घर की अन्नपूर्णा
"जिस घर में सब नई बहू की तारीफ़ कर रहे थे... उसी घर की बड़ी बहू की एक आदत ने उसका दिल जीत लिया।"
आरती ने जैसे ही अपने नए घर की चौखट पर कदम रखा, उसके मन में कई तरह की भावनाएँ एक साथ उमड़ने लगीं। हर लड़की की तरह उसने भी अपने ससुराल को लेकर न जाने कितने सपने देखे थे। कहीं मन में खुशी थी, कहीं थोड़ा डर भी कि पता नहीं नए लोग कैसे होंगे, नया माहौल कैसा होगा और वह सबके बीच खुद को कैसे ढाल पाएगी।
गृहप्रवेश की सारी रस्में प्यार से पूरी हुईं। घर बड़ा था, लेकिन उसमें रहने वाले लोग बहुत सादगी से जीवन बिताते थे।
इस परिवार में बड़े भैया नीरज, उनकी पत्नी सुजाता, दो छोटे भाई अमन और करण, और सबसे छोटे बेटे आदित्य की नई-नवेली दुल्हन आरती थी।
आरती ने एक बात आते ही महसूस कर ली थी कि इस घर में सास-ससुर नहीं हैं।
रस्में पूरी होने के बाद उसने धीरे से सुजाता से पूछा,
"दीदी... मम्मी जी कहाँ हैं?"
सुजाता के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन आँखों में एक पल के लिए नमी उतर आई।
"आरती... अब वो इस दुनिया में नहीं हैं। शादी के दो साल बाद ही मम्मी-पापा दोनों हमें छोड़कर चले गए थे।"
आरती एकदम चुप हो गई।
उसने सोचा भी नहीं था कि जिस घर में वह आई है, वहाँ इतने बड़े दुख के बाद भी सबके चेहरों पर इतनी सहज मुस्कान होगी।
कुछ देर बाद वह अपने कमरे में बैठी थी कि बाहर से सुजाता की आवाज़ सुनाई दी।
"करण... तुम्हारी चाय बिना चीनी की रख दी है।"
"अमन, तुम्हारी फाइल टेबल पर रखी है।"
"जी, आपकी दवाई मेज़ पर रख दी है।"
"आदित्य, तुम्हारा फोन चार्ज पर लगा दिया है।"
आरती हैरानी से दरवाज़े तक आ गई।
इतने लोगों की इतनी छोटी-छोटी बातें... और सब उन्हें याद थीं।
उसे लगा जैसे यह घर किसी एक महिला के भरोसे ही चल रहा है।
अगले दिन भी उसने यही देखा।
कोई सब्ज़ी माँग रहा था।
कोई रुमाल।
किसी की शर्ट प्रेस नहीं हुई थी।
किसी की चप्पल नहीं मिल रही थी।
हर आवाज़ का जवाब सिर्फ एक ही व्यक्ति दे रहा था—सुजाता।
वह कभी मुस्कुराकर समझाती, कभी खुद जाकर चीज़ ढूँढ़ देती।
लेकिन किसी से नाराज़ नहीं होती।
आरती सोचने लगी—
"क्या सच में कोई इंसान बिना थके इतना सब कर सकता है?"
दोपहर तक रिश्तेदार आने लगे।
सब नई बहू को देखने आए थे।
हर कोई आरती की तारीफ़ कर रहा था।
"बहू बहुत सुंदर है।"
"बहुत शालीन लगती है।"
"कितनी पढ़ी-लिखी है।"
आरती सबके पैर छूती और मुस्कुराकर आशीर्वाद लेती।
लेकिन उसने एक बात गौर की।
जो भी रिश्तेदार आते, जाते समय सुजाता से ज़रूर कहते—
"बड़ी बहू, तुमने घर बहुत अच्छे से संभाल रखा है।"
उसने पहली बार महसूस किया कि इस घर की असली नींव कोई और नहीं, सुजाता हैं।
रात को जब सब लोग खाना खा चुके, तब आरती पानी लेने रसोई में गई।
वहाँ का दृश्य देखकर वह रुक गई।
सुजाता अकेली बर्तन समेट रही थीं।
आरती ने हैरानी से पूछा,
"दीदी, आप अभी तक रसोई में हैं?"
