माँ की खामोशी
सुबह के करीब सात बज रहे थे।
सुनीता रसोई में खड़ी सबके लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। एक तरफ गैस पर चाय चढ़ी थी, दूसरी तरफ तवे पर पराठे सिक रहे थे। बीच-बीच में वह अपनी पोती अन्वी के लिए टिफिन भी तैयार कर रही थी।
रात से ही उसके घुटनों में दर्द था। कमर भी दर्द कर रही थी, लेकिन घर का काम कभी उसके दर्द का इंतजार नहीं करता था।
सुनीता ने तवे से पराठा उतारा ही था कि कमरे से उसके पति सुरेश की आवाज आई—
"सुनीता! मेरी दवाई कहाँ रखी है?"
सुनीता ने तुरंत गैस धीमी की।
"जी, अभी लाई।"
वह जल्दी से कमरे में गई और दवाई ढूँढ़कर सुरेश को दे दी।
सुरेश ने दवाई हाथ में लेते हुए कहा,
"तुमसे एक काम भी समय पर नहीं होता। सुबह-सुबह कितनी देर लगा देती हो।"
सुनीता ने सिर झुका लिया।
"जी… आगे से ध्यान रखूँगी।"
वह वापस रसोई में आ गई।
अभी उसने चाय कप में डाली ही थी कि उसका बेटा करण भी तैयार होकर कमरे से बाहर आया।
"माँ, मेरा नीला कुर्ता कहाँ है?"
सुनीता बोली,
"बेटा, कल धोकर तुम्हारी अलमारी में रख दिया था।"
करण ने अलमारी खोली और कपड़े इधर-उधर करते हुए कहा,
"यहाँ तो नहीं है। आप हमेशा चीजें गलत जगह रख देती हैं।"
सुनीता ने अपने हाथ पोंछे और उसके कमरे में जाकर कपड़े देखने लगी।
कुछ ही देर बाद कुर्ता एक दूसरे कपड़े के नीचे से मिल गया।
सुनीता ने कुर्ता आगे बढ़ाते हुए कहा,
"ये रहा बेटा।"
करण ने कुर्ता लिया और बोला,
"पहले से ठीक से रखा करो ना माँ। मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है।"
सुनीता कुछ नहीं बोली।
वह फिर रसोई में लौट आई।
रसोई के दरवाजे पर उसकी बहू पूजा खड़ी थी।
वह पिछले छह महीने से इस घर का हिस्सा थी।
शादी के बाद शुरू में उसे लगता था कि उसकी सास बहुत सख्त होंगी। लेकिन धीरे-धीरे उसे पता चला कि सुनीता सख्त नहीं थीं।
वह तो जरूरत से ज्यादा शांत थीं।
कोई कुछ कह देता, वह चुप रहतीं।
कोई नाराज हो जाता, वह मना लेतीं।
किसी की जरूरत होती, वह अपना काम छोड़कर उसकी मदद करने लगतीं।
पूजा ने देखा कि सुनीता ने सुबह से एक घूंट चाय भी नहीं पी थी।
वह धीरे से उनके पास गई।
"माँ जी, आप पहले नाश्ता कर लीजिए।"
सुनीता मुस्कुराईं।
"पहले सब खा लें बेटा। फिर मैं खा लूँगी।"
पूजा ने पूछा,
"लेकिन आप रोज सबसे बाद में क्यों खाती हैं?"
सुनीता ने हँसते हुए कहा,
"घर में यही तो होता है बेटा। पहले बच्चों का, फिर बड़ों का… आखिर में जो बचे, वो मेरा।"
पूजा मुस्कुराई नहीं।
उसके मन में कुछ चुभ गया।
उसे लगा जैसे सुनीता ने यह बात मजाक में नहीं, अपनी पूरी जिंदगी की सच्चाई के रूप में कही थी।
दिन गुजरते गए।
पूजा ने धीरे-धीरे घर के बारे में बहुत कुछ समझना शुरू कर दिया।
सुनीता सुबह सबसे पहले उठती थीं और रात में सबसे आखिर में सोती थीं।
सुरेश को समय पर दवाई चाहिए।
करण को समय पर नाश्ता चाहिए।
अन्वी को स्कूल का टिफिन चाहिए।
घर की सफाई चाहिए।
कपड़े चाहिए।
मेहमान आएँ तो उनकी सेवा चाहिए।
लेकिन सुनीता को क्या चाहिए?
