सपनों की उड़ान
"पापा... अगर मैं आपकी पसंद का रास्ता न चुनूँ, तो क्या मैं आपकी अच्छी बेटी नहीं रहूँगी?"
इतना सुनते ही राघव के हाथ में रखा चाय का कप वहीं रुक गया।
उन्होंने सामने खड़ी अपनी बेटी आर्या की ओर देखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी, लेकिन आँखें जैसे कई दिनों से कोई अनकही बात छिपाए बैठी थीं।
कुछ पल तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा।
"ये कैसी बातें कर रही हो, बेटा?" राघव ने धीमे स्वर में पूछा।
आर्या ने सिर झुका लिया।
"कुछ नहीं पापा... बस ऐसे ही पूछ लिया।"
इतना कहकर वह अपने कमरे की ओर चली गई।
रसोई से बाहर आती मीरा ने बेटी को जाते देखा तो बोली,
"आजकल आर्या बहुत बदली-बदली लग रही है। पहले हर समय हँसती रहती थी, अब देखो... जैसे किसी बात का बोझ लिए घूम रही हो।"
राघव ने चाय का आखिरी घूँट पीते हुए कहा,
"बारहवीं की परीक्षा देकर बैठी है। हर बच्चे को रिज़ल्ट से पहले ऐसा ही लगता है। बेकार चिंता मत करो।"
मीरा चुप हो गई, लेकिन एक माँ का मन बार-बार बेटी की उदासी पर जाकर अटक रहा था।
उसी समय बड़ा बेटा आदित्य तैयार होकर बाहर आया।
"माँ, मेरा टिफिन तैयार है?"
"हाँ, मेज़ पर रखा है।"
आदित्य ने टिफिन उठाया और मुस्कुराते हुए बोला,
"रिज़ल्ट आते ही हमारी छोटी इंजीनियर की तैयारी शुरू हो जाएगी।"
राघव गर्व से बोले,
"बिल्कुल। मेरी बेटी देश के सबसे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ेगी।"
कमरे के दरवाज़े के पीछे खड़ी आर्या ने यह बात सुन ली।
उसने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसके होंठों पर मुस्कान थी...
लेकिन दिल के भीतर जैसे कोई चीख रहा था।
राघव शहर के जाने-माने सिविल इंजीनियर थे। कई बड़ी इमारतें उनके नाम से जानी जाती थीं।
मीरा सरकारी स्कूल में हिंदी की शिक्षिका थीं।
घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी।
आदित्य इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में था।
और आर्या...
पूरे परिवार की सबसे लाडली।
बचपन से ही पढ़ाई में तेज़, शांत स्वभाव की और हर प्रतियोगिता में अव्वल आने वाली।
दसवीं की बोर्ड परीक्षा में उसने पूरे जिले में दूसरा स्थान प्राप्त किया था।
रिश्तेदार जब भी घर आते, उसकी तारीफ़ किए बिना नहीं जाते।
"राघव जी, आपकी बेटी तो बहुत नाम रोशन करेगी।"
राघव मुस्कुराकर कहते,
"हाँ, मेरी बेटी इंजीनियर बनेगी।"
हर बार यह सुनकर आर्या भी मुस्कुरा देती...
लेकिन वह मुस्कान कभी उसके दिल तक नहीं पहुँचती थी।
आर्या को बचपन से कैमरे से प्यार था।
जब वह सिर्फ़ बारह साल की थी, तब मामा ने उसे जन्मदिन पर एक छोटा-सा डिजिटल कैमरा दिया था।
उस दिन से कैमरा उसका सबसे अच्छा दोस्त बन गया।
कभी वह बारिश की बूंदों की तस्वीर खींचती...
कभी किसी बुज़ुर्ग के चेहरे की मुस्कान...
कभी सड़क किनारे खेलते बच्चों की मासूमियत...
हर तस्वीर के पीछे वह एक कहानी खोज लेती थी।
स्कूल में उसकी तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी।
जिला स्तर की फोटोग्राफी प्रतियोगिता में उसे पहला पुरस्कार मिला।
पुरस्कार लेते समय एक प्रसिद्ध फोटोग्राफर ने उससे कहा था,
"तुम्हारी नज़र बहुत अलग है। अगर मेहनत करोगी तो एक दिन देश की बेहतरीन फोटोग्राफरों में तुम्हारा नाम होगा।"
उस दिन आर्या खुशी से घर लौटी थी।
उसने दौड़ते हुए राघव के सामने ट्रॉफी रखी।
"पापा... देखिए, मैं जीत गई।"
राघव ने ट्रॉफी हाथ में लेकर कहा,
"शाबाश बेटा।"
फिर मुस्कुराकर बोले,
"अब बस यह सब शौक तक ही रखना। असली मेहनत इंजीनियर बनने में करनी है।"
आर्या कुछ कहना चाहती थी।
लेकिन शब्द उसके होंठों तक आकर लौट गए।
उसने बस धीरे से "जी पापा" कहा।
धीरे-धीरे बारहवीं की पढ़ाई शुरू हो गई।
कोचिंग...
टेस्ट...
असाइनमेंट...
मॉक एग्ज़ाम...
आर्या का पूरा दिन किताबों में बीतने लगा।
उसका कैमरा अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में रख दिया गया।
कई महीनों तक उसने उसे छुआ तक नहीं।
एक दिन उसने हिम्मत करके माँ से कहा,
"माँ... अगर मैं फोटोग्राफी में करियर बनाना चाहूँ तो?"