सुजाता मुस्कुराईं।
"सब खा लें, उसके बाद ही तो घर की औरत खाना खाती है।"
आरती ने इधर-उधर देखा। डाइनिंग टेबल खाली हो चुकी थी। वह चौंककर बोली,
"लेकिन दीदी, आपने तो अभी तक खाना भी नहीं खाया।"
सुजाता ने प्यार से जवाब दिया,
"पहले सबका पेट भर जाए, वही मेरी सबसे बड़ी खुशी होती है।"
आरती ने पहली बार उनके चेहरे को ध्यान से देखा।
थकान साफ दिखाई दे रही थी।
हाथों में हल्के-हल्के निशान थे।
फिर भी चेहरे पर शिकायत का नाम नहीं था।
उसने तुरंत प्लेट उठाई और बोली,
"आज से आप अकेले कोई काम नहीं करेंगी।"
सुजाता हँस पड़ीं।
"अरे पगली, अभी-अभी आई हो। आराम करो।"
"नहीं दीदी, अब मैं भी इस घर की बहू हूँ। काम हम दोनों मिलकर करेंगे।"
उस रात दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया।
खाते-खाते आरती ने पूछा,
"दीदी... आपने कभी नौकरी नहीं की?"
सुजाता कुछ पल चुप रहीं।
फिर अलमारी से एक पुरानी फाइल निकालकर लाई।
उसमें कई प्रमाणपत्र रखे थे।
आरती ने देखा—
एम.ए. में गोल्ड मेडल।
बी.एड. की डिग्री।
कई प्रतियोगिताओं के प्रमाणपत्र।
वह हैरान रह गई।
"दीदी... आप तो बहुत पढ़ी-लिखी हैं।"
सुजाता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"शादी के बाद नौकरी का मौका मिला था। लेकिन तभी पापा जी बीमार हो गए। फिर मम्मी जी भी चल बसीं। छोटे-छोटे देवर थे। घर संभालने वाला कोई नहीं था।"
"फिर?"
"फिर नौकरी छोड़ दी। सोचा, घर भी तो किसी को संभालना होगा।"
आरती के हाथों से फाइल लगभग छूट गई।
इतना बड़ा त्याग...
और किसी ने कभी इसका ज़िक्र तक नहीं किया।
उसने धीरे से पूछा,
"दीदी... कभी अफसोस नहीं हुआ?"
सुजाता ने मुस्कुराकर कहा,
"जिस घर के लोग अपने हों, वहाँ त्याग बोझ नहीं लगता।"
यह सुनकर आरती की आँखें नम हो गईं।
उसी समय बाहर से करण की आवाज़ आई,
"भाभी... कल छोटी भाभी की पहली रसोई है।"
अमन हँसते हुए बोला,
"हाँ, इस बार कुछ अलग होना चाहिए।"
आदित्य भी मुस्कुराया,
"आरती, तैयार रहना। कल तुम्हारा इम्तिहान है।"
सब हँस पड़े।
आरती भी मुस्कुरा दी।
लेकिन उसके मन में अब सिर्फ पहली रसोई की चिंता नहीं थी।
वह सोच रही थी—
जिस महिला ने इतने वर्षों तक इस घर को अपने हाथों से सँभाला, क्या उसे कभी वह सम्मान मिला जिसकी वह सच में हकदार है?
उसने उसी पल मन ही मन एक फैसला कर लिया...
