बेटियाँ बोझ नहीं

 

Emotional Indian family celebrating three daughters with grandmother, parents, and grandparents in a warm modern home


“माँ, अगर बेटी को ही घर में बोझ समझा जाए, तो क्या वह घर कभी अपना घर कहलाने लायक रह जाता है?”


सुमन ने अपनी माँ कमला देवी के सामने बैठते हुए यह बात कही तो कमला देवी कुछ पल तक अपनी बेटी का चेहरा देखती रह गईं।


सुमन की आँखें लाल थीं। आँसू लगातार गालों पर उतर रहे थे, लेकिन वह उन्हें पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रही थी।


कमला देवी ने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया।


“क्या हुआ बेटा? तू इतनी परेशान क्यों है? निखिल ने कुछ कहा है क्या?”


सुमन ने सिर हिलाकर मना कर दिया।


“नहीं माँ… निखिल ने कुछ नहीं कहा।”


कमला देवी ने चिंता से बेटी का चेहरा देखते हुए पूछा, “फिर तेरी सास ने कुछ कहा है क्या?”


इस बार सुमन की आँखों से आँसू और तेजी से बहने लगे।


कमला देवी का दिल बैठने लगा।


“बता न बेटा… आखिर हुआ क्या है?”


सुमन ने अपने आँसू पोंछे और कुछ पल चुप रहने के बाद बोली,


“माँ… मुझे लगता है कि मेरे घर में मेरी बेटियों की कोई कीमत नहीं है।”


कमला देवी ने हैरानी से पूछा,


“ऐसा किसने कह दिया?”


सुमन ने अपनी माँ की तरफ देखा।


“किसी एक ने नहीं माँ… धीरे-धीरे सबकी बातों से ऐसा महसूस होने लगा है।”


कमला देवी ने बेटी को अपने पास खींच लिया।


“तू पूरी बात बता। जब तक तू बताएगी नहीं, तेरी माँ को कैसे पता चलेगा कि दर्द कहाँ है?”


सुमन ने गहरी साँस ली।


उसकी शादी को पाँच साल हो चुके थे।


उसका पति निखिल एक निजी कंपनी में इंजीनियर था। स्वभाव से शांत और समझदार था। शादी के बाद सुमन को ऐसा परिवार मिला था जिसे देखकर उसके मायके वाले भी खुश थे।


ससुर गोविंद प्रसाद शांत स्वभाव के व्यक्ति थे।


सास शारदा देवी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन दिल की बुरी नहीं थीं।


शादी के शुरुआती वर्षों में शारदा देवी सुमन को अपनी बेटी की तरह मानती थीं।


सुमन भी सास-ससुर की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ती थी।


घर का काम हो या किसी की तबीयत खराब होना, सुमन हमेशा आगे रहती।


जब सुमन पहली बार माँ बनने वाली थी तो शारदा देवी ने उसकी खूब देखभाल की थी।


उन्हें उम्मीद थी कि घर में पहला बच्चा पोता होगा।


लेकिन जब बेटी पैदा हुई तो कुछ पल के लिए शारदा देवी के चेहरे पर निराशा जरूर आई थी।


फिर उन्होंने बच्ची को गोद में लिया और धीरे से कहा,


“जो भी है, भगवान की देन है।”


उस बच्ची का नाम परी रखा गया।


परी घर में आते ही सबकी लाडली बन गई।


गोविंद प्रसाद उसे गोद में लेकर घंटों खेलते रहते।


निखिल तो जैसे अपनी बेटी के बिना रह ही नहीं पाता था।


शारदा देवी भी धीरे-धीरे परी से बहुत जुड़ गईं।


जब परी ने पहली बार “दादी” कहा था तो शारदा देवी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए थे।


लेकिन रिश्तेदारों की बातें शायद कभी खत्म नहीं होतीं।


परी के तीन साल की होने के बाद सुमन ने दूसरी बेटी को जन्म दिया।


इस बार बच्ची का नाम काव्या रखा गया।


घर में फिर खुशी आई।


लेकिन शारदा देवी के मन में कहीं एक छोटी-सी इच्छा दबकर रह गई।


पोते की इच्छा।


वह कभी-कभी खुद से कहतीं,


“अगर एक पोता भी होता तो घर पूरा हो जाता।”


हालाँकि उन्होंने यह बात सुमन से कभी सीधे नहीं कही थी।


लेकिन उनके आसपास के लोगों ने उनके मन में वह इच्छा और मजबूत कर दी।


खासकर उनकी छोटी बहन ललिता ने।


ललिता देवी अपने बेटे-बहू के घर से थोड़ी दूरी पर रहती थीं।


उन्हें दूसरों के घर के मामलों में सलाह देने की आदत थी।


एक दिन वह शारदा देवी के घर आईं।


उन्होंने दोनों बच्चियों को खेलते हुए देखा और मुस्कुराकर बोलीं,


“भाभी, दोनों पोतियाँ तो बहुत प्यारी हैं।”


शारदा देवी ने गर्व से कहा,


“हाँ, मेरी दोनों आँखों का तारा हैं।”


ललिता कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं,


“लेकिन एक पोता भी होता तो अच्छा रहता।”


शारदा देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


ललिता ने उनकी चुप्पी को समझ लिया।


उन्होंने धीरे से कहा,


“आपको बुरा मत लगे तो एक बात कहूँ?”