मीरा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।
"बेटा, शौक अपनी जगह अच्छे होते हैं, लेकिन करियर ऐसा होना चाहिए जिसमें भविष्य सुरक्षित हो।"
"लेकिन माँ..."
"पहले इंजीनियर बन जाओ। उसके बाद जितनी चाहे फोटोग्राफी करना।"
आर्या चुप हो गई।
उसे समझ आ गया...
इस घर में उसकी बात सुनने से पहले ही उसका जवाब तय किया जा चुका है।
रात को आदित्य उसके कमरे में आया।
"क्या हुआ छोटी? आजकल बहुत चुप रहने लगी है।"
आर्या कुछ देर तक उसे देखती रही।
फिर धीरे से बोली,
"भैया... अगर किसी का सपना अलग हो तो?"
आदित्य हँस पड़ा।
"सपने तो सब देखते हैं। लेकिन माँ-पापा हमसे ज़्यादा दुनिया जानते हैं। जो कह रहे हैं, वही सही होगा।"
आर्या ने धीरे से पूछा, "भैया... अगर मुझे इंजीनियर नहीं बनना हो तो?"
आदित्य ने बिना सोचे जवाब दिया,
"ऐसा मत सोच। तू बहुत होशियार है। पापा का सपना पूरा करना।"
आर्या ने सिर झुका लिया।
उसे लगा था कि शायद उसका बड़ा भाई उसकी बात समझेगा...
लेकिन यहाँ भी वही जवाब मिला।
उस रात उसने अलमारी खोली।
ऊपर रखा कैमरा नीचे उतारा।
धीरे से उसकी धूल साफ की।
कैमरा ऑन किया।
स्क्रीन पर उसकी पुरानी तस्वीरें एक-एक करके दिखाई देने लगीं।
हर तस्वीर उसे उसके उस रूप की याद दिला रही थी...
जो अब धीरे-धीरे कहीं खोता जा रहा था।
उसकी आँखों से एक आँसू कैमरे पर गिरा।
उसने तुरंत उसे पोंछ दिया...
जैसे अपने ही सपनों पर गिरी नमी छिपाने की कोशिश कर रही हो।
उसी समय उसके मोबाइल पर एक संदेश आया।
"बोर्ड परीक्षा का परिणाम कल सुबह 10 बजे घोषित किया जाएगा।"
संदेश पढ़ते ही उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने मोबाइल बंद किया...
और खिड़की के बाहर अँधेरे आसमान को देखने लगी।
उसे रिज़ल्ट से ज़्यादा डर उस पल का था...
जब पूरे घर की उम्मीदें उसके सामने खड़ी होंगी।
"आर्या... क्या हुआ? तू पिछले कई मिनटों से खिड़की के बाहर ही देख रही है। सब ठीक है ना?"
मीरा की आवाज़ सुनकर आर्या चौंक गई।
उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली,
"हाँ माँ... बस ऐसे ही बैठी थी।"
मीरा उसके पास आकर बैठ गईं।
"कल रिज़ल्ट है, इसलिए घबरा रही है?"
आर्या ने हल्के से सिर हिला दिया।
"सब ठीक होगा बेटा। ज़्यादा मत सोचो।"
इतना कहकर मीरा बाहर चली गईं।
दरवाज़ा बंद होते ही आर्या की मुस्कान गायब हो गई।
उसके मन में सिर्फ़ एक ही बात घूम रही थी—
"अगर रिज़ल्ट खराब आया... तो पापा क्या कहेंगे?"
लेकिन उससे भी बड़ा सवाल था—
"अगर अच्छे अंक आ गए... तब क्या होगा?"
क्योंकि अच्छे अंक आने का मतलब था...
इंजीनियरिंग की तैयारी।
और वही रास्ता, जिस पर वह कभी चलना ही नहीं चाहती थी।
रात के खाने पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था।
राघव बड़े उत्साह में थे।
"कल रिज़ल्ट आते ही सबसे पहले इंजीनियरिंग कॉलेजों की लिस्ट देखेंगे।"
आदित्य भी मुस्कुराकर बोला,
"मैंने तो पहले ही कुछ अच्छे कॉलेजों की जानकारी निकाल ली है।"
मीरा ने प्यार से आर्या की प्लेट में रोटी रखते हुए कहा,
"घबराना मत बेटा। तूने मेहनत की है। अच्छे अंक ही आएँगे।"
आर्या बस सबकी बातें सुनती रही।
उसने मुश्किल से दो निवाले खाए।
"इतना कम क्यों खा रही है?" मीरा ने पूछा।
आर्या ने प्लेट की तरफ देखते हुए धीमे स्वर में कहा, "भूख नहीं है माँ।"
मीरा ने उसके माथे को छूते हुए पूछा, "तबीयत तो ठीक है?"
"हाँ..."
यह "हाँ" इतना धीमा था कि उसमें छिपा दर्द किसी ने नहीं सुना।
खाना खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए।
लेकिन आर्या की आँखों से नींद कोसों दूर थी।
उसने धीरे से अलमारी खोली।
पुराना कैमरा निकाला।
बैटरी खत्म हो चुकी थी।
उसने चार्जर लगाया और कैमरे को हाथों में लेकर बैठ गई।
उसे याद आने लगा...
वह दिन जब उसने पहली बार किसी गरीब बच्चे की तस्वीर खींची थी।
वह तस्वीर अख़बार में छपी थी।
स्कूल के प्रिंसिपल ने पूरी सभा के सामने उसकी तारीफ़ की थी।
उस दिन उसने सोचा था—
"मैं दुनिया की ऐसी कहानियाँ कैमरे में कैद करूँगी जिन्हें लोग अनदेखा कर देते हैं।"
लेकिन...
