माँ के अधूरे सपने
“माँ, आप हर बार चुप क्यों हो जाती हो?”
रागिनी ने यह सवाल पूछा तो कमला के हाथ में पकड़ा हुआ गिलास वहीं रुक गया।
वह कुछ पल तक अपनी बेटी को देखती रही।
फिर हल्की सी मुस्कान लाकर बोली—
“हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता बेटा।”
रागिनी की आँखों में गुस्सा था।
“जरूरी होता है माँ। कम से कम अपने सम्मान के लिए तो जरूरी होता है।”
कमला ने बेटी की तरफ देखा और उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
“तू अभी बहुत छोटी है रागिनी। जिंदगी को समझने में वक्त लगता है।”
रागिनी ने तुरंत कहा—
“और आपने जिंदगी समझते-समझते अपनी पूरी जिंदगी ही चुप रहने में निकाल दी।”
कमला के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
यह बात सीधे उसके दिल में लगी थी।
उसे लगा जैसे उसकी बेटी ने उसकी जिंदगी का वह पन्ना खोल दिया है जिसे वह पिछले बाईस साल से किसी संदूक में बंद करके बैठी थी।
बाईस साल पहले पच्चीस साल की कमला इस घर में दुल्हन बनकर आई थी।
वह बी.ए. तक पढ़ी थी और आगे पढ़कर अध्यापिका बनना चाहती थी।
उसके पिता चाहते थे कि बेटी पढ़े और अपने पैरों पर खड़ी हो।
लेकिन शादी के बाद सब कुछ बदल गया।
ससुराल में आते ही उसकी सास ने साफ कह दिया था—
“हमारे घर की बहुएँ नौकरी नहीं करतीं।”
कमला ने उस दिन कुछ नहीं कहा था।
पति सुरेश भी माँ के सामने कभी अपनी पत्नी का साथ नहीं देते थे।
वह एक छोटी सी दुकान पर काम करते थे।
कमाई बहुत ज्यादा नहीं थी, मगर घर चल जाता था।
कमला ने सोचा था कि प्यार धीरे-धीरे बढ़ जाएगा।
लेकिन शादी के कुछ ही दिनों बाद उसे पता चल गया कि सुरेश के मन में पहले से ही किसी और के लिए जगह थी।
शादी उसकी इच्छा से नहीं हुई थी।
वह किसी और से प्रेम करते थे।
परिवार के दबाव में उन्होंने शादी कर ली थी।
शादी के बाद उन्होंने कमला को कभी पत्नी का वह सम्मान नहीं दिया जिसकी वह हकदार थी।
न मारपीट करते थे, न खुलकर लड़ते थे।
बस एक दूरी बनाए रखते थे।
कमला उनके पास बैठती तो वह उठकर चले जाते।
कमला कुछ पूछती तो छोटा सा जवाब देकर चुप हो जाते।
कई बार वह रात भर रोती रहती और सुरेश दूसरी तरफ करवट लेकर सो जाते।
कमला चाहती तो मायके लौट सकती थी।
उसके पिता ने शादी के बाद भी कई बार कहा था—
“बेटी, अगर कभी बहुत दुख हो तो घर आ जाना।”
लेकिन कमला हर बार यही सोचती—
“अगर मैं लौट गई तो छोटी बहन की शादी में लोग क्या कहेंगे?”
