मायके का सफर

Emotional Indian family scene showing a daughter-in-law comforting an elderly mother in a traditional home with warm lighting, symbolizing love, respect, forgiveness, and family values.


"भैया, इस बार मुझे लेने मत आना... क्योंकि मैं जानना चाहती हूँ कि मेरी कमी किसी को महसूस भी होती है या नहीं।"


इतना कहकर वैदेही ने फोन काट दिया।


मोबाइल की स्क्रीन बुझ गई, लेकिन आदित्य देर तक उसी स्क्रीन को देखता रहा। उसे समझ ही नहीं आया कि उसकी बड़ी बहन ने ऐसा क्यों कहा। पिछले आठ वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि रक्षाबंधन से पहले वैदेही ने उसे अपने पास आने से मना किया हो।


वह हर साल पूरे उत्साह से बहन को लेने जाता था। रास्ते भर दोनों बचपन की बातें करते, पुराने गाने सुनते और वही ढाबे पर रुककर कुल्हड़ वाली चाय पीते। लेकिन इस बार सब कुछ बदल गया था।


"क्या हुआ?" पत्नी निहारिका ने कमरे में आते हुए पूछा।


आदित्य ने गहरी साँस ली।


"वैदेही ने कहा है कि इस बार उसे लेने मत जाऊँ।"


निहारिका ने सहज भाव से कहा, "तो मत जाइए। दीदी अब बच्ची तो हैं नहीं। अपनी कार है, ड्राइविंग करती हैं, बड़े शहर में रहती हैं। आजकल कौन किसी को लेने जाता है?"


आदित्य ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसे लगा जैसे किसी ने उसके बचपन का एक हिस्सा उससे छीन लिया हो।


उधर वैदेही भी फोन रखने के बाद मुस्कुरा नहीं पाई।


वह बालकनी में खड़ी दूर तक फैली सड़क को देख रही थी।


उसके पति करण ने पूछा, "क्या हुआ? भाई से बात हो गई?"


वैदेही ने धीमे स्वर में जवाब दिया,

"हाँ, बात हो गई।"


करण ने उत्सुकता से फिर पूछा,

"तो... वो तुम्हें लेने आ रहे हैं?"


वैदेही कुछ पल चुप रही। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में छिपी उदासी साफ़ दिखाई दे रही थी।


उसने धीरे से सिर हिलाया।


"नहीं... मैंने ही उन्हें मना कर दिया।"


करण एकदम चौंक गया।


"तुमने मना कर दिया? लेकिन हर साल तो तुम उनके आने का सबसे ज़्यादा इंतज़ार करती हो। इस बार ऐसा क्यों?"


वैदेही ने खिड़की के बाहर देखते हुए धीमे स्वर में कहा,


"कभी-कभी इंसान किसी को रोककर नहीं, बल्कि चुप रहकर यह जानना चाहता है कि उसकी कमी किसी को सच में महसूस होती है या नहीं।"


करण उसकी बात पूरी तरह नहीं समझ पाया, लेकिन उसने और कुछ नहीं पूछा।



उधर आदित्य की माँ, सावित्री देवी, पूजा का सामान निकाल रही थीं।


उन्होंने बेटे से पूछा—


"बेटा, टिकट करा ली?"


आदित्य झिझक गया।


"माँ... इस बार वैदेही खुद आएगी।"


सावित्री देवी के हाथ रुक गए।


"क्या कहा? वैदेही खुद आएगी?"


आदित्य ने धीमे से सिर हिलाया।

"हाँ माँ... उसने कहा कि इस बार मैं उसे लेने न आऊँ।"


सावित्री देवी कुछ पल तक बेटे का चेहरा देखती रहीं। फिर धीमे स्वर में बोलीं—


"और तूने उसकी बात मान भी ली? उसे लेने नहीं जाएगा?"


आदित्य ने फीकी-सी मुस्कान के साथ कहा—

"वह बार-बार मना कर रही थी माँ। इसलिए मैंने भी ज़ोर नहीं दिया।"


माँ ने धीमे से कहा—


"बेटियाँ बहुत कम मना करती हैं बेटा... ज़्यादातर तो अपने मन की बात छिपाती हैं।"


आदित्य ने हैरानी से माँ की ओर देखा।


"मतलब... मैं समझा नहीं, माँ?"


