बहू से कलेक्टर तक
"तुम इस घर की बहू हो... कलेक्टर बनने का सपना देखना बंद करो।"
सास की यह बात सुनकर पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया।
सबकी नज़रें साक्षी पर टिक गईं। शादी को अभी सिर्फ़ चार महीने हुए थे। हाथों की मेहंदी का रंग पूरी तरह फीका भी नहीं पड़ा था, लेकिन उसके सपनों को फीका करने की कोशिश शुरू हो चुकी थी।
साक्षी ने कुछ पल तक किसी की ओर नहीं देखा। फिर उसने धीरे से अपनी किताब उठाई, उसे सीने से लगाया और शांत आवाज़ में बोली—
"माँजी... अगर बहू होना मेरे सपनों को मार देना है, तो मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं दोनों ज़िम्मेदारियाँ निभाऊँगी... लेकिन अपने सपनों का गला नहीं घोंटूँगी।"
उसकी बात सुनते ही ससुर रामप्रसाद जी गुस्से से खड़े हो गए।
"बहुत ज़ुबान चलने लगी है। हमारे खानदान की कोई बहू नौकरी नहीं करती, और तुम तो कलेक्टर बनने चली हो!"
पति अमन चुपचाप सिर झुकाकर बैठा रहा। साक्षी की सबसे बड़ी तकलीफ़ यही थी कि उसका अपना जीवनसाथी भी उसके लिए एक शब्द नहीं बोल रहा था।
उस रात साक्षी बहुत देर तक जागती रही। उसने अलमारी से अपनी पुरानी डायरी निकाली। पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा था—
"आईएएस अधिकारी बनकर अपने गाँव की बेटियों के लिए कुछ करना है।"
यह सपना उसने बारहवीं कक्षा में देखा था।
साक्षी एक छोटे कस्बे के सरकारी शिक्षक हरिशंकर जी की बेटी थी। घर में पैसे ज़्यादा नहीं थे, लेकिन शिक्षा को सबसे बड़ा धन माना जाता था।
पिता अक्सर कहते थे—
"बेटी, इंसान का सम्मान उसके कपड़ों या पैसों से नहीं, उसके कर्म और ज्ञान से होता है।"
साक्षी ने पढ़ाई में हमेशा अव्वल स्थान हासिल किया। कॉलेज में गोल्ड मेडल मिला। उसने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी शुरू कर दी थी।
तभी रिश्ता आया।
अमन एक बड़े व्यापारी परिवार का इकलौता बेटा था। परिवार ने वादा किया—
"हम बहू को बेटी बनाकर रखेंगे। उसकी पढ़ाई कभी नहीं रुकने देंगे।"
माँ-बाप ने भरोसा कर लिया।
लेकिन शादी के बाद सारे वादे बदल गए।
किताबों की जगह रसोई ने ले ली।
लाइब्रेरी की जगह मेहमानों की चाय ने।
और सपनों की जगह ताने सुनाई देने लगे।
हर दिन कोई न कोई कह देता—
"इतनी पढ़ाई करके क्या मिलेगा?"
"घर संभालो, यही सबसे बड़ी नौकरी है।"
"आईएएस बनने चली है... पहले गोल रोटी बनाना सीखो।"
साक्षी मुस्कुराकर सब सहती रही।
वह रात के बारह बजे सबके सो जाने के बाद पढ़ती।
कभी रसोई की मेज़ पर...
कभी छत के कोने में...
कभी मोबाइल की टॉर्च जलाकर।
एक दिन उसकी सास ने किताबें उठाकर अलमारी के ऊपर रख दीं।
"अब बस... बहुत पढ़ लिया।"
उस दिन पहली बार साक्षी रोई।
लेकिन अगले ही पल उसने आँसू पोंछे और मन ही मन एक फैसला कर लिया...
"अब मेरी हार सिर्फ़ मेरी नहीं होगी... उन सभी लड़कियों की होगी जो अपने सपनों के लिए लड़ रही हैं। इसलिए मैं हार नहीं मानूँगी।"
साक्षी ने किसी से बहस नहीं की। उसने चुपचाप एक स्टूल खींचा, अलमारी के ऊपर रखी अपनी किताबें उतारीं, उन्हें साफ़ किया और फिर से अपने कमरे में रख दिया।
उसका यह शांत विरोध घरवालों को और ज़्यादा खटकने लगा।
अब हर छोटी-बड़ी बात पर उसे सुनाया जाने लगा।
"बहू, तुम्हें घर की चिंता कम और किताबों की ज़्यादा रहती है।"
"इतना पढ़कर भी आखिर करना क्या है?"
