वह काली रात
“मांजी, आप ध्वनि को अपने कमरे में क्यों ले आईं? वह तो अपने भाइयों के साथ सोने की जिद कर रही थी।”
रश्मि की आवाज सुनकर रंजना कुछ पल के लिए चुप रहीं। उन्होंने अपनी पोती ध्वनि को प्यार से अपने पास सुलाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं,
“बेटा, ध्वनि अभी बहुत छोटी है। बच्चों को अपने पास सुलाना ही अच्छा होता है।”
रश्मि हल्के से मुस्कुराई।
“मां, आप भी ना… बच्चों को कुछ नहीं होता। दिनभर खेलते-खेलते थक गए हैं। अभी सो जाएंगे तो सुबह तक आंख भी नहीं खुलेगी।”
रंजना ने कोई जवाब नहीं दिया।
उनकी नजर ध्वनि के मासूम चेहरे पर टिकी थी।
ध्वनि गहरी नींद में थी।
उसकी मासूमियत देखकर रंजना के मन में अचानक एक ऐसा डर जाग उठा, जिसे उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने सीने में दबाकर रखा था।
वह डर किसी अजनबी का नहीं था।
वह डर रिश्तों के नाम पर मिलने वाले भरोसे का था।
रंजना की आंखों के सामने अचानक अपना बचपन घूमने लगा।
वह भी कभी इतनी ही छोटी थीं।
उम्र मुश्किल से नौ साल रही होगी।
उनका परिवार गांव में रहता था। पिता छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। घर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन परिवार में प्यार की कोई कमी नहीं थी।
रंजना की एक छोटी बहन भी थी।
दोनों बहनें हर समय साथ रहती थीं।
एक दिन उनके ताऊजी का बेटा सुरेश उनके घर आया।
सुरेश शहर में पढ़ता था और परिवार के सभी लोग उसे बहुत समझदार लड़का मानते थे।
घर में उसके आने से सभी खुश थे।
रंजना भी बहुत खुश थीं।
सुरेश उनके लिए शहर से मिठाई और कुछ खिलौने लेकर आया था।
“रंजू, तुम्हारे लिए यह गुड़िया लाया हूं।”
गुड़िया देखते ही रंजना की आंखें चमक उठीं।
“सच में भैया! यह मेरी है?”
“हां, बिल्कुल तुम्हारी।”
रंजना खुशी से उछल पड़ीं।
उन्हें क्या पता था कि जिस इंसान को वह अपना बड़ा भाई समझकर इतना प्यार कर रही हैं, वही आगे चलकर उनके जीवन में एक ऐसा डर छोड़ जाएगा जिसे वह वर्षों तक अपने भीतर लेकर चलेंगी।
सुरेश कुछ दिनों के लिए उनके घर रुका।
वह बच्चों के साथ खेलता, उन्हें कहानियां सुनाता और कभी-कभी पढ़ाई में भी मदद करता।
रंजना को उस पर पूरा भरोसा था।
एक रात घर में सभी लोग सोने की तैयारी कर रहे थे।
गर्मी बहुत थी।
घर में पंखे की सुविधा भी ठीक से नहीं थी, इसलिए आंगन में ही चारपाइयां और बिस्तर लगा दिए गए।
रंजना अपनी मां के पास जाने वाली थीं कि सुरेश ने मुस्कुराकर कहा,
“रंजू, आज तुम्हें एक नई कहानी सुनाऊंगा।”
रंजना तुरंत उसके पास चली गईं।
“कौन सी कहानी?”
“बहुत मजेदार है। मेरे पास आकर लेटो, फिर सुनाता हूं,” सुरेश ने कहा।
रंजना हंस पड़ीं।
“ठीक है।”
एक मासूम बच्ची के लिए यह सिर्फ कहानी थी।
उसे क्या पता था कि हर मुस्कुराता चेहरा भरोसे के लायक नहीं होता।
कुछ देर बाद कहानी सुनते-सुनते रंजना को नींद आ गई।
घर में सभी लोग सो चुके थे।
चारों तरफ शांति थी।
लेकिन आधी रात में अचानक रंजना की नींद खुली।
उन्हें कुछ अजीब महसूस हुआ।
पहले तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है।
उन्होंने करवट बदल ली।
उनका मन घबरा उठा।
कुछ देर बाद उन्हें फिर वही असहजता महसूस हुई।
इस बार रंजना डर गईं।
उन्होंने आंखें खोलकर देखा।
सुरेश उनके पास था।
रंजना को कुछ समझ नहीं आया।
उन्होंने धीरे से उससे दूर होने की कोशिश की।
लेकिन वह फिर उनके करीब आया।
अब रंजना को बहुत डर लगने लगा।
वह तुरंत उठकर अपनी मां के पास जाना चाहती थीं।
किसी तरह वह वहां से उठीं और मां के पास जाकर लेट गईं।
मां ने नींद में पूछा,
“क्या हुआ रंजू?”
