आख़िरी मुलाक़ात
"ट्रेन ने सीटी दी ही थी कि तभी भीड़ को चीरता हुआ एक आदमी मेरे डिब्बे में चढ़ा... और उसे देखते ही मेरी बीस साल पुरानी दुनिया फिर से आँखों के सामने आ खड़ी हुई।"
मैं खिड़की के पास बैठी बाहर प्लेटफॉर्म पर भागते लोगों को देख रही थी। हाथ में पानी की बोतल थी, लेकिन प्यास बिल्कुल नहीं थी। मन कहीं और भटक रहा था।
स्लीपर में टिकट नहीं मिला था, इसलिए मजबूरी में जनरल डिब्बे में सफर करना पड़ रहा था। भीड़ इतनी थी कि साँस लेना भी मुश्किल लग रहा था। कोई अपने बैग संभाल रहा था, कोई बच्चों को गोद में लिए खड़ा था। ऊपर की रैक तक लोगों ने सामान ठूँस दिया था।
मेरे बगल की सीट अभी खाली थी।
ट्रेन चलने ही वाली थी कि तभी एक आदमी तेजी से अंदर आया। उसके हाथ में छोटा-सा बैग था। माथे पर पसीना था। शायद दौड़कर आया था।
उसने एक पल के लिए पूरे डिब्बे में नज़र दौड़ाई और फिर सीधा मेरी सीट की तरफ बढ़ आया।
मेरे पास आकर उसने धीरे से पूछा,
"यहाँ कोई बैठा है क्या?"
मैंने सिर हिलाकर 'नहीं' कहा।
वह बिना कुछ बोले बैठ गया।
मैंने उसकी तरफ देखा...
और अगले ही पल मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया।
क्या यह...?
नहीं...
हो ही नहीं सकता...
मैंने दोबारा गौर से देखा।
आँखें वही थीं...
माथा वही...
हँसते समय गाल पर पड़ने वाला हल्का-सा गड्ढा भी वही।
बस उम्र ने चेहरे पर थोड़ा ठहराव ला दिया था।
यह विवेक था।
वही विवेक...
जिसके साथ मैंने स्कूल की दसवीं से लेकर कॉलेज तक पाँच साल बिताए थे।
वही विवेक...
जिससे कभी अपने दिल की बात नहीं कह सकी।
और वही...
जो एक दिन बिना कुछ कहे फ़ौज में भर्ती होकर चला गया था।
उसके जाने के कुछ महीनों बाद मेरी शादी हो गई थी।
फिर ज़िंदगी अपनी-अपनी राहों पर निकल गई।
मैं उसे देखती रही।
वह बिल्कुल अनजान बनकर बैठा था।
जैसे पहली बार किसी अजनबी के पास बैठा हो।
मैंने सोचा...
शायद उसने मुझे पहचाना ही नहीं।
उम्र ने मुझे भी तो बदल दिया था।
चेहरे पर पहले जैसी चमक कहाँ रही थी।
बालों में सफेदी की कुछ लटें भी दिखने लगी थीं।
मैंने चुपके से साड़ी का पल्लू थोड़ा आगे कर लिया।
मन जाने क्यों घबरा रहा था।
इतने वर्षों बाद अगर उसने पहचान भी लिया...
तो क्या होगा?
और अगर नहीं पहचाना...
तो उससे भी ज़्यादा दुख होगा।
वह मोबाइल निकालकर कुछ पढ़ने लगा।
बीच-बीच में हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर आ जाती।
मैं उसे देखती...
फिर तुरंत नज़रें हटा लेती।
डर था कि कहीं वह मुझे घूरते हुए न पकड़ ले।
करीब बीस मिनट निकल गए।
हम दोनों में एक भी शब्द नहीं हुआ।
इतने में चाय वाला आया।
"चाय... गरम चाय..."
मैंने एक कप ले लिया।
उसने भी चाय ली।
जब पैसे देने लगी तो चाय वाला बोला,
"मैडम, आपके पैसे तो साहब दे चुके हैं।"
मैं चौंक गई।
मैंने उसकी तरफ देखा।
वह अब भी बाहर देख रहा था।
मैंने कहा,
"आपने पैसे क्यों दिए?"
वह मुस्कुराया भी नहीं।
बस इतना बोला,
"अकेले सफर कर रही हैं... इतना तो कर ही सकता हूँ।"
उसकी आवाज़ सुनते ही मेरा भ्रम टूट गया।
यह वही आवाज़ थी...