"जब पति अच्छी कमाई करता है तो नौकरी की क्या ज़रूरत है?"
साक्षी हर बार बस इतना कहती—
"ज्ञान कभी बेकार नहीं जाता।"
अमन अब भी चुप रहता। वह न पत्नी का साथ देता, न परिवार का विरोध करता।
साक्षी समझ चुकी थी कि उसे अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी होगी।
कुछ दिनों बाद संघ लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा की तारीख़ घोषित हुई।
साक्षी ने फॉर्म पहले ही भर रखा था।
जब घरवालों को यह बात पता चली तो जैसे तूफ़ान आ गया।
"तुमने हमसे पूछे बिना फॉर्म भर दिया?"
ससुर रामप्रसाद जी गरज उठे।
"जी... क्योंकि यह मेरा सपना है।"
"सपना भूल जाओ। उस दिन तुम्हें कहीं नहीं जाना है।"
साक्षी ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा—
"मैं परीक्षा देने ज़रूर जाऊँगी।"
सास ने तुरंत ताना मारा—
"अगर इस घर की दहलीज़ पार की, तो वापस मत आना।"
कमरे में खामोशी फैल गई।
साक्षी की नज़र अमन पर गई।
उसे उम्मीद थी कि शायद इस बार वह कुछ बोलेगा।
लेकिन अमन ने फिर वही किया...
सिर झुका लिया।
उस रात साक्षी ने अपने पिता को फ़ोन नहीं किया।
वह जानती थी कि अगर पिता को यह सब पता चला तो उन्हें बहुत दुःख होगा।
उसने अपने गहनों में से एक पतली-सी सोने की चेन निकाली और अगले दिन चुपचाप बेच दी।
उसी पैसे से परीक्षा केंद्र तक आने-जाने का किराया और ज़रूरी किताबें खरीद लीं।
परीक्षा वाले दिन घर में किसी ने उसे शुभकामनाएँ नहीं दीं।
वह चुपचाप भगवान के सामने हाथ जोड़कर निकली।
बस अड्डे तक वह पैदल गई।
रास्ते भर उसके कानों में सास की बात गूँजती रही—
"असफल होकर ही लौटोगी।"
साक्षी ने मन ही मन कहा—
"अगर हार भी गई... तो कोशिश करके हारूँगी, बिना लड़े नहीं।"
परीक्षा अच्छी हुई।
वह घर लौटी तो किसी ने यह तक नहीं पूछा कि पेपर कैसा गया।
जैसे वह इस घर की बहू नहीं, एक अनचाही मेहमान हो।
करीब डेढ़ महीने बाद परिणाम आया।
साक्षी प्रारंभिक परीक्षा शानदार अंकों से पास कर चुकी थी।
पूरा मोहल्ला उसे बधाई देने लगा।
अख़बार में उसका नाम भी छपा।
लेकिन घर के भीतर किसी के चेहरे पर खुशी नहीं थी।
ससुर ने अख़बार मोड़ते हुए कहा—
"अभी तो पहली सीढ़ी है। इतना खुश होने की ज़रूरत नहीं।"
साक्षी मुस्कुरा दी।
उसे अब समझ आ गया था कि कुछ लोगों को आपकी सफलता नहीं, आपकी हार का इंतज़ार होता है।
उसने बिना समय गंवाए मुख्य परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
लेकिन उसे क्या पता था...