धीरे-धीरे यह सपना किताबों के नीचे दब गया।
मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर उसकी सबसे अच्छी दोस्त सिया का नाम चमक रहा था।
सिया बोली, "हैलो..."
आर्या ने धीमी आवाज़ में कहा, "हाँ सिया..."
सिया ने मुस्कुराते हुए पूछा, "क्या कर रही है?"
आर्या ने खिड़की से बाहर देखते हुए जवाब दिया, "कुछ नहीं..."
सिया ने तुरंत कहा, "झूठ मत बोल। तेरी आवाज़ बता रही है कि तू बहुत परेशान है।"
आर्या कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
"सिया... अगर किसी इंसान को अपनी ही ज़िंदगी अपनी न लगे तो क्या करना चाहिए?"
सिया घबरा गई।
"ये कैसी बातें कर रही है?"
आर्या ने धीमी आवाज़ में कहा, "बस ऐसे ही पूछ रही हूँ।"
सिया ने चिंता से पूछा, "नहीं... बात कुछ और है।"
आर्या की आवाज़ भर्रा गई।
"सिया... मैं बहुत थक गई हूँ।"
सिया ने हैरानी से पूछा, "किस बात से?"
आर्या ने गहरी साँस लेते हुए जवाब दिया, "सबको खुश रखने की कोशिश करते-करते।"
फोन के दूसरी तरफ़ कुछ देर तक खामोशी रही।
फिर सिया ने धीरे से कहा,
"कल रिज़ल्ट है न... उसी की टेंशन है?"
आर्या ने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे रिज़ल्ट से डर नहीं लगता..."
"फिर?"
"मुझे अपने घरवालों को दुख देने से डर लगता है।"
सिया कुछ समझ नहीं पा रही थी।
"तू साफ-साफ बता।"
आर्या ने पहली बार अपने मन की बात किसी से कही।
"मैं इंजीनियर नहीं बनना चाहती..."
सिया ने धीरे से पूछा, "फिर क्या बनना चाहती है?"
आर्या ने कुछ पल चुप रहने के बाद धीमी आवाज़ में कहा, "मैं फोटो जर्नलिस्ट बनना चाहती हूँ।"
सिया कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली,
"तो अपने घरवालों से कह दे।"
आर्या हल्का-सा हँसी।
"काश... इतना आसान होता।"
रात के करीब ग्यारह बजे फोन कट गया।
आर्या खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
सड़क पर दूर-दूर तक सन्नाटा था।
उसे लग रहा था...
जैसे उसके मन का शोर सिर्फ़ वही सुन पा रही है।
उसने डायरी निकाली।
उस डायरी में वह अपने मन की बातें लिखा करती थी।
आज उसने लिखा—
"क्या हर अच्छा बच्चा वही होता है जो अपने सपनों की बलि दे दे?"
"क्या माँ-पापा कभी समझ पाएँगे कि मैं उनसे दूर नहीं जाना चाहती... बस अपने सपनों के साथ जीना चाहती हूँ?"
लिखते-लिखते उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
स्याही फैल गई।
उसने डायरी बंद कर दी।
उधर मीरा को भी नींद नहीं आ रही थी।
वह कई बार आर्या के कमरे के बाहर तक आईं।
दरवाज़ा बंद था।
उन्होंने सोचा—
"रिज़ल्ट की वजह से परेशान होगी। कल सब ठीक हो जाएगा।"
वह वापस चली गईं।
उन्हें कहाँ पता था...
आर्या को अंकों से नहीं...
अपनी पहचान खो देने का डर सता रहा था।
सुबह होने से पहले ही आर्या की आँख खुल गई।
उसने मोबाइल देखा।
रिज़ल्ट आने में अभी कई घंटे बाकी थे।
लेकिन उसके दिल की धड़कनें अभी से तेज़ थीं।
उसी समय उसने एक फैसला किया।
अगर आज भी वह अपने मन की बात नहीं कह पाई...
तो शायद फिर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाएगी।
उसने मेज़ की दराज़ खोली।
एक सफेद कागज़ बाहर निकाला...
और कलम हाथ में ले ली।
उसके हाथ काँप रहे थे।
कुछ पल तक वह खाली कागज़ को देखती रही।
फिर उसने पहला शब्द लिखा—
"प्रिय पापा, माँ और भैया..."
पहला शब्द लिखते ही आर्या की उँगलियाँ काँपने लगीं।
उसने कलम कुछ पल के लिए मेज़ पर रख दी।
आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
वह कई मिनट तक खाली कागज़ को देखती रही।
फिर गहरी साँस लेकर दोबारा लिखना शुरू किया।
> प्रिय पापा, माँ और भैया,
अगर आप यह पत्र पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि मैं अपनी बात सामने बैठकर कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
मुझे आप सबसे कोई शिकायत नहीं है। आपने हमेशा मुझे बहुत प्यार दिया, हर खुशी दी। लेकिन एक चीज़ ऐसी थी जो मैं कभी माँग नहीं पाई—अपनी पसंद से जीने की आज़ादी।
मैं इंजीनियर नहीं बनना चाहती। मुझे कैमरे के पीछे रहकर लोगों की कहानियाँ दुनिया तक पहुँचानी हैं। यही मेरा सपना है।
पिछले दो सालों से मैं हर दिन खुद से लड़ रही हूँ। मैं पढ़ रही थी, लेकिन मेरा मन कहीं और था। मुझे सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि अगर मैंने सच बता दिया, तो कहीं आप मुझसे निराश न हो जाएँ।
अगर मेरे अंक अच्छे नहीं आए, तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा। मैंने कोशिश की थी... लेकिन मन के बिना पढ़ाई नहीं हो सकी।
आपकी...