रंजना चुप रहीं।
उन्होंने मां को कसकर पकड़ लिया।
उस रात वह मां से लिपटी रहीं।
लेकिन उनकी आंखों से नींद गायब हो चुकी थी।
उनके छोटे से मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
“भैया ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
सुबह मां ने जब रंजना को देखा तो पूछा,
“तू रात को अचानक मेरे पास क्यों आ गई थी?”
रंजना मां को देखती रहीं।
उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ था।
लेकिन शब्द नहीं थे।
वह चाहती थीं कि मां से सब बता दें।
पर मन में डर था।
अगर मां ने विश्वास नहीं किया तो?
अगर मां ने उन्हें ही डांट दिया तो?
अगर मां ने कहा कि सुरेश ऐसा कर ही नहीं सकता?
आखिर वह तो घर का अपना लड़का था।
रंजना ने सिर झुका लिया।
“कुछ नहीं मां… नींद नहीं आ रही थी।”
मां ने ज्यादा सवाल नहीं किए।
बात वहीं खत्म हो गई।
लेकिन रंजना के लिए वह बात कभी खत्म नहीं हुई।
उस दिन के बाद जब भी सुरेश उनके सामने आता, रंजना उससे दूर रहने लगीं।
उन्हें समझ नहीं आता था कि आखिर वह उस व्यक्ति से डर क्यों रही हैं जिसे कभी वह अपना सबसे प्यारा भाई समझती थीं।
वह इतनी छोटी थीं कि उस घटना का पूरा अर्थ भी नहीं समझती थीं।
लेकिन उनका मन समझ चुका था कि कुछ गलत हुआ है।
वर्ष बीतते गए।
रंजना बड़ी होती गईं।
लेकिन वह घटना उनके भीतर कहीं दबी रही।
उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।
न मां को।
न पिता को।
न अपनी बहन को।
यहां तक कि खुद से भी वह इस घटना के बारे में बात नहीं करती थीं।
लेकिन बचपन का दबा हुआ डर कभी सचमुच खत्म नहीं हुआ।
किसी पुरुष का अचानक करीब आना उन्हें असहज कर देता।
किसी का अचानक हाथ पकड़ लेना उन्हें डरा देता।
और रात में अकेले होने पर उन्हें कभी-कभी वही पुरानी रात याद आ जाती।
समय के साथ रंजना की शादी तय हो गई।
उनके पति का नाम बसंत था।
बसंत कॉलेज में प्रोफेसर थे।
वह शांत, समझदार और संवेदनशील व्यक्ति थे।
शादी के बाद रंजना को लगा कि अब उन्हें अपने पुराने डर से छुटकारा मिल जाएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
जब बसंत ने पहली बार उनके करीब आने की कोशिश की तो रंजना अचानक कांपने लगीं।
उनकी आंखों में आंसू आ गए।
बसंत तुरंत पीछे हट गए।
उन्होंने पूछा,
“रंजना, क्या हुआ?”
रंजना ने अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए कहा,
“कुछ नहीं।”
बसंत ने उसके चेहरे को ध्यान से देखते हुए पूछा,
“तुम रो क्यों रही हो?”
रंजना ने नजरें झुकाकर धीमी आवाज में कहा,
“मैं… मैं ठीक हूं।”
बसंत समझ गए कि बात सिर्फ घबराहट की नहीं है।
उन्होंने उस दिन कोई सवाल नहीं किया।
कई दिन बीत गए।
जब भी वह रंजना के करीब आने की कोशिश करते, रंजना डर जातीं।
बसंत ने कभी उन्हें मजबूर नहीं किया।
एक दिन उन्होंने रंजना का हाथ अपने हाथ में लिया और बहुत शांत आवाज में कहा,
“रंजना, मैं तुम्हारा पति हूं। तुम्हें मुझसे कुछ छिपाने की जरूरत नहीं है।”
रंजना चुप रहीं।
“अगर तुम्हारे साथ कभी कुछ गलत हुआ है तो मुझे बताओ। मैं तुम्हें दोष नहीं दूंगा।”
बसंत की यह बात सुनते ही रंजना की आंखों से आंसू निकलने लगे।
वह काफी देर तक रोती रहीं।
फिर कांपती हुई आवाज में बोलीं,
“बसंत… मेरे बचपन में मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ था, जिसे मैं आज तक भूल नहीं पाई।”
बसंत ने उनका हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।
“क्या हुआ था?”