उसकी असली परीक्षा अभी किताबों से नहीं, अपने ही परिवार से होने वाली थी।
मुख्य परीक्षा में अब सिर्फ़ तीन महीने बचे थे।
साक्षी ने अपनी पूरी दिनचर्या बदल दी। वह घर के सारे काम पहले खत्म करती, फिर पढ़ाई में जुट जाती। कई बार रात के दो-दो बजे तक जागती, लेकिन सुबह सबसे पहले उठकर रसोई में भी वही दिखाई देती।
उसे उम्मीद थी कि शायद अब घरवालों का मन बदल जाए।
लेकिन हुआ ठीक उल्टा।
एक दिन सास ने उसकी सारी नोटबुक और किताबें उठाकर स्टोर रूम में रख दीं।
"अब बहुत हो गया। अगले महीने तुम्हारी ननद की शादी है। पूरे घर की ज़िम्मेदारी तुम्हें संभालनी होगी। पढ़ाई-लिखाई बाद में करना।"
साक्षी ने शांत स्वर में कहा,
"माँजी, मैं शादी की पूरी तैयारी करूँगी। लेकिन रोज़ चार-पाँच घंटे पढ़ाई भी करूँगी।"
"नहीं होगी पढ़ाई!" सास ने सख़्त लहजे में कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि इस घर का फैसला हम करते हैं।"
उस दिन पहली बार साक्षी ने बिना आवाज़ ऊँची किए एक ऐसा जवाब दिया, जिसने सबको चुप कर दिया।
"घर के फैसले आप कर सकती हैं... लेकिन मेरी मेहनत और मेरा भविष्य मेरे फैसले होंगे।"
ससुर गुस्से में उठ खड़े हुए।
"बहुत घमंड आ गया है पढ़ाई का!"
साक्षी ने हाथ जोड़ लिए।
"घमंड नहीं बाबूजी... आत्मविश्वास है।"
उसकी यह बात किसी को पसंद नहीं आई।
अगले ही दिन उसका मोबाइल अपने पास रख लिया गया।
कहा गया—
"अब पढ़ाई का सारा नशा उतर जाएगा।"
साक्षी मुस्कुराई।
उसे मोबाइल से ज़्यादा अपनी किताबों पर भरोसा था।
वह पुरानी कॉपियों में नोट्स बनाती रही।
कभी अख़बार पढ़ती, कभी लाइब्रेरी से किताबें लाती।
धीरे-धीरे शादी का समय भी आ गया।
पूरा घर मेहमानों से भर गया।
हर कोई साक्षी की तारीफ़ करता—
"बहू बहुत मेहनती है।"
लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि वही बहू हर रात सबके सोने के बाद टॉर्च की रोशनी में पढ़ती है।
शादी के दो दिन पहले की बात थी।
साक्षी अपने कमरे में संविधान की एक किताब पढ़ रही थी।
तभी सास अंदर आईं।
उन्होंने बिना कुछ कहे किताब उसके हाथ से छीनी और ज़मीन पर फेंक दी।
"अब अगर मैंने तुम्हें किताब खोलते देखा, तो अच्छा नहीं होगा।"
कमरे में कुछ पल की ख़ामोशी छा गई।
साक्षी ने झुककर किताब उठाई।
उसने धूल साफ़ की...
किताब को माथे से लगाया...
और बहुत शांत आवाज़ में बोली—
"जिस घर में किताबों का अपमान होता है, वहाँ लक्ष्मी तो आ सकती हैं... लेकिन सरस्वती ज़्यादा देर नहीं ठहरती।"
यह सुनते ही सास का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उन्होंने उसी समय फैसला सुना दिया—
"शादी खत्म होने तक तुम कमरे से बाहर नहीं निकलोगी... और परीक्षा देने की बात तो भूल ही जाओ।"
साक्षी समझ गई...
अब लड़ाई सिर्फ़ सपनों की नहीं रही।
अब उसके आत्मसम्मान की भी थी।
उसने उसी रात अपनी डायरी खोली और एक पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा—
"अगर इस बार मैं झुक गई... तो पूरी ज़िंदगी सिर उठाकर नहीं जी पाऊँगी।"
उसने डायरी बंद की, गहरी साँस ली और एक ऐसा निर्णय लिया...
