
"स्कूल प्रिंसिपल।"
उन्होंने कॉल उठाई।
"नमस्ते, सर।"
उधर से गंभीर आवाज़ आई।
"मिस्टर निखिल, क्या आप और आरव की मम्मी कल सुबह स्कूल आ सकते हैं?"
निखिल घबरा गए।
"सब ठीक तो है?"
प्रिंसिपल कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
"आरव ने आज जो निबंध लिखा है..."
"...उसे पढ़ने के बाद मुझे लगा कि आप दोनों से बात करना बहुत ज़रूरी है।"
कॉल कट गई।
कमरे में फिर खामोशी छा गई।
निखिल ने धीरे से पूजा की तरफ देखा।
"क्या तुम चलोगी?"
पूजा ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
शायद कई महीनों बाद दोनों किसी एक वजह से साथ जाने वाले थे।
और वह वजह...
उनका बेटा था।
उधर अपने कमरे में बैठा आरव यह सब नहीं जानता था।
वह अपनी डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिख रहा था—
"शायद बड़े लोग लड़ाई जीत जाते हैं... लेकिन उनका बच्चा हमेशा हार जाता है।"
उसने डायरी बंद की।
आँखें बंद कीं।
और पहली बार उसके मन में एक डर पैदा हुआ...
**अगर एक दिन माँ और पापा दोनों अपनी-अपनी नई ज़िंदगी में आगे बढ़ गए...
तो क्या मेरी जगह किसी और बच्चे को मिल जाएगी?**
यही सवाल उसके दिल में तूफ़ान बनकर उठ रहा था...
"अगर एक दिन माँ और पापा दोनों अपनी-अपनी नई ज़िंदगी में आगे बढ़ गए... तो क्या मेरी जगह किसी और बच्चे को मिल जाएगी?"
यह सवाल आरव के मन में काँटे की तरह चुभ रहा था।
उस रात उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया।
पूजा बार-बार उसे बुलाती रहीं।
"बेटा... दो कौर और खा ले।"
लेकिन आरव ने सिर हिला दिया।
"भूख नहीं है, माँ।"
वह अपने कमरे में चला गया।
पूजा उसके पीछे गईं।
दरवाज़ा आधा खुला था।
आरव अलमारी के सामने बैठा था।
उसने एक पुराना फोटो एलबम खोल रखा था।
हर तस्वीर में एक ही बात थी...
तीनों साथ थे।
कहीं पापा उसे कंधे पर बैठाए हँस रहे थे।
कहीं माँ उसका हाथ पकड़कर पार्क में दौड़ रही थीं।
एक तस्वीर में तीनों ने मिलकर केक काटा था।
आरव ने तस्वीर पर उँगली फेरते हुए धीरे से कहा,
"माँ... क्या इन लोगों को तुम जानती हो?"
पूजा ने तस्वीर देखी।
आँसू अपने आप बह निकले।
"हाँ बेटा..."
"ये... हम हैं।"
आरव ने मासूमियत से पूछा,
"तो ये लोग कहाँ चले गए?"
पूजा के पास कोई जवाब नहीं था।
आरव ने तस्वीर सीने से लगा ली।
"मुझे इनकी बहुत याद आती है।"
उस रात पूजा एक पल भी सो नहीं सकीं।
उधर निखिल भी अपने घर में बेचैन थे।
बार-बार आरव की वही बात उनके कानों में गूँज रही थी—
"मैं हर हफ्ते अपना दिल बाँटते-बाँटते थक गया हूँ।"
उन्होंने अलमारी खोली।
एक पुराने डिब्बे से शादी का एलबम निकाला।
पहले पन्ने पर उनकी और पूजा की मुस्कुराती तस्वीर थी।
उन्होंने तस्वीर को देर तक देखा।
फिर धीरे से बोले,
"अगर उस समय किसी ने बताया होता कि हमारी लड़ाई का सबसे बड़ा दर्द हमारे बेटे को मिलेगा..."
"...तो शायद हम कभी इस मोड़ तक नहीं पहुँचते।"
अगले दिन दोनों स्कूल पहुँचे।
पहली बार कई महीनों बाद वे एक ही जगह साथ बैठे थे।
दोनों के बीच अब भी दूरी थी।
लेकिन पहले जैसी कठोरता नहीं थी।
प्रिंसिपल सर कमरे में आए।
उन्होंने दोनों का अभिवादन किया और बिना किसी भूमिका के एक फाइल उनके सामने रख दी।
"यह आरव की स्कूल रिपोर्ट नहीं है।"
"यह उसके मन की रिपोर्ट है।"
दोनों ने हैरानी से फाइल खोली।
उसमें आरव की ड्रॉइंग थीं।
पहली तस्वीर...