यह सवाल घर में किसी ने कभी नहीं पूछा था।
एक दिन दोपहर में पूजा ने देखा कि सुनीता कपड़े तह करते-करते अचानक रुक गईं।
वह अपने घुटने पर हाथ रखकर बैठ गईं।
पूजा तुरंत उनके पास पहुँची।
"माँ जी, बहुत दर्द हो रहा है?"
सुनीता ने मुस्कुराकर कहा,
"थोड़ा-सा है। ठीक हो जाएगा।"
पूजा ने कहा,
"माँ जी, डॉक्टर को दिखा देते हैं।"
सुनीता ने जवाब दिया,
"नहीं बेटा, डॉक्टर के पास जाने से पहले घर के काम कौन करेगा?"
पूजा कुछ पल चुप रही।
फिर उसने कहा,
"काम मैं कर लूँगी।"
सुनीता ने उसकी तरफ देखा।
"तुम अभी नई हो बेटा। धीरे-धीरे सीख जाओगी।"
पूजा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माँ जी, काम मैं सीख लूँगी… लेकिन आपको दर्द में काम करते देखना नहीं सीखना चाहती।"
सुनीता की आँखें भर आईं।
उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
शायद उन्हें लंबे समय बाद किसी ने उनके दर्द को देखा था।
कुछ दिन बाद घर में एक और परेशानी आ गई।
एक शाम करण ऑफिस से बहुत परेशान होकर लौटा।
पूजा ने दरवाजा खोला।
"क्या हुआ?"
करण ने जूते उतारते हुए कहा,
"कुछ नहीं।"
लेकिन उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि बात गंभीर थी।
सुरेश ने भी पूछ लिया,
"क्या हुआ बेटा?"
करण चुप रहा।
फिर धीरे से बोला,
"पापा… मेरी नौकरी चली गई।"
घर में अचानक सन्नाटा छा गया।
पूजा ने हैरानी से करण को देखा।
सुनीता रसोई के दरवाजे पर खड़ी थीं।
सुरेश ने कुछ देर बाद कहा,
"कैसे चली गई?"
"कंपनी ने कई लोगों को निकाल दिया। मेरा नाम भी उसमें था।"
सुरेश का चेहरा तनाव से भर गया।
"तुमने काम ठीक से किया होता तो ऐसा नहीं होता।"
करण ने सिर झुका लिया।
"मैंने पूरी मेहनत की थी पापा।"
"तो फिर अब नई नौकरी ढूँढ़ो। घर बैठने से कुछ नहीं होगा।"
करण बिना कुछ बोले अपने कमरे में चला गया।
पूजा उसके पीछे गई।
लेकिन सुनीता वहीं खड़ी रह गईं।
उनके चेहरे पर चिंता थी।
रात को सब सो गए।
लेकिन सुनीता देर तक जागती रहीं।
उन्होंने अलमारी खोली।
अंदर एक पुराना कपड़े का बैग रखा था।
उन्होंने बैग बाहर निकाला।
कुछ देर तक उसे हाथ में लेकर बैठी रहीं।
फिर धीरे से बैग खोला।
उसमें कुछ पुराने सोने के गहने थे।
ये वही गहने थे जो उन्हें उनकी माँ ने शादी के समय दिए थे।
सुनीता ने गहनों को हाथ में लिया और उनकी आँखों में पुरानी यादें उतर आईं।
लेकिन तभी उन्होंने करण के परेशान चेहरे को याद किया।
उन्होंने गहरी साँस ली।
"अगर बेटे की जरूरत के समय ये काम नहीं आए… तो फिर इन्हें संभालकर रखने का क्या फायदा?"
अगली सुबह उन्होंने वह बैग अपने पास रख लिया।
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उसी समय पूजा दरवाजे के बाहर खड़ी उनकी बात सुन चुकी थी।
पूजा की आँखें भर आईं।
उसे समझ आ गया था कि एक माँ अपने बेटे के लिए क्या करने जा रही है।
लेकिन उसे यह भी पता था कि करण अपनी माँ के गहने कभी नहीं बेचेगा।
और तभी पूजा के मन में एक विचार आया।
शायद सुनीता को अपने गहने बेचने की जरूरत ही न पड़े।
शायद उनके भीतर छिपी वह पुरानी कला ही इस परिवार को संभाल सकती है…
जिसके बारे में घर में किसी को कुछ पता नहीं था।
लेकिन वह कला क्या थी?