आर्या"
पत्र पूरा करते-करते उसके आँसू कागज़ पर गिर चुके थे।
उसने उसे मोड़ा और अपनी डायरी के बीच रख दिया।
फिर अलमारी के ऊपर रखे कैमरे को उतारा।
उसने उसे सीने से लगा लिया।
"काश... मैं पहले ही सब कह पाती।"
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन दर्द बहुत गहरा था।
उधर घर के बाहर सब कुछ सामान्य था।
मीरा रसोई में नाश्ता बना रही थीं।
राघव तैयार होकर ऑफिस जाने वाले थे।
आदित्य मोबाइल पर रिज़ल्ट का समय देख रहा था।
"बस एक घंटा और..."
वह मुस्कुराते हुए बोला।
"आज तो मिठाई पक्की है।"
मीरा भी हँस दीं।
"हाँ, मेरी बेटी कभी निराश नहीं करेगी।"
आर्या ने यह बात सुनी।
उसके कदम वहीं रुक गए।
वह कुछ कहना चाहती थी...
लेकिन फिर चुपचाप अपने कमरे में लौट गई।
करीब नौ बजे उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर उसकी दोस्त सिया का नाम था।
"हैलो..." आर्या ने धीमी आवाज़ में कहा।
"घर में है?" सिया ने पूछा।
"हाँ..." आर्या ने जवाब दिया।
"चल, थोड़ी देर बाहर चलते हैं। यहाँ बैठकर तो मेरी भी धड़कन बढ़ रही है।" सिया ने उसे हँसाने की कोशिश करते हुए कहा।
आर्या कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
"ठीक है... दस मिनट में आती हूँ।"
उसने माँ से कहा,
"माँ, मैं सिया से मिलकर आती हूँ।"
मीरा ने बिना कुछ सोचे कहा,
"जल्दी आ जाना। रिज़ल्ट आने वाला है।"
"जी।"
दोनों पास के पार्क में जाकर बैठ गईं।
सिया लगातार बातें कर रही थी।
लेकिन आर्या चुप थी।
सिया ने आर्या का चेहरा देखते हुए पूछा,
"इतनी खामोश क्यों है?"
आर्या ने हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की और बोली,
"बस... मन नहीं लग रहा।"
सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"देख, चाहे जो भी रिज़ल्ट आए... दुनिया खत्म नहीं हो जाती।"
आर्या ने गहरी साँस लेते हुए जवाब दिया,
"कई बार रिज़ल्ट नहीं... लोगों की उम्मीदें डराती हैं।"
सिया ने हैरानी से पूछा,
"तेरे पापा नाराज़ होंगे?"
आर्या ने धीमी आवाज़ में कहा,
"मुझे नहीं पता..."
सिया ने समझाते हुए कहा,
"अगर तू उन्हें सब सच बता दे तो?"
आर्या ने आसमान की तरफ देखा।
"मैंने कई बार कोशिश की थी..."
"फिर?"
"हर बार मेरी बात पूरी होने से पहले किसी ने कह दिया—'पहले इंजीनियर बन जाओ, बाकी सब बाद में।'"
सिया कुछ नहीं बोली।
उसे पहली बार समझ आया कि आर्या सिर्फ़ पढ़ाई के दबाव में नहीं...
बल्कि अपनी पहचान खोने के डर में जी रही थी।
उसी समय घर पर...
मीरा अलमारी से कुछ ज़रूरी कागज़ निकाल रही थीं।
राघव ने कहा था कि बैंक के दस्तावेज़ ढूँढ़कर रख देना।
उन्होंने जैसे ही दराज़ खोली...
एक डायरी नीचे गिर गई।
डायरी खुली...
और उसके बीच रखा हुआ मोड़ा हुआ कागज़ बाहर निकल आया।
मीरा ने उसे उठाया।
सोचा, शायद कोई पुराना नोट होगा।
लेकिन जैसे ही पहली पंक्ति पढ़ी...
उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"प्रिय पापा, माँ और भैया..."
मीरा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उन्होंने पूरा पत्र पढ़ डाला।
हर शब्द उनके दिल में किसी नुकीली चीज़ की तरह चुभ रहा था।
पत्र के आखिर में लिखा था—
"मैं सिर्फ़ आपकी उम्मीद नहीं... आपकी बेटी भी हूँ। एक बार मेरी बात सुन लीजिए..."
मीरा के हाथ काँपने लगे।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
उन्हें अचानक पिछले दो साल की हर छोटी-बड़ी बात याद आने लगी।
आर्या का चुप हो जाना...
कैमरे का अलमारी में बंद रहना...
हर बात पर "ठीक है माँ" कह देना...
उन्होंने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की कि उनकी बेटी के भीतर क्या चल रहा है।
उन्होंने तुरंत राघव को फोन लगाया।
"राघव... आप अभी तुरंत घर आ जाइए।" मीरा की आवाज़ घबराई हुई थी।
"क्या हुआ मीरा? सब ठीक तो है?" राघव ने चिंतित होकर पूछा।
"मैं अभी फोन पर कुछ नहीं बता सकती... आप बस जल्दी घर आ जाइए।" मीरा की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
मीरा की काँपती आवाज़ सुनकर राघव घबरा गए।
उन्होंने बिना एक पल गंवाए गाड़ी घर की ओर मोड़ दी।
उधर...