पहली रसोई में वह सिर्फ खाना ही नहीं बनाएगी, बल्कि पूरे परिवार को एक ऐसी बात भी समझाएगी जिसे शायद वे वर्षों से भूलते आ रहे थे।
आरती पूरी रात ठीक से सो नहीं पाई। उसके मन में बार-बार एक ही बात घूम रही थी—आज उसकी पहली रसोई थी। यह सिर्फ एक रस्म नहीं थी, बल्कि नए परिवार के सामने उसकी पहली पहचान भी बनने वाली थी।
लेकिन उसके मन में एक और बात भी थी।
वह चाहती थी कि आज का दिन सिर्फ उसकी तारीफ़ तक सीमित न रह जाए। वह चाहती थी कि इस घर की उस महिला का सम्मान भी सबके सामने हो, जिसने वर्षों से बिना किसी शिकायत के पूरे परिवार को संभाला था।
थोड़ी देर बाद वह चुपचाप रसोई में पहुँची।
रसोई पहले से ही साफ-सुथरी थी। सारे मसाले करीने से रखे हुए थे। दालों के डिब्बों पर नाम लिखे थे। सब्ज़ियाँ धुली हुई थीं और ज़रूरत का हर सामान अपनी जगह मौजूद था।
आरती मुस्कुरा दी।
वह समझ गई कि यह सब सुजाता की मेहनत थी।
कुछ ही देर में सुजाता भी रसोई में आ गईं।
"अरे, तुम अकेली क्यों शुरू हो गई? मुझे भी बुला लेती।"
आरती ने मुस्कुराकर कहा,
"दीदी, आज तो आपको आराम करना है।"
सुजाता हँस पड़ीं।
"घर की बड़ी बहू को आराम कहाँ मिलता है?"
दोनों साथ मिलकर काम करने लगीं।
आटा गूँथा गया।
सब्ज़ियाँ कटीं।
खीर चढ़ाई गई।
इसी बीच अमन रसोई के दरवाज़े पर आकर बोला,
"छोटी भाभी, आज सिर्फ पूड़ी-सब्ज़ी नहीं चलेगी।"
करण ने भी हँसते हुए कहा,
"हाँ, हमें पिज़्ज़ा भी चाहिए, पास्ता भी और मंचूरियन भी।"
आदित्य ने मुस्कुराकर पत्नी की तरफ देखा।
"देख लो, अब पीछे हटने का मौका नहीं है।"
आरती ने हँसते हुए जवाब दिया,
"ठीक है, जो आदेश मिलेगा, पूरा किया जाएगा।"
सब हँसते हुए बाहर चले गए।
सुजाता ने धीरे से कहा,
"अगर मुश्किल लगे तो रहने देना। पहली रसोई में इतना सब बनाने की ज़रूरत नहीं होती।"
आरती ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"दीदी, आप साथ हैं तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।"
दोनों फिर काम में जुट गईं।
सुजाता कभी सब्ज़ी काट देतीं, कभी गैस की आँच संभालतीं, कभी कोई मसाला पकड़ातीं।
लेकिन हर बार यही कहतीं,
"सबको लगे कि खाना तुमने बनाया है।"
आरती यह सुनकर बस मुस्कुरा देती।
कुछ देर बाद पूरे घर में खुशबू फैलने लगी।
पिज़्ज़ा ओवन से निकल चुका था।
पास्ता भी तैयार था।
मंचूरियन की महक पूरे घर में फैल रही थी।
साथ ही देसी घी में बनी खीर और गरमागरम पूड़ियाँ भी तैयार थीं।
इतने में पड़ोस वाली ताईजी आ गईं।
टेबल पर सजे विदेशी व्यंजन देखकर उन्होंने भौंहें चढ़ा लीं।
"अरे बहू, पहली रसोई में ये सब भी बनता है क्या?"
आरती कुछ कहती, उससे पहले ही सुजाता ने मुस्कुराकर कहा,
"ताईजी, आपकी पसंद की खीर और पूड़ी भी बनाई है। पहले उसका स्वाद तो चखिए।"
ताईजी का चेहरा खिल उठा।
उन्होंने आराम से बैठकर खीर और पूड़ी खाई।
हर कौर के साथ उनकी मुस्कान बढ़ती जा रही थी।
"वाह बहू! बहुत स्वादिष्ट बनाया है। खीर हो या पूड़ी, हर चीज़ में घर का अपनापन झलक रहा है। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।"
उन्होंने नेग में सौ रुपये का नोट दिया और ढेर सारा आशीर्वाद देकर चली गईं।
उनके जाते ही सब लोग खाने की मेज़ पर आ बैठे।
करण ने सबसे पहले पिज़्ज़ा उठाया।
अमन ने मंचूरियन लिया।
आदित्य ने पास्ता चखा।
कुछ ही देर में तीनों एक-दूसरे की प्लेट से भी खाने लगे।
"वाह!"