सावित्री देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

"बेटा, हर 'मत आना' का मतलब सचमुच 'मत आना' नहीं होता। कभी-कभी उसके पीछे एक अनकही उम्मीद छिपी होती है कि 'काश... तुम फिर भी आ जाओ।' रिश्तों में कुछ बातें शब्दों से नहीं, दिल से समझी जाती हैं।"


निहारिका ने बीच में कहा—


"माँजी, अब ज़माना बदल गया है। हर बात को भावना से नहीं जोड़ना चाहिए।"


सावित्री देवी मुस्कुरा दीं।


"ज़माना बदल गया होगा बेटी... लेकिन बेटी का मायका नहीं बदलता।"


घर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।



रक्षाबंधन करीब था।


वैदेही ने जानबूझकर किसी को अपने निकलने का समय नहीं बताया।


उसने सोचा—


"अगर किसी को सच में मेरी प्रतीक्षा होगी... तो वह खुद पूछेगा।"


लेकिन पूरा दिन बीत गया।


कोई फोन नहीं आया।


उसने खुद ही कार की चाबी उठाई।


करण उसके पास आया।


"मैं छोड़ दूँ?"


वैदेही मुस्कुरा दी।


"नहीं... आदत डालनी चाहिए अकेले चलने की।"


करण ने उसकी आँखों में झाँका।


उसे साफ दिखाई दे रहा था कि यह मुस्कान अधूरी थी।



हाईवे पर कार तेज़ी से दौड़ रही थी।


रेडियो पर पुराने गीत बज रहे थे।


लेकिन वैदेही ने कुछ ही देर बाद रेडियो बंद कर दिया।


सन्नाटा उसे ज़्यादा अच्छा लग रहा था।


करीब सौ किलोमीटर आगे एक ढाबे के पास उसने कार रोकी।


वहीं सामने एक पुरानी बस रुकी।


बस जैसे ही रुकी, एक लड़की अपना बैग लेकर नीचे उतरी। सफर की थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। तभी भीड़ को चीरता हुआ उसका भाई तेज़ कदमों से उसके पास पहुँचा।


"अरे, बैग मुझे दे," उसने मुस्कुराते हुए कहा और बिना जवाब का इंतज़ार किए उसके हाथ से बैग ले लिया।


लड़की ने हल्की-सी नाराज़गी जताते हुए कहा, "अरे रहने दे, मैं खुद उठा लूँगी।"


भाई हँस पड़ा। "जब तक मैं साथ हूँ, मेरी बहन कोई सामान नहीं उठाएगी।"


लड़की ने प्यार से उसके कंधे पर हल्की-सी चपत लगाई और दोनों हँसते हुए ढाबे की तरफ बढ़ गए।


वैदेही उन्हें देखती रह गई।


उसकी आँखों के सामने अचानक एक पुरानी याद तैर गई।


उसी ढाबे पर कभी आदित्य उसे जबरदस्ती जलेबी खिलाया करता था।


वह कहती—


"मुझे नहीं चाहिए।"


और आदित्य हँसकर कहता—


"मेरी बहन मायके जा रही है... आज डाइटिंग बंद।"


याद आते ही उसकी आँखें भर आईं।


उसने जल्दी से पानी पिया और फिर कार स्टार्ट कर दी।



मायके का दरवाज़ा खुला।


माँ दौड़कर बेटी से लिपट गईं।


आदित्य भी मुस्कुराया।


निहारिका ने आरती उतारी।


सब कुछ ठीक था...


फिर भी कुछ अधूरा था।


वैदेही ने महसूस किया कि इस बार उसके आने की खुशी तो थी, लेकिन उसका इंतज़ार नहीं था।


उसे लेने कोई नहीं आया था।


उसके आने से पहले कोई बेचैन नहीं हुआ था।


और यही बात उसे अंदर ही अंदर चुभ रही थी।


रात के खाने पर सब साथ बैठे।


हँसी-मज़ाक भी हुआ।


लेकिन आदित्य बार-बार अपनी बहन का चेहरा देख रहा था।


वह मुस्कुरा रही थी...


