बुढ़ापा और अधूरे सपने
आज सुबह से ही पड़ोस वाले घर से तेज आवाजें आ रही थीं। कभी रमा आंटी की ऊंची आवाज सुनाई देती, तो कभी अम्मा जी की धीमी-सी सफाई देने वाली आवाज।
मैं बालकनी में खड़ी होकर काफी देर तक समझने की कोशिश करती रही कि आखिर बात क्या है।
रमा आंटी वैसे तो हमारे पड़ोस में पिछले दस साल से रह रही थीं। उनका परिवार काफी खुशहाल था। उनके पति का अपना कारोबार था और दोनों बच्चे अच्छी नौकरी करते थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी।
लेकिन आज सुबह उनकी आवाज कुछ ज्यादा ही कड़वी लग रही थी।
मैंने सोचा, शायद घर में कोई बड़ी बात हो गई है।
कुछ देर बाद जब मैं दूध लेने बाहर निकली तो गली के मोड़ पर मुझे उनकी बेटी अंजलि मिल गई। अंजलि मेरी कॉलेज की दोस्त भी थी।
मैंने उससे पूछा,
“अंजलि, आज सुबह से तुम्हारे घर में क्या हो रहा है? आंटी इतनी जोर-जोर से क्यों चिल्ला रही हैं?”
अंजलि ने थोड़ा परेशान होकर कहा,
“क्या बताऊं? अम्मा जी ने सुबह से परेशान कर रखा है।”
मैंने हैरानी से पूछा,
“लेकिन हुआ क्या?”
अंजलि ने लंबी सांस लेते हुए कहा,
“कुछ नहीं। उनकी पुरानी सहेलियों का एक ग्रुप रामेश्वरम जा रहा है। बस अम्मा जी ने भी जाने की जिद पकड़ ली है।”
मैंने हैरानी से पूछा,
“तो इसमें परेशानी की क्या बात है? उन्हें जाने दो।”
अंजलि ने मेरी तरफ देखा और बोली,
“तुम्हें पता है ट्रैवल एजेंसी वाले आठ हजार रुपये मांग रहे हैं?”
मैंने कहा,
“तो?”
अंजलि ने थोड़े गुस्से में कहा,
“तो आठ हजार रुपये कोई कम पैसे हैं क्या? ऊपर से इतनी उम्र में अकेले यात्रा करेंगी। रास्ते में कुछ हो गया तो?”
मैंने कहा,
“लेकिन उनके साथ तो उनकी सहेलियां रहेंगी न?”
अंजलि ने लापरवाही से कंधे उचकाते हुए कहा,
“हां, लेकिन फिर भी। इस उम्र में घूमने का क्या शौक?”
मैं चुप हो गई।
अंजलि ने आगे कहा,
“मैंने अम्मा से साफ कह दिया कि अब उम्र आराम करने की है। भगवान का नाम लो, घर में रहो। ये घूमना-फिरना अब अच्छा नहीं लगता।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
अंजलि वहां से चली गई।
लेकिन मैं वहीं खड़ी रह गई।
मेरे मन में बस एक ही सवाल घूम रहा था—
क्या सचमुच बुढ़ापे में इंसान को अपने सारे शौक छोड़ देने चाहिए?
जिस परिवार के लोग कुछ महीने पहले ही विदेश घूमने गए थे…
जिस परिवार ने वहां तीन-चार लाख रुपये खर्च किए थे…
जिस घर में हर महीने महंगी पार्टियां होती थीं…
जिस घर में बच्चों के जन्मदिन पर हजारों रुपये के केक और सजावट होती थी…
उसी घर में एक बुजुर्ग महिला के लिए आठ हजार रुपये का खर्च अचानक बहुत बड़ा हो गया था।
मैंने उस दिन इस बात को ज्यादा नहीं सोचा।
लेकिन शायद किस्मत चाहती थी कि मैं उस घर की एक ऐसी कहानी देखूं, जिसे मैं जिंदगी भर न भूलूं।
अगले दिन सुबह मैं मंदिर जा रही थी।
रास्ते में अम्मा जी अपने घर के बाहर चारपाई पर बैठी थीं।
उनके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।
मैंने मुस्कुराकर पूछा,
“अम्मा जी, क्या देख रही हैं?”