जिसे मैं वर्षों बाद भी भूल नहीं पाई थी।
अब मुझे यकीन हो गया।
यह विवेक ही था।
लेकिन वह अब भी मुझे नाम से नहीं बुला रहा था।
मैंने हिम्मत जुटाई।
"माफ़ कीजिए... क्या हम पहले कभी मिले हैं?"
उसने पहली बार मेरी तरफ सीधे देखा।
कुछ पल तक देखता रहा।
फिर बहुत धीमे से बोला,
"अगर मैं कहूँ कि बीस साल पहले मिले थे... तो यकीन करोगी?"
मेरी साँस जैसे रुक गई।
"विवेक...?"
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"आख़िर पहचान ही लिया।"
मेरी आँखें भर आईं।
मैं कुछ बोल ही नहीं पाई।
इतने साल...
इतनी दूरियाँ...
और आज...
एक जनरल डिब्बे में अचानक मुलाकात।
जिंदगी सचमुच कहानियों से भी ज़्यादा अजीब होती है।
मैंने खुद को संभालते हुए पूछा,
"तुमने पहले क्यों नहीं बताया कि तुमने पहचान लिया है?"
वह खिड़की से बाहर देखते हुए बोला,
"पहले यह देखना चाहता था कि तुम पहचानती हो या नहीं।"
मैं हँस पड़ी।
"और अगर नहीं पहचानती?"
विवेक ने खिड़की से बाहर देखते हुए शांत स्वर में कहा, "तो चुपचाप अगले स्टेशन पर उतर जाता।"
मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा, "इतनी बेरुखी?"
वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, "बेरुखी नहीं... बस कुछ रिश्तों की इज़्ज़त दूर रहकर ही बची रहती है।"
उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गई।
आज भी वह पहले जैसा ही था।
कम बोलने वाला...
लेकिन हर बात दिल तक पहुँचाने वाला।
मैंने पूछा,
"कहाँ जा रहे हो?"
उसने जवाब दिया,
"अभी नहीं बताऊँगा।"
मैंने हैरानी से पूछा, "क्यों?"
विवेक हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, "क्योंकि पहले तुम्हारी कहानी सुननी है।"
मैं मुस्कुरा दी।
"मेरी कहानी बहुत साधारण है।"
वह बोला,
"जिस लड़की की मुस्कान पूरे स्कूल को याद थी... उसकी कहानी कभी साधारण नहीं हो सकती।"
मेरे चेहरे पर बरसों बाद वैसी ही मुस्कान लौट आई...
जिसे शायद मैंने शादी के बाद कहीं खो दिया था।
ट्रेन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही...
और हमारी बीस साल पुरानी कहानी फिर से वहीं से शुरू होने लगी...
ट्रेन अपनी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। बाहर खेत, छोटे-छोटे स्टेशन और पेड़ पीछे छूटते जा रहे थे, लेकिन हमारे लिए समय जैसे बीस साल पीछे लौट चुका था।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
इतने वर्षों की दूरी को कुछ मिनटों की बातों में कैसे समेटा जा सकता था?
आख़िर मैंने ही चुप्पी तोड़ी।
"तुम बिल्कुल नहीं बदले..."
विवेक हल्का-सा मुस्कुराया।
"बदल गया हूँ... बस तुम्हें दिख नहीं रहा।"
मैंने हैरानी से पूछा, "क्या बदल गया?"
विवेक ने खिड़की से बाहर देखते हुए धीमे स्वर में कहा, "पहले सपने बहुत थे... अब सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ हैं।"
उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी थकान थी।
मैंने विषय बदल दिया।
"याद है स्कूल का वो नीम का पेड़?"
वह हँस पड़ा।
"जहाँ तुम हर सोमवार अपनी कॉपी भूल जाती थीं।"
मैं हँसकर बोली, "और तुम अपनी कॉपी मुझे दे देते थे।"
विवेक हँस पड़ा, "फिर मास्टर जी मुझे ही डाँटते थे।"
दोनों हँस पड़े।
पास बैठे कुछ यात्री हमारी तरफ देखने लगे।
कई साल बाद मैं दिल खोलकर हँसी थी।
विवेक मुझे देखता रहा।
फिर धीरे से बोला,
"तुम्हारी हँसी आज भी वैसी ही है।"
मैंने नज़रें झुका लीं।
दिल के किसी कोने में दबी हुई धड़कन फिर से जाग उठी थी।
थोड़ी देर बाद उसने पूछा,
"घर में सब ठीक हैं?"
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"हाँ... सब ठीक हैं।"
उसने तुरंत कहा,
"झूठ।"
मैं चौंक गई।
"इतने यकीन से कैसे कह सकते हो?"