पर उसकी आँखें मुस्कुरा नहीं रही थीं।



खाना खत्म होने के बाद वैदेही अपने पुराने कमरे में चली गई।


कमरे की अलमारी खोलते ही उसे बचपन की एक छोटी-सी गुल्लक दिखाई दी।


उसने उसे हाथ में लिया।


अंदर से कुछ सिक्कों की आवाज़ आई।


गुल्लक के नीचे एक पुरानी चिट्ठी रखी थी।


उस पर छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा था—


"दीदी, जब तू शादी करके चली जाएगी, तब मैं हर राखी पर तुझे खुद लेने आऊँगा। — तेरा छोटा भाई आदित्य"


चिट्ठी पढ़ते ही वैदेही की आँखों से आँसू बह निकले।


उसी समय दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।


निहारिका खड़ी थी।


उसने पहली बार अपनी ननद को इस तरह टूटते हुए देखा।


वह धीरे से अंदर आई और बोली—


"दीदी... क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?"


वैदेही ने जल्दी से आँसू पोंछ लिए।


"हाँ... आओ।"


निहारिका की नज़र उस पुरानी चिट्ठी पर पड़ चुकी थी।


उसे समझ नहीं आया कि एक छोटे-से कागज़ ने इतनी बड़ी पीड़ा कैसे जगा दी।


लेकिन उसे इतना ज़रूर महसूस हुआ...


कि शायद उसने रिश्तों को समझने में कहीं बहुत बड़ी गलती कर दी है।



निहारिका धीरे-धीरे वैदेही के पास आकर बैठ गई।


कुछ पल तक कमरे में पूरी खामोशी छाई रही। बाहर आँगन में माँ और आदित्य की हँसी की आवाज़ आ रही थी, लेकिन कमरे के भीतर जैसे समय ठहर गया था।


निहारिका ने धीरे से पूछा, "दीदी... क्या मैं कुछ पूछ सकती हूँ?"


वैदेही ने मुस्कुराने की कोशिश की।


"पूछो।"


"क्या सिर्फ इसलिए आपको इतना बुरा लगा कि भैया आपको लेने नहीं आए?"


वैदेही ने सिर हिलाया।


"नहीं निहारिका... बात सिर्फ इतनी नहीं है। अगर सिर्फ गाड़ी चलाकर आने की बात होती, तो मुझे कभी दुख नहीं होता। मैं रोज़ सैकड़ों किलोमीटर अकेले सफर कर लेती हूँ। मुझे दुख इस बात का है कि अब रिश्तों में 'ज़रूरत' बची है, 'चाहत' नहीं।"


निहारिका चुपचाप सुनती रही।


वैदेही ने अलमारी से एक पुराना फोटो एलबम निकाला।


उसमें एक तस्वीर थी। छोटी-सी वैदेही, फटी हुई फ्रॉक पहने खड़ी थी और उसके बगल में दस साल का आदित्य, जिसके हाथ में स्कूल का बैग था।


"निहारिका, यह तस्वीर देख रही हो?"


निहारिका तस्वीर को ध्यान से देखते हुए बोली, "हाँ दीदी... इसमें आप और आदित्य दोनों बहुत छोटे लग रहे हैं।"


"उस दिन मेरे पास चप्पल नहीं थी। पूरे गाँव के मेले में मैं नंगे पैर घूम रही थी। आदित्य ने अपनी नई चप्पल मुझे पहना दी और खुद तपती सड़क पर नंगे पैर चलता रहा।"


निहारिका हैरानी से उसकी तरफ देखने लगी।


"उसने घर आकर माँ से झूठ बोला था कि चप्पल कहीं खो गई। बाद में पता चला कि उसके पैरों में छाले पड़ गए थे।"


निहारिका की आँखें भर आईं।


वैदेही मुस्कुराई।


"तब हम गरीब थे, लेकिन रिश्ते बहुत अमीर थे।"


उसने एलबम का दूसरा पन्ना पलटा।


एक और तस्वीर थी।


रक्षाबंधन की।


आदित्य साइकिल पर बैठा था और पीछे छोटी-सी वैदेही।


"मेरी शादी के बाद पहला रक्षाबंधन था। बसें बंद थीं। भैया तीस किलोमीटर साइकिल चलाकर मुझे लेने आया था।"


निहारिका ने हैरानी से वैदेही की ओर देखा।

"क्या...? आदित्य सचमुच आपको साइकिल से लेने आए थे?"


"हाँ... सिर्फ इसलिए कि मैं मायके आने से मना न कर दूँ।"


निहारिका के हाथ काँप गए।


उसे याद आया...


कुछ दिन पहले उसी ने आदित्य से कहा था—


"दीदी खुद आ जाएँगी। इतना पेट्रोल क्यों खर्च करना?"