उसने अपने दुख को अपने अंदर दबाना सीख लिया।
कुछ साल बाद रागिनी पैदा हुई।
कमला को लगा जैसे उसकी जिंदगी में फिर से रोशनी आ गई।
उसने बेटी को सीने से लगाकर कहा था—
“तू मेरी बेटी नहीं, मेरी उम्मीद है।”
रागिनी के लिए कमला ने अपना पूरा जीवन लगा दिया।
उसने अपने गहने बेचकर बेटी की फीस भरी।
उसकी स्कूल की किताबों के लिए अपनी जरूरतें टालीं।
रागिनी को कभी ट्यूशन चाहिए होती तो कमला घर में सिलाई का काम बढ़ा देती।
सुरेश अक्सर कहते—
“लड़की है, जितना पढ़ाना है पढ़ा दो। आखिर में घर ही तो संभालना है।”
कमला चुप रहती।
लेकिन रागिनी के सामने हमेशा यही कहती—
“तू खूब पढ़ बेटा। तेरी मंजिल सिर्फ शादी नहीं, तेरी अपनी पहचान होनी चाहिए।”
रागिनी पढ़ने में बहुत तेज थी।
उसका सपना था कि वह बड़ी होकर प्रशासनिक अधिकारी बने।
वह अक्सर कहती—
“माँ, मैं ऐसा काम करूँगी कि लोग आपको मेरे नाम से नहीं, आपके नाम से पहचानें।”
कमला हँसकर कहती—
“मुझे और क्या चाहिए?”
लेकिन घर की हालत हमेशा एक जैसी नहीं रही।
सुरेश की दुकान बंद हो गई।
कुछ समय बाद उन्होंने दूसरी जगह काम शुरू किया।
कमाई कम थी।
रागिनी की पढ़ाई का खर्च बढ़ता जा रहा था।
एक दिन सुरेश ने गुस्से में कहा—
“अब बहुत पढ़ लिया। बारहवीं के बाद इसकी पढ़ाई बंद करवा दो।”
कमला के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने पहली बार पति के सामने आवाज उठाई।
“नहीं।”
सुरेश ने उसे घूरकर देखा।
“क्या कहा?”
कमला ने डरते हुए भी दोबारा कहा—
“रागिनी की पढ़ाई नहीं रुकेगी।”
सास ने तुरंत ताना मारा—
“बहुत पंख निकल आए हैं बहू के।”
कमला चुप हो गई।
लेकिन इस बार उसने हार नहीं मानी।
उसने सिलाई मशीन पर दिन-रात काम किया।
कपड़े सिलती।
फॉल लगाती।
बच्चों के कपड़े बनाती।
कभी पड़ोस की औरतों के कपड़े घर तक पहुँचाती।
धीरे-धीरे उसने रागिनी की फीस जमा करनी शुरू कर दी।
रागिनी सब देखती थी।
एक दिन उसने माँ से कहा—
“माँ, मैं पढ़ाई छोड़ देती हूँ।”
कमला ने तुरंत उसके गाल पर हल्की सी चपत लगाई।
“दोबारा ऐसी बात मत करना।”
“लेकिन माँ, आप इतनी मेहनत करती हो।”
कमला मुस्कुराई।
“मैं मेहनत नहीं करती बेटा, मैं अपने सपने सीती हूँ।”
रागिनी की आँखों में आँसू आ गए।
वह माँ के गले लग गई।
“मैं आपका सपना पूरा करूँगी माँ।”
कमला ने उसके सिर को चूमते हुए कहा—
“नहीं बेटा, अपना सपना पूरा करना। मेरा सपना तो तू है।”
लेकिन कमला को क्या पता था कि उसकी बेटी एक दिन सिर्फ अपना सपना ही नहीं, बल्कि अपनी माँ की पूरी जिंदगी बदलने वाली थी।
और उस बदलाव की शुरुआत होने वाली थी एक ऐसे फैसले से, जिससे पूरे घर में तूफान आने वाला था।
समय गुजरता गया।
रागिनी कॉलेज में पहुँच गई।
उसकी मेहनत रंग लाने लगी।
उसने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
लेकिन घर में उसकी पढ़ाई को लेकर रोज कोई न कोई समस्या खड़ी हो जाती।
कभी बिजली का बिल नहीं भरा होता।
कभी घर में कोई मेहमान आ जाता।
कभी सुरेश कहते—
“इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़कर क्या करेगी?”