और क्यों सुनीता ने उसे पिछले कई सालों से छिपाकर रखा था?
…
पिछली रात पूजा ने अपनी सास सुनीता को अलमारी के सामने बैठे देखा था।
उनके हाथ में पुराने सोने के गहने थे।
पूजा समझ गई थी कि करण की नौकरी जाने के बाद सुनीता अपने आखिरी सहारे को भी बेटे के लिए कुर्बान करने जा रही थीं।
लेकिन पूजा ऐसा नहीं होने देना चाहती थी।
अगली सुबह वह जल्दी उठ गई।
रसोई में सुनीता पहले से मौजूद थीं।
पूजा ने पीछे से जाकर उनके कंधे पर हाथ रखा।
"माँ जी…"
सुनीता पलटीं।
"अरे बेटा, इतनी सुबह? अभी तो सब सो रहे हैं।"
पूजा कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
"माँ जी, कल रात आपने अलमारी से गहने निकाले थे।"
सुनीता का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"तुमने देख लिया?"
"जी।"
सुनीता ने धीरे से कहा,
"करण के काम आएँगे बेटा। उसकी नौकरी चली गई है। पता नहीं कब तक नई नौकरी मिलेगी। घर का खर्च भी तो चलाना है।"
पूजा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"लेकिन माँ जी, ये आपके आखिरी गहने हैं।"
सुनीता मुस्कुराईं।
"गहने मेरे लिए नहीं हैं बेटा। अगर मेरे बेटे की परेशानी दूर हो सकती है तो इनसे अच्छी जगह और क्या होगी?"
पूजा की आँखें भर आईं।
वह बोली,
"अगर मैं आपसे कहूँ कि इन गहनों को बेचने की जरूरत नहीं है तो?"
सुनीता ने हैरानी से पूछा,
"फिर क्या करूँ?"
पूजा ने मुस्कुराकर कहा,
"आप अपना पुराना हुनर वापस शुरू कीजिए।"
सुनीता कुछ समझ नहीं पाईं।
"कौन-सा हुनर?"
पूजा ने कहा,
"सिलाई का।"
सुनीता जैसे अचानक बहुत पुराने समय में पहुँच गईं।
उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
"तुम्हें किसने बताया?"
"कल रात जब आप गहने निकाल रही थीं, उसी कमरे के कोने में मैंने वह पुरानी सिलाई मशीन देखी थी।"
सुनीता ने मशीन की तरफ देखा।
वह मशीन कई सालों से धूल में पड़ी थी।
सुनीता धीरे से उसके पास गईं।
उन्होंने मशीन पर हाथ फेरा।
उनकी आँखों में यादें तैरने लगीं।
"शादी से पहले मैं बहुत अच्छी सिलाई करती थी। मेरी माँ ने मुझे बचपन से सिखाया था। मोहल्ले की औरतें मेरे पास कपड़े सिलवाने आती थीं।"
पूजा ने पूछा,
"फिर आपने छोड़ क्यों दिया?"
सुनीता ने कुछ पल चुप रहकर कहा,
"शादी के बाद घर बड़ा था। जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं। पहले सास-ससुर, फिर बच्चे… फिर घर के काम। धीरे-धीरे मशीन बंद हो गई।"
उन्होंने मशीन की तरफ देखा।
"फिर कभी समय ही नहीं मिला।"
पूजा ने कहा,
"तो अब समय निकालिए।"
सुनीता हल्का-सा हँस दीं।
"इस उम्र में कौन मेरे पास कपड़े सिलवाने आएगा?"