उसका सिर शर्म से झुक गया।



उधर आँगन में आदित्य माँ के साथ बैठा था।


सावित्री देवी ने बेटे को गौर से देखा।


"तू खुश नहीं है।"


आदित्य ने धीमी आवाज़ में कहा, "माँ... पता नहीं क्यों, लेकिन मन बार-बार कह रहा है कि मुझसे कोई बड़ी गलती हो गई है।"


सावित्री देवी ने बेटे की आँखों में देखा और शांत स्वर में बोलीं, "हाँ बेटा, गलती हुई है... लेकिन अभी भी उसे सुधारा जा सकता है।"


आदित्य ने हैरानी से पूछा, "पर माँ, मैंने तो वही किया जो मुझे सही और व्यावहारिक लगा। फिर गलती कहाँ हो गई?"


सावित्री देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और प्यार से समझाते हुए कहा, "बेटा, ज़िंदगी में हर सही फैसला रिश्तों के लिए सही हो, यह ज़रूरी नहीं होता। कुछ फैसले दिमाग को सही लगते हैं, लेकिन वही फैसले किसी अपने के दिल को चुपचाप दुख पहुँचा देते हैं। रिश्ते सिर्फ सुविधा से नहीं, एहसास और अपनापन से भी चलते हैं।"


आदित्य माँ की बात समझ नहीं पाया।


तभी माँ उठीं और भीतर से एक पुराना डिब्बा लेकर आईं।


उन्होंने उसे बेटे के हाथ में रख दिया।


"खोल।"


अंदर दर्जनों राखियाँ थीं।


हर साल की।


सबके साथ एक छोटी-सी पर्ची रखी थी।


पहली पर्ची पर लिखा था—


"भैया इस बार मुझे बस स्टैंड से लेने आए थे।"


दूसरी पर—


"भैया रास्ते भर मुझे गोलगप्पे खिलाते रहे।"


तीसरी पर—


"भैया ने कहा था कि शादी हो गई है, इसका मतलब यह नहीं कि तू पराई हो गई।"


आदित्य की आँखें भर आईं।


"माँ... ये सब क्या है?"


माँ बोलीं—


"तेरी बहन हर राखी के बाद अपनी याद लिखकर रखती थी।"


आदित्य के हाथ काँपने लगे।


वह समझ गया...


बहन के लिए सफर नहीं, साथ मायने रखता था।



रात गहरी हो चुकी थी।


सब सो गए।


लेकिन निहारिका की आँखों में नींद नहीं थी।


वह बार-बार वैदेही की बातें सोच रही थी।


उसे अपनी शादी का पहला साल याद आया।


जब वह पहली बार मायके गई थी, तब उसके पिता खुद उसे लेने आए थे।


वापसी में उसके भाई ने उसे छोड़ा था।


पूरे रास्ते वे दोनों हँसते रहे थे।


वह सफर आज भी उसकी सबसे प्यारी यादों में था।


उसने धीरे से खुद से कहा—


"अगर मुझे वह दिन आज भी याद है... तो फिर मैंने दीदी की भावना क्यों नहीं समझी?"


उसकी आँखों से आँसू बह निकले।



अगले दिन घर में राखी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।


वैदेही ने थाली सजाई।


आदित्य उसके सामने बैठा।


राखी बाँधते समय वैदेही मुस्कुरा रही थी।


लेकिन आदित्य पहली बार बहन की मुस्कान के पीछे छिपा दर्द पढ़ पा रहा था।


राखी बाँधने के बाद उसने जेब से लिफाफा निकाला।


वैदेही ने मुस्कुराकर कहा—


"इतने बड़े अधिकारी बन गए हो, फिर भी वही लिफाफा?"


आदित्य बोला—


"लिफाफा नहीं दीदी... इस बार माफ़ी है।"


वैदेही ने हैरानी से अपने भाई की ओर देखा।


"माफ़ी? किस बात की, भैया?" उसने धीमे स्वर में पूछा।


आदित्य ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसकी आवाज़ पश्चाताप से भरी हुई थी।


"माफ़ी इस बात की, दीदी... कि मैंने यह सोच लिया था कि अब तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं रही। मुझे लगा, तुम्हारे पास अपनी गाड़ी है, अच्छी नौकरी है, तुम हर काम खुद कर लेती हो... इसलिए तुम्हें लेने आना सिर्फ एक औपचारिकता है। लेकिन मैं यह भूल गया कि बहन को लेने जाना कोई एहसान या मजबूरी नहीं, बल्कि अपनेपन का सबसे खूबसूरत एहसास होता है।"