रागिनी सब सहती रही।
उसके भीतर गुस्सा जमा होता गया।
उसे सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि उसकी माँ दिन-रात मेहनत करती थी, लेकिन घर में उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं थी।
कमला सुबह से रात तक सिलाई करती।
किसी के कपड़े खराब न हो जाएँ, इसलिए आँखों में दर्द होने के बावजूद काम करती रहती।
रागिनी कई बार कहती—
“माँ, अब बस करो।”
कमला हँसकर जवाब देती—
“तेरी किताबें मुझसे ज्यादा जरूरी हैं।”
एक दिन कॉलेज में रागिनी का चयन एक बड़े प्रतियोगी प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए हो गया।
उसका पूरा खर्च लगभग मुफ्त था।
यह उसके सपने की दिशा में बहुत बड़ा कदम था।
लेकिन एक जरूरी दस्तावेज जमा करने के लिए उसे कॉलेज से बाहर जाना था।
उसने सोचा कि पिता से अनुमति माँगेगी।
वह सुरेश के पास गई।
“पापा, कॉलेज से एक जरूरी काम है। मुझे कुछ घंटों के लिए जाना पड़ेगा।”
सुरेश ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
“नहीं जाना कहीं।”
रागिनी ने समझाने की कोशिश की।
“पापा, यह बहुत जरूरी है।”
सुरेश ने गुस्से में उसकी तरफ देखते हुए कहा—
“मैंने कहा ना, नहीं जाना।”
रागिनी ने धीरे से समझाने की कोशिश की—
“लेकिन पापा—”
सुरेश ने गुस्से में उसकी तरफ देखा।
“बहुत ज्यादा बोलने लगी हो।”
रागिनी चुप हो गई।
वह माँ के पास गई।
कमला ने उसकी आँखों में निराशा देख ली।
“क्या हुआ?”
रागिनी रोते हुए बोली—
“माँ, अगर मैंने यह मौका छोड़ दिया तो शायद दोबारा नहीं मिलेगा।”
कमला कुछ देर तक उसे देखती रही।
फिर धीरे से बोली—
“जा बेटा।”
रागिनी चौंक गई।
“पापा ने मना किया है।”
कमला ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं उनसे बात कर लूँगी।”
रागिनी चली गई।
लेकिन लौटते समय रास्ते में उसकी मुलाकात सुरेश से हो गई।
उन्होंने उसे देख लिया।
घर पहुँचते ही उन्होंने दरवाजा जोर से बंद किया।
“तुम मेरी बात के खिलाफ जाकर बाहर गई थी?”
रागिनी चुप रही।
“जवाब दो!”
रागिनी ने धीमे से कहा—
“हाँ।”
सुरेश का गुस्सा बढ़ गया।
“तुम्हें हमारी इज्जत की कोई चिंता नहीं है?”
रागिनी के अंदर कई सालों से दबा हुआ दर्द अचानक बाहर आ गया।
उसने पहली बार पिता की आँखों में आँखें डालकर कहा—
“पापा, इज्जत सिर्फ घर की बेटी के बाहर जाने से नहीं जाती।”
सुरेश गुस्से से काँपने लगे।
“जुबान चलाती है?”