एक घर था।
लेकिन बीच से टूटा हुआ।
एक तरफ माँ खड़ी थीं।
दूसरी तरफ पापा।
और बीच में एक छोटा बच्चा दोनों तरफ हाथ बढ़ाए रो रहा था।
दूसरी तस्वीर...
एक पुल था।
पुल के बीच में दरार थी।
नीचे गहरा पानी।
और पुल पर अकेला चलता एक बच्चा।
तीसरी तस्वीर देखकर पूजा चीख पड़ी।
उसमें आरव ने खुद को दो हिस्सों में बनाया था।
एक हिस्से पर लिखा था—
"मम्मी का बेटा।"
दूसरे हिस्से पर लिखा था—
"पापा का बेटा।"
बीच में बड़े अक्षरों में लिखा था—
"मैं कहाँ हूँ?"
निखिल की आँखों से आँसू टपकने लगे।
प्रिंसिपल सर शांत स्वर में बोले,
"मैं पच्चीस साल से बच्चों के बीच हूँ।"
"मार्कशीट में कम नंबर आने से बच्चे इतने नहीं टूटते..."
"...जितना घर टूटने से टूट जाते हैं।"
उन्होंने एक और कागज़ आगे बढ़ाया।
"यह कल की काउंसलिंग का नोट है।"
उसमें लिखा था—
'आरव को हमेशा डर रहता है कि कहीं उसे भी कोई छोड़ न दे।'
'वह किसी से ज़्यादा जुड़ने से डरता है।'
'उसे लगता है कि जो लोग बहुत प्यार करते हैं, वही एक दिन सबसे पहले छोड़कर चले जाते हैं।'
पूजा अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपाकर रोने लगी।
निखिल कुर्सी पर बैठे-बैठे काँप रहे थे।
प्रिंसिपल ने धीमे स्वर में कहा,
"मैं आप दोनों से एक पति-पत्नी की तरह बात नहीं कर रहा।"
"मैं आप दोनों से सिर्फ़ एक माँ और एक पिता की तरह बात कर रहा हूँ।"
"अगर आप साथ नहीं रह सकते..."
"...तो मत रहिए।"
"लेकिन अपने बच्चे को यह एहसास मत होने दीजिए कि उसे हर बार किसी एक को चुनना पड़ेगा।"
दोनों चुप रहे।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
तभी बाहर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।
खिड़की से देखा तो आरव मैदान में अकेला बेंच पर बैठा था।
बाकी बच्चे अपने माता-पिता के साथ खेल रहे थे।
वह बस उन्हें देख रहा था।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी...
लेकिन उसकी आँखें खाली थीं।
निखिल अचानक उठ खड़े हुए।
उन्होंने पूजा की तरफ देखा।
फिर धीमी आवाज़ में कहा,
"चलो..."
"आज पहली बार अपने बेटे के पास साथ चलते हैं।"
पूजा ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
दोनों कमरे से बाहर निकले।
उधर बेंच पर बैठा आरव अभी भी यही सोच रहा था—
"क्या कभी ऐसा दिन आएगा... जब मुझे किसी को खोने का डर नहीं रहेगा?"
उसे नहीं पता था...
अगले कुछ मिनट उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी याद बनने वाले थे।
आरव बेंच पर चुपचाप बैठा सामने खेलते बच्चों को देख रहा था।
किसी बच्चे को उसके पापा झूला झुला रहे थे।
कहीं एक माँ अपने बेटे के जूते के फीते बाँध रही थी।
कोई पूरा परिवार मिलकर हँस रहा था।
आरव के होंठों पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन अगले ही पल गायब हो गई।
उसने मन ही मन कहा,
"शायद मैं भी कभी ऐसा ही हँसता था..."
उसी समय किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
उसने पलटकर देखा।
सामने माँ और पापा दोनों खड़े थे।
एक साथ।
आरव ने अपनी आँखें मल लीं।
उसे लगा शायद वह सपना देख रहा है।
"माँ...?"
"पापा...?"
दोनों उसके पास बैठ गए।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर निखिल ने धीरे से कहा,
"बेटा... क्या तुम हमें माफ़ कर पाओगे?"
