लौटती हुई प्रतीक्षा

 

An emotional Indian couple reunited after years of separation, expressing love, forgiveness and hope


“तुमने आखिर वही विषय चुन लिया, नीलिमा, जिसके लिए मैंने तुम्हें मना किया था?”


आदित्य ने नीलिमा की मेज पर रखी फाइल को देखते हुए कहा।


नीलिमा ने फाइल अपने पास खींच ली और बोली,


“मैंने अपनी पसंद से नहीं चुना आदित्य। पिताजी ने कहा है कि अंग्रेजी में एमए करोगी तो आगे नौकरी के अवसर ज्यादा मिलेंगे।”


“लेकिन तुम्हारी रुचि तो हिंदी साहित्य में है।”


नीलिमा ने धीमे स्वर में उत्तर दिया,

“रुचि से पेट थोड़े ही भरता है।”


आदित्य ने उसकी तरफ देखा।


“तुम्हें कब से ऐसी बातें करने की आदत हो गई?”


नीलिमा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,

“जब से जिंदगी को थोड़ा समझना शुरू किया है।”


आदित्य ने गंभीर होकर पूछा,

“जिंदगी को समझना चाहती हो या पिताजी के फैसलों के अनुसार जीना चाहती हो?”


नीलिमा कुछ देर चुप रही।


फिर बोली,


“तुम मेरे पिताजी के बारे में ऐसा मत कहा करो।”


“मैं उनका अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि तुम्हें अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने का अधिकार है,” आदित्य ने शांत स्वर में जवाब दिया।


“अधिकार है, लेकिन उनकी भावनाएँ भी तो हैं,” नीलिमा ने धीमे स्वर में कहा।


“और तुम्हारी भावनाएँ?” आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।


नीलिमा ने उसकी ओर देखा।


“मेरी भावनाएँ...”


वह रुक गई।


आदित्य मुस्कुराया।


“देखा? तुम्हारे पास उसका भी जवाब नहीं है।”


“तुम्हारे पास है?” नीलिमा ने तुरंत पूछा।


“नहीं।” आदित्य ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया।


“तो फिर मुझे क्यों समझाते हो?” नीलिमा ने थोड़ी नाराजगी से कहा।


“क्योंकि तुमसे अपनी बात कह सकता हूँ।” आदित्य ने शांत स्वर में कहा।


“सिर्फ बात?” नीलिमा ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।


आदित्य ने उसकी आँखों में देखा।


“हाँ, अभी तो सिर्फ बात।”


नीलिमा ने धीरे से सिर झुका लिया।


दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। एक ही कॉलोनी में रहते थे और दोनों के परिवार एक-दूसरे को वर्षों से जानते थे।


आदित्य साधारण परिवार से था। उसके पिता गाँव में शिक्षक थे और माँ घर संभालती थीं। परिवार में ज्यादा संपत्ति नहीं थी, लेकिन पढ़ाई और संस्कारों को सबसे ऊपर रखा जाता था।


नीलिमा का परिवार शहर में प्रतिष्ठित था। उसके पिता प्रोफेसर थे और माँ कॉलेज में अध्यापिका रह चुकी थीं। घर में किताबों की कमी नहीं थी।


नीलिमा विज्ञान की छात्रा थी, लेकिन उसे कविता लिखने का बहुत शौक था।


उसकी डायरी में छोटी-छोटी कविताएँ भरी रहती थीं।


आदित्य साहित्य का विद्यार्थी था।


उसे कविता, कहानी और दर्शन पढ़ना पसंद था।


कॉलेज के पुस्तकालय में दोनों पहली बार लंबे समय तक साथ बैठे थे।


नीलिमा ने उससे पूछा था,


“तुम इतनी मोटी किताबें पढ़ते हो, समझ में सब आता है?”


आदित्य ने कहा था,


“नहीं।”


नीलिमा ने हैरानी से पूछा,

“फिर पढ़ते क्यों हो?”