रागिनी की आवाज भर्रा गई।
“जिस घर में बेटी की पढ़ाई को बोझ समझा जाए, जहाँ माँ की मेहनत की कोई कीमत न हो, वहाँ सिर्फ बेटी के बाहर जाने से इज्जत नहीं जाती पापा।”
कमला दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी।
उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
सुरेश ने हाथ उठाया।
लेकिन हाथ रागिनी तक पहुँचता, उससे पहले कमला दोनों के बीच आकर खड़ी हो गई।
“बस।”
घर में सन्नाटा छा गया।
सुरेश ने हैरानी से अपनी पत्नी को देखा।
“हटो सामने से।”
कमला ने पहली बार पति की आँखों में आँखें डालकर कहा—
“मेरी बेटी पर हाथ मत उठाइए।”
सुरेश बोले—
“बहुत हिम्मत आ गई है तुममें।”
कमला की आँखों में आँसू थे।
लेकिन आवाज में मजबूती थी।
“हिम्मत आज नहीं आई। बाईस साल से थी। बस मैंने इस्तेमाल नहीं की।”
सुरेश कुछ बोल नहीं पाए।
कमला ने अपनी जिंदगी का वह दर्द खोल दिया जिसे उसने वर्षों से छिपा रखा था।
“मैंने आपकी हर बात मानी।”
“आपकी माँ की हर बात मानी।”
“अपने सपने छोड़े।”
“अपनी पढ़ाई छोड़ी।”
“नौकरी करने का सपना छोड़ा।”
“आपकी बेरुखी सहन की।”
“आपकी चुप्पी सहन की।”
कमला की आवाज काँपने लगी।
“सिर्फ इसलिए कि घर बचा रहे।”
उसने रागिनी की तरफ देखा।
“लेकिन अब मेरी बेटी का सपना नहीं टूटने दूँगी।”
रागिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
सुरेश कुछ पल तक दोनों को देखते रहे।
फिर बिना कुछ बोले अपने कमरे में चले गए।
कमला वहीं फर्श पर बैठ गई।
रागिनी दौड़कर माँ के पास आई।
“माँ…”
कमला ने बेटी को गले लगा लिया।
दोनों बहुत देर तक रोती रहीं।
उस रात रागिनी ने माँ से पूछा—
“माँ, आपने पहले कभी आवाज क्यों नहीं उठाई?”
कमला ने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा—
“क्योंकि मुझे डर था कि आवाज उठाऊँगी तो घर टूट जाएगा।”
रागिनी ने पूछा—
“और आज?”
कमला ने बहुत धीमे से कहा—
“आज समझ आया कि अगर घर बचाने के लिए किसी एक इंसान को रोज टूटना पड़े, तो वह घर नहीं होता बेटा।”
रागिनी माँ से लिपट गई।
“अब आपको कभी अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा माँ।”
कमला ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में पहली बार भरोसा था।
कुछ महीनों बाद परीक्षा का परिणाम आया।
रागिनी ने पूरे जिले में पहला स्थान प्राप्त किया।
घर के बाहर लोग बधाई देने आने लगे।
जिस बेटी की पढ़ाई को कभी बोझ कहा गया था, उसी बेटी का नाम अखबार में छपा।
कमला ने अखबार हाथ में लिया।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
रागिनी ने माँ को गले लगाकर कहा—
“माँ, मैंने कर दिखाया।”
कमला ने उसके माथे को चूमते हुए कहा—
“नहीं बेटा… हमने कर दिखाया।”
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
क्योंकि रागिनी की सबसे बड़ी जीत अभी बाकी थी।
वह जीत उसकी नौकरी या परीक्षा की नहीं थी।
वह जीत थी—
अपनी माँ को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाने की।
रागिनी की सफलता के बाद घर का माहौल बदलने लगा।
लोग अब सुरेश से कहते—
“आपकी बेटी ने तो कमाल कर दिया।”
“बहुत भाग्यशाली हैं आप।”
“आपकी बेटी पूरे जिले में सबसे आगे रही।”
सुरेश हर बार कुछ नहीं कहते।
बस चुपचाप मुस्कुरा देते।
लेकिन उनके मन में एक बात बार-बार घूमती—
जिस बेटी को वह रोकते रहे, वही बेटी आज उनके घर का नाम रोशन कर रही थी।
एक दिन सुरेश ने अखबार हाथ में लिया।
रागिनी की तस्वीर देखकर उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने कमला को आवाज दी।
“कमला…”
कमला बाहर आई।
“जी?”