"कमाल!"
"ऐसा पास्ता तो हमने बाहर भी नहीं खाया।"
हर तरफ बस तारीफ़ ही तारीफ़ थी।
आरती सबको मुस्कुराकर देख रही थी।
उधर सुजाता चुपचाप रसोई में खड़ी सबके लिए गरम पूड़ियाँ तल रही थीं।
उन्होंने खुद अभी तक एक निवाला भी नहीं खाया था।
अचानक करण ने चम्मच से प्लेट बजाई।
सबकी नज़र उसकी तरफ चली गई।
वह खड़ा होकर बोला,
"आज से घोषणा की जाती है कि हमारी छोटी भाभी इस घर की आधिकारिक मास्टर शेफ हैं।"
पूरा कमरा तालियों से गूँज उठा।
अमन ने भी कहा,
"सच में, आज तो आपने कमाल कर दिया।"
आदित्य गर्व से पत्नी की तरफ देख रहा था।
लेकिन तभी...
आरती धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठी।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन आँखों में गहराई साफ दिखाई दे रही थी।
उसने हाथ जोड़कर कहा,
"अगर आप सब अनुमति दें... तो मैं भी दो बातें कहना चाहती हूँ।"
पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।
सबकी निगाहें अब सिर्फ आरती पर थीं।
आरती ने गहरी साँस ली और बोली,
"आज आपने मेरे हाथ के खाने की इतनी तारीफ़ की... इसके लिए मैं दिल से आपका धन्यवाद करती हूँ।"
"लेकिन सच यह है कि अगर आज खाना स्वादिष्ट बना है... तो उसका पूरा श्रेय मुझे नहीं जाता।"
करण ने हैरानी से पूछा,
"मतलब?"
आरती मुस्कुराई।
"खाना सिर्फ मसालों से स्वादिष्ट नहीं बनता... उसे बनाने वाले के संस्कार भी उसमें घुल जाते हैं।"
सब चुप थे।
आरती ने धीरे से अपना हाथ सुजाता की ओर बढ़ाया।
सुजाता अभी भी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं।
"आज मैं जो भी बना पाई हूँ, उसमें हर कदम पर बड़ी भाभी ने मेरा साथ दिया।"
"कहाँ कौन-सा मसाला रखा है... किसे क्या पसंद है... किसकी थाली में क्या पहले परोसना है... यह सब उन्होंने मुझे बताया।"
"अगर ये साथ न होता... तो शायद मैं इतनी आसानी से कुछ भी नहीं बना पाती।"
सुजाता ने तुरंत कहा,
"अरे नहीं, यह सब तुम्हारी मेहनत है।"
लेकिन आरती ने इस बार उनकी बात बीच में ही रोक दी।
"नहीं दीदी... आज मुझे पूरी बात कहने दीजिए।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
आरती ने सबकी तरफ देखते हुए कहा,
"शेफ तो कोई भी बन सकता है..."
"...लेकिन अन्नपूर्णा वही बनती है, जो सालों तक बिना किसी उम्मीद के पूरे परिवार का पेट ही नहीं, दिल भी भरती रहे।"
यह सुनते ही सबकी नज़रें सुजाता पर टिक गईं।
आरती की आवाज़ भर्रा गई।
"इस घर की असली अन्नपूर्णा मैं नहीं..."
"...मेरी बड़ी भाभी हैं।"
इतना कहते हुए उसने सबके सामने झुककर सुजाता के पैर छू लिए।
सुजाता घबरा गईं।
"अरे, ये क्या कर रही हो?"
लेकिन आरती उठी नहीं।
उसने कहा,
"आज अगर मैं सम्मान पा रही हूँ... तो उसकी सबसे बड़ी हकदार आप हैं।"
पूरा कमरा बिल्कुल शांत हो चुका था।
किसी के पास कोई शब्द नहीं था।
सबके चेहरों पर एक ही सवाल था—
क्या सचमुच उन्होंने वर्षों से सुजाता की मेहनत को कभी देखा ही नहीं...?