"क्योंकि तुम जब सच बोलती हो तो आँखों में देखती हो... और जब झूठ बोलती हो तो खिड़की के बाहर।"
मैं कुछ नहीं बोली।
उसने आज भी मुझे वैसे ही पढ़ लिया था जैसे कॉलेज के दिनों में पढ़ लिया करता था।
कुछ देर बाद मैंने धीरे से कहा,
"ज़िंदगी बुरी नहीं है... बस कभी-कभी बहुत अकेली लगती है।"
वह चुपचाप सुनता रहा।
"पति अच्छे हैं, बच्चों की पढ़ाई है, घर है... सब कुछ है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि अपने लिए जीना कब का भूल गई।"
विवेक ने लंबी साँस ली।
"हर औरत यही कहती है... और हर आदमी यही सोचता है कि उसने सब कुछ दे दिया।"
उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं।
मैंने पूछा,
"और तुम्हारी ज़िंदगी?"
वह कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला,
"शादी हुई थी।"
मैंने उसकी तरफ देखा।
"पत्नी बहुत अच्छी थी।"
"फिर?"
उसने जेब से बटुआ निकाला।
उसमें से एक छोटी-सी तस्वीर निकाली।
एक मुस्कुराती हुई महिला की तस्वीर।
उसने तस्वीर को बड़े प्यार से देखा।
"तीन साल पहले बीमारी ने उसे मुझसे छीन लिया।"
मेरे हाथ अपने आप उसके हाथ पर चले गए।
"मुझे माफ़ करना... मुझे नहीं पता था।"
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"ज़िंदगी किसी को सब कुछ नहीं देती।"
हम दोनों फिर चुप हो गए।
ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी।
कुछ यात्री उतर गए।
डिब्बे में थोड़ी जगह हो गई।
एक बुज़ुर्ग महिला भारी बैग लेकर चढ़ीं।
बैठने की जगह नहीं थी।
विवेक तुरंत उठ गया।
"माँ जी, आप बैठ जाइए।"
बुज़ुर्ग ने मना किया।
लेकिन उसने ज़बरदस्ती उन्हें अपनी सीट पर बैठा दिया।
अब वह खुद दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।
मैं उसे देखती रही।
बीस साल बाद भी उसके संस्कार नहीं बदले थे।
करीब आधे घंटे बाद बुज़ुर्ग उतर गईं।
वह फिर आकर मेरे पास बैठ गया।
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"तुम आज भी वैसे ही हो।"
विवेक मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया।
"कैसा?"
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"दूसरों के लिए अपनी तकलीफ़ भूल जाने वाले।"
वह कुछ नहीं बोला।
थोड़ी देर बाद उसने बैग खोला।
उसमें से एक पुरानी डायरी निकाली।
डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे।
उसने एक पन्ना खोला और मेरी तरफ बढ़ा दिया।
"पहचानती हो?"
मैंने देखा।
वह मेरी ही लिखावट थी।
कॉलेज के आख़िरी दिन मैंने पूरी क्लास के लिए एक छोटा-सा संदेश लिखा था।
सबने शायद उसे फेंक दिया होगा।
लेकिन विवेक ने आज तक संभालकर रखा था।
मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े।
मैंने पूछा,
"इतने साल... इसे संभालकर रखा?"
वह मुस्कुराया।
"कुछ चीज़ें फेंकी नहीं जातीं... क्योंकि उनमें यादें रहती हैं।"
मैंने डायरी वापस कर दी।
दिल भर आया था।
मैंने धीरे से पूछा,
"क्या कभी मेरी याद आई?"
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।
खिड़की से बाहर देखने लगा।
काफ़ी देर बाद बोला,
"हर रक्षाबंधन पर..."
मैं हैरान रह गई।
"रक्षाबंधन?"
वह बोला,
"याद है... कॉलेज में सब लड़कियाँ मुझे राखी बाँध रही थीं। तुमने कहा था—'मैं नहीं बाँधूँगी, क्योंकि दोस्ती किसी रिश्ते से छोटी नहीं होती।'"
मैं मुस्कुरा दी।
"तुम्हें आज भी याद है?"
"कुछ बातें भूलने के लिए नहीं होतीं।"
मेरी आँखें फिर भर आईं।
मैंने पहली बार महसूस किया...
कुछ रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते।
वे बस समय के साथ और पवित्र हो जाते हैं।
ट्रेन तेज़ी से कानपुर की तरफ बढ़ रही थी।
लेकिन मुझे लग रहा था...