आदित्य ने किताब बंद करते हुए कहा,

“जो समझ में नहीं आता, वही तो पढ़ने के लिए होता है।”


नीलिमा हँस पड़ी।


“तो तुम मुझे भी पढ़ते हो?”


आदित्य ने किताब से नजर उठाकर उसे देखा।


“तुम किताब नहीं हो।”


नीलिमा ने मुस्कुराकर पूछा,

“तो क्या हूँ?”


आदित्य ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर धीरे से बोला,

“एक ऐसी कविता, जिसे अभी समझना बाकी है।”


नीलिमा कुछ पल उसे देखती रही।


उस दिन पहली बार उसे लगा था कि आदित्य की बातें बाकी लड़कों से अलग हैं।


धीरे-धीरे दोनों की मित्रता गहरी होती गई।


वे कॉलेज की साहित्यिक गोष्ठियों में साथ जाते।


कवि सम्मेलन में बैठते।


कविताएँ सुनकर एक-दूसरे से उनका अर्थ पूछते।


कभी कॉलेज के मैदान में बैठकर बहस करते तो कभी पुस्तकालय के बाहर खड़े होकर किसी कविता की एक पंक्ति पर आधे घंटे चर्चा करते।


नीलिमा को आदित्य का साथ अच्छा लगता था।


लेकिन उसे समझ नहीं आता था कि आदित्य के मन में उसके लिए क्या है।


एक दिन उसने सीधे पूछ लिया,


“आदित्य, तुम मुझे पसंद करते हो?”


आदित्य ने कहा,


“क्यों?”


नीलिमा ने नजरें चुराते हुए कहा,

“बस ऐसे ही पूछ रही हूँ।”


आदित्य ने मुस्कुराकर पूछा,

“ऐसे ही?”


नीलिमा ने सिर हिलाते हुए कहा,

“हाँ।”


आदित्य ने हल्के मजाकिया अंदाज में कहा,

“तो ऐसे ही जवाब भी दूँ?”


नीलिमा ने उत्सुकता से कहा,

“दे दो।”


आदित्य ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर शांत स्वर में कहा,

“तुम अच्छी हो।”


नीलिमा नाराज हो गई।


“मैंने यह नहीं पूछा था कि मैं अच्छी हूँ या नहीं।”


आदित्य ने पूछा, “फिर?”


नीलिमा ने कुछ झिझकते हुए कहा, “तुम्हें मुझसे लगाव है या नहीं?”


आदित्य ने कुछ क्षण सोचा।


“लगाव है।”


नीलिमा की आँखों में चमक आ गई।


“कितना?”


आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“इतना कि तुम्हारे दुख में मुझे अपना दुख दिखाई देता है।”


नीलिमा ने कुछ क्षण उसकी आँखों में देखा और फिर धीमे स्वर में पूछा,

“और प्यार?”


आदित्य शांत रहा।


“प्यार शब्द बोल देने से नहीं होता।”


नीलिमा ने उत्सुकता से पूछा,

“तो कैसे होता है?”


आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए धीरे से कहा,

“जब सामने वाला दूर हो जाए और फिर भी मन उसके साथ चलता रहे।”


नीलिमा ने कहा,


“तुम बहुत अजीब हो।”


आदित्य ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और बोला,

“तुम्हें आज पता चला?”


नीलिमा ने सिर हिलाते हुए कहा,

“नहीं, पहले दिन से पता है।”


दोनों हँस पड़े।


लेकिन नीलिमा के मन में उस दिन एक सवाल पैदा हो गया था।


क्या आदित्य उससे प्यार करता है?


वह जवाब कभी नहीं पा सकी।


कॉलेज के अंतिम वर्ष में दोनों की पढ़ाई पूरी होने वाली थी।


नीलिमा के पिता चाहते थे कि वह आगे अंग्रेजी में एमए करे।


आदित्य चाहता था कि वह हिंदी साहित्य में शोध करे।


एक दिन नीलिमा ने कहा,


“अगर मैं तुम्हारी बात मानकर हिंदी में एमए कर लूँ तो?”


