भरोसे का रिश्ता

 

Young Indian woman finding hope and support from a kind elderly woman and a caring family at a city tea stall, emotional cinematic social illustration.


“मुश्किल समय में इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत पैसों की नहीं, बल्कि ऐसे इंसान की होती है जो उसकी मजबूरी का फायदा उठाने के बजाय उसकी इज्जत की रक्षा करे।”


सीमा अपनी बूढ़ी माँ के साथ शहर के किनारे बने एक छोटे से किराए के कमरे में रहती थी। उम्र अभी उन्नीस साल ही थी, लेकिन जिंदगी ने उसे समय से पहले बहुत कुछ सिखा दिया था। पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। माँ दूसरों के घरों में काम करके किसी तरह दोनों का पेट पालती थी।


सीमा की माँ अक्सर उससे कहती—


“बेटी, दुनिया में अच्छे लोग भी हैं और बुरे भी। किसी की मीठी बातों पर जल्दी भरोसा मत करना।”


सीमा हँसकर कहती—


“माँ, आप चिंता मत किया करो। मैं इतनी भी भोली नहीं हूँ।”


लेकिन उसे क्या पता था कि कुछ ही दिनों बाद माँ की यही बातें उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा बनने वाली थीं।


एक दिन अचानक उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब हो गई। सीमा उसे अस्पताल लेकर गई, लेकिन डॉक्टरों ने बहुत कोशिश करने के बाद भी उसे बचा नहीं पाया।


सीमा अस्पताल के बाहर फूट-फूटकर रोने लगी।


“माँ... मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ।”


लेकिन अब उसकी माँ इस दुनिया में नहीं थी।


मोहल्ले के लोगों ने मिलकर अंतिम संस्कार करवाया। कुछ औरतों ने सीमा को संभाला और कुछ पुरुषों ने जरूरी कामों में उसकी मदद की।


अंतिम संस्कार के बाद जब सब लोग अपने-अपने घर चले गए तो सीमा अपने खाली कमरे में अकेली बैठी रही।


जिस घर में माँ की आवाज गूंजती थी, वहाँ अब सिर्फ सन्नाटा था।


तभी दरवाजे पर राजू आया।


राजू पास के कस्बे में ट्रक चलाता था। वह कई बार सीमा की माँ के काम वाली जगह पर आया था। माँ के जिंदा रहते वह सीमा से शादी की बातें किया करता था।


उसने सीमा के सामने बैठकर कहा—


“सीमा, अब तुम अकेली हो। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। मैं तुम्हें बहुत खुश रखूँगा।”


सीमा ने कोई जवाब नहीं दिया।


राजू ने कहा—


“तुम्हें किसी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाकर रखूँगा।”


सीमा की आँखों में आँसू थे। उसे माँ की बात याद आ रही थी—


“बेटी, मुसीबत में लिया गया फैसला सोच-समझकर लेना।”


लेकिन माँ अब उसके पास नहीं थी।


मोहल्ले के कुछ लोगों ने भी राजू की बात का समर्थन किया।


“लड़का कमाता है, तुम्हारा ध्यान रखेगा।”


“तुम अकेली लड़की हो, कब तक अकेली रहोगी?”


आखिर सीमा ने राजू के साथ जाने का फैसला कर लिया।


राजू उसे अपने गाँव ले जाने के लिए ट्रक में बैठा ले गया।


रास्ते में वह लगातार भविष्य के सपने दिखाता रहा।


“हम अपना घर बनाएँगे।”


“तुम्हारे लिए नए कपड़े खरीदूँगा।”


“तुम्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगा।”


सीमा चुपचाप उसकी बातें सुनती रही।


शाम होते-होते राजू ने ट्रक एक सुनसान ढाबे के पास रोक दिया।


उसने कहा—


“तुम हाथ-मुँह धोकर आ जाओ। मैं खाना लगवाता हूँ।”


सीमा ढाबे के पीछे चली गई।


इधर राजू ने अपना फोन निकाला। कई घंटों से उसका फोन बंद था।


फोन चालू करते ही उसके घर से कई मिस्ड कॉल दिखाई दिए।


उसने तुरंत फोन लगाया।


एक छोटी बच्ची की आवाज आई—


“पापा, आप कब आओगे?”