वैदेही की आँखें नम हो गईं। उसने मुस्कुराते हुए अपने भाई का हाथ थाम लिया और बोली—


"पगले... मुझे रास्ता तय करने के लिए तेरी ज़रूरत कभी नहीं थी। लेकिन मायके तक का सफर तेरे साथ तय करने की चाह हमेशा रहेगी। बहनें आत्मनिर्भर ज़रूर हो जाती हैं, पर भाई का साथ उन्हें आज भी उतना ही सुकून देता है, जितना बचपन में देता था।"


दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को देखते रहे।


माँ चुपचाप आँचल से आँखें पोंछ रही थीं।



राखी का त्योहार हँसी-खुशी बीत गया।


लेकिन निहारिका ने मन ही मन एक फैसला कर लिया था।


उसने किसी को कुछ नहीं बताया।


रात को जब सब सो गए, तब उसने चुपके से आदित्य के मोबाइल में अगले दिन की छुट्टी के लिए आवेदन भेज दिया।


ऑफिस से तुरंत मंजूरी भी आ गई।


फिर उसने वैदेही की कार की चाबी अपने पर्स में रख ली।


उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।


वह जानती थी...


अगली सुबह वैदेही को ऐसा उपहार मिलने वाला है, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होगी।


और शायद...


उसी सफर में एक टूटा हुआ रिश्ता फिर से पहले जैसा हो जाएगा।


राखी का त्योहार बीत चुका था। घर में धीरे-धीरे फिर वही सामान्य माहौल लौटने लगा। माँ रसोई में बचे हुए पकवान समेट रही थीं। आदित्य बरामदे में बैठा मोबाइल पर ऑफिस के कुछ ज़रूरी संदेश देख रहा था। वैदेही अपने कमरे में सामान पैक कर रही थी।


थोड़ी देर बाद वह अपना बैग लेकर बाहर आई। आदतन उसने सेंटर टेबल पर अपनी कार की चाबी ढूँढ़ी, लेकिन चाबी वहाँ नहीं थी।


"अरे... मेरी चाबी कहाँ गई?"


उसने इधर-उधर देखा।


"भैया, आपने देखी क्या?"


आदित्य ने सिर उठाया।


"नहीं तो।"


तभी पीछे से निहारिका मुस्कुराती हुई आई। उसने अपने पर्स से कार की चाबी निकाली और हथेली पर घुमाते हुए बोली,


"दीदी... जिसे ढूँढ़ रही हैं, वह मेरे पास है।"


वैदेही हैरान रह गई।


"अरे! तुमने मेरी चाबी क्यों रख ली?"


निहारिका धीरे-धीरे उसके पास आई।


"क्योंकि आज यह चाबी आपको नहीं मिलेगी।"


"मतलब?"


निहारिका ने बिना कुछ कहे वह चाबी आदित्य की हथेली पर रख दी।


"आज गाड़ी भैया चलाएँगे।"


पूरा घर कुछ पल के लिए शांत हो गया।


वैदेही ने मुस्कुराकर बात टालनी चाही।


"अरे पगली, इसकी क्या ज़रूरत है? मैं आराम से चली जाऊँगी।"


निहारिका की आँखें भर आईं।


"ज़रूरत रास्ते की नहीं है दीदी... ज़रूरत उस रिश्ते की है जिसे मैंने अपनी समझदारी दिखाने के चक्कर में कमज़ोर कर दिया।"


वैदेही कुछ बोल नहीं पाई।


निहारिका ने दोनों हाथ जोड़ दिए।


"दीदी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आत्मनिर्भर होने का मतलब गलत समझ लिया था। मुझे लगा था कि जो अपने हर काम खुद कर सकता है, उसे किसी अपने की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन आज समझ आया कि इंसान कितना भी मज़बूत और सफल क्यों न हो जाए, अपने लोगों के बीच उसे भी कुछ पल ऐसे चाहिए होते हैं, जहाँ वह सारी ज़िम्मेदारियाँ भूलकर सिर्फ़ एक बेटी, एक बहन या एक अपना बनकर जी सके।"


यह सुनते ही सावित्री देवी की आँखें भी भर आईं।


उन्होंने कहा,


"बेटी... गलती मान लेना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।"


निहारिका ने वैदेही को गले लगा लिया।


"अगली बार चाहे आप विदेश से ही क्यों न आ रही हों... भैया आपको लेने ज़रूर जाएँगे।"