शारदा देवी ने उनकी तरफ देखा और बोलीं,

“कहो।”


ललिता ने धीरे से कहा,

“देखिए भाभी, बेटियाँ कितनी भी प्यारी हों, आखिर दूसरे घर चली जाती हैं। बेटा ही तो बुढ़ापे का सहारा बनता है।”


शारदा देवी चुप रहीं।


ललिता ने फिर कहा,


“आपके पड़ोस में ही देखिए। शर्मा जी के दो बेटे हैं। दोनों माँ-बाप की कितनी सेवा करते हैं।”


शारदा देवी ने पहली बार उनकी ओर देखकर कहा,


“मेरी पोतियाँ भी सेवा करेंगी।”


ललिता हँस पड़ीं।


“अरे भाभी, आप भी ना… भावुक हो जाती हैं।”


इसके बाद वह चली गईं।


शारदा देवी ने उस बात को ज्यादा महत्व नहीं दिया।


लेकिन ललिता की आदत थी—एक बात कहकर छोड़ना नहीं।


वह फिर आईं।


फिर आईं।


और हर बार किसी न किसी बहाने से बेटा होने की बात छेड़ देतीं।


कभी कहतीं,


“भाभी, निखिल की उम्र भी बढ़ रही है।”


कभी कहतीं,


“सुमन को तीसरा बच्चा कर लेना चाहिए।”


और कभी कहतीं,


“भगवान ने चाहा तो इस बार पोता जरूर होगा।”


सुमन सब सुनती थी।


वह जवाब देना चाहती थी, लेकिन संस्कार उसे रोक लेते थे।


उसे लगता था कि अगर वह ललिता को जवाब देगी तो बात बड़ी हो जाएगी।


एक दिन ललिता ने हद ही कर दी।


वह शारदा देवी के पास बैठी थीं।


“भाभी, आप मेरी बात मानिए।”


शारदा देवी ने उनकी तरफ देखते हुए पूछा,

“क्या?”


ललिता ने आवाज धीमी करते हुए कहा,

“अगर इस बार भी बेटी हो गई तो?”


शारदा देवी का चेहरा उतर गया।


ललिता ने धीरे से कहा,


“फिर सोचिएगा कि आगे क्या करना है।”


शारदा देवी ने हैरानी से उनकी तरफ देखा और पूछा,

“क्या मतलब?”


ललिता ने थोड़ा पास खिसकते हुए कहा,

“मेरा मतलब है, निखिल से कहिए कि किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह ले। आजकल तो बहुत कुछ संभव है।”


शारदा देवी ने नाराज होकर कहा,


“ललिता, ऐसी बातें मत करो।”


ललिता ने तुरंत सफाई देते हुए कहा,

“मैं तो आपकी भलाई चाहती हूँ।”


शारदा देवी ने दृढ़ स्वर में जवाब दिया,

“मेरी भलाई मेरी पोतियों में है।”


ललिता कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं,


“आप समझ नहीं रही हैं भाभी। कल को जब निखिल बूढ़ा होगा तो कौन उसका नाम आगे बढ़ाएगा?”


यह बात शारदा देवी के मन में कहीं चुभ गई।


सुमन उस समय रसोई में थी।


उसके हाथ में चाय का कप था।


कप रखते हुए उसका हाथ काँप गया।


परी पास में बैठी अपनी छोटी बहन काव्या के बाल सहला रही थी।


अचानक परी ने मासूमियत से पूछा,


“मम्मी, क्या पापा मुझे प्यार नहीं करते?”


सुमन चौंक गई।


“ऐसा क्यों बोल रही हो?”


परी बोली,


“ललिता दादी कह रही थीं कि दादी को पोता चाहिए।”


सुमन के पास कोई जवाब नहीं था।


उसने परी को अपनी गोद में बैठा लिया।


“तुम्हें पता है मेरी बच्ची, तुम मेरी जान हो।”


परी ने पूछा,


“दादी की भी?”


सुमन ने उसे सीने से लगा लिया।


“दादी की भी।”


लेकिन उसके मन में एक डर बैठ गया था।


अगर यही बातें उसकी बेटियों के मन में बैठ गईं तो?


अगर वे बड़ी होकर खुद को अपने भाई से कम समझने लगीं तो?


उसे यह सोचकर ही डर लगने लगा।


इसी बीच निखिल को कंपनी के काम से कुछ दिनों के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा।


जाते समय उसने सुमन से कहा,


“बच्चियों का ध्यान रखना और माँ-पापा का भी।”


सुमन ने मुस्कुराकर कहा,


“आप चिंता मत करो।”


निखिल ने दोनों बेटियों को गले लगाया।


“पापा जल्दी आएँगे।”


परी ने पूछा,


“मेरे लिए क्या लाओगे?”


निखिल ने हँसकर कहा,


“जो मेरी बेटी माँगेगी।”


परी खुशी से उछल पड़ी।


सुमन दूर खड़ी सब देख रही थी।


उसे लगा, शायद उसके घर में अभी भी सब ठीक है।


लेकिन उसे नहीं पता था कि निखिल के घर से बाहर जाते ही ललिता एक बार फिर शारदा देवी के मन में वही बात डालने वाली थीं।


और इस बार वह सिर्फ पोते की बात नहीं करने वाली थीं।


वह ऐसा बीज बोने वाली थीं जो पूरे परिवार को तोड़ सकता था।


ललिता ने शारदा देवी से कहा,


“भाभी, अब आपको एक फैसला लेना ही पड़ेगा।”


शारदा देवी ने पूछा,


“कैसा फैसला?”


ललिता ने धीरे से कहा,


“सुमन को समझाइए… अगर वह बेटा नहीं दे सकती तो निखिल की जिंदगी के बारे में सोचिए।”


शारदा देवी का चेहरा सख्त हो गया।


“तुम कहना क्या चाहती हो?”