राजू ने प्यार से कहा—


“बस बेटा, कल तक घर आ जाऊँगा।”


फिर उसकी पत्नी ने फोन लिया।


राजू ने धीमी आवाज में कहा—


“सुनो, चिंता मत करना। मुझे बहुत अच्छा माल मिल गया है। इसे बेचकर खूब पैसा मिलेगा। कल घर आकर सब बताऊँगा।”


पत्नी ने पूछा—


“कैसा माल?”


राजू हँसते हुए बोला—


“बस इतना समझ लो कि हमारी जिंदगी बदल जाएगी।”


सीमा पीछे खड़ी उसकी सारी बातें सुन रही थी।


उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।


जिस आदमी ने उससे शादी करने का वादा किया था, उसकी पहले से पत्नी और बच्ची थी।


सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।


उसने सोचा—


“माँ सही कहती थी। मीठी बातें करने वाला हर इंसान अच्छा नहीं होता।”


राजू खाना लेने अंदर गया और सीमा मौका देखकर वहाँ से निकल गई।


सड़क पर उसे एक बस दिखाई दी।


वह बिना सोचे बस में चढ़ गई।


बस शहर की तरफ जा रही थी।


पूरे रास्ते सीमा रोती रही।


उसे नहीं पता था कि वह कहाँ जाएगी, किसके पास जाएगी और आगे क्या करेगी।


रात में बस शहर के बड़े बस अड्डे पर रुकी।


सीमा नीचे उतरी तो उसके पास न पैसा था, न सामान, न कोई पहचान वाला।


वह एक कोने में खड़ी होकर रोने लगी।


तभी पास में बैठी एक बूढ़ी औरत ने उसे देखा।


बूढ़ी औरत ने पूछा—


“बेटी, इतनी रात को अकेली क्यों खड़ी हो?”


सीमा डर गई।


वह कुछ नहीं बोली।


औरत ने फिर कहा—


“डर मत। मैं तुझे कुछ नहीं कहूँगी।”


कुछ देर बाद सीमा उसके पास जाकर बैठ गई।


बूढ़ी औरत का नाम जमुना था। बस अड्डे पर लोग उसे प्यार से “जमुना अम्मा” कहते थे।


अम्मा ने पूछा—


“घर कहाँ है?”


सीमा ने रोते हुए सारी कहानी सुना दी।


अम्मा की आँखें भी भर आईं।


उन्होंने सीमा के सिर पर हाथ रखा।


“बेटी, रात बहुत हो गई है। आज मेरे पास रह जा। सुबह कुछ सोचेंगे।”


सुबह अम्मा उसे पास की एक छोटी सी चाय की दुकान पर ले गईं।


दुकान चलाने वाला युवक मोहन था।


मोहन ने अम्मा को देखते ही कहा—


“अम्मा, आज अकेली नहीं आईं?”


अम्मा ने कहा—


“बेटा, यह मेरी पोती जैसी है। गाँव से आई है। कुछ दिन मेरे साथ रहेगी।”


मोहन ने सीमा की तरफ देखा और बोला—


“अगर काम करना चाहती हो तो यहाँ मदद कर सकती हो।”


सीमा ने तुरंत कहा—


“भैया, मैं बर्तन धो दूँगी, चाय के गिलास साफ कर दूँगी। बदले में मुझे दो वक्त का खाना मिल जाए तो काफी है।”


मोहन ने कहा—


“पैसे भी मिलेंगे। मेहनत का पैसा लेना तुम्हारा अधिकार है।”


उस दिन से सीमा दुकान पर काम करने लगी।


वह सुबह सबसे पहले दुकान खोलती, सफाई करती, बर्तन धोती और ग्राहकों को चाय देती।


कुछ ही दिनों में दुकान चलने लगी तो मोहन की माँ भी वहाँ आने लगीं।


एक दिन उन्होंने मोहन से कहा—


“बेटा, सीमा बहुत संस्कारी लड़की है। क्यों न इसे घर की बेटी बनाकर रख लें?”