उन्होंने डायरी बंद कर दी।
“कुछ नहीं बेटी।”
मैं उनके पास बैठ गई।
“कल रामेश्वरम जाने की बात हो रही थी न?”
उनकी आंखें अचानक चमक उठीं।
“हां बेटी।”
फिर कुछ पल बाद उनकी आंखों की चमक बुझ गई।
उन्होंने धीमी आवाज में कहा,
“मेरी पांच सहेलियां जा रही हैं। हम सबकी उम्र लगभग बराबर है। सोच रही थी कि आखिरी बार सब साथ में घूम आएं।”
मैंने पूछा,
“आखिरी बार क्यों कह रही हैं?”
अम्मा जी हल्का सा मुस्कुराईं।
“बुढ़ापा है बेटी। पता नहीं अगली बार किसका शरीर साथ देगा और किसका नहीं।”
मैं कुछ बोल नहीं पाई।
उन्होंने अपनी डायरी खोली।
उसमें कई जगह पुराने टिकट, मंदिरों की तस्वीरें और छोटे-छोटे कागज लगे थे।
“जानती हो बेटी, मेरी शादी के बाद मैं कभी बाहर घूमने नहीं जा पाई।”
मैंने हैरानी से पूछा,
“क्यों अम्मा जी?”
अम्मा जी ने एक गहरी सांस ली और धीमी आवाज में बोलीं,
“घर-गृहस्थी में ही पूरी जिंदगी निकल गई। पहले पति की जिम्मेदारी थी, फिर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उसके बाद बेटियों की शादी और फिर पोते-पोतियों की देखभाल। पता ही नहीं चला कि जिंदगी कब गुजर गई।”
उन्होंने एक पुरानी तस्वीर निकालकर मुझे दिखाई।
“ये देखो। ये मेरी सहेलियां हैं। हम सबने शादी से पहले बहुत घूमने का सपना देखा था।”
मैंने तस्वीर देखी।
पांच जवान लड़कियां एक साथ खड़ी थीं।
उनके चेहरे पर वही बेफिक्री थी, जो आजकल की लड़कियों के चेहरों पर होती है।
अम्मा जी तस्वीर देखते हुए बोलीं,
“हमने सोचा था कि शादी के बाद पति के साथ घूमेंगे।”
फिर हंसते हुए बोलीं,
“लेकिन शादी के बाद पता चला कि पति के साथ घूमना तो दूर, बाजार जाने के लिए भी पूछना पड़ता है।”
हम दोनों हंस पड़े।
फिर उनका चेहरा गंभीर हो गया।
“पति चले गए। बच्चे बड़े हो गए। अब सोचा था कि कम से कम अपने मन की एक इच्छा तो पूरी कर लूं।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
“आप जरूर जाइए।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
“लेकिन घर वाले?”
उनकी आवाज में डर था।
मैंने कहा,
“अगर आपकी सेहत ठीक है और आपकी सहेलियां साथ हैं तो आपको जाना चाहिए।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस आसमान की तरफ देखते हुए धीरे से बोलीं,
“काश कोई मुझे यह बात घर में भी कह देता।”
उस दिन शाम को मैंने देखा कि रमा आंटी की बेटी और बेटा दोनों घर में बैठे थे।
अम्मा जी उनके सामने खड़ी थीं।
रमा आंटी ने कहा,
“मां, आपको समझ क्यों नहीं आता? अब आपकी उम्र घूमने की नहीं है।”
अम्मा जी चुप रहीं।
उनके बेटे ने कहा,
“मां, हम आपको कहीं अच्छी जगह घुमा देंगे। लेकिन ये रामेश्वरम वाला चक्कर छोड़ो।”
अम्मा जी ने पूछा,
“कब घुमाओगे बेटा?”
वह चुप हो गया।
अम्मा जी ने फिर पूछा,
“बेटा, अगले महीने चलोगे?”