पार्क की बेंच पर बैठी आर्या दूर कहीं खोई हुई थी।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...
कि उसके कमरे में रखा एक पत्र अब उसके पूरे परिवार की सोच बदलने वाला है।
"राघव... हमने बहुत बड़ी गलती कर दी।"
घर में कदम रखते ही राघव ने देखा, मीरा सोफे पर बैठी रो रही थीं।
उनके हाथ में वही पत्र था।
"क्या हुआ? किसका पत्र है?" राघव ने घबराकर पूछा।
मीरा बिना कुछ बोले पत्र उनकी ओर बढ़ा दिया।
राघव ने पढ़ना शुरू किया।
जैसे-जैसे हर पंक्ति उनकी आँखों के सामने आती गई, उनके चेहरे का रंग बदलता गया।
पत्र खत्म होते-होते उनकी आँखें भी भर चुकी थीं।
उन्होंने कुर्सी पर बैठते हुए अपना माथा पकड़ लिया।
"यह... यह सब हमारी आर्या ने लिखा है?"
मीरा फूट-फूटकर रो पड़ीं।
"हाँ... और हमें कुछ पता ही नहीं चला।"
दोनों कुछ देर तक बिल्कुल चुप बैठे रहे।
घर में ऐसा सन्नाटा था, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था।
राघव की आँखों के सामने पिछले दो साल की हर घटना घूमने लगी।
उन्हें याद आया...
एक दिन आर्या हाथ में कैमरा लेकर उनके पास आई थी।
"पापा, अगले महीने शहर में फोटोग्राफी वर्कशॉप है। मैं जाना चाहती हूँ।"
उन्होंने बिना उसकी ओर देखे कहा था,
"समय बर्बाद मत करो। अभी सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान दो।"
उस दिन आर्या चुपचाप कमरे में चली गई थी।
उन्हें याद आया...
एक बार स्कूल से फोन आया था।
प्रिंसिपल ने कहा था,
"सर, आपकी बेटी में फोटोग्राफी की अद्भुत प्रतिभा है।"
उन्होंने हँसकर जवाब दिया था,
"सर, ये सब शौक हैं। इसे इंजीनियर बनना है।"
आज वही शब्द उनके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहे थे।
"आर्या कहाँ है?"
राघव ने घबराकर पूछा।
"सिया के साथ पार्क गई है।"
मीरा ने तुरंत फोन मिलाया।
घंटी बजती रही...
लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया।
एक बार...
दो बार...
तीन बार...
मीरा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
"अगर उसने..."
वह आगे कुछ बोल ही नहीं पाईं।
राघव ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"नहीं... हमारी बेटी ऐसा कुछ नहीं करेगी।"
लेकिन यह कहते हुए उनकी अपनी आवाज़ काँप रही थी।
उन्होंने तुरंत कार निकाली।
दोनों बिना कुछ सोचे पार्क की ओर निकल पड़े।
उधर पार्क में...
सिया पानी लेने गई थी।
आर्या अकेली बेंच पर बैठी थी।
उसकी नज़र सामने खेल रहे छोटे-छोटे बच्चों पर थी।
एक छोटी बच्ची अपने पिता का हाथ पकड़कर हँस रही थी।
उसे देखकर आर्या की आँखें भर आईं।
उसने मन ही मन कहा,
"काश... मैं भी अपने पापा से बिना डरे अपने दिल की बात कह पाती।"
उसी समय उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर लिखा था—
"माँ कॉलिंग..."
उसने फोन उठाया।
आर्या: "हाँ माँ..."
मीरा: "बेटा... तुम कहाँ हो?"
आर्या: "मैं पार्क में हूँ, सिया के साथ।"
मीरा (घबराई हुई आवाज़ में): "बेटा, वहीं रहना... मैं और तुम्हारे पापा अभी आ रहे हैं।"
आर्या (हैरान होकर): "लेकिन माँ, हुआ क्या है?"
मीरा: "अभी कुछ मत पूछो... बस वहीं रहना। मैं आकर सब बताती हूँ।"
फोन कट गया।
आर्या कुछ समझ नहीं पाई।
करीब दस मिनट बाद राघव की कार पार्क के बाहर आकर रुकी।
मीरा लगभग दौड़ते हुए आर्या के पास पहुँचीं।
उन्हें देखते ही आर्या खड़ी हो गई।
"माँ... क्या हुआ?"
अगले ही पल मीरा ने उसे कसकर गले लगा लिया।
इतनी मजबूती से...
जैसे बरसों बाद अपनी बेटी को पाया हो।
"मुझे माफ़ कर दो बेटा..."
आर्या हैरान रह गई।
"माँ... आप रो क्यों रही हैं?"
मीरा की रुलाई नहीं रुक रही थी।
"मैं सबकी भावनाएँ समझाती रही... लेकिन अपनी बेटी का दर्द नहीं समझ पाई।"
आर्या कुछ बोल भी नहीं पाई थी कि राघव भी उसके सामने आकर खड़े हो गए।
उनकी आँखें लाल थीं।
उन्होंने काँपते हुए पूछा,
"बेटा... क्या तू हमसे इतनी दूर हो गई थी कि हमें पत्र लिखना पड़ा?"