रंजना ने आंखें बंद कर लीं।
उनके सामने वही आंगन, वही रात और वही चेहरा फिर से घूम गया।
वह बोलना चाहती थीं, लेकिन आवाज गले में अटक रही थी।
फिर आखिरकार उन्होंने अपने पति को अपने बचपन का वह राज बता दिया।
बसंत सब सुनकर कुछ देर तक बिल्कुल शांत रहे।
रंजना डर रही थीं कि कहीं वह उन्हें गलत न समझ लें।
लेकिन बसंत ने धीरे से कहा,
“रंजना, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”
रंजना ने रोते हुए उनकी ओर देखा।
“लेकिन मैं आज तक उस रात को भूल नहीं पाई।”
बसंत ने प्यार से उनका हाथ थामते हुए कहा,
“तुम्हें उस रात को भूलने की जरूरत नहीं है, रंजना। तुम्हें बस उस दर्द से बाहर आने की जरूरत है।”
रंजना ने सिसकते हुए पूछा,
“क्या मैं कभी सामान्य हो पाऊंगी?”
बसंत ने उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा,
“हां। और मैं तुम्हारा साथ दूंगा।”
रंजना ने पहली बार महसूस किया कि शायद उनके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति आ गया है जिसके सामने वह अपना पूरा सच कह सकती हैं।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में बसंत का एक फैसला उनकी पूरी जिंदगी बदल देगा।
और वह फैसला सिर्फ रंजना को उनके अतीत से बाहर निकालने वाला नहीं था…
बल्कि आने वाली पीढ़ी की बेटियों को सुरक्षित रखने की एक नई शुरुआत बनने वाला था।
रंजना की बात सुनने के बाद बसंत काफी देर तक चुप बैठे रहे।
सामने बैठी उनकी पत्नी लगातार रो रही थीं।
उनके चेहरे पर वर्षों का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
बसंत ने धीरे से उनका हाथ थामा और कहा,
“रंजना, तुम्हें इतने साल तक यह दर्द अकेले नहीं सहना चाहिए था।”
रंजना ने आंसू पोंछते हुए कहा,
“मैं क्या करती बसंत? उस समय मैं बहुत छोटी थी। मुझे खुद समझ नहीं आया था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। बाद में जब समझ आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”
बसंत ने शांत स्वर में रंजना को समझाते हुए कहा,
“देर कभी नहीं होती, रंजना।”
रंजना ने कुछ पल चुप रहने के बाद डरते हुए कहा,
“लेकिन मुझे डर लगता है।”
बसंत ने उसका हाथ थामकर पूछा,
“किस बात का?”
रंजना की आंखों में फिर आंसू भर आए। वह धीमी आवाज में बोली,
“लोगों का... रिश्तों का... और कभी-कभी खुद से भी।”
बसंत कुछ पल उन्हें देखते रहे।
फिर बोले,
“तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है। और सबसे जरूरी बात यह है कि उस घटना की जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं थी।”
रंजना ने सिर झुका लिया।
“कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर उस रात मैंने मां को सब बता दिया होता तो शायद…”
बसंत ने रंजना की ओर देखते हुए शांत स्वर में कहा,
“शायद कुछ बदल जाता, शायद नहीं। लेकिन एक बात निश्चित है—तुम उस उम्र में इतनी समझदार नहीं थीं कि ऐसी स्थिति को संभाल पातीं। इसलिए खुद को दोष देना बंद करो।”
रंजना की आंखों से फिर आंसू बह निकले।
बसंत ने उन्हें रोने दिया।
उस रात उन्होंने रंजना से कोई और सवाल नहीं किया।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा,
“कल हम किसी अच्छे मनोवैज्ञानिक से मिलेंगे। तुम्हें अपने मन का बोझ धीरे-धीरे हल्का करना होगा।”
