जिसे लोग कमजोर समझते रहे
बस अड्डे पर भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। मेरे हाथ में एक बैग था और चेहरे पर सफर की थकान साफ दिखाई दे रही थी। कई टैक्सियों और ऑटो वालों से बात की, लेकिन कोई भी मेरे मोहल्ले तक चलने को तैयार नहीं था।
"उधर कौन जाएगा साहब... वापस खाली आना पड़ेगा।"
हर किसी का यही जवाब था।
मैंने सोचा कि शायद आज यहीं कुछ देर बैठना पड़ेगा। तभी एक पुराना ई-रिक्शा मेरे सामने आकर रुका।
"कहाँ जाना है साहब?"
आवाज़ सुनकर मैंने सिर उठाया। रिक्शा चलाने वाली एक युवती थी। साधारण सूती सलवार-कुर्ता, छोटे बाल और चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास, जिसे देखकर कोई भी दोबारा देखने पर मजबूर हो जाए।
मैंने ई-रिक्शा के पास जाकर पूछा, "बेटी, शिव विहार चलोगी?"
रिक्शा चला रही युवती ने मेरी ओर देखा, हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली, "क्यों नहीं चलेंगे साहब? सवारी को उसकी मंज़िल तक पहुँचाना ही तो हमारा काम है। आइए, बैठ जाइए।"
उसके आत्मविश्वास भरे जवाब ने मेरी सारी झिझक दूर कर दी। मैंने अपना बैग रिक्शे में रखा और बैठ गया। अगले ही पल उसने रिक्शा स्टार्ट किया और धीरे-धीरे सड़क पर बढ़ा दिया।
कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर मैंने पूछा,
"तुम कब से ये काम कर रही हो?"
वह हल्का-सा मुस्कुराई।
"जब लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि लड़की होकर घर कैसे चलाएगी, उसी दिन से।"
उसका जवाब सीधा था, लेकिन उसके पीछे बहुत बड़ा संघर्ष छिपा हुआ था।
मैंने उत्सुकता से पूछा,
"तुम्हारे घर में कौन-कौन है?"
उसने कुछ पल सड़क पर नज़र टिकाए रखी। चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई। फिर धीमी आवाज़ में बोली,
"घर में माँ हैं... और दो छोटे भाई हैं। पिताजी को गुज़रे पाँच साल हो गए। उनके जाने के बाद पहले दो दिन तो रिश्तेदार हमारे साथ बैठकर रोए। तीसरे दिन सबने अपने-अपने हिसाब से सलाह देना शुरू कर दिया, और चौथे दिन हर कोई अपने घर लौट गया। उसके बाद किसी ने मुड़कर यह तक नहीं पूछा कि घर का चूल्हा कैसे जल रहा है।"
उसकी बात सुनकर मेरे पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचे। मैं बस चुपचाप उसकी ओर देखता रहा, जबकि वह बिना शिकायत किए रिक्शा चलाती रही।
वह बोलती रही।
"पहले लोगों के घरों में बर्तन माँजती थी। फिर लगा कि दूसरों के सहारे कब तक रहूँ? थोड़ा कर्ज लिया और ये रिक्शा खरीद लिया।"
कुछ पल चुप रहने के बाद मैंने उसकी तरफ देखा और कहा, "इतनी सुनसान सड़कों पर अकेले रिक्शा चलाती हो... तुम्हें डर नहीं लगता?"
उसने मेरी तरफ बिना देखे कहा,
"जिस इंसान ने खाली बर्तन देखकर छोटे भाई की आँखों में आँसू देखे हों, उसे सड़क का डर नहीं लगता साहब।"
उसकी बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ दूर आगे दो लड़के सड़क किनारे खड़े थे। उन्होंने रिक्शा देखकर सीटी बजाई।
"अरे बहन जी... हमें भी घुमा दो।"
वह बिना उनकी तरफ देखे आगे बढ़ गई।
मैंने पूछा,
"गुस्सा नहीं आता?"