आर्या के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसे समझते देर नहीं लगी...
पत्र मिल चुका था।
उसने धीरे से सिर झुका लिया।
"मैं... मैं आपको दुखी नहीं करना चाहती थी पापा।"
राघव ने पहली बार बिना कुछ कहे अपनी बेटी का सिर सीने से लगा लिया।
उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
"दुख तो हमने तुझे दिया है, बेटा..."
"हमने कभी तुझसे पूछा ही नहीं कि तू क्या चाहती है।"
आर्या भी फूट-फूटकर रो पड़ी।
पार्क में बैठे लोग उस परिवार को देख रहे थे...
लेकिन उस समय उन्हें किसी की परवाह नहीं थी।
तीनों बस एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे।
क्योंकि कई बार आँसू...
वह सब कह देते हैं, जो शब्द नहीं कह पाते।
कुछ देर बाद चारों (सिया भी वापस आ गई थी) घर लौट आए।
घर पहुँचते ही आदित्य भी कॉलेज से आ गया।
उसने माँ-पापा और आर्या को रोते हुए देखा तो घबरा गया।
"क्या हुआ?"
राघव ने बिना कुछ छिपाए पूरा पत्र उसके हाथ में दे दिया।
पत्र पढ़ते-पढ़ते आदित्य की आँखें भी भर आईं।
वह सीधे आर्या के पास आया।
"छोटी..."
"मुझे माफ़ कर दे।"
"तू कई बार मुझसे अपने मन की बात कहना चाहती थी... और हर बार मैंने तुझे समझाने की कोशिश की, समझने की नहीं।"
आर्या ने अपने भाई को गले लगा लिया।
घर का माहौल पहली बार इतना भावुक था।
लेकिन इस बार आँसू दर्द के नहीं...
एक-दूसरे को समझ लेने के थे।
"मुझे अंकों से नहीं... आपकी नाराज़गी से डर लगता था, पापा।"
आर्या की यह बात सुनकर राघव की आँखें फिर भर आईं।
उन्होंने बेटी का हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत देर तक कुछ बोल नहीं पाए।
घर में गहरा सन्नाटा था।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि बातचीत कहाँ से शुरू की जाए।
आख़िरकार राघव ने ही चुप्पी तोड़ी।
"बेटा... आज तक मैं यही समझता रहा कि एक पिता होने के नाते मुझे तुम्हारा भविष्य तय करने का अधिकार है। लेकिन मैं यह भूल गया कि भविष्य तुम्हारा है... इसलिए फैसला भी तुम्हारा होना चाहिए।"
आर्या ने हैरानी से अपने पिता की ओर देखा।
उसे पहली बार लगा कि शायद उसकी बात सचमुच सुनी जा रही है।
मीरा उसके पास आकर बैठ गईं।
"बेटा, एक बात सच-सच बताओ।"
"जी माँ।"
"अगर हम तुम्हें कभी इंजीनियर बनने के लिए मजबूर नहीं करते... तो तुम क्या बनना चाहती?"
आर्या ने बिना एक पल सोचे जवाब दिया।
"मैं फोटो जर्नलिस्ट बनना चाहती हूँ, माँ।"
"मैं ऐसी तस्वीरें लेना चाहती हूँ जो लोगों की ज़िंदगी बदल दें। मैं उन लोगों की कहानियाँ दुनिया तक पहुँचाना चाहती हूँ जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।"
उसकी आँखों में पहली बार चमक दिखाई दे रही थी।
राघव और मीरा एक-दूसरे को देखने लगे।
दो साल बाद उन्होंने अपनी बेटी को इतनी खुशी से बोलते देखा था।
उसी समय मोबाइल पर नोटिफिकेशन आया।
"बोर्ड परीक्षा का परिणाम घोषित कर दिया गया है।"
कमरे में फिर से खामोशी छा गई।
आर्या के हाथ काँपने लगे।
उसने मोबाइल उठाया...
लेकिन रोल नंबर टाइप करने की हिम्मत नहीं हुई।
राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"डर मत।"
"आज जो भी होगा... हम सब साथ मिलकर देखेंगे।"
आर्या ने काँपते हाथों से रोल नंबर भरा।
कुछ सेकंड बाद स्क्रीन पर परिणाम दिखाई दिया।
78.4%
आर्या ने स्क्रीन बंद कर दी।
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
"सॉरी पापा..."
"मैं आपकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई।"
राघव ने तुरंत उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
"किसने कहा कि तू हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी?"
"लेकिन मेरे नंबर..." आर्या की आवाज़ भर्रा गई। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
राघव ने बेटी का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए बोले, "आज मुझे समझ आया है कि अच्छे नंबरों से बड़ा इंसान का खुश रहना होता है, बेटा।"
"लेकिन पापा... मैंने आपका सपना पूरा नहीं किया।" आर्या ने सिर झुकाकर कहा।
राघव ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "नहीं बेटा, तुमने आज मेरी सबसे बड़ी गलती सुधार दी है। मैं तुम्हारा सपना देखे बिना अपना सपना तुम पर थोप रहा था। अब तुम वही करोगी, जिसमें तुम्हारा दिल खुश हो।"
मीरा ने भी मुस्कुराते हुए कहा,
"अगर ये 78 प्रतिशत अंक तुम्हें तुम्हारे सपनों तक ले जाएँ... तो हमारे लिए ये 100 प्रतिशत से भी ज़्यादा हैं।"
आर्या को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
उसी समय आदित्य मिठाई का डिब्बा लेकर आया।
सब उसे हैरानी से देखने लगे।
"अरे... रिज़ल्ट आया है। मिठाई तो बनती है।"
आर्या ने आँसू पोंछते हुए पूछा,
"मेरे इतने कम नंबर आए हैं... फिर भी?"