पूरा कमरा एकदम शांत था।
कुछ क्षण पहले तक जहाँ हँसी-मज़ाक और तालियों की आवाज़ गूँज रही थी, वहाँ अब किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था।
आरती अभी भी झुकी हुई थी।
सुजाता की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उन्होंने जल्दी से आरती को उठाया और गले से लगा लिया।
"पगली... ये क्या कर रही है? छोटी बहनें कभी बड़ी बहनों के पैर नहीं छूतीं।"
आरती मुस्कुराई।
"आज मैंने अपनी बड़ी बहन नहीं... इस घर की अन्नपूर्णा के चरण छुए हैं।"
इतना सुनते ही सुजाता अपने आँसू रोक नहीं पाईं।
उधर बड़े भैया नीरज कुर्सी पर बैठे-बैठे जैसे अतीत में खो गए।
उन्हें अपनी शादी का पहला दिन याद आ गया।
जब सुजाता इस घर में आई थीं, तब माँ-पिताजी जीवित थे।
माँ अक्सर कहा करती थीं,
"बहू, यह घर अब तुम्हारे भरोसे है।"
और सचमुच...
कुछ ही वर्षों बाद माँ और पिताजी दोनों इस दुनिया से चले गए।
उस समय अमन कॉलेज में था।
करण बारहवीं में पढ़ रहा था।
आदित्य तो अभी स्कूल में ही था।
घर की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी।
नीरज नौकरी पर चले जाते और पूरा घर सुजाता अकेले संभालतीं।
उन्होंने कभी अपने मायके वालों से शिकायत नहीं की।
कभी किसी रिश्तेदार के सामने अपने दुख नहीं गिनाए।
बस चुपचाप सबकी जरूरतें पूरी करती रहीं।
नीरज की आँखें भर आईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
"सुजाता..."
इतने वर्षों में शायद पहली बार उन्होंने पत्नी का नाम इतने अपनापन से लिया था।
सुजाता ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
नीरज अपनी कुर्सी से उठे और सबके सामने बोले,
"आज मुझे स्वीकार करने में बिल्कुल शर्म नहीं कि मैं अपनी पत्नी का सबसे बड़ा गुनहगार हूँ।"
सभी चौंक गए।
"मैं हमेशा समझता रहा कि घर संभालना तो इनकी जिम्मेदारी है। कभी यह नहीं सोचा कि इन जिम्मेदारियों के पीछे इनकी कितनी इच्छाएँ दब गईं।"
उन्होंने आरती की ओर देखा।
"अगर आज तुम हमें आईना न दिखाती... तो शायद हम जिंदगी भर यही भूल करते रहते।"
इतना कहते ही उन्होंने सुजाता का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
"मुझे माफ कर दो।"
सुजाता घबरा गईं।
"ऐसा मत कहिए।"
"नहीं सुजाता, आज कहने दीजिए।"
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"तुमने इस घर को सिर्फ संभाला नहीं... उसे टूटने से भी बचाया है।"
अमन अब तक चुप बैठा था।
अचानक वह उठा और सुजाता के पास आकर बैठ गया।
"भाभी..."
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
"याद है... जब मैं इंजीनियरिंग पढ़ रहा था, हर महीने फीस भरने की चिंता करता था?"
सुजाता मुस्कुराईं।
"हाँ, याद है।"
"मुझे बाद में पता चला कि मेरी फीस भरने के लिए आपने अपनी शादी का सोने का कंगन बेच दिया था।"
पूरा कमरा स्तब्ध रह गया।
आरती ने आश्चर्य से सुजाता की तरफ देखा।
उन्होंने कभी इस बात का जिक्र तक नहीं किया था।
सुजाता ने धीरे से कहा,
"अरे... वह तो छोटी-सी बात थी।"
अमन की आवाज़ भर्रा गई।
"मेरे लिए छोटी नहीं थी, भाभी। उसी डिग्री की वजह से आज मैं अच्छी नौकरी कर पा रहा हूँ।"
अब करण भी अपने आँसू नहीं रोक पाया।
वह बोला,
"भाभी... मुझे याद है, बोर्ड की परीक्षा से पहले मेरी तबीयत बहुत खराब हो गई थी।"
"पूरी रात आपने मेरे सिर पर पट्टियाँ रखीं और सुबह मुझे खुद परीक्षा दिलाने लेकर गईं।"
"उस दिन अगर आप साथ न होतीं... तो शायद मैं परीक्षा ही नहीं दे पाता।"
आदित्य भी आगे आया।
उसने मुस्कुराकर कहा,
"और जब मैं पहली बार नौकरी के इंटरव्यू के लिए जा रहा था... तब मेरी शर्ट आपने पूरी रात जागकर प्रेस की थी, क्योंकि बिजली नहीं थी।"
तीनों भाई एक साथ सुजाता के सामने खड़े थे।
उनके चेहरे पर अपराधबोध साफ दिखाई दे रहा था।
आरती चुपचाप यह सब देख रही थी।
उसे लगा...