काश यह सफ़र कभी ख़त्म ही न हो।
तभी विवेक का मोबाइल बजा।
उसने स्क्रीन देखी।
चेहरे पर गंभीरता आ गई।
वह थोड़ा दूर जाकर बात करने लगा।
मैंने सिर्फ़ इतना सुना...
"जी सर... मैं समय पर पहुँच जाऊँगा... चिंता मत कीजिए..."
वह वापस आया।
चेहरा पहले जैसा शांत नहीं था।
मैंने पूछा,
"सब ठीक है?"
वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला,
"हाँ... बस ड्यूटी का फ़ोन था।"
मुझे लगा...
वह मुझसे कुछ छिपा रहा है।
लेकिन क्या...
यह मैं समझ नहीं पाई।
मैं उसे लगातार देख रही थी।
फोन रखने के बाद उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, लेकिन आँखों में पहले जैसी शांति नहीं थी।
मैंने धीरे से पूछा,
"सब ठीक तो है?"
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"हाँ... फौज की नौकरी है। कभी भी बुलावा आ जाता है।"
मैंने पहली बार उसके हाथों को गौर से देखा।
हथेलियों पर पुराने घावों के निशान थे।
शायद देश की सेवा करते-करते मिले होंगे।
दिल के अंदर उसके लिए सम्मान और भी बढ़ गया।
मैंने मुस्कुराकर पूछा,
"इतने साल बाद मिले हो... और अब भी हर बात आधी ही बताते हो?"
वह हँस पड़ा।
"कुछ बातें पूरी बताने का समय नहीं मिलता।"
मैंने मज़ाक में कहा,
"तुम पहले भी ऐसे ही थे।"
विवेक मुस्कुराया और बोला,
"और तुम पहले भी हर बात जानने की ज़िद करती थीं।"
दोनों हँस पड़े।
इतने में ट्रेन अगले स्टेशन पर रुक गई।
कुछ बच्चे मूँगफली बेचते हुए डिब्बे में चढ़ गए।
एक छोटा-सा लड़का बार-बार लोगों से कह रहा था,
"ले लो साहब... सुबह से कुछ नहीं बिका।"
अधिकतर लोग उसे अनदेखा कर रहे थे।
विवेक ने उसे बुलाया।
"कितने की है?"
"बीस रुपये की।"
विवेक ने दो पैकेट लिए और पाँच सौ का नोट उसके हाथ में रख दिया।
लड़का घबरा गया।
"साहब... मेरे पास खुले नहीं हैं।"
विवेक मुस्कुराया।
"रख लो... पढ़ाई करना... हमेशा यही काम मत करना।"
लड़के की आँखें भर आईं।
वह बार-बार धन्यवाद कहता हुआ उतर गया।
मैंने कहा,
"तुम बिल्कुल नहीं बदले।"
वह बोला,
"अगर किसी की दुआ मिल जाए... तो समझो सफर सफल हो गया।"
मैं चुपचाप उसे देखती रही।
मन बार-बार सोच रहा था...
काश...
उस समय हम दोनों ने एक-दूसरे से दिल की बात कह दी होती।
शायद आज कहानी कुछ और होती।
लेकिन अगले ही पल मैंने खुद को रोक लिया।
कुछ बातें अगर समय पर न हों...
तो उन्हें वहीं छोड़ देना ही अच्छा होता है।
कानपुर आने में अब केवल चालीस मिनट बचे थे।
मैंने हिम्मत करके पूछा,
"एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"अगर उस समय मेरी शादी नहीं हुई होती... तो क्या तुम..."
मेरी बात पूरी होने से पहले ही उसने धीरे से कहा,
"मत पूछो।"
मैं चुप हो गई।
वह कुछ पल तक खिड़की के बाहर देखता रहा।
फिर बोला,
"कुछ सवालों के जवाब मिल जाएँ... तो कई रिश्ते बोझ बन जाते हैं।"
मैंने सिर झुका लिया।
उसकी बात सही थी।
अब हम दोनों किसी और के जीवन का हिस्सा थे।
हमारी एक छोटी-सी भूल कई लोगों की खुशियाँ छीन सकती थी।
उसने धीरे से कहा,
"मैं इतना जरूर कहूँगा..."
मैंने उसकी तरफ देखा।
"भगवान ने अगर हमें दोस्त बनाया था... तो शायद उसी में हम दोनों की भलाई थी।"
मेरी आँखें नम हो गईं।
मैंने धीरे से कहा,
"और मैं आज भी यही मानती हूँ।"
कुछ देर बाद ट्रेन कानपुर स्टेशन पर पहुँच गई।
भीड़ उतरने लगी।
विवेक ने बिना कुछ कहे मेरा बैग उठा लिया।
मैं उसके पीछे-पीछे चलती रही।
स्टेशन से बाहर निकलकर उसने एक ऑटो रोका।
मेरा सामान उसमें रखा।
फिर ड्राइवर से बोला,
"बहन को सही-सलामत घर छोड़ देना।"
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"तुम चलोगे नहीं?"