जिससे अगले ही दिन पूरे घर में हड़कंप मचने वाला था।
अगले दिन जैसे ही घर के लोग शादी की तैयारियों में व्यस्त हुए, साक्षी ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
उसने अलमारी खोली।
एक तरफ़ शादी के भारी गहने और महँगी साड़ियाँ रखी थीं।
दूसरी तरफ़ उसकी पुरानी किताबें, नोट्स और डायरी।
साक्षी ने बिना एक पल सोचे गहनों की जगह किताबों वाला बैग उठा लिया।
उसी समय दरवाज़ा खुला।
अमन सामने खड़ा था।
"कहाँ जा रही हो?" उसने धीमे स्वर में पूछा।
"मुख्य परीक्षा देने।"
"अगर तुम गईं तो घर में बहुत बड़ा झगड़ा हो जाएगा।"
साक्षी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"झगड़ा तो उस दिन हो गया था, जब मेरे सपनों को कैद कर दिया गया था। आज मैं सिर्फ़ उन्हें आज़ाद करने जा रही हूँ।"
अमन कुछ नहीं बोला।
वह रास्ते से हट गया।
साक्षी चुपचाप घर से निकल गई।
जब सास को पता चला तो पूरा घर सिर पर उठा लिया गया।
"देखा... हमने पहले ही कहा था, पढ़ाई ने इसे बिगाड़ दिया है।"
ससुर ने गुस्से में कहा—
"आज से इस घर के दरवाज़े इसके लिए बंद हैं।"
शाम तक यह बात साक्षी के मायके भी पहुँच गई।
पिता हरिशंकर जी ने उसे फ़ोन किया।
"बेटी, अगर लौटना चाहो तो यह घर हमेशा तुम्हारा है। लेकिन फैसला सोच-समझकर लेना।"
साक्षी की आँखें भर आईं।
"पापा... मैं किसी घर से भाग नहीं रही। मैं अपने सपनों की ओर जा रही हूँ।"
पिता ने सिर्फ़ इतना कहा—
"फिर पीछे मुड़कर मत देखना।"
साक्षी ने पूरी लगन से मुख्य परीक्षा दी।
पेपर उम्मीद से भी बेहतर हुए।
लेकिन अब उसके सामने सबसे बड़ी समस्या थी।
ससुराल लौटे या नहीं?
बहुत देर तक वह बस स्टैंड की बेंच पर बैठी रही।
फिर उसने एक निर्णय लिया।
वह सीधे अपने मायके नहीं गई।
उसने उसी शहर में एक छोटे-से छात्रावास में कमरा किराए पर लिया।
खर्च चलाने के लिए पास के एक कोचिंग संस्थान में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
दिन में पढ़ाती...
रात में अपनी तैयारी करती।
उसने किसी से एक रुपया भी नहीं माँगा।
कई बार महीने के आख़िरी दिनों में उसके पास सिर्फ़ दाल और चावल खरीदने भर के पैसे बचते।
फिर भी उसके चेहरे पर शिकायत नहीं होती।
उसे विश्वास था कि कठिन दिन हमेशा नहीं रहते।
करीब चार महीने बाद संघ लोक सेवा आयोग का परिणाम आया।
उस दिन छात्रावास के बाहर अचानक भीड़ जमा हो गई।
कोचिंग के बच्चे दौड़ते हुए उसके कमरे तक पहुँचे।
"मैडम... आपका इंटरव्यू के लिए चयन हो गया!"
साक्षी कुछ पल तक स्क्रीन को देखती रही।
फिर उसने भगवान की तस्वीर के सामने सिर झुका दिया।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे...
लेकिन इस बार ये आँसू हार के नहीं, उम्मीद के थे।
उधर, उसी समय ससुराल में भी टीवी पर खबर चल रही थी।
"स्थानीय युवती साक्षी शर्मा ने संघ लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण कर इंटरव्यू के लिए स्थान बनाया।"
टीवी की स्क्रीन पर साक्षी की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी।
पूरा घर पहली बार बिल्कुल शांत था।
सास के हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर गया।
अमन बिना कुछ बोले स्क्रीन को देखता रह गया।
जिस लड़की को उन्होंने घर से निकाल दिया था...
आज वही पूरे शहर की चर्चा बन चुकी थी।
लेकिन साक्षी की सबसे कठिन परीक्षा अभी बाकी थी।
क्योंकि इंटरव्यू से ठीक पाँच दिन पहले...
एक ऐसी घटना हुई जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी बदलकर रख दी।
इंटरव्यू से ठीक पाँच दिन पहले साक्षी को एक अनजान नंबर से फ़ोन आया।
"हैलो... क्या आप साक्षी बोल रही हैं?"