बेटे ने थोड़ा असहज होकर कहा,
“देखेंगे, मां।”
अम्मा जी ने कुछ पल चुप रहने के बाद फिर पूछा,
“तो अगले साल चलेंगे?”
बेटे ने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए कहा,
“मां, अभी बहुत काम है। समय मिला तो जरूर ले चलेंगे।”
अम्मा जी मुस्कुराईं।
“फिर जब समय मिलेगा?”
बेटे ने कहा,
“हां मां।”
अम्मा जी ने धीरे से कहा,
“बेटा, तुम्हारे पास समय कभी नहीं होगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अम्मा जी ने अपनी आंखों में आए आंसू पोंछे।
“तुम लोग कहते हो कि मैं बूढ़ी हो गई हूं। लेकिन मैं तुमसे बस इतना पूछती हूं कि बूढ़ी होने के बाद क्या इंसान की इच्छाएं भी बूढ़ी हो जाती हैं?”
कोई जवाब नहीं आया।
अम्मा जी अपने कमरे में चली गईं।
दो दिन बाद अचानक घर में बहुत चहल-पहल थी।
रमा आंटी का बेटा विदेश जा रहा था।
उसकी पत्नी ने बताया कि कंपनी की तरफ से कुछ दिन की छुट्टी मिली है।
घर में नई घड़ी, नए कपड़े, नए जूते और यात्रा का सामान आ गया।
रमा आंटी खुशी से सबको बता रही थीं,
“इस बार तो खूब घूमने वाले हैं।”
मैंने देखा, अम्मा जी कमरे के दरवाजे पर खड़ी होकर सब देख रही थीं।
उनके चेहरे पर खुशी भी थी और एक अजीब-सी उदासी भी।
मैं उनके पास गई।
“अम्मा जी, आप भी कहीं जा रही हैं?”
उन्होंने हल्की हंसी के साथ कहा,
“हां।”
मैं खुश हुई।
“सच?”
उन्होंने अपनी छोटी-सी पोटली दिखाई।
“रामेश्वरम।”
मैंने खुशी से कहा,
“तो फिर आपने टिकट करा लिया?”
उन्होंने सिर हिला दिया।
“मेरी सहेलियों ने मेरे लिए पैसे जमा करके टिकट करा दिया।”
मैंने पूछा,
“घर वाले मान गए?”
उन्होंने मेरी आंखों में देखकर कहा,
“नहीं।”
“फिर?”
“मैंने अपनी पेंशन में से पैसे बचाए थे। उन्हीं से जाऊंगी।”
मैं कुछ कहती, उससे पहले रमा आंटी की आवाज आई,
“मां! आप फिर वही बात लेकर बैठ गईं?”
अम्मा जी चुप हो गईं।
रमा आंटी बोलीं,
“आपको कितनी बार समझाएं?”
अम्मा जी ने शांत आवाज में कहा,
“बहू, मैं किसी से पैसे नहीं मांग रही।”
रमा आंटी ने तुरंत जवाब दिया,
“बात पैसे की नहीं है।”
अम्मा आंटी बोलीं,
“तो फिर किस बात की है?”