आदित्य ने कहा,


“तो तुम्हारे पिता नाराज होंगे।”


नीलिमा ने पूछा,

“और अगर उनकी बात मानकर अंग्रेजी करूँ?”


आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

“तो तुम्हारा मन नाराज होगा।”


नीलिमा ने उलझन में पूछा,

“तो फिर मैं किसकी सुनूँ?”


आदित्य ने मुस्कुराकर कहा,


“इस बार अपनी सुनो।”


नीलिमा ने थोड़ी चिंता के साथ पूछा,

“अगर मेरी बात गलत निकली तो?”


आदित्य ने शांत स्वर में समझाते हुए कहा,

“गलत रास्ते से वापस आया जा सकता है। लेकिन किसी और के रास्ते पर पूरी जिंदगी चलने के बाद लौटना मुश्किल होता है।”


नीलिमा ने उसी रात अपने पिता से बात की।


“पिताजी, मैं हिंदी में एमए करना चाहती हूँ।”


पिता ने अखबार से नजर उठाई।


“हिंदी?”


नीलिमा ने धीरे से जवाब दिया,

“जी पिताजी।”


पिता ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर बोले,

“तुम्हारी बीएससी में हिंदी तो विषय था ही नहीं।”


नीलिमा ने कहा,

“लेकिन पिताजी, साहित्य में मेरी रुचि है।”


पिता ने गंभीर स्वर में कहा,

“रुचि से करियर नहीं बनता।”


नीलिमा ने हिम्मत करके पूछा,

“तो क्या करियर के लिए अपनी पसंद छोड़ दूँ?”


पिता कुछ देर चुप रहे।


“तुम्हें किसने समझाया?”


नीलिमा ने उनकी आँखों में देखा।


“किसी ने नहीं।”


पिता समझ गए।


“आदित्य से बात हुई है?”


नीलिमा ने उत्तर नहीं दिया।


पिता ने गहरी सांस ली।


“मैं तुम्हें पढ़ने से नहीं रोक रहा। लेकिन तुम्हें यह समझना होगा कि जीवन केवल भावनाओं से नहीं चलता।”


नीलिमा ने सिर झुकाकर कहा,

“मैं समझती हूँ।”


उसके पिता ने पूछा,

“क्या सच में?”


नीलिमा ने उनकी ओर देखते हुए कहा,

“हाँ।”


पिता ने कहा,


“तो जो तुम्हें सही लगे करो।”


नीलिमा को विश्वास नहीं हुआ।


“सच?”


“हाँ। लेकिन जिम्मेदारी भी तुम्हारी होगी।”


उस दिन नीलिमा बहुत खुश हुई।


लेकिन अगले ही दिन उसे पता चला कि आदित्य ने हिंदी में एमए के साथ शोध के लिए आवेदन कर दिया है।


नीलिमा ने पूछा,


“तुम हमेशा पढ़ते ही रहोगे?”


आदित्य ने कहा,


“शायद।”


नीलिमा ने तुरंत पूछा,

“फिर नौकरी?”


आदित्य मुस्कुराते हुए बोला,

“मिल जाएगी।”


नीलिमा ने फिर पूछा,

“और शादी?”


आदित्य मुस्कुराया।


“कभी न कभी।”


नीलिमा ने उत्सुकता से पूछा,

“किससे?”


आदित्य ने सहजता से उत्तर दिया,

“पता नहीं।”


नीलिमा कुछ क्षण चुप रही। फिर उसने आदित्य की आँखों में देखते हुए पूछा,

“अगर मैं पूछूँ कि मुझसे क्यों नहीं?”