रंजना ने हामी भर दी।
अगले कुछ दिनों तक दोनों एक विशेषज्ञ से मिले।
रंजना ने पहली बार अपने बचपन की उस घटना को खुलकर समझना शुरू किया।
उन्हें बताया गया कि बचपन में हुआ ऐसा अनुभव लंबे समय तक मन पर असर डाल सकता है।
डर, शर्म, घबराहट और किसी पर भरोसा करने में कठिनाई—ये सब उस आघात की प्रतिक्रिया हो सकती हैं।
रंजना धीरे-धीरे खुद को समझने लगीं।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि वह कमजोर नहीं थीं।
वह सिर्फ एक ऐसी बच्ची थीं, जिसके साथ गलत किया गया था।
और गलती उसकी नहीं थी।
बसंत ने हर कदम पर उनका साथ दिया।
उन्होंने कभी जल्दबाजी नहीं की।
उन्होंने रंजना की इच्छा और सहमति को हमेशा महत्व दिया।
धीरे-धीरे रंजना के मन का डर कम होने लगा।
उनके रिश्ते में भी विश्वास बढ़ता गया।
एक दिन रंजना ने बसंत से कहा,
“अगर तुम उस दिन मेरी बात सुनने के बजाय मुझे ही गलत समझ लेते तो शायद मैं पूरी जिंदगी टूट जाती।”
बसंत मुस्कुराए।
“पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ एक कमरे या एक घर में साथ रहने का नाम नहीं है। इसमें एक-दूसरे के डर को समझना भी शामिल है।”
रंजना की आंखें नम हो गईं।
कुछ समय बाद रंजना ने महसूस किया कि वह अपने जीवन में फिर से सामान्य हो रही हैं।
उनका घर खुशियों से भर गया।
फिर उनके जीवन में एक बेटी आई।
रंजना ने उसका नाम रूपा रखा।
कुछ वर्षों बाद बेटा भी हुआ—रोहित।
बच्चों के आने के बाद रंजना की दुनिया ही बदल गई।
वह अपने दोनों बच्चों से बहुत प्यार करती थीं।
लेकिन बेटी रूपा को लेकर वह विशेष रूप से सतर्क रहती थीं।
कभी-कभी बसंत उन्हें देखकर मुस्कुराते और कहते,
“रंजना, तुम रूपा को एक पल के लिए भी अपनी आंखों से दूर नहीं होने देतीं।”
रंजना कहतीं,
“बसंत, मैं जानती हूं कि दुनिया में हर इंसान बुरा नहीं होता। लेकिन बच्चों को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।”
बसंत सहमति में सिर हिला देते।
उन्होंने कभी रंजना की सावधानी को गलत नहीं समझा।
दोनों ने मिलकर बच्चों के साथ ऐसा रिश्ता बनाया कि बच्चे उनसे कुछ भी कह सकें।
घर में किसी बात को लेकर डर का माहौल नहीं था।
रूपा जब सात-आठ साल की हुई तो एक दिन रंजना ने उसे अपने पास बैठाया।
“रूपा, मैं तुमसे कुछ जरूरी बात करना चाहती हूं।”
रूपा ने मासूमियत से पूछा,
“क्या हुआ मां?”
“बेटा, तुम्हारे शरीर के कुछ हिस्से निजी होते हैं। उन्हें बिना तुम्हारी अनुमति कोई नहीं छू सकता।”
रूपा ध्यान से मां की बात सुनने लगी।
“अगर कोई तुम्हें ऐसा छुए जिससे तुम्हें अच्छा न लगे तो क्या करोगी?”
रूपा ने कहा,
“आपको बताऊंगी।”
रंजना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“सिर्फ मुझे ही नहीं, तुम पापा को भी बता सकती हो। अगर कभी हम दोनों पास न हों, तो किसी ऐसे बड़े व्यक्ति को जरूर बताना जिस पर तुम्हें पूरा भरोसा हो।”
रूपा ने कुछ सोचते हुए पूछा,
“मां, अगर कोई मुझे कहे कि यह बात किसी को मत बताना, तब?”
रंजना ने गंभीर होकर कहा,
“तब तो तुम्हें सबसे पहले हमें बताना है। कोई तुम्हें डराए या किसी बात को छिपाने के लिए कहे, तो उसकी बात कभी मत मानना।”
रूपा ने फिर मासूमियत से पूछा,
“मां, अगर वह अपना हो तब भी?”