रमा आंटी के पास कोई जवाब नहीं था।
रामेश्वरम जाने का दिन आ गया।
सुबह-सुबह अम्मा जी तैयार होकर बाहर आईं।
हल्की पीली साड़ी, माथे पर छोटी-सी बिंदी, बालों में सफेद फूल और हाथ में एक छोटा बैग।
उनके चेहरे पर वर्षों बाद वैसी खुशी थी जैसी किसी बच्चे के चेहरे पर होती है।
बाहर उनकी सहेलियां खड़ी थीं।
सब एक-दूसरे को देखकर खुश हो रही थीं।
मैं भी उन्हें विदा करने गई।
अम्मा जी ने मुझे गले लगाया।
“बेटी, पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है जैसे मैं अपनी जिंदगी का कोई अधूरा पन्ना पूरा करने जा रही हूं।”
मैंने कहा,
“आप खूब घूमिएगा।”
वह हंसकर बोलीं,
“तुम्हारे लिए प्रसाद जरूर लाऊंगी।”
बस चली गई।
मैं काफी देर तक उसे जाते हुए देखती रही।
चार दिन बाद सुबह गली में अचानक बहुत भीड़ हो गई।
मैं बाहर निकली तो देखा कि रमा आंटी के घर के सामने एंबुलेंस खड़ी थी।
मेरा दिल घबरा गया।
पता चला, अम्मा जी की तबीयत यात्रा के दौरान खराब हो गई थी।
लेकिन उनकी सहेलियों ने समय पर अस्पताल पहुंचाया।
डॉक्टरों ने कहा कि कमजोरी और थकान के कारण उन्हें कुछ समय आराम की जरूरत है।
उन्हें वापस घर लाया गया।
उस दिन पहली बार मैंने रमा आंटी को अम्मा जी के सिरहाने बैठे देखा।
अम्मा जी आंखें बंद किए लेटी थीं।
रमा आंटी धीरे-धीरे उनके बालों में हाथ फेर रही थीं।
मैं बाहर खड़ी थी।
तभी अम्मा जी ने आंखें खोलीं।
“बहू…”
रमा आंटी तुरंत झुक गईं।
“हां मां।”
“यात्रा बहुत अच्छी थी।”
रमा आंटी की आंखों में आंसू आ गए।
अम्मा जी बोलीं,
“मुझे लगा था कि शायद तुम नाराज होगी।”
रमा आंटी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मां, मुझे माफ कर दो।”
अम्मा जी चुप रहीं।
रमा आंटी रोते हुए बोलीं,
“मैंने आपको खर्च समझा। आपकी खुशी नहीं समझी।”
अम्मा जी ने पूछा,
“अब समझ आई?”
रमा आंटी ने सिर हिलाया।
“हां मां।”
अम्मा जी मुस्कुराईं।
“तो रो क्यों रही है?”
रमा आंटी बोली,
“क्योंकि मुझे डर लग रहा है।”
अम्मा जी ने हैरानी से पूछा,
“किस बात का?”
रमा आंटी ने अम्मा जी का हाथ कसकर पकड़ लिया और भर्राई हुई आवाज में कहा,
“कि कहीं मैंने आपको खुश होने में बहुत देर तो नहीं कर दी।”
अम्मा जी ने उसकी हथेली अपने हाथ में ले ली।
“देर हुई है बहू, लेकिन बहुत देर नहीं हुई।”
कुछ दिन बाद अम्मा जी पूरी तरह ठीक हो गईं।
उनके लौटने पर घर में एक छोटा-सा कार्यक्रम रखा गया।
अम्मा जी की सभी सहेलियां आईं।
उन्होंने रामेश्वरम की तस्वीरें दिखाईं।
किसी तस्वीर में सभी समुद्र किनारे खड़ी थीं।
किसी में मंदिर के सामने।
किसी में बस में गाना गा रही थीं।
अम्मा जी हर तस्वीर देखकर बच्चों की तरह हंस रही थीं।
रमा आंटी उन्हें देखती रही।
फिर अचानक बोलीं,
“मां, अगली बार कहां चलें?”
अम्मा जी ने आश्चर्य से पूछा,
“अगली बार?”
रमा आंटी मुस्कुराकर बोलीं,
“हां मां।”
अम्मा जी ने पूछा,
“तुम मुझे घुमाने ले जाओगी?”
रमा आंटी ने कहा,
“आप जहां कहेंगी।”
अम्मा जी मुस्कुराईं।
“फिर तो पहले वृंदावन चलेंगे।”
सब हंस पड़े।
रमा आंटी ने कहा,
“और उसके बाद?”
अम्मा जी बोलीं,
“उसके बाद देखेंगे। अभी तो बहुत जगह बाकी हैं।”
उस दिन शाम को मैं अम्मा जी से मिलने गई।
उन्होंने मुझे एक छोटा-सा प्रसाद दिया।
“रामेश्वरम का है।”
मैंने उसे माथे से लगाया।
फिर उनसे पूछा,
“अम्मा जी, एक बात पूछूं?”