सुरेश कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“तुम सही थीं।”
कमला ने उनकी तरफ देखा।
सुरेश की आवाज भर्रा गई।
“मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं।”
कमला ने कोई शिकायत नहीं की।
वह सिर्फ चुपचाप खड़ी रही।
सुरेश ने कहा—
“मैंने हमेशा सोचा कि घर चलाना ही औरत की जिंदगी है।”
फिर उन्होंने गहरी साँस ली।
“लेकिन तुमने इस घर को संभालते-संभालते अपनी जिंदगी ही खो दी।”
कमला की आँखों में आँसू आ गए।
सुरेश ने पहली बार उससे कहा—
“मुझे माफ कर दो।”
कमला कुछ देर तक उन्हें देखती रही।
उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ था।
बाईस साल की पीड़ा थी।
अनगिनत रातों के आँसू थे।
अधूरे सपने थे।
लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा—
“जो बीत गया, उसे बदलना हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन जो बचा है, उसे अच्छा बनाया जा सकता है।”
सुरेश की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसी समय रागिनी वहाँ आ गई।
सुरेश ने उसे पास बुलाया।
कुछ पल तक वह कुछ बोल नहीं पाए।
फिर बोले—
“बेटी, मुझे माफ कर दे।”
रागिनी की आँखें भी भर आईं।
वह पिता के पास गई।
लेकिन उनके पैर छूने के बजाय उसने उन्हें गले लगा लिया।
“पापा, मुझे आपसे नाराजगी थी। नफरत नहीं।”
सुरेश रो पड़े।
कमला दूर खड़ी यह सब देख रही थी।
उसे लगा जैसे उसके जीवन का एक बहुत पुराना घाव आज पहली बार भरने लगा है।
कुछ दिन बाद रागिनी माँ के पास एक फॉर्म लेकर आई।
“माँ, यह लो।”
कमला ने पूछा—
“क्या है बेटा?”
रागिनी मुस्कुराई और बोली—
“खोलकर देखो।”
कमला ने फॉर्म खोला।
उसकी आँखें अचानक ठहर गईं।
“बी.एड.?”
रागिनी मुस्कुराई।
“हाँ।”
कमला ने फॉर्म वापस उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“अब इस उम्र में?”
रागिनी हँस पड़ी।
“सपनों की भी कोई उम्र होती है क्या माँ?”
कमला चुप हो गई।
उसकी आँखों के सामने अपना बचपन घूम गया।
कॉलेज की किताबें।
पिता का प्यार।
अध्यापिका बनने का सपना।
शादी।
ससुराल।
सपनों का टूटना।
और फिर रागिनी का जन्म।
उसने फॉर्म को सीने से लगा लिया।
“लेकिन लोग क्या कहेंगे?”
रागिनी ने तुरंत कहा—
“लोगों ने तो तब भी कहा था कि लड़की को ज्यादा पढ़ाने से क्या फायदा होगा।”
फिर उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“आज उन्हीं लोगों को जवाब देना है।”
कमला की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने काँपते हाथों से फॉर्म पर हस्ताक्षर कर दिए।
वह फिर पढ़ने लगी।
उम्र उसके रास्ते में आई।
घर की जिम्मेदारियाँ आईं।
लोगों के ताने आए।
लेकिन इस बार कमला अकेली नहीं थी।
रागिनी हर कदम पर उसके साथ थी।
वह माँ को पढ़ाती।
माँ की परीक्षा की तैयारी करवाती।
कभी कमला थक जाती तो कहती—
“अब मुझसे नहीं होगा।”
रागिनी हँसकर कहती—
“माँ, आपने मुझे हारना नहीं सिखाया। अब मैं आपको हारने नहीं दूँगी।”
कमला ने मेहनत की।
उसने बी.एड. की परीक्षा पास कर ली।
फिर उसने शिक्षक भर्ती की परीक्षा दी।
और एक दिन उसके हाथ में नियुक्ति पत्र था।
कमला देर तक उस कागज को देखती रही।
उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।
“रागिनी…”
रागिनी तुरंत माँ के पास आई और प्यार से बोली—
“हाँ माँ?”
कमला ने काँपती आवाज में नियुक्ति पत्र को देखते हुए पूछा—
“मैं सच में अध्यापिका बन गई?”