आदित्य मुस्कुरा दिया।


"यह वादा रहा।"


वैदेही की आँखों से आँसू बह निकले।


उसने हल्के से कहा,


"इतनी-सी बात सुनने के लिए शायद मेरा दिल इतने दिनों से इंतज़ार कर रहा था।"



कुछ ही देर बाद कार घर के बाहर आकर रुकी।


इस बार ड्राइविंग सीट पर आदित्य था।


वैदेही पहली बार बिना स्टीयरिंग संभाले बगल वाली सीट पर बैठी।


कार आगे बढ़ी।


दोनों कुछ देर तक चुप रहे।


हाईवे पर पहुँचने के बाद आदित्य ने धीमे से पूछा,


"दीदी... एक बात पूछूँ?"


"पूछ।"


"तूने फोन पर ऐसा क्यों कहा था कि 'मुझे लेने मत आना'?"


वैदेही खिड़की से बाहर देखने लगी।


दूर तक फैले खेत पीछे छूट रहे थे।


उसने धीमी आवाज़ में कहा,


"क्योंकि मैं जानना चाहती थी कि मेरा भाई मेरी बात मानेगा... या मेरी ख़ामोशी समझेगा।"


आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।


कुछ देर बाद वैदेही खुद बोली,


"जानता है... शादी के बाद लड़की की ज़िंदगी बदल जाती है। वह हर घर में अपने लिए जगह बनाती रहती है। लेकिन मायका... वहाँ उसे कोई जगह नहीं बनानी पड़ती। वहाँ वह जैसी है, वैसी ही स्वीकार की जाती है।"


आदित्य ध्यान से सुन रहा था।


"जब भाई लेने आता है न... तो रास्ते भर बहन फिर से वही छोटी लड़की बन जाती है जिसे किसी बात की चिंता नहीं होती। उसे यह नहीं सोचना पड़ता कि रास्ता कौन देखेगा, गाड़ी कौन चलाएगा, पेट्रोल कितना लगेगा... वह बस अपने भाई के साथ हँसती रहती है।"


आदित्य की आँखें नम हो गईं।


"और मैंने वही सबसे खूबसूरत सफर तुझसे छीन लिया।"


वैदेही ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।


"नहीं... तूने कुछ नहीं छीना। बस ज़िंदगी की भागदौड़ में भूल गया कि कुछ रिश्ते कैलेंडर देखकर नहीं निभाए जाते।"


कार आगे बढ़ती रही।


करीब एक घंटे बाद वही पुराना ढाबा दिखाई दिया जहाँ वे बचपन से रुकते आए थे।


आदित्य मुस्कुराया।


"दीदी... कुल्हड़ वाली चाय?"


वैदेही पहली बार खुलकर हँसी।


"अगर जलेबी भी मिले तो।"


दोनों कार से उतर गए।


ढाबे का मालिक अब बूढ़ा हो चुका था।


उसने जैसे ही दोनों को देखा, उसकी आँखें चमक उठीं।


"अरे... इतने साल बाद फिर वही भाई-बहन!"


आदित्य ने हैरानी से पूछा,


"आपने पहचान लिया?"


बूढ़ा मुस्कुरा दिया।


"बेटा... कुछ चेहरे उम्र के साथ बदलते नहीं, बस उन पर ज़िम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं।"


दोनों चुप हो गए।


चाय आ गई।


गरम जलेबियाँ भी आ गईं।


वैदेही ने पहला टुकड़ा उठाया ही था कि आदित्य ने हँसते हुए कहा,


"रुक... पहले मैं खिलाऊँगा।"


वैदेही खिलखिलाकर हँस पड़ी।


"तू बिल्कुल नहीं बदला।"


उसी समय ढाबे के बाहर अचानक तेज़ ब्रेक लगने की आवाज़ आई।


दोनों ने मुड़कर देखा...


एक बुज़ुर्ग दंपति सड़क किनारे खड़े थे और उनकी पुरानी स्कूटी बंद हो गई थी। पीछे से तेज़ रफ़्तार वाहन निकल रहे थे।


आदित्य बिना एक पल गंवाए उनकी ओर दौड़ पड़ा...