“पूछ।”
“अगर उस दिन घर वाले आपको जाने से बिल्कुल रोक देते तो?”
वह कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं,
“तो शायद मैं चली नहीं जाती।”
मैंने पूछा,
“क्यों?”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
“क्योंकि बच्चों की नाराजगी कौन मां सह सकती है?”
फिर उन्होंने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“लेकिन बेटी, एक बात हमेशा याद रखना।”
मैंने उनकी तरफ देखते हुए पूछा,
“क्या?”
अम्मा जी ने मेरी तरफ देखा और बोलीं,
“बुजुर्गों को सिर्फ दवा, खाना और एक कमरा नहीं चाहिए होता।”
मैंने हैरानी से पूछा,
“फिर उन्हें क्या चाहिए, अम्मा जी?”
अम्मा जी हल्की-सी मुस्कुराईं और बोलीं,
“उन्हें यह एहसास चाहिए कि उनकी जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है।”
मैं चुपचाप सुनती रही।
उन्होंने आगे कहा,
“जब बच्चे छोटे होते हैं तो हम उनकी छोटी-छोटी इच्छाएं पूरी करते हैं। उन्हें खिलौना चाहिए तो खिलौना दिलाते हैं। कहीं जाना हो तो लेकर जाते हैं। कोई चीज पसंद आ जाए तो खरीद देते हैं।”
मैं चुपचाप उनकी बात सुनती रही।
अम्मा जी ने कुछ पल रुककर गहरी सांस ली और फिर बोलीं,
“लेकिन जब वही बच्चे बड़े हो जाते हैं तो अक्सर सोचते हैं कि अब मां-बाप को क्या चाहिए?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
“उन्हें बहुत कुछ नहीं चाहिए बेटी। बस इतना चाहिए कि कोई उनसे पूछ ले—‘मां, तुम्हारा मन किस चीज का है?’”
मेरी आंखें भर आईं।
अम्मा जी ने मुस्कुराकर कहा,
“उम्र बढ़ती है बेटी, मन नहीं।”
फिर उन्होंने धीरे से कहा,
“बुढ़ापा शौक छोड़ने का नाम नहीं है। बुढ़ापा तो उन अधूरे शौकों को पूरा करने का आखिरी मौका है, जिन्हें इंसान ने पूरी जिंदगी अपने परिवार के लिए टाल दिया।”
मैं उस दिन घर लौट आई।
रास्ते भर यही सोचती रही—
हम अपने माता-पिता की जरूरतों पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन उनकी इच्छाओं पर कितनी बार ध्यान देते हैं?
हम पूछते हैं—
“दवा खा ली?”
“खाना खाया?”
“आराम कर लिया?”
लेकिन कितनी बार पूछते हैं—
“मां, आपका मन किस चीज का है?”
“पापा, आप कहीं घूमना चाहते हैं?”
“आपकी कोई अधूरी इच्छा है?”
शायद यही सबसे बड़ा फर्क है।
किसी बुजुर्ग को जिंदगी देने के लिए हमेशा बड़े-बड़े पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी बस उनके साथ बैठकर उनकी बात सुन लेना ही काफी होता है।
क्योंकि जिस उम्र में शरीर कमजोर हो जाता है, उस उम्र में इच्छाएं खत्म नहीं होतीं।
बल्कि कई बार वही इच्छाएं इंसान को जीने की वजह देती हैं।
इसलिए अगली बार जब घर का कोई बुजुर्ग किसी छोटी-सी चीज की इच्छा करे, तो उसे यह कहकर मत रोकिए—
“अब आपकी उम्र नहीं रही।”
हो सकता है वही छोटी-सी इच्छा उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन जाए।
और याद रखिए—
उम्र का बढ़ना जिंदगी का अंत नहीं है।
जब तक सांस है, तब तक मन में कोई न कोई सपना जरूर जिंदा रहता है।
और शायद हमारे माता-पिता की सबसे बड़ी इच्छा यही होती है कि उनके बच्चे उन्हें बोझ नहीं, एक इंसान समझें—जिसका मन आज भी कुछ पाने, कुछ देखने और कुछ जीने को करता है।

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