ललिता ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा,


“मैं कह रही हूँ… अगर जरूरत पड़े तो निखिल की दूसरी शादी के बारे में भी सोचिए।”


शारदा देवी के हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया।


रसोई में खड़ी सुमन ने भी यह बात सुन ली।


उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।


वह दीवार का सहारा लेकर खड़ी रह गई।


उसने अपनी दोनों बेटियों की तरफ देखा।


परी अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी।


काव्या जमीन पर बैठकर खिलौना घुमा रही थी।


सुमन की आँखों से आँसू निकल पड़े।


उसके मन में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—


“क्या सिर्फ बेटियाँ पैदा करने की वजह से एक माँ से उसका घर छीन लिया जाएगा?”


और इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए सुमन ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने आगे चलकर पूरे परिवार की सोच बदल दी।



सुमन के कानों में ललिता की कही हुई बात बार-बार गूँज रही थी।


“अगर जरूरत पड़े तो निखिल की दूसरी शादी के बारे में भी सोचिए।”


वह कुछ देर तक रसोई में खड़ी रही।


उसकी आँखों के सामने अपनी दोनों बेटियों के चेहरे घूम रहे थे।


परी अपनी गुड़िया को गोद में लेकर खेल रही थी और काव्या अपने छोटे-छोटे हाथों से खिलौने को पकड़ने की कोशिश कर रही थी।


सुमन ने मन ही मन सोचा,


“मैं अपने लिए लड़ लूँगी… लेकिन अगर मेरी बच्चियों को यह महसूस होने लगा कि उनके पैदा होने की वजह से उनका घर टूट रहा है, तो मैं उन्हें कैसे संभालूँगी?”


उसने आँसू पोंछे और किसी तरह अपने काम में लग गई।


शारदा देवी भी ललिता की बात से परेशान थीं।


उन्हें लगा था कि ललिता शायद कुछ ज्यादा बोल गई हैं।


लेकिन कुछ देर बाद वही ललिता फिर बोलीं,


“भाभी, मैं आपकी दुश्मन नहीं हूँ। मैं तो चाहती हूँ कि बुढ़ापे में आपको पोते का सुख मिले।”


शारदा देवी ने धीमी आवाज में कहा,


“मेरी पोतियाँ क्या कम हैं?”


ललिता देवी ने शारदा देवी को समझाने के अंदाज में कहा,

“प्यार अपनी जगह है भाभी, लेकिन खानदान की बात अलग होती है।”


शारदा देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


ललिता समझ गईं कि उनकी बात मन में उतर रही है।


वह चली गईं।


सुमन ने हिम्मत करके अपनी सास से पूछा,


“माँ… क्या आपको सच में लगता है कि बेटा न होने की वजह से मेरा घर अधूरा है?”


शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।


उनके पास तुरंत कोई जवाब नहीं था।


कुछ पल बाद बोलीं,


“ऐसी बात नहीं है बहू।”


सुमन की आँखें भर आईं। उसने अपनी सास से सीधे सवाल किया,


“तो फिर दूसरी शादी की बात क्यों हो रही थी?”


शारदा देवी चुप हो गईं।


सुमन की आँखें भर आईं।


“माँ, अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो मुझे बता दीजिए। लेकिन मेरी बेटियों को उनकी गलती मत समझिए।”


शारदा देवी का दिल काँप गया।


“मैंने ऐसा नहीं कहा।”


सुमन ने अपनी सास की ओर देखते हुए धीमी आवाज में कहा,

“आपने नहीं कहा माँ… लेकिन आपकी चुप्पी बहुत कुछ कह रही है।”


यह कहकर सुमन अपनी बेटियों के पास चली गई।


शारदा देवी वहीं बैठी रह गईं।


उनके मन में पहली बार अपराधबोध पैदा हुआ।


लेकिन ललिता की बातें भी उनके कानों में थीं।


यही तो सबसे बड़ी मुश्किल थी।


कभी-कभी इंसान गलत बात पर विश्वास इसलिए नहीं करता कि वह गलत बात को सही मानता है, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि वह बात बार-बार सुनाई जाती है।


उधर निखिल को घर की स्थिति का कुछ पता नहीं था।


वह फोन पर सुमन से बात करता तो सुमन सामान्य बनने की कोशिश करती।


“सब ठीक है?”


सुमन ने अपनी आवाज को सामान्य रखते हुए कहा,

“हाँ।”


निखिल ने फिर पूछा,

“माँ-पापा ठीक हैं?”


सुमन ने धीरे से जवाब दिया,

“हाँ, सब ठीक हैं।”


निखिल ने बच्चों के बारे में पूछा,

“परी और काव्या कैसी हैं?”


सुमन ने दोनों बेटियों की ओर देखते हुए कहा,

“दोनों आपको बहुत याद कर रही हैं।”


निखिल हँसकर कहता,


“मैं भी उन्हें बहुत याद कर रहा हूँ।”


सुमन कुछ कहना चाहती थी।


लेकिन उसके होंठों तक आते-आते शब्द रुक जाते।


वह सोचती,


“अगर मैंने निखिल को सब बता दिया और उसने माँ से पूछ लिया तो घर में झगड़ा हो जाएगा।”


वह अपनी सास का अपमान नहीं करना चाहती थी।


उसे बस अपना घर बचाना था।


इसी बीच एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।


परी स्कूल से लौटी तो उसके हाथ में एक चित्र था।


उसने शारदा देवी के पास जाकर कहा,


“दादी, मैंने आपके लिए बनाया है।”


शारदा देवी ने चित्र देखा।


उसमें चार लोग बने थे—दादी, दादा, पापा और मम्मी।


एक कोने में दो छोटी बच्चियाँ भी थीं।


शारदा देवी ने पूछा,


“इसमें निखिल कहाँ है?”