पूजा ने कहा,
"यह आप तय नहीं करेंगी। लोग तय करेंगे। पहले मशीन तो चलाइए।"
उस दिन पूजा ने मशीन साफ की।
उसने पुराना कपड़ा निकाला।
सुनीता ने मशीन में धागा डाला।
काफी सालों बाद मशीन की आवाज उस घर में गूँजी।
टर्र-टर्र-टर्र…
सुनीता कुछ पल उसे चलाती रहीं।
उनके चेहरे पर ऐसी खुशी थी जो पूजा ने पहले कभी नहीं देखी थी।
उन्होंने कहा,
"देखो… अभी भी हाथ नहीं भूले।"
पूजा हँस पड़ी।
"मैंने कहा था ना माँ जी।"
सबसे पहले पूजा ने अपना एक पुराना सूट उन्हें दिया।
"इसे ठीक कर दीजिए।"
सुनीता ने दो घंटे में सूट बिल्कुल नए जैसा कर दिया।
पूजा देखकर दंग रह गई।
"माँ जी, ये तो बहुत सुंदर है!"
सुनीता ने कहा,
"बस थोड़ा अभ्यास चाहिए।"
पूजा ने वही सूट अपनी पड़ोसन रमा को दिखाया।
रमा ने तुरंत पूछा,
"कहाँ से सिलवाया?"
पूजा ने मुस्कुराकर कहा,
"मेरी सास ने बनाया है।"
रमा ने कहा,
"क्या वो मेरे दो सूट भी सिल देंगी?"
पूजा ने कहा,
"क्यों नहीं?"
अगले दिन रमा दो सूट लेकर आ गई।
सुनीता ने मन लगाकर दोनों सूट सिल दिए।
रमा ने पैसे देते हुए कहा,
"बहन, सिलाई बहुत अच्छी है। मैं अपनी भाभी को भी भेजूँगी।"
सुनीता ने पैसे लेने में झिझक दिखाई।
"इतने पैसे क्यों?"
रमा हँसते हुए बोली,
"काम का पैसा है। मुफ्त में थोड़ी करवाऊँगी।"
उस दिन सुनीता ने पहली बार अपनी मेहनत के बदले पैसे अपने हाथ में लिए।
रकम बहुत बड़ी नहीं थी।
लेकिन उन पैसों को देखकर उनकी आँखें भर आईं।
पूजा ने पूछा,
"क्या हुआ माँ जी?"
सुनीता ने धीरे से कहा,
"पता है बेटा… इतने साल बाद मुझे अपनी मेहनत की कीमत मिली है।"
धीरे-धीरे काम बढ़ने लगा।
पहले पड़ोस की महिलाएँ आईं।
फिर उनके जानने वाले।
फिर किसी ने अपनी बेटी के कपड़े सिलवाए।
किसी ने ब्लाउज।
किसी ने बच्चों के कपड़े।
सुनीता सुबह घर का जरूरी काम करतीं और दोपहर बाद सिलाई करने बैठ जातीं।
पूजा भी उनका साथ देती।
वह कपड़ों के नाप लिखती।
धागे और सामान लाती।
ग्राहकों के फोन संभालती।
धीरे-धीरे घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।
लेकिन करण को अभी भी नौकरी नहीं मिली थी।
एक दिन वह कमरे से बाहर आया और उसने देखा कि उसकी माँ सिलाई कर रही हैं।
वह कुछ देर उन्हें देखता रहा।
फिर बोला,
"माँ, आप इतना काम क्यों कर रही हो?"
सुनीता मुस्कुराईं।
"काम नहीं करूँगी तो घर कैसे चलेगा?"
करण चुप हो गया।
"माँ, मेरे कारण आपको इतना काम करना पड़ रहा है?"
सुनीता ने मशीन रोक दी।
"तुम्हारे कारण नहीं बेटा। अपने परिवार के लिए कर रही हूँ।"
करण की आँखें नम हो गईं।
वह माँ के पास बैठ गया।
"माँ, अगर मुझे पहले पता होता कि आप इतनी अच्छी सिलाई करती हैं तो मैं आपको बहुत पहले काम शुरू करने को कहता।"
सुनीता ने हँसते हुए कहा,
"तुम्हें क्या पता होता बेटा? तुमने कभी पूछा ही नहीं।"
करण के पास कोई जवाब नहीं था।
उसने पहली बार महसूस किया कि उसने अपनी माँ को हमेशा सिर्फ घर के काम करते हुए देखा था।
उसने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि उसकी माँ के भीतर भी सपने थे।
कुछ दिनों बाद पूजा ने सुनीता के सिलाई के काम के लिए मोबाइल पर एक छोटा-सा पेज बना दिया।
उसने सुनीता के बनाए कपड़ों की तस्वीरें डालनी शुरू कर दीं।
कुछ ही दिनों में ऑर्डर आने लगे।
एक दिन इतना काम आया कि सुनीता अकेले संभाल नहीं पाईं।
पूजा ने कहा,
"माँ जी, अब हमें एक और मशीन खरीदनी पड़ेगी।"
सुनीता हँस पड़ीं।
"इतना काम सच में आ रहा है?"