उसने सिर हिला दिया।
"नहीं... मेरी ट्रेन एक घंटे बाद दूसरी तरफ से है।"
मैंने पहली बार उसका हाथ पकड़ लिया।
"इतने साल बाद मिले हो... और फिर चले जाओगे?"
वह मुस्कुराया।
"कुछ मुलाकातें लंबी नहीं होतीं...
लेकिन पूरी ज़िंदगी याद रहती हैं।"
मैंने कहा,
"कम से कम अपना फोन नंबर तो दे दो।"
उसने जेब से एक कागज़ निकाला।
कुछ लिखने लगा।
फिर अचानक रुक गया।
कागज़ मोड़ा...
और फाड़कर पास रखे डस्टबिन में डाल दिया।
मैं हैरानी से उसे देखने लगी।
वह बोला,
"अगर नंबर दे दिया...
तो शायद कभी-कभी बात होगी...
फिर बातें आदत बन जाएँगी...
और आदतें रिश्तों की परीक्षा लेने लगती हैं।
हम दोनों अपनी-अपनी दुनिया में खुश रहें...
यही सबसे अच्छी याद होगी।"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
मैंने बस इतना कहा,
"अपना ख़याल रखना।"
उसने मुस्कुराकर सलाम किया।
"तुम भी।"
मैं ऑटो में बैठ गई।
ऑटो आगे बढ़ गया।
मैं बार-बार पीछे मुड़कर देखती रही।
वह वहीं खड़ा था...
जब तक मैं उसकी नज़रों से ओझल नहीं हो गई।
घर पहुँचने के बाद कई दिनों तक मन उसी सफर में अटका रहा।
उसकी बातें...
उसकी मुस्कान...
उसकी सादगी...
सब कुछ आँखों के सामने घूमता रहता।
करीब डेढ़ महीने बाद टीवी पर समाचार चल रहे थे।
समाचार वाचक की आवाज़ सुनकर मेरे हाथ रुक गए।
"सीमा पर आतंकियों से मुठभेड़ में सेना के मेजर विवेक शर्मा वीरगति को प्राप्त..."
मेरे हाथ से चाय का कप गिर गया।
टीवी स्क्रीन पर उसकी तस्वीर थी।
वही मुस्कान...
वही चेहरा...
जिसे मैंने कुछ ही दिन पहले अपने सामने देखा था।
मैं वहीं बैठ गई।
आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
पूरे दिन किसी से बात नहीं कर पाई।
अगले दिन अख़बार में उसकी अंतिम यात्रा की तस्वीर छपी।
हज़ारों लोग उसे अंतिम विदाई देने आए थे।
मैं भी जाना चाहती थी।
बहुत चाहती थी।
लेकिन नहीं गई।
क्योंकि मेरे आँसुओं का कोई रिश्ता दुनिया को समझ नहीं आता।
मैंने घर के मंदिर में एक दीपक जलाया।
भगवान से सिर्फ़ एक प्रार्थना की...
"जहाँ भी हो...
खुश रहना मेरे दोस्त।"
एक साल बीत गया।
फिर वही महीना आया।
फिर वही सफर।
इस बार भी मैं जानबूझकर जनरल डिब्बे में बैठी।
लोगों ने पूछा,
"इतनी भीड़ में क्यों?"
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"यहीं मेरी एक याद रहती है।"
ट्रेन चलने लगी।
मैंने बगल वाली खाली सीट की तरफ देखा।
कुछ पल के लिए ऐसा लगा...
जैसे कोई मुस्कुराकर कह रहा हो...
"थोड़ा खिड़की के पास बैठ जाऊँ?
दौड़कर आया हूँ... पसीना सूख जाए तो अपनी जगह बैठ जाऊँगा।"
मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई।
आँखें भीग गईं।
मैंने धीरे से उस खाली सीट पर हाथ रखा...
और मन ही मन कहा,
"तुमने दोस्ती निभाने में कभी कमी नहीं छोड़ी...
अब तुम्हारी यादें मेरा सफर पूरा करती हैं।"
ट्रेन आगे बढ़ती रही।
ज़िंदगी भी आगे बढ़ती रही।
कुछ लोग साथ चलकर भी बिछड़ जाते हैं...
और कुछ लोग बिछड़कर भी पूरी उम्र हमारे साथ चलते रहते हैं।

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