परी ने हँसकर कहा,


“यह पापा हैं।”


शारदा देवी ने दूसरी आकृति की तरफ देखते हुए पूछा, “और यह?”


परी ने मासूमियत से जवाब दिया, “दादा।”


शारदा देवी ने चित्र को ध्यान से देखा।


फिर पूछा,


“इसमें कोई भाई क्यों नहीं बनाया?”


परी कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


“क्योंकि हमारे घर में भाई नहीं है।”


शारदा देवी का दिल बैठ गया।


“तुम्हें भाई चाहिए?”


परी ने सिर हिलाया।


“नहीं।”


शारदा देवी ने आश्चर्य से पूछा,


“क्यों?”


परी ने मासूमियत से कहा,


“मम्मी रोती हैं।”


शारदा देवी जैसे पत्थर की हो गईं।


“क्या?”


परी बोली,


“जब ललिता दादी आती हैं ना, तब मम्मी बाद में कमरे में जाकर रोती हैं। उन्होंने कहा था कि हमारी वजह से घर में कोई परेशान न हो।”


शारदा देवी की आँखें भर आईं।


उन्हें पहली बार समझ आया कि उनकी चुप्पी ने सुमन को कितना दर्द दिया था।


उन्होंने परी को अपनी गोद में बैठा लिया।


“तुम्हारी मम्मी ने ऐसा क्यों कहा?”


परी बोली,


“पता नहीं दादी।”


शारदा देवी ने बच्ची को सीने से लगा लिया।


उसी समय ललिता वहाँ आ गईं।


उन्होंने आते ही कहा,


“अरे परी, तुम्हें तो भाई चाहिए होगा ना?”


परी ने तुरंत कहा,


“नहीं।”


ललिता हँसीं।


“क्यों?”


परी ने दादी की तरफ देखा।


“क्योंकि दादी को हम पसंद हैं।”


ललिता कुछ पल के लिए चुप हो गईं।


शारदा देवी ने पहली बार ललिता की तरफ कठोर नजरों से देखा।


“बस ललिता। अब बहुत हो गया।”


ललिता ने हैरानी से पूछा, “क्या हुआ?”


शारदा देवी ने नाराज़ होकर कहा, “तुम्हें पता भी है तुम क्या कर रही हो?”


ललिता ने सफाई दी,


“मैं तो परिवार की भलाई चाहती हूँ।”


शारदा देवी ने कहा,


“परिवार की भलाई के नाम पर मेरे परिवार में जहर मत घोलो।”


ललिता चौंक गईं।


“भाभी… आप मुझसे नाराज़ क्यों हो रही हैं? मैंने तो वही कहा जो मुझे सही लगा।”


शारदा देवी ने दृढ़ आवाज में कहा,

“नहीं ललिता। आज मेरी बात ध्यान से सुनो।”


शारदा देवी की आवाज काँप रही थी, लेकिन इस बार उसमें दृढ़ता थी।


“जिस घर में दो मासूम बच्चियाँ अपने होने के लिए खुद को दोषी समझने लगें, उस घर को पोते की नहीं, समझ की जरूरत होती है।”


ललिता के चेहरे का रंग बदल गया।


लेकिन उन्होंने जाते-जाते एक आखिरी बात कही,


“आपको जो करना है कीजिए। लेकिन बाद में पछताना मत।”


शारदा देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसी दिन उन्होंने निखिल को फोन किया।


निखिल ने फोन उठाया।


“हाँ माँ?”


“बेटा, तू कब आ रहा है?” शारदा देवी ने थोड़ी चिंता भरी आवाज में पूछा।


“एक-दो दिन में आ जाऊँगा।” निखिल ने जवाब दिया।


“जल्दी आ।” शारदा देवी ने कहा।


निखिल ने माँ की आवाज में चिंता महसूस की।


“सब ठीक है?”


शारदा देवी कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं,


“नहीं बेटा। घर में एक बात हुई है, जो तुझे बतानी जरूरी है।”


निखिल ने तुरंत पूछा,


“क्या हुआ?”


शारदा देवी ने पूरी बात बता दी।


निखिल कुछ क्षण बिल्कुल शांत रहा।


फिर उसकी आवाज बदल गई।


“माँ, ललिता बुआ ने आपसे यह बात कही?”


शारदा देवी ने धीमी आवाज में जवाब दिया,

“हाँ बेटा।”


निखिल ने थोड़ी नाराज़गी के साथ पूछा,

“और आपने उनकी बात सुनकर मुझसे बात भी नहीं की?”


शारदा देवी की आँखें भर आईं।


“मैं गलत थी बेटा।”


निखिल ने कहा,


“माँ, मैं अपनी बेटियों को किसी भी हालत में कम नहीं समझ सकता। और सुमन के साथ दूसरी शादी की बात तो दूर, मैं उस सोच को भी अपने घर में जगह नहीं दूँगा।”


शारदा देवी ने धीमे से कहा,


“मुझे अब समझ आ गया है।”


निखिल बोला,


“माँ, आपको पता है मेरी बेटियाँ मुझे क्यों प्यारी हैं?”


शारदा देवी ने आँसू पोंछते हुए पूछा,

“क्यों बेटा?”