आरव ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
"माफ़... किस बात के लिए?"
पूजा की आवाज़ काँप गई।
"उस दर्द के लिए... जो हमने तुझे दिया।"
आरव ने तुरंत सिर हिला दिया।
"मैं आप दोनों से कभी नाराज़ नहीं था।"
"मैं तो बस..."
"...अकेला पड़ गया था।"
इतना सुनते ही पूजा खुद को रोक नहीं सकीं।
उन्होंने आरव को सीने से लगा लिया।
निखिल भी दोनों के पास बैठ गए।
कई महीनों बाद पहली बार तीनों एक-दूसरे के इतने करीब थे।
उसी समय स्कूल की एक छोटी बच्ची अपनी माँ का हाथ पकड़कर वहाँ आई।
उसने मासूमियत से पूछा,
"आंटी... ये आपके पति हैं?"
पूजा कुछ बोल नहीं पाईं।
निखिल भी चुप रहे।
लेकिन उससे पहले ही आरव मुस्कुराकर बोला,
"ये मेरे पापा हैं।"
फिर उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"और ये मेरी माँ हैं।"
"बस... अभी ये दोनों दोस्त बनने की कोशिश कर रहे हैं।"
उस मासूम जवाब ने वहाँ खड़े हर शिक्षक की आँखें नम कर दीं।
प्रिंसिपल दूर से यह सब देख रहे थे।
उन्होंने मन ही मन सोचा,
"कई बार बच्चों की समझ, बड़ों की समझ से कहीं बड़ी होती है।"
स्कूल से लौटते समय पहली बार ऐसा हुआ कि आरव कार की पिछली सीट पर अकेला नहीं बैठा।
पूजा एक तरफ थीं।
निखिल दूसरी तरफ।
आरव बीच में बैठा था।
उसने दोनों के हाथ पकड़ लिए।
पूरे रास्ते उसने हाथ नहीं छोड़ा।
उसे डर था...
कहीं यह पल भी छूट न जाए।
घर पहुँचकर निखिल जाने लगे।
तभी आरव दौड़कर अंदर गया।
कुछ सेकंड बाद वह एक पुराना डिब्बा लेकर आया।
"पापा... यह आपके लिए।"
निखिल ने डिब्बा खोला।
अंदर एक छोटी-सी नीली कार थी।
वही खिलौना...
जो उन्होंने आरव के तीसरे जन्मदिन पर दिया था।
"तुमने इसे संभालकर रखा?"
निखिल ने भर्राई आवाज़ में पूछा।
आरव मुस्कुराया।
"हाँ।"
"क्योंकि यह आपने और माँ ने मिलकर खरीदी थी।"
"जब भी इसे देखता हूँ..."
"...लगता है कि आप दोनों अभी भी कहीं न कहीं साथ हो।"
निखिल की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने खिलौने की कार सीने से लगा ली।
उस शाम के बाद धीरे-धीरे बहुत कुछ बदलने लगा।
निखिल अब हर बार दरवाज़े के बाहर खड़े नहीं रहते थे।
वह अंदर आकर पाँच-दस मिनट बैठने लगे।
पूजा भी अब औपचारिक बातें करने लगीं।
"ऑफिस कैसा चल रहा है?"
"तुम्हारी तबीयत ठीक है?"
छोटी-छोटी बातें...
लेकिन आरव के लिए वही सबसे बड़ी खुशियाँ थीं।
एक दिन आरव ने अपनी डायरी में लिखा—
"आज पहली बार मुझे लगा कि शायद टूटे हुए रिश्ते फिर से शादी नहीं करते... लेकिन इंसानियत से मिलना ज़रूर सीख जाते हैं।"
दिन बीतते गए।
आरव पहले से थोड़ा खुश रहने लगा।
उसकी पढ़ाई भी सुधरने लगी।
टीचर ने भी ध्यान दिया कि अब वह क्लास में पहले की तरह चुप नहीं रहता।
लेकिन किस्मत शायद अभी उसकी परीक्षा पूरी नहीं करना चाहती थी।
एक रविवार निखिल आरव को पार्क घुमाने ले गए।
दोनों आइसक्रीम खा रहे थे कि तभी एक छोटी-सी लड़की दौड़ते हुए आई।
वह सीधे निखिल से लिपट गई।
"पापा... आपने कहा था जल्दी आओगे।"
आरव के हाथ से आइसक्रीम नीचे गिर गई।
उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
उसने काँपती आवाज़ में पूछा—
"पापा... यह... आपको 'पापा' क्यों कह रही है?"