"जी माँ जी।"
सुनीता की आँखों में चमक आ गई।
उन्होंने पहली बार महसूस किया कि उनका हुनर अभी खत्म नहीं हुआ था।
बस वह धूल के नीचे दबा हुआ था।
एक शाम सुरेश घर लौटे।
उन्होंने देखा कि घर के बाहर दो महिलाएँ कपड़े लेकर खड़ी थीं।
सुरेश ने पूछा,
"ये लोग यहाँ क्यों खड़ी हैं?"
पूजा ने कहा,
"माँ जी से कपड़े सिलवाने आई हैं।"
सुरेश ने आश्चर्य से सुनीता की तरफ देखा।
"तुम सिलाई करती हो?"
सुनीता ने धीरे से कहा,
"जी।"
सुरेश कुछ नहीं बोले।
वह कमरे में चले गए।
कुछ देर बाद करण भी घर आया।
उसने पिता से कहा,
"पापा, माँ ने घर की बहुत मदद की है। अब उनका काम अच्छा चल रहा है।"
सुरेश ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन रात को जब सब सो गए, वह अकेले उठकर उस कमरे में गए जहाँ सुनीता सिलाई करती थीं।
उन्होंने वहाँ रखी पुरानी मशीन को देखा।
मशीन के पास सुनीता की पुरानी तस्वीर रखी थी।
शादी से पहले की तस्वीर।
उस तस्वीर में सुनीता बहुत खुश दिखाई दे रही थीं।
सुरेश काफी देर तक तस्वीर देखते रहे।
शायद वह पहली बार सोच रहे थे—
क्या उन्होंने शादी के बाद अपनी पत्नी की उस मुस्कान को कहीं खो दिया था?
उसी समय उनकी नजर एक पुराने कागज पर पड़ी।
वह सुनीता का बनाया हुआ एक डिजाइन था।
नीचे उनकी माँ के हाथ से लिखा था—
"मेरी बेटी सुनीता एक दिन अपनी सिलाई की दुकान जरूर खोलेगी।"
सुरेश के हाथ काँप गए।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि सुनीता के भी कभी सपने थे।
लेकिन शादी, घर और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच वे सपने कहीं पीछे छूट गए।
अगली सुबह सुरेश ने सुनीता से कहा,
"सुनीता, अगर तुम चाहो तो अपनी दुकान खोल सकती हो।"
सुनीता ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
"दुकान?"
सुरेश ने मुस्कुराते हुए कहा,
"हाँ।"
सुनीता कुछ बोल नहीं पाईं।
सुरेश ने आगे कहा,
"मैंने तुम्हारी जिंदगी के बहुत साल सिर्फ घर संभालने में निकलवा दिए। अब अगर तुम्हारे मन में कोई सपना है, तो उसे पूरा करो।"
सुनीता की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन तभी दरवाजे पर करण खड़ा दिखाई दिया।
उसके हाथ में एक कागज था।
वह अंदर आया और बोला,
"माँ… पापा… मुझे एक नौकरी मिल गई है।"
सबके चेहरे पर खुशी आ गई।
लेकिन करण ने तुरंत आगे कहा,
"और माँ… मैं चाहता हूँ कि मेरी पहली तनख्वाह से आपकी दुकान का बोर्ड बनवाऊँ।"
सुनीता ने बेटे को गले लगा लिया।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि अगले ही दिन उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला था, जो उनके पुराने सारे घाव फिर से खोल देगा।
क्योंकि जिस व्यक्ति ने वर्षों तक उन्हें कमजोर समझा था…
वही अब उनकी सफलता से सबसे ज्यादा परेशान होने वाला था।
आखिर वह कौन था?