"गुस्सा आता है... लेकिन हर भौंकने वाले कुत्ते पर पत्थर फेंकने लगूँ तो मंजिल तक कभी नहीं पहुँचूँगी।"
उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा दिया।
मैंने उत्सुकता से उसकी ओर देखा और पूछा,
"तुम पढ़ी-लिखी भी हो?"
उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ सड़क पर नज़र टिकाए रखी और बोली,
"हाँ साहब, बारहवीं तक पढ़ी हूँ। आगे कॉलेज में दाखिला लेने का सपना था, लेकिन घर की जिम्मेदारियाँ पहले आ गईं। फिर अपने सपनों को पीछे छोड़ना पड़ा। अब सोचती हूँ, जब मेरे भाई अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे, तब शायद मैं भी अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर लूँ।"
रिक्शा अब सुनसान रास्ते से गुजर रहा था।
मैंने कहा,
"अगर कोई सच में परेशान करे तो?"
उसने रिक्शा की रफ्तार धीमी की और बोली,
"डरना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया। सम्मान से बात करने वाले के लिए मैं छोटी बहन हूँ... और बदतमीज़ी करने वाले के लिए बहुत बड़ी मुसीबत।"
उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न घमंड... सिर्फ भरोसा था।
मैंने पूछा,
"शादी के बारे में क्या सोचती हो?"
वह हँस पड़ी।
"शादी करनी है... लेकिन ऐसे आदमी से जो मेरी कमाई से नहीं, मेरी मेहनत से प्यार करे। जो मेरी माँ को अपनी माँ कह सके।"
कुछ देर हम दोनों फिर चुप रहे।
मोहल्ला आ गया था।
मैंने सामने वाली गली की ओर इशारा करते हुए कहा,
"बस, यहीं रोक दीजिए। मेरा घर इसी गली के अंदर है।"
उसने रिक्शा रोक दिया।
मीटर पर 148 रुपये बने थे।
मैंने उसे 200 रुपये दिए।
वह तुरंत बाकी पैसे निकालने लगी।
मैंने कहा,
"रख लो।"
उसने पैसे मेरी तरफ बढ़ा दिए।
"मेहनत का पैसा चाहिए साहब... एहसान का नहीं।"
मैंने कहा,
"लेकिन इसमें क्या बुराई है?"
वह मुस्कुराई।
"आज अगर बिना मेहनत के पैसे लेने की आदत डाल ली, तो कल मेहनत करने का हौसला खत्म हो जाएगा।"
उसकी बात मेरे दिल में उतर गई।
मैंने पैसे वापस रख लिए।
बैग उठाया और जाने लगा।
पीछे से उसकी आवाज़ आई,
"साहब..."
मैं पलटा।
"घर पहुँचकर माँ को फोन ज़रूर कर दीजिएगा। इंतज़ार सबसे भारी चीज़ होती है।"
मैं कुछ पल उसे देखता रह गया।
मैंने पूछा,
"तुम्हें कैसे पता कि मेरी माँ इंतज़ार कर रही होंगी?"
वह मुस्कुराकर बोली,
"जिसके सिर पर माँ का हाथ होता है, उसके चेहरे पर पहचान दिख ही जाती है।"
मेरी आँखें भर आईं।
मैंने आगे बढ़कर उसके सिर पर हाथ रखा।
"बेटी... भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।"
उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।
"दुआ में ताकत होती है साहब... पैसे में नहीं।"
मैं घर की तरफ चल पड़ा।
पीछे मुड़कर देखा तो उसका रिक्शा भीड़ में कहीं खो चुका था।
उस दिन मुझे एहसास हुआ...
कमज़ोर वह नहीं होता जिसके हाथों में ताकत कम हो, बल्कि वह होता है जो हालात के सामने हिम्मत छोड़ दे।

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