रंजना कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
यह सवाल उनके दिल में सीधे उतर गया था।
उन्होंने बेटी को अपने पास खींचते हुए कहा,
“अपना हो या पराया, अगर कोई तुम्हें असहज महसूस कराए तो तुम्हें चुप रहने की जरूरत नहीं है।”
रूपा ने मां को गले लगा लिया।
रंजना की आंखों में आंसू आ गए।
उन्हें लगा जैसे उन्होंने अपनी बचपन की उस छोटी रंजना को भी पहली बार जवाब दिया है।
वह जवाब, जो उन्हें अपनी मां से कभी नहीं मिला था।
समय तेजी से बीतता गया।
रूपा बड़ी होती गई।
वह पढ़ाई में अच्छी थी और अपनी हर छोटी-बड़ी बात मां-पापा से साझा करती थी।
रंजना को सबसे ज्यादा खुशी इसी बात की थी कि उनकी बेटी उनसे डरती नहीं थी।
एक दिन रूपा स्कूल से लौटकर सीधे रंजना के पास आई।
“मां, आज स्कूल में एक लड़की रो रही थी।”
“क्यों रो रही थी?” रंजना ने पूछा।
“वह कह रही थी कि उसे किसी रिश्तेदार के घर जाना अच्छा नहीं लगता,” रूपा ने जवाब दिया।
रंजना ने पूछा,
“उसने कुछ बताया?”
“नहीं। वह बहुत डर रही थी।”
रंजना ने बेटी से कहा,
“अगर कभी कोई बच्चा ऐसा महसूस करे तो उसे चुप रहने के लिए मत कहना। उसे भरोसा दिलाना कि उसकी बात सुनी जाएगी।”
रूपा ने सिर हिलाया।
रंजना को लगा कि शायद उनका अतीत किसी न किसी रूप में उनकी बेटी को मजबूत बनाना सिखा रहा था।
वर्षों बाद रूपा की शादी हुई।
वह अपने घर में खुश थी।
रंजना अब दादी बन चुकी थीं।
उनकी बहू रश्मि बहुत समझदार और मिलनसार थी।
रश्मि की एक बेटी थी—ध्वनि।
ध्वनि रंजना की आंखों का तारा थी।
वह जब भी दादी को देखती, दौड़कर उनके गले लग जाती।
“दादी, आज कहानी सुनाओ।”
रंजना हंसते हुए कहतीं,
“कौन सी कहानी?”
“राजकुमारी वाली,” ध्वनि ने उत्साह से कहा।
“अच्छा, आज वही सुनाऊंगी।”
ध्वनि की मासूम बातें सुनकर रंजना का दिल खिल उठता।
लेकिन उनके भीतर बचपन की वह पुरानी सावधानी आज भी जिंदा थी।
वह बच्चों को लेकर किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती थीं।
एक दिन रश्मि की बड़ी बहन अपने परिवार के साथ कुछ दिनों के लिए उनके घर आई।
घर छोटा था।
दो कमरे और एक हॉल।
फिर भी सभी लोग खुशी-खुशी एडजस्ट हो गए।
बच्चों ने मिलकर खूब खेला।
बड़े लोग बातें करते रहे।
घर में कई दिनों बाद इतनी रौनक आई थी।
रंजना भी बहुत खुश थीं।
लेकिन रात में जब सभी लोग सोने लगे तो उनकी नजर ध्वनि पर पड़ी।
ध्वनि अपने भाइयों के पास सोने की जिद कर रही थी।
रंजना का दिल अचानक धड़क उठा।
उन्होंने रश्मि से कहा,
“बेटा, ध्वनि को अपने पास सुला लो।”
रश्मि हंसकर बोली,
“मां, वह नहीं मान रही। बच्चों को साथ सोने दीजिए। सब एक-दूसरे के साथ खुश हैं।”
रंजना ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उनकी बेचैनी बढ़ती गई।
उन्हें अपनी वह रात याद आ गई।
वही उम्र।
वही मासूमियत।
वही भरोसा।
वही गलती कि किसी अपने पर आंख बंद करके विश्वास कर लिया जाए।
उन्होंने कुछ देर इंतजार किया।
फिर धीरे से हॉल में गईं।
ध्वनि अभी भी बच्चों के बीच सो रही थी।
रंजना ने उसे प्यार से उठाया।
“दादी के पास सोओगी?”
ध्वनि ने आधी नींद में आंखें खोलीं।
“हां…”
वह दादी के साथ उनके कमरे में चली गई।
रंजना ने उसे अपने पास सुला लिया।
उसके माथे पर हाथ फेरते हुए वह देर तक जागती रहीं।
उनके मन में सवाल उठ रहा था—
क्या वह जरूरत से ज्यादा सावधान हो रही हैं?
या फिर यही सावधानी किसी मासूम बच्चे को ऐसी घटना से बचा सकती है, जिसका दर्द पूरी जिंदगी पीछा करता है?