आदित्य मुस्कुराया।
"ये मिठाई अंकों की नहीं..."
"हमारी छोटी बहन के वापस मुस्कुराने की है।"
पूरा घर पहली बार खुलकर हँस पड़ा।
दोपहर तक रिश्तेदारों के फोन आने शुरू हो गए।
"कितने प्रतिशत आए?"
"अब किस इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला करवा रहे हो?"
राघव हर किसी से एक ही बात कहते।
"मेरी बेटी इंजीनियर नहीं बनेगी।"
"वह वही बनेगी... जो उसका दिल चाहता है।"
कुछ लोग हैरान हुए।
कुछ ने कहा,
"इतनी होशियार लड़की है... फोटोग्राफी में क्या रखा है?"
लेकिन इस बार राघव मुस्कुरा भर देते।
उन्हें अब किसी को जवाब देने की ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।
शाम को राघव ने आर्या से कहा,
"चलो... कहीं चलते हैं।"
"कहाँ पापा?" आर्या ने हैरानी से पूछा।
"रास्ते में पता चल जाएगा।" राघव ने मुस्कुराते हुए कहा।
कुछ देर बाद कार एक बड़े कैमरा शोरूम के सामने रुकी।
आर्या ने बोर्ड पढ़ा...
फिर अपने पिता की ओर देखा।
"पापा..."
राघव मुस्कुराए।
"दो साल पहले मैंने तुझसे तेरा कैमरा छीन लिया था।"
"आज वही गलती सुधारने आया हूँ।"
आर्या की आँखों से आँसू बह निकले।
वह कुछ बोल ही नहीं पाई।
दुकान के अंदर जाकर राघव ने कहा,
"बेटा... जो कैमरा तुम्हें पसंद हो, वही चुनो।"
आर्या बार-बार कह रही थी,
"नहीं पापा... यह बहुत महँगा होगा।"
राघव ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
"बेटी के सपनों की कोई कीमत नहीं होती।"
उसने काँपते हाथों से अपना पसंदीदा कैमरा उठाया।
उसे ऐसा लग रहा था...
जैसे किसी ने उसके सपनों को फिर से उसके हाथों में लौटा दिया हो।
कैमरा हाथ में लेते ही उसने सबसे पहली तस्वीर अपने माँ-पापा की खींची।
स्क्रीन पर दोनों मुस्कुरा रहे थे।
आर्या उस तस्वीर को देखते हुए बोली,
"यही मेरी सबसे खूबसूरत तस्वीर है।"
मीरा ने उसे गले लगा लिया।
राघव ने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,
"धन्यवाद भगवान... आज मेरी बेटी मुझे फिर से मिल गई।"
"पापा... क्या सच में मैं अपने सपनों की राह पर चल सकती हूँ?"
आर्या की आँखों में अब भी विश्वास और डर दोनों साथ-साथ थे।
राघव मुस्कुराए।
उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"बेटा, जिस दिन हमने तुम्हारे सपनों को समझ लिया, उसी दिन हमने तय कर लिया था कि अब तुम्हारी मंज़िल तुम चुनोगी।"
मीरा भी उसके पास आकर बोलीं,
"अब तुम्हें किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है। बस मेहनत करना... बाकी हम संभाल लेंगे।"
आर्या की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
उसे लग रहा था जैसे कई वर्षों बाद उसके मन का बोझ उतर गया हो।
कुछ दिनों बाद राघव स्वयं आर्या को शहर के एक प्रतिष्ठित फोटोग्राफी संस्थान में लेकर गए।
फॉर्म भरते समय आर्या बार-बार अपने पिता को देख रही थी।
जिस पिता ने कभी कैमरा हाथ में लेने से मना किया था...
आज वही फीस जमा कर रहे थे।
रसीद हाथ में लेते हुए राघव मुस्कुराए।
"अब मेहनत की जिम्मेदारी तुम्हारी है।"
आर्या ने मुस्कुराकर कहा,
"और भरोसे की जिम्मेदारी मेरी।"
लेकिन दुनिया इतनी जल्दी नहीं बदली।
रिश्तेदारों को जैसे ही पता चला कि आर्या इंजीनियरिंग नहीं कर रही, तरह-तरह की बातें शुरू हो गईं।
एक दिन बुआ घर आईं।
"भैया, इतनी होशियार लड़की थी। इंजीनियर बन जाती तो कितना नाम होता।"
दूसरी चाची बोलीं,
"कैमरा लेकर घूमने से भी कोई करियर बनता है क्या?"
आर्या चुपचाप सब सुन रही थी।
पहले ऐसी बातें सुनकर उसकी हिम्मत टूट जाती थी।
लेकिन इस बार...
राघव ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
"हर इंसान का नाम डिग्री से नहीं, अपने काम से होता है। मेरी बेटी वही करेगी जिसमें उसका मन है।"
पूरा कमरा शांत हो गया।
आर्या ने पहली बार महसूस किया...
आज उसके पिता सिर्फ उसके साथ नहीं खड़े थे...
बल्कि उसके लिए खड़े थे।
फोटोग्राफी का कोर्स आसान नहीं था।
सुबह जल्दी निकलना...
घंटों धूप में खड़े रहना...
कभी पहाड़...
कभी गाँव...