निखिल ने बिना किसी झिझक के कहा,

“क्योंकि वे मेरी बेटियाँ हैं। बस।”


शारदा देवी की आँखों से आँसू निकल पड़े।


“बेटा… तू अपनी माँ को माफ कर देगा?”


निखिल ने माँ की बात सुनकर कुछ पल चुप रहने के बाद शांत स्वर में कहा,

“माँ, आपने गलती की है, लेकिन आपने उसे मान भी लिया है। यही बहुत है।”


निखिल ने फोन रखा।


शारदा देवी देर तक बैठी रहीं।


उन्हें अपना अतीत याद आने लगा।


उन्हें याद आया कि बचपन में उन्हें भी भाई से कम समझा जाता था।


उनके भाई को पढ़ाया गया था, उन्हें नहीं।


उनके भाई की पसंद पूछी जाती थी, उनकी नहीं।


और आज वही सोच अनजाने में वह अपनी पोतियों के सामने ला रही थीं।


उन्होंने मन ही मन कहा,


“नहीं… अब नहीं।”


निखिल के घर लौटने से पहले ही सुमन अपनी माँ कमला देवी के घर चली गई।


वह अपनी दोनों बेटियों को लेकर माँ के पास पहुँची।


कमला देवी ने उसे देखते ही पूछा,


“क्या हुआ?”


सुमन ने पूरी बात बता दी।


कमला देवी ने कुछ देर तक बेटी की बात सुनी।


फिर बोलीं,


“तू डर मत।”


सुमन की आँखों में आँसू भर आए। उसने काँपती आवाज में कहा,

“माँ, मुझे डर लगता है।”


कमला देवी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा,

“किस बात का डर है?”


सुमन ने कुछ पल चुप रहने के बाद धीमी आवाज में कहा,

“माँ… कहीं मेरा घर न टूट जाए।”


कमला देवी ने उसकी बात काट दी।


“घर बेटा होने से नहीं बचता। घर रिश्तों की समझ से बचता है।”


सुमन चुप रही।


कमला देवी ने अपनी बेटी का चेहरा दोनों हाथों में लेकर कहा,


“और एक बात याद रखना। अगर कोई तुम्हें यह महसूस कराए कि तुम्हारी बेटियाँ तुम्हारी कमजोरी हैं, तो समझ लेना कि असली कमजोरी उसकी सोच है।”


सुमन की आँखों से आँसू बह निकले।


“माँ, मैं क्या करूँ?”


कमला देवी ने कहा,


“अभी कुछ मत कर। पहले अपने पति से बात कर।”


सुमन ने घबराई हुई आवाज में पूछा,

“लेकिन अगर निखिल भी माँ की बात मान गए तो?”


कमला देवी ने दृढ़ स्वर में कहा,

“अगर वह तुम्हारे साथ खड़ा है, तो किसी की हिम्मत नहीं कि तुम्हारा घर तोड़ सके।”


सुमन ने माँ की बात सुनी।


उसे थोड़ी राहत मिली।


लेकिन उसे यह नहीं पता था कि कमला देवी के मन में अपनी बेटी को लेकर एक और चिंता थी।


क्योंकि कमला देवी खुद अपने जीवन में ऐसी परिस्थिति से गुजर चुकी थीं।


और अब वह अपनी बेटी को वही दर्द दोबारा नहीं सहने देना चाहती थीं।


उन्होंने अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा और कहा,


“सुमन, इस बार अगर किसी ने मेरी बेटी के घर की तरफ बुरी नजर से देखा ना… तो उसे जवाब मैं दूँगी।”


सुमन ने माँ की ओर देखा।


उसकी आँखों में पहली बार डर के साथ-साथ उम्मीद भी दिखाई दी।


लेकिन उसी समय निखिल का फोन आया।


“सुमन, तुम माँ के घर हो?”


सुमन ने जवाब दिया, “हाँ।”


निखिल ने कहा, “तुम वहीं रहो। मैं तुमसे मिलने आ रहा हूँ।”


सुमन घबरा गई।


“क्यों?”


निखिल ने शांत आवाज में कहा,


“क्योंकि अब कुछ बातें सामने बैठकर करनी हैं।”


सुमन ने फोन रख दिया।


कमला देवी ने उसकी तरफ देखा।


“क्या कहा?”


सुमन बोली,


“निखिल आ रहा है।”


कमला देवी ने गहरी साँस ली।


“अच्छा है। अब जो होगा, सामने होगा।”


और कुछ ही देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई।


निखिल सामने खड़ा था।


लेकिन उसके हाथ में सिर्फ अपना बैग नहीं था।


उसके साथ शारदा देवी भी थीं।


सुमन उन्हें देखकर चौंक गई।


शारदा देवी सीधे अपनी बहू के पास आईं।


उन्होंने सुमन का हाथ पकड़ लिया और कहा,


“बहू, आज मुझे तुमसे नहीं… अपनी दोनों पोतियों से माफी माँगनी है।”


सुमन की आँखें भर आईं।


लेकिन तभी शारदा देवी ने ऐसी बात कही जिसे सुनकर कमला देवी भी हैरान रह गईं।


“और इसके बाद मैं ललिता को भी जवाब दूँगी।”


घर में सबकी नजरें शारदा देवी पर टिक गईं।


अब एक माँ, एक सास और एक दादी—तीनों की सोच एक नए मोड़ पर पहुँच चुकी थी।


लेकिन ललिता इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थीं।


उन्हें अभी यह पता नहीं था कि जिस परिवार को वह बेटा-बेटी की सोच से बाँटने निकली थीं, वही परिवार अब उनके सामने एकजुट होकर खड़ा होने वाला था।



शारदा देवी की बात सुनकर सुमन कुछ पल तक उन्हें देखती रह गई।


“माँ… आपने मुझसे माफी क्यों माँगी?”