रंजना के पास इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं था।
लेकिन एक बात वह जानती थीं—
वह अपनी पोती के साथ वही गलती नहीं दोहराएंगी जो उनकी मां से अनजाने में हो गई थी।
उन्होंने ध्वनि को देखा।
मासूम बच्ची गहरी नींद में सो रही थी।
रंजना ने धीरे से कहा,
“तुम्हें मैं कभी अकेले नहीं छोड़ूंगी, मेरी बच्ची।”
उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन एक ऐसी बात सामने आने वाली है, जो पूरे परिवार को हिला देगी।
और रंजना को अपने अतीत का वह सच सबके सामने रखने के लिए मजबूर कर देगी, जिसे उन्होंने दशकों से छिपा रखा था।
अगले दिन रंजना की आंख खुली तो ध्वनि अभी भी उनके पास गहरी नींद में सो रही थी।
उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।
ध्वनि ने आंखें खोलते ही मुस्कुराकर पूछा,
“दादी, मैं आपके पास ही सोई थी?”
रंजना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराकर कहा,
“हां मेरी बच्ची।”
ध्वनि खुशी से दादी के गले लगते हुए बोली,
“बहुत अच्छा लगा।”
रंजना मुस्कुरा दीं।
उन्हें लगा जैसे ध्वनि ने उनके मन के सारे डर को एक पल के लिए शांत कर दिया हो।
कुछ देर बाद पूरा घर जाग गया।
रश्मि की बहन और उसके पति घूमने की तैयारी करने लगे।
बच्चे भी जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे।
घर में फिर से हंसी-मजाक शुरू हो गया।
रश्मि रसोई में नाश्ता बनाने लगी।
रंजना भी उसकी मदद करने पहुंच गईं।
रश्मि ने हंसते हुए कहा,
“मां, कल रात आपने ध्वनि को अपने पास सुला लिया। सुबह वह आपके बारे में ही बता रही थी।”
रंजना ने मुस्कुराकर कहा,
“दादी के पास सोना उसे अच्छा लगा होगा।”
रश्मि भी मुसकराई और बोली, “बहुत अच्छा लगा। सुबह उठते ही वह आपके बारे में ही बता रही थी।”
दोनों मुस्कुराईं।
लेकिन रंजना के मन में अभी भी एक बात थी।
वह चाहती थीं कि रश्मि उनकी बात समझे।
न किसी पर शक करे।
न बच्चों को डराए।
बस उन्हें जागरूक रखे।
नाश्ता करने के बाद सभी लोग बाहर घूमने चले गए।
दिनभर बच्चों ने खूब मस्ती की।
रंजना भी उनके साथ थीं।
लेकिन जब भी कोई बच्चा किसी बड़े के साथ अकेला जाता, उनकी नजर अपने आप उस ओर चली जाती।
रश्मि ने यह महसूस किया।
वापस लौटते समय उसने पूछा,
“मां, आप बच्चों को लेकर इतनी चिंतित क्यों रहती हैं?”
रंजना कुछ पल चुप रहीं।
“बस बेटा, बच्चों को लेकर हर मां को सावधान रहना चाहिए।”
रश्मि ने सास के चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा, “लेकिन आपकी चिंता कुछ ज्यादा लगती है।”
रंजना ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह अपने अतीत की बात किसी को बताना नहीं चाहती थीं।
लेकिन शायद अब समय आ चुका था।
रात को सभी लोग फिर हॉल में बैठे बातें कर रहे थे।
बच्चे एक तरफ खेल रहे थे।
ध्वनि अचानक अपनी दादी के पास आकर बैठ गई।
“दादी, मुझे आपसे एक बात कहनी है।”
रंजना ने उसे प्यार से पास बुलाया।
“बोलो।”
ध्वनि ने धीमी आवाज में कहा,
“कल जब मैं सो रही थी, तब मुझे एक सपना आया था।”
रंजना का दिल धड़क उठा।
“कैसा सपना?”