"जी।"
"मैं सिटी हॉस्पिटल से बोल रहा हूँ। आपके पति अमन का एक्सीडेंट हो गया है। उनकी हालत गंभीर है। उनके मोबाइल में सबसे पहले आपका नंबर मिला, इसलिए आपको सूचना दे रहे हैं।"
कुछ पल के लिए साक्षी के हाथ काँप गए।
जिस इंसान ने कभी उसका साथ नहीं दिया, वही आज ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा था।
उसने बिना एक पल गँवाए अस्पताल का रुख किया।
जब वह पहुँची, तो बाहर सास और ससुर रो रहे थे।
सास ने साक्षी को देखा तो नज़रें झुका लीं।
शायद पहली बार उन्हें अपने व्यवहार पर शर्म आई थी।
डॉक्टर बाहर आए।
"मरीज की जान फिलहाल सुरक्षित है, लेकिन उन्हें कुछ दिन आराम की ज़रूरत होगी।"
सबने राहत की साँस ली।
अमन को होश आया तो सबसे पहले उसकी नज़र साक्षी पर पड़ी।
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
"तुम... आई?"
साक्षी ने शांत स्वर में कहा—
"मुसीबत में इंसानियत पहले आती है, रिश्ते बाद में।"
अमन बहुत देर तक कुछ बोल नहीं पाया।
अगले दिन उसने साक्षी से अकेले में बात करने की इच्छा जताई।
कमरे में सिर्फ़ दोनों थे।
अमन ने धीमे स्वर में कहा—
"मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। जब तुम्हें मेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मैं डरता रहा... चुप रहा। मेरी चुप्पी ने तुम्हें सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाई।"
साक्षी ने कोई जवाब नहीं दिया।
अमन आगे बोला—
"अगर हो सके... तो मुझे माफ़ कर देना।"
साक्षी ने उसकी ओर देखा।
"माफ़ करना मुश्किल नहीं है, अमन। लेकिन जो भरोसा एक बार टूट जाता है, उसे वापस बनने में बहुत समय लगता है।"
कमरे में फिर खामोशी छा गई।
तीन दिन बाद अमन की हालत सुधरने लगी।
उसी दिन साक्षी का इंटरव्यू था।
सास उसके पास आईं।
उनकी आँखें नम थीं।
उन्होंने काँपते हाथों से साक्षी का हाथ पकड़ा।
"बहू... नहीं... बेटी... हमने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया। अगर आज तुम अस्पताल न आतीं, तो शायद हम खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाते।"
साक्षी चुप रही।
सास ने आगे कहा—
"जाओ... अपना इंटरव्यू दो। इस बार तुम्हें रोकने वाला इस घर में कोई नहीं होगा।"
पहली बार ससुर रामप्रसाद जी भी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े थे।
"हमें माफ़ कर दो, बेटी।"
साक्षी ने उनके हाथ तुरंत पकड़ लिए।
"बड़ों के हाथ जुड़े हुए अच्छे नहीं लगते, बाबूजी।"
यह सुनकर तीनों की आँखें भर आईं।
साक्षी सीधे इंटरव्यू देने चली गई।
बोर्ड के सामने उससे कई कठिन सवाल पूछे गए।
एक सदस्य ने मुस्कुराकर पूछा—
"अगर आपको अपने जीवन की सबसे बड़ी सीख एक वाक्य में बतानी हो, तो क्या कहेंगी?"
साक्षी ने बिना सोचे जवाब दिया—
"जिस इंसान को दुनिया रोकती है, अगर वह खुद को नहीं रोकता, तो उसकी मंज़िल उससे कभी दूर नहीं रहती।"
पूरा बोर्ड कुछ पल तक उसे देखता रहा।
फिर सभी के चेहरों पर हल्की मुस्कान आ गई।
साक्षी बाहर निकली।
आज उसे पहली बार लगा...
वह सचमुच अपनी मंज़िल के बहुत करीब पहुँच चुकी है।
लेकिन अंतिम परिणाम अभी आना बाकी था...
और वही परिणाम उसकी पूरी ज़िंदगी की दिशा तय करने वाला था।
तीन महीने बाद संघ लोक सेवा आयोग का अंतिम परिणाम घोषित होने वाला था।
पूरे देश की तरह साक्षी भी उस दिन बेचैन थी।
उसने सुबह से ही मोबाइल बंद कर दिया था। वह किसी भी अफवाह या अधूरी खबर से खुद को दूर रखना चाहती थी।
वह पास के मंदिर गई, कुछ देर शांत बैठी और फिर सीधे छात्रावास लौट आई।
कमरे में उसकी पुरानी डायरी मेज़ पर रखी थी।
उसने पहला पन्ना खोला।
वही पुराना सपना...