शारदा देवी ने उसकी हथेली अपने हाथों में लेते हुए कहा,


“क्योंकि गलती सिर्फ वही नहीं करता जो गलत बात कहता है। कई बार चुप रहने वाला भी उतना ही जिम्मेदार होता है।”


सुमन की आँखें भर आईं।


शारदा देवी ने आगे कहा,


“ललिता ने मेरे मन में पोते की इच्छा जगाई। मैंने उसकी बातों को रोकने के बजाय अपने मन में जगह दे दी। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि मेरी चुप्पी से तुझे कितना दर्द हो रहा होगा।”


निखिल माँ के पास खड़ा सब सुन रहा था।


उसने कहा,


“माँ, मुझे आपसे नाराजगी थी। लेकिन अब नहीं है।”


शारदा देवी ने बेटे की ओर देखा।


“क्यों?”


निखिल ने माँ का हाथ पकड़कर शांत स्वर में कहा,

“क्योंकि आपने अपनी गलती समझ ली है।”


कमला देवी भी चुपचाप सब देख रही थीं।


उन्होंने कहा,


“बहन, गलती हर इंसान से होती है। लेकिन बेटियों के मामले में समाज की पुरानी सोच इतनी गहरी है कि कई बार अच्छे लोग भी उसमें फँस जाते हैं।”


शारदा देवी ने सिर झुका लिया।


“आप सही कह रही हैं समधिन जी।”


सुमन की दोनों बेटियाँ पास ही बैठी थीं।


परी ने अपनी दादी को देखते हुए पूछा,


“दादी, अब आप हमसे नाराज नहीं हो?”


शारदा देवी तुरंत उसके पास बैठ गईं।


“कभी नहीं।”


परी ने दादी की आँखों में देखते हुए फिर पूछा,

“पक्का?”


शारदा देवी मुस्कुराईं और परी की छोटी-सी उँगली अपने हाथ में पकड़ते हुए बोलीं,

“बहुत पक्का।”


परी ने अपनी छोटी उँगली आगे कर दी।


“तो पिंकी प्रॉमिस?”


शारदा देवी मुस्कुराईं और उसकी उँगली पकड़ ली।


“पक्का प्रॉमिस।”


काव्या भी अपनी दादी की गोद में चढ़ गई।


शारदा देवी ने दोनों पोतियों को अपने सीने से लगा लिया।


उनकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।


लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं थे।


ये उस सोच के खत्म होने के आँसू थे, जो उन्होंने अनजाने में अपने ही घर में आने दी थी।


निखिल ने सुमन से कहा,


“तुम्हें मुझसे पहले ही सब बता देना चाहिए था।”


सुमन ने सिर झुका लिया।


“मुझे डर था कि घर में झगड़ा हो जाएगा।”


निखिल ने शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा,

“झगड़ा तब होता है जब सच छिपाया जाता है। अगर कोई गलत बात मेरे परिवार के खिलाफ कही जाए, तो मुझे पता होना चाहिए।”


सुमन ने उसकी तरफ देखा।


“अगर तुम्हारी माँ सच में दूसरी शादी के लिए तैयार हो जातीं तो?”


निखिल ने बिना देर किए कहा,


“तो मैं अपनी माँ से भी लड़ता।”


शारदा देवी ने बेटे की बात सुनकर कहा,


“नहीं बेटा। आज मुझे किसी से लड़ने की जरूरत नहीं। अब मैं खुद अपनी सोच की लड़ाई लड़ूँगी।”


कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा,


“बस यही बात सुनना चाहती थी।”


सभी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।


लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।


अगले दिन ललिता शारदा देवी के घर पहुँचीं।


उन्हें लगता था कि उनकी कही बातें अब तक असर कर रही होंगी।


घर में प्रवेश करते ही उन्होंने पूछा,


“भाभी, मैंने जो बात कही थी, उस पर आपने निखिल से बात की?”


शारदा देवी ने शांत स्वर में कहा,


“हाँ।”


ललिता के चेहरे पर उत्सुकता आ गई।


“क्या कहा उसने?”


शारदा देवी ने शांत स्वर में जवाब दिया,

“उसने कहा कि उसे अपनी बेटियों पर गर्व है।”


ललिता का चेहरा उतर गया।


“अरे भाभी, लड़के तो ऐसी बातें भावुक होकर कह देते हैं।”


शारदा देवी ने कहा,


“नहीं ललिता। मेरा बेटा भावुक नहीं हुआ। वह समझदार हुआ है।”


ललिता चुप रहीं।


शारदा देवी ने आगे कहा,


“और अब मेरी भी आँखें खुल गई हैं।”


ललिता ने हैरानी से पूछा,

“मतलब?”


शारदा देवी ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,

“मतलब यह कि मेरे घर में अब कोई बेटा-बेटी का भेद नहीं करेगा।”


ललिता ने हँसने की कोशिश की।


“आप तो मेरी बात का बुरा मान गईं।”


शारदा देवी ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया, “बुरा नहीं माना। लेकिन अब समझ लिया है कि तुम्हारी बातों का असर कितना खतरनाक हो सकता है।”


ललिता ने कहा,


“मैं तो आपकी भलाई चाहती थी।”


शारदा देवी ने गंभीर स्वर में जवाब दिया,

“अगर किसी की भलाई के नाम पर उसका परिवार टूटने लगे, तो वह भलाई नहीं होती।”


ललिता के पास जवाब नहीं था।


लेकिन उन्होंने फिर भी आखिरी कोशिश की।


“भाभी, मान लीजिए आगे भी बेटी ही हुई तो?”