निखिल एक पल के लिए बिल्कुल जड़ हो गए।
उधर कुछ दूरी पर खड़ी एक महिला तेज़ी से उनकी तरफ बढ़ रही थी...
और आरव के मन में वही पुराना डर फिर से ज़िंदा हो चुका था—
"क्या अब सचमुच मेरी जगह किसी और ने ले ली है?"
मैं कहानी को यथार्थवादी बनाए रखना चाहता हूँ। पिछले भाग के अंत में जो नई बच्ची आई, उसे आगे बढ़ाने से कहानी अचानक "दूसरी शादी" वाले मोड़ पर चली जाएगी, जबकि अब तक कहानी का केंद्र आरव की भावनाएँ और सह-अभिभावक (co-parenting) था। इसलिए अगले भाग में उसी भावनात्मक धारा को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ाते हैं।
आरव के हाथ से आइसक्रीम ज़मीन पर गिर चुकी थी।
उसकी नज़र उस छोटी-सी बच्ची पर टिकी थी, जिसने निखिल को "पापा" कहा था।
उसके कानों में जैसे कोई आवाज़ ही नहीं पड़ रही थी।
बस एक ही डर बार-बार उसके दिल में उठ रहा था।
"क्या अब मेरे पापा सिर्फ़ मेरे नहीं रहे?"
इतने में वह महिला भी पास आ गई।
उन्होंने जल्दी से बच्ची का हाथ पकड़ा और मुस्कुराते हुए बोलीं,
"अरे, सिया! कितनी बार कहा है, किसी अंकल को पापा मत कहा करो।"
बच्ची मासूमियत से बोली,
"लेकिन मम्मी, ये तो बिल्कुल पापा जैसे दिखते हैं।"
महिला ने शर्मिंदा होकर निखिल से कहा,
"मुझे माफ़ कीजिए। इसके पापा का देहांत दो साल पहले हो गया था। यह अक्सर किसी भी ऐसे व्यक्ति को देखकर, जो इसे प्यार से मुस्कुरा दे, 'पापा' कह देती है।"
निखिल ने बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
"कोई बात नहीं।"
महिला बच्ची को लेकर चली गई।
लेकिन आरव वहीं खड़ा रहा।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
निखिल ने उसे सीने से लगा लिया।
"क्या हुआ, बेटा?"
आरव सिसकते हुए बोला,
"मैं... मैं डर गया था।"
"मुझे लगा... अब आपकी ज़िंदगी में कोई और बच्चा आ गया है।"
निखिल का दिल जैसे टूट गया।
उन्होंने आरव का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया।
"मेरी तरफ देखो।"
आरव ने आँसू भरी आँखों से पापा को देखा।
"दुनिया में लाखों बच्चे होंगे..."
"लेकिन मेरा बेटा सिर्फ़ एक है।"
"और उसका नाम आरव है।"
"कोई भी... कभी भी... उसकी जगह नहीं ले सकता।"
आरव ने पहली बार राहत की साँस ली।
वह पापा से लिपट गया।
"सच?"
निखिल मुस्कुराए।
"बिल्कुल सच।"
"बच्चों की जगह कोई नहीं ले सकता।"
"और माँ-बाप की जगह भी कोई नहीं ले सकता।"
उस दिन लौटते समय आरव पहले से थोड़ा शांत था।
लेकिन उसके मन में एक और सवाल जन्म ले चुका था।
घर पहुँचकर उसने पूजा से पूछा,
"माँ..."
"अगर मैं बड़ा होकर कहीं दूर चला गया..."
"...तो क्या तुम दोनों मुझे भूल जाओगे?"
पूजा ने तुरंत उसे गले लगा लिया।
"माँ अपने बच्चे को कभी नहीं भूलती।"
"चाहे वह कितनी भी दूर चला जाए।"
आरव ने फिर पूछा,
"और पापा?"
उसी समय दरवाज़े पर खड़े निखिल ने उसकी बात सुन ली।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"पिता अपने बेटे को भूल जाए..."
"यह हो ही नहीं सकता।"
आरव ने दोनों को देखा।
फिर धीरे से बोला,
"तो फिर एक वादा करो।"
दोनों ने एक साथ पूछा,
"कैसा वादा?"
"अगर कभी मैं किसी बात से दुखी हो जाऊँ..."