आदित्य चुप हो गया।


नीलिमा ने उसकी आँखों में देखा।


“तुम फिर चुप हो गए।”


आदित्य कुछ क्षण चुप रहा, फिर बोला, “कुछ बातें कहने के लिए सही समय चाहिए।”


नीलिमा ने हल्की नाराजगी से कहा, “पाँच साल हो गए।”


आदित्य ने धीमे स्वर में जवाब दिया, “समय बीतना और सही समय आना अलग बातें हैं।”


नीलिमा को पहली बार आदित्य की चुप्पी से चोट लगी।


उसने कहा,


“शायद तुम मुझे कभी समझना ही नहीं चाहते।”


आदित्य ने धीरे से कहा,


“शायद मैं तुम्हें इतना समझता हूँ कि तुम्हें अपने निर्णय का अधिकार देना चाहता हूँ।”


नीलिमा बिना कुछ बोले चली गई।


कुछ ही समय बाद उसके पिता ने उसका विवाह तय कर दिया।


लड़का दूसरे शहर में नौकरी करता था।


परिवार अच्छा था।


नीलिमा ने आदित्य को बताया।


“मेरी शादी तय हो गई।”


आदित्य ने बस इतना कहा,


“बधाई।”


नीलिमा को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर कुछ तोड़ दिया हो।


“बस?”


आदित्य ने सहज भाव से कहा,

“और क्या कहूँ?”


नीलिमा ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा,

“तुम्हें कुछ महसूस नहीं हुआ?”


आदित्य ने नजरें झुका लीं और धीमे स्वर में कहा,

“बहुत कुछ।”


नीलिमा की आवाज में शिकायत उतर आई। उसने पूछा,

“तो बोलते क्यों नहीं?”


आदित्य ने गंभीर होकर कहा,

“क्योंकि अब तुम्हारा फैसला हो चुका है।”


नीलिमा कुछ क्षण चुप रही। फिर उसने हिम्मत करके कहा,

“अगर मैं कहूँ कि मैं खुश नहीं हूँ?”


आदित्य ने शांत स्वर में उत्तर दिया,

“तो तुम्हें अपने पिता से बात करनी चाहिए।”


नीलिमा की आँखें भर आईं। उसने कांपती आवाज में पूछा,

“अगर मैं कहूँ कि मैं तुम्हारे साथ जाना चाहती हूँ?”


आदित्य ने उसकी तरफ देखा।


“क्या तुम सच में मेरे साथ चलना चाहती हो?”


नीलिमा ने बिना झिझके कहा,

“हाँ।”


आदित्य ने गंभीर स्वर में कहा,

“तो पहले अपने मन को समझो।”


नीलिमा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“मैं समझ चुकी हूँ।”


आदित्य ने सिर हिलाते हुए कहा,

“नहीं नीलिमा। तुम अभी भावुक हो।”


नीलिमा ने तुरंत पूछा,

“और तुम?”


आदित्य कुछ क्षण चुप रहा, फिर धीमे स्वर में बोला,

“मैं भी।”


नीलिमा की आँखें भर आईं। उसने दुखी होकर पूछा,

“फिर भी तुम मुझे रोक नहीं रहे?”


आदित्य की आँखें नम हो गईं।


“क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे पास अपनी इच्छा से आओ, किसी मजबूरी में नहीं।”


नीलिमा ने कहा,


“शायद तुम मुझे खो दोगे।”


आदित्य ने उत्तर दिया,


“अगर हमारा रिश्ता इतना कमजोर है कि दूरी से खत्म हो जाएगा तो उसे बचाकर भी क्या करूँगा?”


विवाह हो गया।


नीलिमा दूसरे शहर चली गई।


आदित्य ने अपनी पढ़ाई जारी रखी।


दोनों की बातचीत धीरे-धीरे बंद हो गई।


नीलिमा ने नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश की।


उसका पति बुरा आदमी नहीं था।


वह अपनी नौकरी में व्यस्त रहता था।


नीलिमा ने एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी शुरू कर दी।


कुछ वर्षों बाद उसका बेटा हुआ।


उसने उसका नाम आरव रखा।


बेटे के जन्म के बाद उसका जीवन कुछ समय के लिए पूरी तरह बदल गया।


आरव उसकी दुनिया बन गया।


लेकिन आदित्य की याद कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।


जब भी वह किसी पुस्तक की दुकान के सामने से गुजरती, उसे कॉलेज का पुस्तकालय याद आता।