शारदा देवी मुस्कुराईं।


“तो मेरे घर में एक और लक्ष्मी आएगी।”


ललिता ने उनकी तरफ देखा।


शारदा देवी ने दृढ़ आवाज में कहा,


“और अगर बेटा हुआ तो उसे भी उतना ही प्यार मिलेगा। लेकिन किसी बच्चे को उसके जन्म से पहले ही किसी दूसरे बच्चे से बड़ा या छोटा नहीं माना जाएगा।”


ललिता पहली बार चुप हो गईं।


वह बिना कुछ बोले बाहर चली गईं।


शारदा देवी दरवाजे पर खड़ी उन्हें जाते हुए देखती रहीं।


उनके मन में कोई गुस्सा नहीं था।


बस एक संतोष था।


उन्होंने अपने घर को टूटने से बचा लिया था।


कुछ समय बीत गया।


सुमन फिर अपने ससुराल लौट आई।


अब घर का माहौल बदल चुका था।


शारदा देवी परी और काव्या के साथ पहले से भी ज्यादा समय बितातीं।


उन्हें स्कूल छोड़ने से लेकर उनकी छोटी-छोटी बातें सुनने तक में खुशी मिलती।


एक दिन परी ने दादी से पूछा,


“दादी, अगर हमारे घर में भाई आ गया तो?”


शारदा देवी हँसकर बोलीं,


“तो तुम दोनों उसे खूब प्यार करना।”


परी ने तुरंत अगला सवाल किया,

“और अगर बहन हुई?”


शारदा देवी ने प्यार से दोनों पोतियों को देखते हुए कहा,

“तो उसे भी उतना ही प्यार करना।”


परी ने कहा,


“तो फिर हमें फर्क ही नहीं पड़ता।”


शारदा देवी की आँखें भर आईं।


“काश बड़े लोग भी बच्चों जितना सरल सोच पाते।”


उधर निखिल भी सुमन के साथ पहले से ज्यादा समय बिताने लगा।


एक दिन उसने सुमन से कहा,


“मैंने एक फैसला किया है।”


सुमन ने हैरानी से उसकी ओर देखा और पूछा,

“क्या?”


निखिल मुस्कुराते हुए बोला,

“मैं अपनी दोनों बेटियों के नाम से एक बचत खाता खोलूँगा।”


सुमन मुस्कुराई।


“क्यों?”


निखिल ने प्यार से उसकी तरफ देखते हुए कहा,

“क्योंकि मैं चाहता हूँ कि जब वे बड़ी हों तो उन्हें किसी के सामने यह साबित न करना पड़े कि वे बेटों से कम हैं।”


सुमन की आँखों में आँसू आ गए।


“आप बहुत अच्छे हो।”


निखिल हँस पड़ा।


“इतने साल बाद पता चला?”


सुमन भी हँस दी।


लेकिन जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता।


कुछ महीनों बाद सुमन की तबीयत खराब रहने लगी।


शारदा देवी ने उसे डॉक्टर के पास ले जाने की जिद की।


जाँच के बाद डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा,


“बधाई हो।”


सुमन ने आश्चर्य से पूछा,


“क्या हुआ?”


डॉक्टर ने कहा,


“आप माँ बनने वाली हैं।”


सुमन कुछ पल के लिए चुप रह गई।


उसके मन में खुशी के साथ एक डर भी पैदा हुआ।


उसे याद आया कि पिछली बार क्या हुआ था।


वह घर लौटकर शारदा देवी के सामने बैठी।


“माँ…”


शारदा देवी ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा,


“क्या हुआ?”


सुमन की आँखों में आँसू थे।


“मैं… फिर से माँ बनने वाली हूँ।”


शारदा देवी कुछ पल उसे देखती रहीं।


फिर खुशी से उसके सिर पर हाथ रख दिया।


“भगवान का आशीर्वाद है।”


सुमन ने धीरे से पूछा,


“अगर बेटी हुई तो?”


शारदा देवी ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।


“तो?”


सुमन ने झिझकते हुए पूछा,

“आपको बुरा तो नहीं लगेगा?”


शारदा देवी की आँखों में आँसू आ गए।


“तूने मुझे अभी तक माफ नहीं किया क्या?”


सुमन ने तुरंत कहा,


“ऐसा नहीं है माँ।”


शारदा देवी ने प्यार से उसकी तरफ देखते हुए पूछा,

“तो फिर ऐसा सवाल क्यों?”


शारदा देवी ने दोनों पोतियों को अपने पास बुलाया।


“देख बहू, मैंने बहुत देर से सही बात समझी है। बेटा हो या बेटी, बच्चा घर में खुशी बनकर आता है। हम ही अपनी सोच से उस खुशी को कम कर देते हैं।”


निखिल ने मुस्कुराकर कहा,


“इस बार माँ सबसे ज्यादा खुश हैं।”


शारदा देवी बोलीं,


“क्योंकि अब मुझे किसी पोते की जरूरत नहीं। मेरे पास पहले से दो पोतियाँ हैं जो मेरी दुनिया हैं।”


परी तुरंत बोली,


“और तीसरी भी आएगी!”