"...तो आप दोनों मेरे सामने कभी एक-दूसरे की बुराई नहीं करोगे।"
"मैं आप दोनों से बराबर प्यार करता हूँ।"
"जब आप एक-दूसरे को गलत कहते हो..."
"...तो ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे ही दिल को गलत कह रहा हो।"
पूजा और निखिल की आँखें झुक गईं।
उन्हें याद आया कि कितनी बार उन्होंने गुस्से में एक-दूसरे के बारे में ऐसी बातें कही थीं, जिन्हें आरव चुपचाप सुनता रहा था।
निखिल ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
पूजा ने भी अपना हाथ उस पर रख दिया।
आरव ने दोनों के हाथों पर अपना छोटा-सा हाथ रख दिया।
तीनों ने बिना शब्दों के एक वादा किया—
अब उनका रिश्ता चाहे जैसा भी हो, लेकिन आरव के सामने वे हमेशा उसके माँ और पापा बनकर रहेंगे, एक-दूसरे के दुश्मन बनकर नहीं।
उसी पल आरव के चेहरे पर कई महीनों बाद एक सच्ची मुस्कान लौट आई।
लेकिन उसे नहीं पता था...
अगले ही सप्ताह स्कूल से आने वाला एक फ़ोन उसकी ज़िंदगी को फिर एक नए मोड़ पर ले जाने वाला था।
स्कूल से आया वह फ़ोन सुनते ही पूजा और निखिल दोनों घबरा गए।
क्लास टीचर ने बस इतना कहा था,
"घबराइए मत, आरव ठीक है... लेकिन आज उसने ऐसी बात कही है, जिसे सुनकर हमें लगा कि आप दोनों का तुरंत आना ज़रूरी है।"
दोनों बिना देर किए स्कूल पहुँचे।
कई महीनों बाद वे फिर एक साथ प्रिंसिपल के कमरे के बाहर खड़े थे।
दोनों की नज़रें एक-दूसरे से नहीं मिलीं।
दोनों की नज़रें सिर्फ़ उस दरवाज़े पर थीं, जिसके पीछे उनका बेटा बैठा था।
अंदर बुलाए जाने पर उन्होंने देखा कि आरव कुर्सी पर शांत बैठा है।
उसके सामने उसकी डायरी खुली हुई थी।
प्रिंसिपल ने डायरी उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा,
"आज बच्चों से कहा गया था कि वे अपने भविष्य के बारे में लिखें। बाकी बच्चों ने डॉक्टर, इंजीनियर, खिलाड़ी बनने की बातें लिखीं। लेकिन आरव ने जो लिखा... उसे पढ़कर हम सब चुप हो गए।"
निखिल ने काँपते हाथों से डायरी उठाई।
उसमें लिखा था—
"अगर मैं बड़ा होकर बहुत अमीर बन गया, तो सबसे पहले एक ऐसा घर बनाऊँगा जिसमें दो दरवाज़े नहीं होंगे। क्योंकि दो दरवाज़ों वाले घरों से बच्चे बार-बार बाहर जाते हैं। मैं ऐसा घर बनाऊँगा जहाँ कोई बच्चा हर शुक्रवार अपना बैग लेकर एक घर से दूसरे घर न जाए।"
नीचे एक और पंक्ति थी—
"अगर कभी मेरे बच्चे हुए, तो मैं उनसे कभी यह नहीं कहूँगा कि मम्मी या पापा में से किसी एक को चुनो। क्योंकि बच्चा किसी एक का नहीं होता, दोनों का होता है।"
पूजा अब रो नहीं रही थीं।
उनकी आँखों से आँसू चुपचाप बह रहे थे।
निखिल ने डायरी बंद कर दी।
उन्हें लगा जैसे उनका बेटा उनसे बड़ा हो गया है।
प्रिंसिपल ने शांत स्वर में कहा,
"आप दोनों ने अपने रिश्ते को बचाने की बहुत कोशिश की होगी। शायद सफल नहीं हुए। लेकिन अब अपने बच्चे का बचपन बचाइए। अभी भी समय है।"
कमरे से बाहर निकलते समय पहली बार निखिल ने खुद आगे बढ़कर कहा,
"पूजा... क्या हम थोड़ी देर बात कर सकते हैं?"