आज इस घर के रिश्ते सचमुच नए सिरे से जन्म ले रहे हैं।
थोड़ी देर बाद नीरज ने कहा,
"आज से इस घर में एक नया नियम बनेगा।"
सबने उनकी ओर देखा।
"घर का कोई भी काम सिर्फ एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं होगा।"
"रविवार का खाना हम तीनों भाई बनाएँगे।"
"बर्तन हम सब मिलकर साफ करेंगे।"
"जो पहले खाली होगा, वही रसोई में हाथ बँटाएगा।"
करण मुस्कुराया।
"और अगर किसी दिन भाभी रसोई में दिखाई भी दीं... तो सिर्फ हमें सिखाने के लिए।"
सब हँस पड़े।
सुजाता ने कहा,
"इतना सब करने की जरूरत नहीं है।"
आरती तुरंत बोली,
"जरूरत है दीदी। सम्मान सिर्फ शब्दों से नहीं, व्यवहार से मिलता है।"
उस दिन पहली बार सुजाता ने बिना किसी चिंता के सबके साथ बैठकर खाना खाया।
न किसी की थाली परोसनी पड़ी।
न बार-बार उठना पड़ा।
सबने मिलकर उन्हें अपने हाथों से खाना परोसा।
उनकी आँखों में जो संतोष था, वह शब्दों में नहीं बताया जा सकता था।
दिन बीतते गए।
धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।
अब सुबह चाय कोई और बना देता।
सब्ज़ी कोई और काट देता।
रोटी कोई और सेंक देता।
रविवार को रसोई हँसी और शोर से भर जाती।
कभी पिज़्ज़ा बनता, कभी पूड़ी, कभी खिचड़ी, तो कभी हलवा।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव यह था कि अब हर काम के बाद एक आवाज़ जरूर सुनाई देती—
"भाभी... धन्यवाद।"
लगभग छह महीने बाद पड़ोस वाली ताईजी फिर घर आईं।
उन्होंने देखा—
नीरज रोटियाँ बेल रहे थे।
अमन सलाद काट रहा था।
करण बर्तन सजा रहा था।
आदित्य दाल में तड़का लगा रहा था।
और रसोई के एक कोने में सुजाता और आरती बैठकर चाय पीते हुए मुस्कुरा रही थीं।
ताईजी ने आश्चर्य से पूछा,
"अरे बहू, आज तुम्हारी तबीयत ठीक है न?"
सुजाता हँस दीं।
"हाँ ताईजी, बिल्कुल ठीक हूँ।"
"फिर ये सब काम कौन कर रहा है?"
इस बार जवाब आरती ने दिया।
"ताईजी, पहले इस घर में सिर्फ एक अन्नपूर्णा थीं। अब सबने उनसे सेवा करना सीख लिया है।"
ताईजी की आँखें चमक उठीं।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"बेटी, जिस घर में औरत का सम्मान होता है, वहाँ बरकत अपने आप चली आती है।"
नीरज ने मुस्कुराकर सुजाता की ओर देखा और कहा,
"इस घर की सबसे बड़ी दौलत हमारा मकान नहीं... हमारी अन्नपूर्णा हैं।"
सुजाता की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
आरती ने उनका हाथ थाम लिया।
दोनों मुस्कुराईं।
उस दिन किसी ने कोई बड़ी बात नहीं कही।
लेकिन पूरे घर को समझ आ गया था कि...
जिस परिवार में त्याग करने वाले का सम्मान किया जाता है, वहाँ प्रेम कभी कम नहीं होता।

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