जब किसी कवि की पंक्ति सुनती तो आदित्य की आवाज कानों में गूंज जाती।


कई बार उसने अपने मन से कहा,


“सब खत्म हो चुका है।”


लेकिन मन हर बार कहता,


“नहीं।”


फिर एक दुर्घटना ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी।


उसके पति की मृत्यु हो गई।


घर के कई लोग भी उस दुर्घटना में चले गए।


नीलिमा के सामने केवल उसका छोटा बेटा रह गया।


उसने खुद को संभाला।


स्कूल की नौकरी जारी रखी।


लोगों ने उसे सलाह दी।


किसी ने कहा दूसरी शादी कर लो।


किसी ने कहा बच्चे को पिता की जरूरत है।


किसी ने कहा अतीत भूल जाओ।


लेकिन नीलिमा ने किसी से अपने मन की बात नहीं कही।


वह केवल इतना कहती,


“मेरा बच्चा ही मेरी जिंदगी है।”


समय गुजरता गया।


आरव बड़ा होने लगा।


एक दिन उसने पूछा,


“माँ, मेरे पापा कैसे थे?”


नीलिमा कुछ पल चुप रही।


“अच्छे थे।”


आरव ने मासूमियत से पूछा, “माँ, आप उन्हें याद करती हैं?”


नीलिमा ने कुछ क्षण चुप रहने के बाद कहा, “हाँ बेटा।”


आरव ने फिर पूछा, “तो फिर रोती क्यों नहीं?”


नीलिमा मुस्कुराई।


“हर दुख आँसू बनकर नहीं निकलता बेटा।”


आरव ने पूछा,


“क्या आपको किसी और की भी याद आती है?”


नीलिमा चौंक गई।


“तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो?”


आरव ने मासूमियत से कहा,

“कभी-कभी आप अकेली बैठकर मुस्कुराती हैं।”


नीलिमा ने उसे गले लगा लिया।


“तुम बहुत बड़े हो गए हो।”


आरव ने मासूमियत से अपनी माँ की ओर देखते हुए पूछा,

“तो बताओ।”


नीलिमा ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा,

“कभी बड़ा होकर समझना।”


उधर आदित्य अपने गाँव लौट चुका था।


उसने शोध पूरा कर लिया था।


कॉलेज में अध्यापक की नौकरी मिल गई थी।


उसके माता-पिता बूढ़े हो चुके थे।


आदित्य गाँव में ही रहकर पढ़ाने लगा।


उसने घर की मरम्मत कराई।


एक छोटा पुस्तकालय बनवाया।


गाँव के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने लगा।


उसकी माँ अक्सर कहती,


“बेटा, अब तो शादी कर लो।”


आदित्य हँसकर कहता,


“अभी बहुत काम है माँ।”


माँ ने प्यार से समझाते हुए कहा,

“काम तो जीवन भर रहेगा।”


आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

“मुझे जल्दी नहीं है।”


माँ ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर पूछा,

“किसका इंतजार है?”


आदित्य चुप हो जाता।


माँ समझ जाती।


एक दिन उन्होंने कहा,


“क्या वह कभी वापस आएगी?”


आदित्य ने माँ की ओर देखा।


“अगर उसके मन में कुछ बचा होगा तो आएगी।”


माँ ने उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“और अगर वह कभी नहीं आई?”


आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“तो उसकी जिंदगी खुश रहे।”


माँ ने गहरी सांस ली।


“तुम्हारे पिता भी ऐसे ही थे। अपने मन की बात कहने में पूरी जिंदगी लगा दी।”


आदित्य मुस्कुरा दिया।


“शायद मैं भी उन्हीं का बेटा हूँ।”


कुछ वर्षों बाद आदित्य के पिता नहीं रहे।


माँ बिल्कुल अकेली हो गईं।


अब आदित्य ही उनका सहारा था।


उसने शादी के विषय पर बात करना भी बंद कर दिया।


लेकिन प्रतीक्षा उसके भीतर कहीं जीवित रही।


फिर एक दिन उसके घर के बाहर एक महिला खड़ी थी।


उसके साथ एक छोटा बच्चा था।


महिला ने दरवाजे पर दस्तक दी।


आदित्य बाहर आया।


महिला ने चादर कसकर पकड़ रखी थी।


बच्चा उसकी गोद में बेहोश-सा पड़ा था।


“कृपया इसे बचा लीजिए।”


आदित्य ने बच्चे को देखा।


“क्या हुआ इसे?”


नीलिमा ने घबराई हुई आवाज में कहा, “कई घंटे से बुखार है।”


आदित्य ने बच्चे को गोद में उठाते हुए कहा, “अंदर आइए।”


महिला अंदर आ गई।


आदित्य की माँ भी बाहर आईं।


उन्होंने महिला को देखते ही कुछ अजीब महसूस किया।


लेकिन पहचान नहीं पाईं।


आदित्य बच्चे को उठाकर भीतर ले गया।


“माँ, पानी गरम करिए।”


बच्चे की हालत खराब थी।


माँ ने उसके हाथ-पैर साफ किए।


दवा दी।


कपड़े बदले।


कई घंटे तक सभी बच्चे की देखभाल करते रहे।


जब बच्चे ने आँखें खोलीं तो उसने सबसे पहले आदित्य को देखा।


“आप डॉक्टर हो?”


आदित्य मुस्कुराया।


“नहीं।”


बच्चे ने मासूमियत से पूछा, “फिर आपने मुझे ठीक क्यों किया?”


आदित्य ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “क्योंकि तुम बीमार थे।”


बच्चे ने अपनी माँ की तरफ देखा।


“माँ, हम कहाँ हैं?”


महिला की आँखों से आँसू निकल आए।


“जहाँ तुम्हें होना चाहिए था।”


आदित्य ने उस आवाज को सुना।


उसका दिल अचानक रुक-सा गया।


वह महिला की ओर मुड़ा।


“तुम...”


महिला ने सिर उठा दिया।


आँखें चार हुईं।


“हाँ आदित्य।”


आदित्य की आवाज नहीं निकली।


“नीलिमा?”


नीलिमा ने सिर झुका दिया।


“बहुत देर कर दी।”


आदित्य ने कुछ नहीं कहा।


माँ दरवाजे पर खड़ी सब देख रही थीं।


उन्होंने धीरे से पूछा,


“तुम दोनों एक-दूसरे को जानते हो?”


नीलिमा ने उनके चरणों की ओर देखा।


वह आगे बढ़ी और झुक गई।


“माँ... मुझे क्षमा कर दीजिए।”


माँ ने उसे रोक दिया।


“पहले यह बताओ कि इतने वर्षों तक कहाँ थीं?”


नीलिमा रो पड़ी।


“जिंदगी मुझे जहाँ ले गई, वहाँ चली गई।”


आदित्य ने कुछ क्षण उसे देखते रहने के बाद पूछा,

“और आज?”


नीलिमा ने धीमे स्वर में कहा,

“आज शायद जिंदगी मुझे वापस यहाँ ले आई है।”


आदित्य अब भी चुप था।


नीलिमा ने कहा,


“मैंने बहुत देर से समझा कि तुम क्या कहना चाहते थे।”


आदित्य ने पूछा,


“क्या समझा?”


नीलिमा ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “कि प्यार किसी को पाने का नाम नहीं है।”


आदित्य ने फिर पूछा, “और?”


नीलिमा ने अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए कहा, “प्यार उस इंसान की खुशी चाहने का नाम है, चाहे वह हमारे पास रहे या नहीं।”


आदित्य की आँखें भर आईं।


नीलिमा ने आगे कहा,


“लेकिन मैंने तुम्हें कभी भुलाया नहीं।”


“मैंने भी नहीं।”


“फिर तुमने मुझे खोजा क्यों नहीं?”