सभी हँस पड़े।


कुछ महीनों बाद सुमन ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया।


घर में फिर खुशी छा गई।


शारदा देवी ने नवजात बच्ची को गोद में लिया।


उन्होंने उसकी छोटी-सी उँगली पकड़कर कहा,


“तू देर से आई है, लेकिन मुझे मेरी सबसे बड़ी सीख देकर आई है।”


सुमन ने पूछा,


“क्या?”


शारदा देवी ने उसकी ओर देखकर कहा,


“कि घर को रोशन करने के लिए बेटे की जरूरत नहीं होती।”


गोविंद प्रसाद ने मुस्कुराते हुए कहा,


“तो हमारी तीनों बेटियाँ इस घर को बहुत रोशन करेंगी।”


निखिल ने अपनी तीनों बेटियों को देखा।


उसकी आँखों में गर्व था।


परी अपनी छोटी बहन को देखकर खुश थी।


काव्या उसके पास बैठकर उसे छूने की कोशिश कर रही थी।


और शारदा देवी बार-बार उस बच्ची को निहार रही थीं।


उसी समय ललिता भी वहाँ आईं।


उन्होंने बच्ची को देखा और मुस्कुराईं।


“बहुत प्यारी है।”


शारदा देवी ने कहा,


“हाँ। मेरी तीसरी पोती है।”


ललिता कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं,


“भाभी, मुझे आपसे कुछ कहना है।”


शारदा देवी ने उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“कहो।”


ललिता ने सिर झुकाकर धीमी आवाज में कहा,

“आप सही थीं।”


शारदा देवी ने उनकी तरफ देखा।


“किस बारे में?”


ललिता ने कुछ पल रुककर कहा,

“बच्चे का बेटा या बेटी होना हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन उनके साथ कैसा व्यवहार करना है, यह हमारे हाथ में है।”


शारदा देवी मुस्कुराईं।


“बस, अब यही बात दूसरों को भी बताना।”


ललिता ने सिर हिला दिया।


“बताऊँगी।”


फिर उन्होंने सुमन की तरफ देखकर कहा,


“मुझे माफ कर देना।”


सुमन ने मुस्कुराकर कहा,


“रिश्तों में माफी माँगने से ज्यादा जरूरी है कि गलती दोबारा न हो।”


ललिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“नहीं होगी।”


तीनों बच्चियाँ एक साथ बैठी थीं।


उन्हें देखकर कमला देवी ने कहा,


“सुमन, तेरे घर में तीन बेटियाँ हैं।”


सुमन मुस्कुराई।


“हाँ माँ।”


कमला देवी ने कहा,


“तो समझ ले, तेरे घर में तीन गुना खुशियाँ हैं।”


सुमन की आँखें भर आईं।


उसने अपनी माँ और सास दोनों को देखा।


दोनों अलग-अलग घरों से आई थीं, लेकिन आज उनकी सोच एक थी।


कमला देवी ने धीरे से कहा,


“बेटी को जन्म देने वाली माँ कमजोर नहीं होती। वह तो एक नई दुनिया को जन्म देती है।”


शारदा देवी ने बात आगे बढ़ाई,


“और बेटी को सम्मान देने वाला परिवार छोटा नहीं होता। वह आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा उदाहरण बनता है।”


निखिल ने अपनी तीनों बेटियों को गोद में लेने की कोशिश की तो सभी हँस पड़े।


घर में किसी को अब यह चिंता नहीं थी कि वंश कौन चलाएगा।


क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि वंश सिर्फ नाम से नहीं चलता।


संस्कारों से चलता है।


प्यार से चलता है।


और उन बेटियों की मुस्कान से चलता है, जिन्हें कभी किसी ने कम समझने की कोशिश की थी।


उस दिन शारदा देवी ने अपनी तीनों पोतियों को पास बैठाकर कहा,


“एक बात हमेशा याद रखना। अगर कोई कभी तुमसे कहे कि तुम लड़की हो इसलिए किसी से कम हो, तो उसकी बात मत मानना।”


परी ने पूछा,


“क्यों दादी?”


शारदा देवी ने मुस्कुराकर कहा,


“क्योंकि तुम किसी से कम नहीं हो। तुम बस अपनी जगह सबसे खास हो।”


तीनों बच्चियाँ दादी से लिपट गईं।


सुमन दूर खड़ी उन्हें देख रही थी।


उसकी आँखों में आँसू थे।


लेकिन आज उन आँसुओं में कोई डर नहीं था।


सिर्फ खुशी थी।


उसे याद आया कि कभी उसने अपनी माँ से पूछा था—


“क्या सिर्फ बेटियाँ पैदा करने की वजह से एक माँ से उसका घर छीन लिया जाएगा?”


आज उसी सवाल का जवाब उसके सामने था।


नहीं।


घर बेटी के जन्म से नहीं टूटता।


घर तब टूटता है जब इंसान रिश्तों से ज्यादा अपनी गलत सोच को महत्व देने लगता है।


और जब सोच बदल जाती है, तो वही घर तीन बेटियों की हँसी से दुनिया का सबसे खूबसूरत घर बन जाता है।


सीख:

बेटा हो या बेटी, दोनों भगवान की देन हैं। किसी बच्चे को उसके लिंग के आधार पर कम समझना सिर्फ उस बच्चे के साथ अन्याय नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सोच को छोटा करना है। बेटियों को प्यार, सम्मान और बराबर अवसर दीजिए—क्योंकि एक बेटी सिर्फ घर में जन्म नहीं लेती, वह पूरे घर की सोच बदलने की ताकत लेकर आती है।



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