रागिनी ने माँ को गले लगा लिया।
“हाँ माँ।”
कमला फूट-फूटकर रो पड़ी।
“काश तेरे नाना आज होते।”
रागिनी ने माँ के आँसू पोंछे।
“वो जहाँ भी होंगे माँ, उन्हें तुम पर गर्व होगा।”
कुछ समय बाद कमला ने स्कूल में पढ़ाना शुरू किया।
पहले दिन जब वह बच्चों के सामने खड़ी हुई तो उसके हाथ थोड़े काँप रहे थे।
लेकिन जैसे ही उसने पढ़ाना शुरू किया, उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई।
उसे लगा जैसे बाईस साल पहले छूटा हुआ उसका जीवन फिर से उसके पास लौट आया है।
एक दिन स्कूल में एक छोटी बच्ची उसके पास आई।
बच्ची बहुत उदास थी।
कमला ने पूछा—
“क्या हुआ बेटा?”
बच्ची बोली—
“मैडम, मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।”
कमला ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“तो पढ़ो बेटा।”
बच्ची ने सिर झुका लिया।
“घर वाले कहते हैं कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं।”
कमला कुछ पल तक चुप रही।
फिर उसने बच्ची के सिर पर हाथ रखा।
“किसी के सपने की कीमत उसके लड़की या लड़का होने से तय नहीं होती।”
बच्ची ने पूछा—
“मैं पढ़ सकती हूँ?”
कमला मुस्कुराई।
“इतना पढ़ो कि एक दिन तुम्हें किसी से यह पूछना ही न पड़े कि तुम्हें पढ़ने की इजाजत है या नहीं।”
दरवाजे के बाहर रागिनी खड़ी यह सब सुन रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसे अपनी माँ पर गर्व था।
वह समझ चुकी थी कि उसकी सफलता केवल उसकी अपनी मेहनत का परिणाम नहीं थी।
उस सफलता के पीछे एक ऐसी माँ थी जिसने अपने सपनों को दबाकर बेटी के सपनों को सींचा था।
और अब वही बेटी अपनी माँ के अधूरे सपनों को पूरा होते देख रही थी।
रागिनी माँ के पास गई।
“माँ।”
कमला मुस्कुराई।
“क्या हुआ?”
रागिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“याद है आपने कहा था कि मैं आपकी उम्मीद हूँ?”
कमला ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
रागिनी की आँखों में आँसू थे।
“आज समझ आया कि मैं आपकी उम्मीद नहीं थी माँ।”
कमला ने पूछा—
“फिर?”
रागिनी मुस्कुराई।
“मैं आपकी वजह थी… और आप मेरी वजह।”
कमला ने बेटी को सीने से लगा लिया।
दोनों की आँखों में आँसू थे।
लेकिन ये आँसू दुख के नहीं थे।
ये उन सारे वर्षों के थे जो चुपचाप बीत गए थे।
उन सपनों के थे जो देर से सही, मगर पूरे हुए थे।
और उस रिश्ते के थे जिसमें एक माँ ने बेटी को सिर्फ जन्म नहीं दिया था—
बल्कि उसे इतना मजबूत बनाया था कि वह एक दिन अपनी माँ की जिंदगी बदल सके।
कमला ने बेटी के सिर पर हाथ रखा और कहा—
“तूने मेरी जिंदगी बदल दी बेटा।”
रागिनी ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
“नहीं माँ।
आपने मेरी जिंदगी बनाई थी।
मैंने तो बस आपकी जिंदगी का अधूरा पन्ना पूरा किया है।”
कमला ने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया।
और उस पल उसे पहली बार लगा कि उसकी सत्रह नहीं, बाईस साल की तपस्या सफल हुई है।
कभी-कभी जिंदगी हमें वह नहीं देती जो हम चाहते हैं।
लेकिन अगर कोई अपना हमारे सपनों पर विश्वास करता रहे, तो टूटे हुए सपने भी एक दिन फिर से खड़े हो जाते हैं।
क्योंकि—
माँ की दुआ से बड़ा कोई सहारा नहीं होता,
और बेटी की सफलता से बड़ा माँ के लिए कोई सम्मान नहीं होता।

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