ध्वनि ने मासूमियत से कहा,
“मुझे याद नहीं... बस डर लग रहा था।”
रंजना ने तुरंत उसे गले लगा लिया।
“कोई बात नहीं। सपना था, अब सब ठीक है।”
ध्वनि कुछ देर दादी से चिपकी रही।
रंजना ने उसे पानी दिया और प्यार से समझाया कि अगर कभी उसे किसी के व्यवहार से डर या असहजता महसूस हो तो वह तुरंत मां, पापा या दादी को बताए।
ध्वनि ने मासूमियत से सिर हिला दिया।
रंजना ने राहत की सांस ली।
लेकिन उसी रात उन्हें एहसास हुआ कि सिर्फ बच्चों को समझाना ही काफी नहीं है।
घर के बड़ों को भी बच्चों की बात सुनना सीखना होगा।
कुछ दिनों बाद रश्मि की बहन अपने परिवार के साथ वापस चली गई।
घर फिर पहले जैसा शांत हो गया।
लेकिन रंजना के मन में हलचल बनी रही।
एक दिन रश्मि ने अचानक पूछा,
“मां, आप उस रात इतनी घबरा क्यों गई थीं?”
रंजना चुप रहीं।
“मैंने कई बार देखा है कि जब भी कोई बच्चा किसी बड़े के साथ अकेला होता है तो आप परेशान हो जाती हैं।”
रंजना ने गहरी सांस ली।
“रश्मि, क्या तुम सच में मेरी बात सुनना चाहती हो?”
“हां मां।”
रंजना ने धीरे-धीरे अपने बचपन का वह राज उसे बता दिया।
रश्मि की आंखें फैल गईं।
कुछ पल तक वह कुछ बोल ही नहीं पाई।
“मां... यह सब आपके साथ हुआ था?”
रंजना ने सिर हिला दिया।
“और आपने कभी किसी को नहीं बताया?”
रंजना ने धीमी आवाज में जवाब दिया,
“नहीं बेटा।”
रश्मि ने बेचैनी से पूछा,
“क्यों मां? आपने इतने साल यह बात अपने मन में क्यों दबाकर रखी?”
रंजना ने गहरी सांस ली और बोलीं,
“क्योंकि मैं उस समय बच्ची थी। मुझे खुद समझ नहीं आया था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। जब बड़ी हुई और उस घटना का मतलब समझ आया, तब डर लगा कि अगर मैं किसी को बताऊंगी तो शायद कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करेगा।”
रश्मि की आंखों में आंसू आ गए।
उसने अपनी सास का हाथ पकड़ लिया।
“मां, आपने इतने साल यह दर्द अकेले कैसे सहा?”
रंजना हल्की मुस्कान के साथ बोलीं,
“शायद इसलिए कि उस समय हमारे पास बात करने का साहस नहीं था। मां-बेटी के बीच बहुत संकोच था। बच्चों को शरीर और सुरक्षा के बारे में समझाया ही नहीं जाता था।”
रश्मि ने कहा,
“लेकिन आज हम अपनी बेटियों को चुप नहीं रहने देंगे।”
रंजना ने उसकी ओर देखा।
“यही तो मैं चाहती हूं।”
तभी कमरे में ध्वनि आ गई।
“दादी, आप रो क्यों रही हो?”
रंजना ने तुरंत आंसू पोंछे और मुस्कुराकर उसे अपने पास बैठा लिया।
“कुछ नहीं मेरी बच्ची।”
ध्वनि ने दादी का चेहरा पकड़ लिया।
“आप झूठ बोल रही हो।”
रंजना हंस पड़ीं।
“तुम तो बहुत समझदार हो गई हो।”
ध्वनि बोली,
“मम्मी कहती हैं कि दादी से कोई बात छिपानी नहीं चाहिए।”
रंजना ने रश्मि की ओर देखा।
दोनों की आंखों में एक साथ नमी आ गई।
उस दिन रंजना ने मन ही मन एक फैसला किया।
वह अब अपने अतीत को सिर्फ दर्द की तरह याद नहीं करेंगी।
वह उसे एक सीख में बदलेंगी।
उन्होंने परिवार के सभी बच्चों को एक दिन अपने पास बैठाया।
“मैं तुम सबको एक जरूरी बात बताना चाहती हूं।”
बच्चे ध्यान से उनकी ओर देखने लगे।
रंजना ने कहा,
“तुम्हारा शरीर तुम्हारा अपना है। कोई भी व्यक्ति तुम्हें ऐसा छूने की कोशिश करे जिससे तुम्हें डर या असहजता महसूस हो तो तुरंत पीछे हट जाना।”
एक बच्चे ने पूछा,
“अगर वह अपना हो तो?”
रंजना ने कहा,
“तब भी।”
दूसरे ने पूछा,
“अगर वह बोले कि किसी को बताना मत?”
रंजना ने दृढ़ आवाज में कहा,
“तब सबसे पहले मां-पापा को बताना।”
ध्वनि ने पूछा,
“अगर कोई डांटे तो?”