आदित्य बिना एक पल गंवाए बुज़ुर्ग दंपति की तरफ दौड़ पड़ा।


सड़क पर तेज़ रफ़्तार से गाड़ियाँ निकल रही थीं। बुज़ुर्ग व्यक्ति अपनी बंद स्कूटी को किनारे करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उम्र उनका साथ नहीं दे रही थी।


आदित्य ने तुरंत स्कूटी पकड़कर उसे सुरक्षित जगह तक पहुँचाया।


वैदेही भी पीछे-पीछे वहाँ आ गई।


बुज़ुर्ग महिला ने राहत की साँस लेते हुए कहा,


"बेटा, भगवान तेरा भला करे। अगर तू दो मिनट और देर कर देता, तो पता नहीं क्या हो जाता।"


आदित्य मुस्कुराया।


"अम्मा, इसमें धन्यवाद की क्या बात है?"


बुज़ुर्ग व्यक्ति ने गौर से दोनों भाई-बहन को देखा।


"तुम दोनों भाई-बहन हो?"


वैदेही मुस्कुराई।


"जी।"


बुज़ुर्ग की आँखों में चमक आ गई।


उन्होंने धीरे से कहा,


"बहुत नसीब वाले हो तुम दोनों।"


आदित्य ने सहजता से पूछा,


"ऐसा क्यों कह रहे हैं?"


बुज़ुर्ग कुछ क्षण चुप रहे।


फिर बोले,


"हमारी भी एक बेटी थी... हर त्योहार पर उसका भाई उसे लेने जाता था। दोनों रास्ते भर लड़ते-झगड़ते, हँसते-बोलते घर आते थे।"


उनकी आवाज़ अचानक भर्रा गई।


"पाँच साल पहले एक बीमारी ने हमारे बेटे को हमसे छीन लिया।"


सन्नाटा छा गया।


बुज़ुर्ग महिला की आँखों से आँसू बह निकले।


उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,


"अब हमारी बेटी हर त्योहार पर खुद ही आती है। वह कभी शिकायत नहीं करती... लेकिन जब भी घर पहुँचती है, सबसे पहले दरवाज़े की तरफ देखती है। शायद उसे आज भी लगता है कि उसका भाई कहीं से दौड़ता हुआ आ जाएगा।"


वैदेही की आँखें भर आईं।


उसने अनायास आदित्य का हाथ पकड़ लिया।


बुज़ुर्ग आगे बोले,


"बेटा... जब तक रिश्ते साथ हैं, उन्हें निभाने का मौका मत छोड़ना। बाद में समय तो रहता है... लेकिन लोग नहीं रहते।"


उनकी बात आदित्य के दिल में उतर गई।


उसने झुककर उनके पैर छुए।


"आपने आज बहुत बड़ी सीख दे दी।"


बुज़ुर्ग दंपति मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए।


कुछ देर तक दोनों भाई-बहन वहीं खड़े रहे।


हवा चल रही थी, लेकिन दोनों के मन में जैसे कोई गहरी बात उतर चुकी थी।



कार फिर अपने रास्ते पर चल पड़ी।


इस बार किसी ने रेडियो नहीं चलाया।


रास्ते भर सिर्फ यादें थीं।


वैदेही बोली,


"याद है, बचपन में तू मेरा स्कूल बैग उठाकर चलता था?"


आदित्य हँस पड़ा।


"और तू हर दूसरे दिन मेरा टिफिन खा जाती थी।"


दोनों हँसने लगे।


हँसी-ठिठोली के बीच अचानक वैदेही की आवाज़ धीमी हो गई।


"भैया..." वैदेही ने भावुक होकर कहा।


"हाँ, बोल न दीदी।" आदित्य ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा।


कुछ पल चुप रहने के बाद वैदेही बोली,


"मुझसे एक वादा करेगा?"


आदित्य बिना देर किए हँसते हुए बोला,


"एक नहीं, हज़ार वादे करूँगा। तू बस बोल।"


वैदेही ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,


"वादा कर... जब तक माँ हमारे साथ हैं, कोई भी त्योहार ऐसा नहीं बीतेगा जिसमें हम दोनों उनके पास बैठकर साथ समय न बिताएँ। चाहे काम कितना भी ज़रूरी हो, दूरी कितनी भी हो, लेकिन माँ का इंतज़ार कभी अधूरा नहीं रहने देंगे।"


आदित्य की आँखें नम हो गईं। उसने स्टीयरिंग पर रखा अपना एक हाथ बढ़ाकर बहन का हाथ थाम लिया और दृढ़ स्वर में कहा,