और क्या सुनीता अपनी जिंदगी में पहली बार अपने लिए खड़ी हो पाएँगी?
…
अगली सुबह घर में खुशी का माहौल था।
करण को नई नौकरी मिल गई थी।
सुनीता के चेहरे पर भी कई दिनों बाद सुकून दिखाई दे रहा था।
पूजा रसोई में मिठाई बना रही थी।
करण बार-बार अपनी माँ के पास जाकर कह रहा था,
"माँ, अब आप ज्यादा काम मत करना। मैं नौकरी शुरू कर रहा हूँ। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।"
सुनीता मुस्कुराकर कहतीं,
"बेटा, अब मुझे काम करने से डर नहीं लगता।"
करण ने पूछा,
"क्यों?"
सुनीता ने अपनी सिलाई मशीन की तरफ देखते हुए कहा,
"क्योंकि अब मुझे पता चल गया है कि मेरे हाथ सिर्फ घर का काम करने के लिए नहीं बने हैं। इनमें हुनर भी है।"
पूजा ने मुस्कुराकर कहा,
"और वही हुनर अब आपकी पहचान बनेगा।"
कुछ ही दिनों बाद करण की पहली तनख्वाह आई।
वह शाम को घर लौटा तो उसके हाथ में एक बड़ा पैकेट था।
उसने पैकेट अपनी माँ के हाथ में रखा।
"माँ, इसे खोलिए।"
सुनीता ने पैकेट खोला।
अंदर एक सुंदर सा बोर्ड था।
उस पर लिखा था—
"सुनीता सिलाई केंद्र"
सुनीता की आँखें भर आईं।
"बेटा… इसकी क्या जरूरत थी?"
करण ने माँ के पैर छूते हुए कहा,
"जरूरत थी माँ। आपने जिंदगी भर हमारा नाम ऊँचा किया। अब हमारी बारी है।"
सुरेश भी पास खड़े थे।
उन्होंने कहा,
"दुकान का खर्च मैं उठाऊँगा।"
सुनीता ने उनकी तरफ देखा।
शायद उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वही पति, जो कभी उनके काम को महत्व नहीं देते थे, आज उनके सपने को पूरा करने में मदद कर रहे हैं।
कुछ दिनों बाद घर के सामने वाले कमरे को दुकान का रूप दे दिया गया।
एक नई सिलाई मशीन आई।
एक छोटी मेज रखी गई।
कुछ कपड़ों के नमूने लगाए गए।
और दरवाजे के ऊपर वही बोर्ड लगा दिया गया—
"सुनीता सिलाई केंद्र"
पहले दिन सुनीता दुकान खोलने के लिए खड़ी थीं तो उनके हाथ काँप रहे थे।
पूजा ने कहा,
"डर क्यों रही हैं माँ जी?"
सुनीता बोलीं,
"पता नहीं बेटा… ऐसा लग रहा है जैसे पहली बार घर से बाहर कदम रख रही हूँ।"
पूजा मुस्कुराई।
"आप घर से बाहर नहीं निकल रही हैं माँ जी। आप अपनी पहचान के अंदर कदम रख रही हैं।"
सुनीता की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने भगवान को हाथ जोड़कर कहा,
"बस इतनी ताकत देना कि किसी का भरोसा न टूटे।"
धीरे-धीरे दुकान चलने लगी।
सुनीता का व्यवहार बहुत अच्छा था।
वह गरीब महिलाओं से कम पैसे लेतीं।
कभी किसी के पास पैसे कम होते तो कह देतीं,
"बाकी बाद में दे देना।"
कुछ ही महीनों में उनका नाम आसपास के इलाके में फैल गया।
अब महिलाएँ उनके पास दूर-दूर से कपड़े सिलवाने आने लगीं।
सुनीता के पास काम बढ़ गया।
उन्होंने पड़ोस की एक जरूरतमंद महिला को भी काम पर रख लिया।
पूजा हिसाब-किताब संभालने लगी।
करण नौकरी करने लगा।
सुरेश भी अब घर के कामों में हाथ बँटाने लगे।
सब कुछ बदलता हुआ दिखाई दे रहा था।
लेकिन हर कहानी में एक ऐसा व्यक्ति जरूर होता है, जिसे दूसरों की खुशी आसानी से दिखाई नहीं देती।
इस घर में वह व्यक्ति सुरेश का छोटा भाई राकेश था।
राकेश अक्सर घर आता था।
वह सुनीता को सिलाई करते देखता और हँसकर कहता,
"भाभी, अब तो आप बड़ी व्यापारी बन गई हैं!"