रंजना ने कहा, “फिर भी बताना।”
ध्वनि बोली, “अगर कोई कहे कि मेरी गलती है?”
रंजना की आंखें भर आईं।
उन्होंने बच्चों से कहा,
“बच्चे की सुरक्षा में कभी उसकी गलती नहीं होती। गलत काम करने वाला ही जिम्मेदार होता है।”
रश्मि पीछे खड़ी होकर सब सुन रही थी।
उसे अपनी सास पर गर्व हो रहा था।
रंजना ने बच्चों को डराया नहीं।
उन्होंने उन्हें यह भी नहीं कहा कि हर व्यक्ति बुरा है।
उन्होंने बस इतना समझाया कि अच्छा इंसान वही है जो उनकी इच्छा, उनकी सीमा और उनकी सुरक्षा का सम्मान करे।
उस शाम बसंत भी वहां बैठे थे।
उन्होंने रंजना की ओर देखा और मुस्कुरा दिए।
रंजना ने उनकी आंखों में वही पुराना भरोसा देखा।
वही भरोसा जिसने उन्हें वर्षों पहले टूटने से बचाया था।
रात को दोनों पति-पत्नी अकेले बैठे थे।
बसंत ने कहा,
“तुमने आज बहुत अच्छा किया।”
रंजना बोलीं,
“मैंने बस वही किया जो मेरी मां को करना चाहिए था।”
बसंत ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“तुमने अपनी पीड़ा को दूसरों की सुरक्षा में बदल दिया। इससे बड़ी बात क्या होगी?”
रंजना की आंखों से आंसू बह निकले।
“बसंत, कभी-कभी सोचती हूं अगर उस समय मैं अपनी मां से कह पाती तो शायद मेरा बचपन अलग होता।”
बसंत ने कुछ पल चुप रहने के बाद शांत स्वर में कहा,
“हो सकता है।”
रंजना ने आंखों में आंसू लिए कहा,
“लेकिन अब मैं चाहती हूं कि किसी और बच्ची का बचपन ऐसा न हो।”
बसंत ने कहा,
“और यही तुम्हारी जीत है।”
रंजना मुस्कुराईं।
उन्हें पहली बार लगा कि उनके जीवन की वह काली रात अब सिर्फ एक दर्दनाक याद नहीं रही।
उसने उन्हें एक ऐसी मां और दादी बना दिया था जो बच्चों की चुप्पी को भी सुनना जानती थी।
उन्होंने ध्वनि को पास बुलाया।
“मेरी बच्ची, एक बात हमेशा याद रखना।”
ध्वनि ने मासूमियत से दादी की ओर देखते हुए पूछा, “क्या दादी?”
रंजना ने गंभीर लेकिन प्यार भरी आवाज में कहा, “अगर जिंदगी में कभी कोई बात तुम्हें डराए, शर्मिंदा करे या परेशान करे, तो उसे अपने मन में मत रखना। चाहे सामने वाला कितना भी करीबी क्यों न हो, अपने भरोसेमंद बड़े को जरूर बताना।”
ध्वनि ने दादी को गले लगा लिया।
“मैं हमेशा आपको बताऊंगी।”
रंजना ने उसे कसकर सीने से लगा लिया।
उनकी आंखों में आंसू थे।
लेकिन इस बार ये आंसू दुख के नहीं थे।
ये उस संतोष के आंसू थे कि जिस बच्ची की आवाज कभी डर के कारण दब गई थी, वही बच्ची आज एक दादी बनकर दूसरी बच्चियों की आवाज बन चुकी थी।
रंजना ने आसमान की ओर देखा।
मन ही मन अपनी मां को याद किया।
उन्होंने सोचा—
“मां, शायद उस समय आपको भी सब पता नहीं था। शायद आप भी समाज और रिश्तों के डर में बंधी थीं। लेकिन मैंने अपनी अगली पीढ़ी को वह डर नहीं दिया।”
उन्होंने ध्वनि के माथे को चूमा।
और उसी पल उन्हें लगा कि उनके जीवन की सबसे काली रात के ऊपर आखिरकार एक उजली सुबह आ गई है।
सीख:
बच्चों को सिर्फ अजनबियों से सावधान रहना सिखाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भरोसा देना जरूरी है कि अगर कोई परिचित या करीबी व्यक्ति भी उन्हें असहज महसूस कराए, तो वे बिना डर के अपनी बात कह सकते हैं। उनकी बात को गंभीरता से सुनना, उन्हें दोष न देना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना हर परिवार की जिम्मेदारी है।

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