पूजा ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
तीनों स्कूल के बगीचे में जाकर बैठ गए।
कुछ देर तक हवा चलती रही।
कोई कुछ नहीं बोला।
फिर निखिल ने धीमी आवाज़ में कहा,
"मैं आज भी यह नहीं कह सकता कि हम फिर से पति-पत्नी बन पाएँगे। लेकिन मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि मैं अब अपने बेटे को कभी अकेला महसूस नहीं होने दूँगा।"
पूजा ने उनकी बात पूरी होने दी।
फिर बोलीं,
"मैं भी अब अपने गुस्से को आरव की मुस्कान से बड़ा नहीं बनने दूँगी।"
आरव दोनों की बातें सुन रहा था।
उसने धीरे से पूछा,
"तो... अब क्या होगा?"
निखिल मुस्कुराए।
"अब जो भी होगा, हम मिलकर तय करेंगे।"
"तेरे स्कूल का हर कार्यक्रम हम दोनों साथ आएँगे।"
"तेरा जन्मदिन एक साथ मनाएँगे।"
"तुझे कभी यह नहीं लगेगा कि तुझे किसी एक को चुनना है।"
पूजा ने आगे कहा,
"और अगर कभी हम दोनों में किसी बात पर मतभेद हुआ, तो वह हमारे बीच रहेगा। तेरे सामने नहीं।"
आरव ने पहली बार चैन की साँस ली।
उसने दोनों का हाथ पकड़ लिया।
"बस मुझे यही चाहिए था।"
उस दिन घर लौटते समय पहली बार ऐसा नहीं लगा कि कोई हार गया है।
ऐसा लगा...
तीनों ने मिलकर एक नई शुरुआत जीत ली है।
दिन बीतने लगे।
अब हर शुक्रवार आरव अपना बैग तो पैक करता था, लेकिन उसके चेहरे पर पहले जैसी उदासी नहीं होती थी।
माँ खुद उसके कपड़े सहेजतीं और कहतीं,
"पापा को कहना, दवाई समय पर लें।"
और जब निखिल उसे वापस छोड़ने आते, तो कहते,
"तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए जो खीर बनाई है, उसका स्वाद दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा।"
धीरे-धीरे औपचारिक बातें मुस्कान में बदल गईं।
जन्मदिन पर तीनों एक साथ केक काटते।
पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में दोनों एक ही बेंच पर बैठते।
आरव मंच पर पुरस्कार लेने जाता, तो सबसे ज़ोर से ताली उसके माँ और पापा ही बजाते।
एक दिन टीचर ने बच्चों से पूछा,
"घर क्या होता है?"
किसी ने कहा— जहाँ परिवार रहता है।
किसी ने कहा— जहाँ प्यार मिलता है।
जब आरव की बारी आई, तो वह मुस्कुराया और बोला—
"घर वह जगह नहीं जहाँ सब साथ रहते हैं। घर वह जगह है जहाँ बच्चे को कभी यह महसूस न हो कि उसे किसी एक का होना पड़ेगा।"
पूरी कक्षा तालियों से गूँज उठी।
टीचर की आँखें भी नम थीं।
कई साल बीत गए।
आरव बड़ा हो गया।
एक दिन उसने अपनी पुरानी डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा वही सवाल अब भी मौजूद था—
"माँ, क्या किसी बच्चे का दिल भी दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है... जैसे आपने और पापा ने अपना घर बाँट लिया?"
उसने उस सवाल के नीचे एक नया जवाब लिखा—
"हाँ... दिल टूट सकता है। लेकिन अगर माँ और पापा अपने अहंकार से ऊपर उठ जाएँ, तो वही दिल फिर से मुस्कुराना भी सीख सकता है।"
उसने डायरी बंद की।
सामने ड्रॉइंग रूम में माँ और पापा बैठे थे।
अब भी पति-पत्नी नहीं थे।
लेकिन अच्छे दोस्त थे।
और सबसे बढ़कर...
वे दोनों मिलकर एक अच्छे माँ-बाप थे।
आरव ने उन्हें देखा और मन ही मन कहा—
"मुझे अब दो घरों का दुख नहीं है... क्योंकि अब दोनों घरों में मेरा पूरा बचपन रहता है।"
संदेश:
रिश्ते हमेशा नहीं बचते।
लेकिन बच्चों का बचपन बचाया जा सकता है।
अगर दो बड़े लोग अपने गुस्से से थोड़ा ऊपर उठ जाएँ, तो एक छोटा-सा दिल पूरी ज़िंदगी टूटने से बच सकता है।
कभी भी अपने मतभेदों की सज़ा अपने बच्चों को मत दीजिए।
वे किसी एक के नहीं होते...
वे दोनों के होते हैं।

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