सुनीता मुस्कुराकर बात टाल देतीं।
लेकिन राकेश को यह बात पसंद नहीं थी कि घर की एक महिला अब अपने पैरों पर खड़ी हो रही थी।
एक दिन उसने सुरेश से कहा,
"भैया, मुझे समझ नहीं आता कि भाभी को दुकान की क्या जरूरत है। घर में रहने वाली औरत को घर ही संभालना चाहिए।"
सुरेश ने शांत स्वर में कहा,
"राकेश, अब मैं भी यही मानता हूँ कि अगर किसी महिला में हुनर है तो उसे रोकना नहीं चाहिए।"
राकेश चुप हो गया।
लेकिन उसके मन में बात बैठ गई।
कुछ दिन बाद उसने सुनीता के बारे में रिश्तेदारों में बातें शुरू कर दीं।
"अब तो भाभी को घर से ज्यादा पैसे की चिंता रहती है।"
"दुकान के कारण घर कौन संभालता है?"
"आजकल की औरतों को आजादी मिल जाए तो परिवार भूल जाती हैं।"
धीरे-धीरे ये बातें सुनीता तक भी पहुँचने लगीं।
एक दिन सुनीता बहुत परेशान होकर दुकान बंद करके अंदर आ गईं।
पूजा ने पूछा,
"क्या हुआ माँ जी?"
सुनीता ने कहा,
"शायद मुझे दुकान बंद कर देनी चाहिए।"
पूजा चौंक गई।
"क्यों?"
"लोग बातें बना रहे हैं।"
पूजा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"लोग तब भी बातें करते थे जब आप दिन-रात घर में काम करती थीं। तब भी आपने किसी को जवाब नहीं दिया।"
सुनीता चुप रहीं।
पूजा ने कहा,
"लेकिन अब फर्क है। अब आपकी मेहनत की कीमत है। अब आपका आत्मसम्मान भी है।"
सुनीता ने धीरे से कहा,
"मैं घर में लड़ाई नहीं चाहती।"
पूजा बोली,
"सम्मान माँगना लड़ाई नहीं होता माँ जी।"
उसी शाम राकेश घर आया।
उसने सबके सामने कहा,
"भाभी, आपको दुकान बंद कर देनी चाहिए। घर की इज्जत सबसे बड़ी होती है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुनीता हमेशा की तरह चुप रहने वाली थीं।
लेकिन इस बार उन्होंने कुछ अलग किया।
वह धीरे से उठीं।
राकेश के सामने जाकर खड़ी हो गईं।
उनकी आवाज शांत थी, लेकिन पहले से ज्यादा मजबूत।
"राकेश, तुम सही कहते हो। घर की इज्जत सबसे बड़ी होती है।"
राकेश मुस्कुराया।
"तो फिर दुकान बंद कर दीजिए।"
सुनीता ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,
"लेकिन घर की इज्जत इस बात से नहीं होती कि घर की औरत चुप रहती है। घर की इज्जत इस बात से होती है कि उस औरत का सम्मान किया जाता है।"
राकेश का चेहरा उतर गया।
सुनीता आगे बोलीं,
"मैंने तीस साल इस घर के लिए दिए। कभी किसी से पैसे नहीं माँगे। कभी अपनी जरूरत नहीं बताई। कभी शिकायत नहीं की।"
उनकी आवाज भर्रा गई।
"जब मेरे घुटने दर्द करते थे, तब भी खाना बनाया। जब बुखार था, तब भी बच्चों को स्कूल भेजा। जब घर में पैसे कम थे, तब अपनी जरूरतें छोड़ दीं।"
कमरे में बैठे सभी लोग चुप थे।
"लेकिन मैंने कभी बदले में बहुत कुछ नहीं माँगा। सिर्फ इतना चाहा कि मुझे इंसान समझा जाए।"
सुरेश की आँखें नम हो गईं।
सुनीता ने आगे कहा,
"आज अगर मैं अपने हाथों से काम करके कुछ पैसे कमा रही हूँ, किसी पर बोझ नहीं हूँ और दो जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार दे रही हूँ… तो इसमें घर की इज्जत कैसे कम हो सकती है?"