"आईएएस अधिकारी बनकर अपने गाँव की बेटियों के लिए कुछ करना है।"
साक्षी मुस्कुरा दी।
चाहे परिणाम कुछ भी हो, उसे इस बात का गर्व था कि उसने अपने सपनों के सामने कभी हार नहीं मानी।
इसी बीच बाहर से शोर सुनाई देने लगा।
छात्रावास की वार्डन दौड़ती हुई उसके कमरे तक आई।
"साक्षी... जल्दी बाहर आओ!"
साक्षी घबरा गई।
"क्या हुआ?"
वार्डन की आँखों में खुशी के आँसू थे।
"तुम... तुम आईएएस बन गई हो!"
साक्षी कुछ पल तक वहीं खड़ी रह गई।
उसे लगा जैसे उसने ठीक से सुना ही नहीं।
वार्डन ने मोबाइल उसके हाथ में दे दिया।
स्क्रीन पर उसका नाम था...
साक्षी हरिशंकर शर्मा—ऑल इंडिया रैंक 27।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
उसे सबसे पहले अपने पिता की याद आई।
उसने काँपते हाथों से उन्हें फ़ोन लगाया।
उधर से आवाज़ आई—
"बेटी..."
बस इतना सुनते ही साक्षी रो पड़ी।
हरिशंकर जी भी रो रहे थे।
"तूने मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया, बेटी।"
पूरा शहर खुशी से झूम उठा।
जिस लड़की को कभी कहा गया था कि वह सिर्फ़ रसोई तक सीमित रहे...
आज वही पूरे जिले की शान बन चुकी थी।
टीवी चैनलों पर उसका इंटरव्यू आने लगा।
अख़बारों की पहली खबर वही थी।
उधर ससुराल में लोगों का ताँता लग गया।
जो रिश्तेदार कभी कहते थे—
"इतनी पढ़ाई का क्या फायदा?"
आज वही मिठाई लेकर आ रहे थे।
सास चुपचाप दरवाज़े पर बैठी सब देख रही थीं।
उन्होंने धीरे से कहा—
"जिसे हमने रोकना चाहा... वही हमारी सबसे बड़ी पहचान बन गई।"
कुछ दिनों बाद साक्षी की पहली नियुक्ति एक पिछड़े जिले में हुई।
उसने सरकारी बंगले में रहने के बजाय सबसे पहले सरकारी स्कूलों और लड़कियों की शिक्षा पर काम शुरू किया।
उसने एक योजना बनाई, जिसके तहत गरीब परिवारों की बेटियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की निःशुल्क तैयारी कराई जाने लगी।
वह हर महीने एक दिन खुद उन छात्राओं को पढ़ाती।
जब कोई लड़की कहती—
"मैडम, मैं भी आपकी तरह अफसर बनना चाहती हूँ।"
तो साक्षी मुस्कुराकर कहती—
"मेरी तरह नहीं... मुझसे भी बेहतर बनना।"
कुछ वर्षों बाद...
एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में साक्षी मुख्य अतिथि बनकर पहुँची।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक वृद्ध महिला भीड़ चीरते हुए उसके पास आई।
वह उसकी सास थीं।
उन्होंने बिना कुछ कहे साक्षी के सिर पर हाथ रख दिया।
"बेटी... आज समझ में आया कि बहू घर की इज़्ज़त सिर्फ़ रसोई से नहीं, अपने कर्मों से भी बढ़ाती है।"
साक्षी ने झुककर उनके पैर छुए।
उसने पुराने घावों को याद नहीं किया।
क्योंकि समय ने उसे बदला नहीं था...
समय ने उसे और बड़ा बना दिया था।
उस रात साक्षी ने अपनी डायरी का आख़िरी पन्ना खोला और लिखा—
"सपनों की सबसे बड़ी दुश्मन परिस्थितियाँ नहीं होतीं, बल्कि वह डर होता है जो हमें पहला कदम उठाने से रोक देता है। जिस दिन इंसान डर से बड़ा हो जाता है, उसी दिन उसकी जीत शुरू हो जाती है।"
डायरी बंद हुई...
लेकिन साक्षी की कहानी नहीं।
वह हर उस लड़की की प्रेरणा बन गई, जिसे कभी यह कहा गया था—
"तुम नहीं कर पाओगी।"
और उसने अपनी पूरी ज़िंदगी से सिर्फ़ एक जवाब दिया—
"कोशिश करने वालों के लिए 'नामुमकिन' सिर्फ़ एक शब्द है, सच नहीं।"

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