कभी भीड़भाड़ वाले बाज़ार...
कई बार एक तस्वीर के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ता।
कई प्रतियोगिताओं में उसने अपनी तस्वीरें भेजीं।
लेकिन हर बार एक ही जवाब आता—
"आपका चयन नहीं हो पाया।"
एक शाम वह उदास होकर घर लौटी।
कैमरा मेज़ पर रखा और चुपचाप बैठ गई।
राघव ने पूछा,
"क्या हुआ?"
"फिर रिजेक्ट हो गई, पापा।"
राघव ने कैमरा उठाकर उसके हाथ में वापस रखा।
"जिस दिन तू चलना सीख रही थी, कितनी बार गिरी थी?"
आर्या मुस्कुराई।
"बहुत बार।"
"तो क्या हमने तुझे चलना छोड़ देने को कहा था?"
"नहीं।" पापा
"बस... फिर यही समझ ले।"
उस दिन के बाद आर्या ने कभी हार मानने की बात नहीं सोची।
धीरे-धीरे उसकी तस्वीरें लोगों का ध्यान खींचने लगीं।
एक स्थानीय अख़बार ने उसकी खींची हुई तस्वीर प्रकाशित की।
वह तस्वीर थी...
बारिश में भीगते हुए भी अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाती एक माँ की।
तस्वीर के साथ उसका नाम भी छपा था—
"फोटो : आर्या शर्मा"
सुबह-सुबह राघव अख़बार लेकर पूरे घर में घूम रहे थे।
"देखो... हमारी बेटी का नाम छपा है।"
मीरा की आँखें खुशी से भर आईं।
आदित्य ने मज़ाक में कहा,
"अब तो हमारी सेलिब्रिटी बहन ऑटोग्राफ भी देगी।"
सभी हँस पड़े।
इसके बाद आर्या ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उसकी तस्वीरें कई पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं।
वह दूर-दराज़ के गाँवों में जाकर उन लोगों की कहानियाँ कैमरे में कैद करती, जिन्हें कोई नहीं देखता था।
कभी किसानों की मेहनत...
कभी मजदूरों का संघर्ष...
कभी बेटियों की शिक्षा...
कभी बुज़ुर्गों का अकेलापन...
उसकी हर तस्वीर लोगों के दिल तक पहुँचने लगी।
लगभग पाँच वर्ष बाद...
एक दिन आर्या अपने काम पर थी।
तभी उसके मोबाइल पर एक ईमेल आया।
उसने पढ़ा...
फिर कुछ क्षण तक स्क्रीन को देखती रह गई।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने तुरंत राघव को फोन किया।
"पापा..."
"क्या हुआ बेटा?"
"आप... आप जल्दी घर आ जाइए।"
राघव घबरा गए।
"सब ठीक तो है?"
इस बार आर्या रोते हुए हँस रही थी।
"पापा... मुझे राष्ट्रीय युवा फोटो जर्नलिस्ट पुरस्कार के लिए चुना गया है।"
कुछ पल तक फोन के दोनों ओर सन्नाटा रहा।
फिर राघव की भर्राई हुई आवाज़ सुनाई दी।
"बेटा..."
"आज सच में तूने हमारा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया।"
पुरस्कार समारोह का दिन आ गया।
जब मंच से आर्या का नाम पुकारा गया तो पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।
आर्या ने पुरस्कार लिया।
फिर माइक के सामने जाकर बोली—
"आज मैं जो भी हूँ, अपने माता-पिता की वजह से हूँ।"
लोग मुस्कुराने लगे।
लेकिन वह आगे बोली—
"नहीं... इसलिए नहीं कि उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया।"
"बल्कि इसलिए कि उन्होंने समय रहते अपनी गलती स्वीकार कर ली।"
पूरा हॉल शांत हो गया।
आर्या ने आगे कहा—
"एक समय ऐसा था जब मेरे सपनों और मेरे परिवार की उम्मीदों के बीच बहुत बड़ी दूरी थी।"
"लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे खोने से पहले मुझे समझ लिया।"
"उन्होंने मुझे मेरी मंज़िल चुनने की आज़ादी दी।"
"अगर उस दिन उन्होंने मेरी बात न सुनी होती..."
"तो शायद आज मैं यहाँ खड़ी नहीं होती।"
यह कहते हुए उसने मंच से नीचे उतरकर अपने माता-पिता को मंच पर बुलाया।
पूरा सभागार खड़ा होकर तालियाँ बजाने लगा।
आर्या ने अपना पुरस्कार राघव और मीरा के हाथों में रख दिया।
"यह पुरस्कार सिर्फ़ मेरा नहीं है..."
"यह उन माता-पिता का भी है जो अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रखते हैं।"
राघव की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने बेटी को गले लगाते हुए कहा—
"बेटा... उस दिन हमें लगा था कि हम तेरा भविष्य बना रहे हैं।"
"आज समझ आया कि बच्चों का भविष्य नहीं बनाया जाता..."
"उन्हें सिर्फ़ अपने सपनों तक पहुँचने का रास्ता दिया जाता है।"
मीरा ने दोनों को गले लगा लिया।
आदित्य भी मुस्कुराते हुए उनके पास आ गया।
पूरा परिवार एक-दूसरे से लिपट गया।
उस पल वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं।
क्योंकि यह सिर्फ़ एक बेटी की जीत नहीं थी...
यह विश्वास, समझ और अपने बच्चों के सपनों का सम्मान करने की जीत थी।

Post a Comment