राकेश के पास कोई जवाब नहीं था।
तभी सुरेश उठे।
उन्होंने सबके सामने कहा,
"राकेश, गलती सुनीता की नहीं थी। गलती मेरी थी।"
सबने उनकी तरफ देखा।
सुरेश ने कहा,
"मैंने वर्षों तक अपनी पत्नी की मेहनत को उसका कर्तव्य समझा। कभी उसका धन्यवाद नहीं किया। कभी यह नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है।"
उन्होंने सुनीता की तरफ देखा।
"आज मुझे समझ आया है कि पत्नी घर की नौकरानी नहीं होती। वह घर की साझेदार होती है।"
करण अपनी माँ के पास गया।
उसने उनका हाथ पकड़कर कहा,
"और माँ सिर्फ हमारे लिए खाना बनाने वाली नहीं हैं। वह हमारी पहली शिक्षक हैं।"
पूजा ने भी सास का हाथ पकड़ लिया।
"और मेरे लिए… माँ जी मेरी सास नहीं, मेरी माँ हैं।"
सुनीता की आँखों से आँसू बहने लगे।
इस बार ये आँसू दुख के नहीं थे।
ये सम्मान मिलने के आँसू थे।
राकेश धीरे से उठकर सुनीता के पास आया।
उसने कहा,
"भाभी… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको सिर्फ घर की एक महिला समझा। आपके संघर्ष को कभी समझा ही नहीं।"
सुनीता ने मुस्कुराकर कहा,
"माफी माँगने की जरूरत नहीं। बस आगे से किसी और महिला को उसकी मेहनत के लिए छोटा मत समझना।"
राकेश ने सिर झुका दिया।
कुछ महीने बाद "सुनीता सिलाई केंद्र" इतना चलने लगा कि सुनीता ने दो और महिलाओं को काम पर रख लिया।
अब वह सिर्फ कपड़े नहीं सिलती थीं।
वह उन महिलाओं को भी सिलाई सिखाती थीं जो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थीं।
एक दिन पूजा ने पूछा,
"माँ जी, अब आपकी सबसे बड़ी खुशी क्या है?"
सुनीता ने दुकान में काम करती महिलाओं को देखा।
फिर मुस्कुराकर बोलीं,
"पहले मुझे लगता था कि मैंने जिंदगी में बहुत कुछ खो दिया।"
"लेकिन अब समझ आता है कि कुछ सपने देर से पूरे होते हैं, खत्म नहीं होते।"
पूजा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
सुनीता ने कहा,
"और एक बात मैंने सीखी है बेटा…"
"क्या?"
"घर के लिए जीना बहुत अच्छी बात है। लेकिन खुद को पूरी तरह भूल जाना अच्छी बात नहीं।"
पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा,
"सही कहा माँ जी।"
सुनीता ने दुकान के बाहर लगे बोर्ड को देखा।
"सुनीता सिलाई केंद्र"
कभी वही हाथ दूसरों के कपड़े धोते थे।
कभी वही हाथ सबके लिए खाना बनाते थे।
कभी वही हाथ अपमान सहते हुए चुप रहते थे।
आज वही हाथ अपना भविष्य बना रहे थे।
और घर के सभी लोगों को एक बात समझ आ चुकी थी—
जिस इंसान को हम सबसे कमजोर समझते हैं, हो सकता है वही हमारे पूरे परिवार की सबसे बड़ी ताकत हो।
सीख:
किसी महिला की चुप्पी को उसकी कमजोरी मत समझिए।
हो सकता है वह अपने परिवार के लिए बहुत कुछ सह रही हो।
लेकिन हर इंसान को प्यार के साथ सम्मान भी चाहिए।
घर तभी खुशहाल बनता है, जब उसमें रहने वाले हर व्यक्ति की मेहनत, भावनाओं और सपनों की कद्र की जाए।
क्योंकि रिश्ते सिर्फ जिम्मेदारियों से नहीं चलते…
रिश्ते सम्मान से मजबूत होते हैं।

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