मोहन मुस्कुराया।


“माँ, मैंने भी यही सोचा है।”


माँ ने पूछा—


“तू इससे शादी करना चाहता है?”


मोहन ने सिर हिलाया।


“नहीं माँ। जब पहली बार इसने मुझे भैया कहा था, उसी दिन से मैंने इसे अपनी बहन माना है। इसके भरोसे को मैं कभी नहीं तोड़ूँगा।”


मोहन की माँ की आँखों में आँसू आ गए।


उन्होंने कहा—


“तूने आज मुझे गर्व महसूस कराया।”


कुछ दिनों बाद मोहन अपनी माँ के साथ अम्मा के पास गया।


मोहन की माँ ने कहा—


“अम्मा, अगर आप अनुमति दें तो सीमा आज से हमारे घर में बेटी बनकर रहे। उसका खर्च, उसकी पढ़ाई और उसका भविष्य हमारी जिम्मेदारी होगी।”


सीमा यह सुनकर रो पड़ी।


उसने कहा—


“मुझे लगा था माँ के जाने के बाद मेरा कोई नहीं रहा।”


मोहन की माँ ने उसे गले लगाकर कहा—


“बेटी, माँ एक चली गई तो क्या हुआ? भगवान ने दूसरी माँ भेज दी।”


उस दिन पहली बार सीमा को लगा कि दुनिया पूरी तरह बुरी नहीं है।


कुछ महीने बाद मोहन और उसकी माँ ने सीमा की पढ़ाई दोबारा शुरू करवा दी।


सीमा मेहनत करने लगी।


दिन में वह दुकान पर हाथ बँटाती और रात में पढ़ाई करती।


समय बीतता गया।


कुछ सालों बाद सीमा ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और शहर में एक अच्छी नौकरी हासिल कर ली।


जिस लड़की को कभी लगा था कि उसके जीवन में कोई रास्ता नहीं बचा, वही अब अपने पैरों पर खड़ी थी।


एक दिन वह अपनी नौकरी से लौट रही थी। रास्ते में उसने सड़क किनारे एक बूढ़ी औरत को बैठे देखा।


वह तुरंत पहचान गई।


वह जमुना अम्मा थीं।


सीमा दौड़कर उनके पास गई और उनके पैर पकड़ लिए।


“अम्मा, आपने उस रात मुझे सहारा नहीं दिया होता तो पता नहीं मेरा क्या होता।”


अम्मा मुस्कुराईं।


“बेटी, मैंने कुछ नहीं किया। बस इंसानियत निभाई थी।”


सीमा ने कहा—


“अम्मा, आपने मुझे सिर्फ उस रात नहीं बचाया था। आपने मुझे जिंदगी दोबारा जीना सिखाया था।”


वह अम्मा को अपने घर ले आई।


मोहन की माँ ने भी उन्हें गले लगाया।


घर में चार लोग थे—एक बूढ़ी अम्मा, एक माँ, एक भाई और एक बेटी।


रिश्ते खून से नहीं, भरोसे और सम्मान से बने थे।


और सीमा ने जिंदगी से एक बात हमेशा के लिए सीख ली—


मुसीबत में हर हाथ मदद के लिए नहीं बढ़ता, लेकिन जो हाथ बिना किसी स्वार्थ के आगे बढ़े, उसे जिंदगी भर संभालकर रखना चाहिए।


सीख:

किसी मजबूर इंसान की कमजोरी का फायदा उठाना इंसानियत नहीं है। असली संस्कार वही हैं जो किसी अकेली लड़की को गलत नजर से देखने के बजाय उसकी सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की चिंता करना सिखाएँ। दुनिया में बुरे लोग जरूर हैं, लेकिन अच्छे लोगों की वजह से इंसानियत आज भी जिंदा है।



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