"मैं वादा करता हूँ, दीदी। अब कोई काम, कोई मीटिंग और कोई दूरी हमारे रिश्तों से बड़ी नहीं होगी। हर त्योहार पर सबसे पहले हम माँ के पास होंगे।"


कुछ देर बाद कार वैदेही की ससुराल के सामने आकर रुकी।


दरवाज़े पर करण, उनकी माँ और पिता पहले से खड़े थे।


आदित्य ने हमेशा की तरह पहले बहन का बैग उठाया।


वैदेही मुस्कुराकर बोली,


"मैं उठा लूँगी।"


आदित्य ने वही पुराना जवाब दिया,


"जब तक मैं हूँ... तू कुछ नहीं उठाएगी।"


करण मुस्कुरा उठे।


उन्होंने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा।


"भाई साहब... आज समझ आया कि बहन को छोड़ने आना सिर्फ एक रस्म नहीं है।"


आदित्य ने कहा,


"रस्में तभी तक ज़िंदा रहती हैं, जब तक उनमें प्यार ज़िंदा रहता है।"


करण ने सम्मान से कहा,


"अगली बार मैं खुद फोन करके कहूँगा—आदित्य, अपनी बहन को लेने ज़रूर आना।"


वैदेही की सास भी आगे बढ़ीं।


उन्होंने बेटी की तरह उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,


"जा बहू... अब हर राखी पर अपने भाई के साथ ही आना-जाना। कुछ रिश्तों का सम्मान बनाए रखना चाहिए।"


वैदेही की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।


उसने भाई को गले लगाया।


धीरे से बोली,


"भैया... इस बार मुझे लेने मत आना कहकर मैंने तेरी परीक्षा ली थी..."


आदित्य मुस्कुराया।


"और मैं फेल हो गया।"


वैदेही ने सिर हिलाया।


"नहीं भैया... तुम फेल नहीं हुए। बस ज़िंदगी की भागदौड़ में हम दोनों रिश्तों की गर्माहट से थोड़ा दूर हो गए थे। आज इस सफ़र ने हमें फिर से वही अपना पुराना रिश्ता लौटा दिया।"


आदित्य ने बहन के माथे को चूमा।


"अब कोई परीक्षा नहीं होगी। अगली राखी से पहले मैं खुद दरवाज़े पर खड़ा मिलूँगा।"



वापसी के रास्ते में आदित्य अकेला था।


लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान थी।


घर पहुँचते ही निहारिका दरवाज़े पर इंतज़ार करती मिली।


उसने घबराकर पूछा,


"दीदी ठीक से पहुँच गईं?"


आदित्य ने मुस्कुराकर कहा,


"हाँ... और आज मैं भी अपने घर लौट आया हूँ।"


निहारिका कुछ समझी नहीं।


आदित्य बोला,


"आज मुझे समझ आया कि रिश्ते निभाने के लिए ज़्यादा समय नहीं, बस सच्चा मन और अपनों के लिए थोड़ी-सी प्राथमिकता चाहिए होती है।"


निहारिका की आँखें नम हो गईं।


उसने धीरे से कहा,


"धन्यवाद... मुझे भी यह बात समझाने के लिए।"



एक साल बाद फिर रक्षाबंधन आया।


इस बार वैदेही ने किसी को फोन नहीं किया।


उसे ज़रूरत ही नहीं पड़ी।


घर की घंटी बजी।


दरवाज़ा खुला।


सामने आदित्य खड़ा था।


हाथ में उसकी पसंद की मिठाई थी और चेहरे पर वही बचपन वाली मुस्कान।


वह हँसते हुए बोला,


"चल दीदी... माँ कब से आपकी राह देख रही हैं। और हाँ, इस बार गाड़ी आप नहीं चलाएँगी। आज भी आप मेरी वही बड़ी दीदी हैं, जिसके साथ सफर करना मुझे बचपन जितना ही अच्छा लगता है।"


वैदेही मुस्कुराई।


उसने बिना कुछ कहे अपना बैग उठाया और भाई के साथ चल दी।


करण दरवाज़े पर खड़े दोनों भाई-बहन को जाते हुए देख रहे थे। उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।


उन्होंने मन ही मन सोचा, "कुछ रिश्ते समय के साथ बदलते नहीं, बस उन्हें निभाने का तरीका बदल जाता है।"


उन्हें आज एहसास हुआ कि बहन को लेने या छोड़ने की परंपरा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में प्यार, सम्मान और अपनापन जीवित रखने का सबसे खूबसूरत बहाना है।



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