आदित्य ने कहा,


“क्योंकि तुम्हें अपने जीवन में आगे बढ़ने का अधिकार था।”


नीलिमा ने उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“और तुम्हें?”


आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“मुझे प्रतीक्षा का।”


नीलिमा रोते हुए बोली,


“क्या अभी भी प्रतीक्षा बाकी है?”


आदित्य ने उसकी ओर देखा।


“शायद नहीं।”


नीलिमा ने हैरानी से पूछा,

“क्यों?”


आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“क्योंकि तुम सामने खड़ी हो।”


माँ ने दोनों को देखा।


फिर बच्चे के सिर पर हाथ रखा।


“इसका नाम क्या है?”


नीलिमा ने कहा,


“आरव।”


माँ ने मुस्कुराकर पूछा,


“और पिता?”


नीलिमा चुप हो गई।


आरव ने मासूमियत से आदित्य की ओर देखा।


“क्या ये मेरे पापा हैं?”


आदित्य के पास कोई उत्तर नहीं था।


नीलिमा ने धीरे से कहा,


“बेटा, कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते। उन्हें समय बनाता है।”


आरव ने आदित्य का हाथ पकड़ लिया।


“तो आप मेरे साथ रहोगे?”


आदित्य की आँखें भर आईं।


उसने बच्चे का हाथ थाम लिया।


“अगर तुम मुझे अपने साथ रखना चाहो तो।”


आरव मुस्कुराया।


“मुझे आप अच्छे लगते हो।”


माँ ने आँचल से आँखें पोंछीं।


“आदित्य, अब इस घर में कोई अकेला नहीं रहेगा।”


आदित्य ने माँ की तरफ देखा।


“माँ...”


माँ ने आदित्य की बात बीच में ही रोकते हुए कहा,

“कुछ मत कहो।”


उन्होंने नीलिमा का हाथ पकड़ लिया।


“तुमने बहुत सहा है। अब जो बचा है उसे संभालो।”


नीलिमा रोती हुई उनके चरणों में बैठ गई।


“माँ, मैं आपके बेटे की जिंदगी में फिर परेशानी नहीं बनना चाहती।”


माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“तुम परेशानी नहीं हो बेटी। तुम उस घर की अधूरी कहानी हो जिसे पूरा होने में बहुत समय लग गया।”


नीलिमा ने आदित्य की तरफ देखा।


“क्या तुम मुझे स्वीकार कर पाओगे?”


आदित्य ने कहा,


“एक शर्त है।”


नीलिमा चौंक गई।


“अब भी शर्त?”


आदित्य मुस्कुराया।


“हाँ।”


नीलिमा ने हैरानी से पूछा,

“क्या?”


आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“इस बार तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगी।”


नीलिमा की आँखों से आँसू बह निकले।


“कभी नहीं।”


माँ ने हँसते हुए कहा,


“अब जाकर खाना बनाओ दोनों के लिए।”


नीलिमा ने पहली बार उस घर में अपनेपन से कहा,


“जी माँ।”


आरव दौड़कर बोला,


“मैं भी मदद करूँगा।”


माँ ने कहा,


“तुम्हारा काम केवल पढ़ना है।”


आरव बोला,


“लेकिन मैं बड़ा होकर क्या बनूँ?”


आदित्य ने कहा,


“जो तुम्हारा मन चाहे।”


आरव ने तुरंत कहा,


“आप जैसा।”


आदित्य हँस पड़ा।


“मेरे जैसा नहीं। मुझसे बेहतर बनना।”


कुछ महीनों बाद नीलिमा ने अपनी नौकरी फिर से शुरू की।


आदित्य ने गाँव के स्कूल में उसके लिए बच्चों की एक नई कक्षा शुरू करवाई।


दोनों ने मिलकर गाँव की लड़कियों के लिए एक छोटा पुस्तकालय भी खोला।


आरव वहीं पढ़ने लगा।


लोगों ने तरह-तरह की बातें कीं।


किसी ने पुराने रिश्ते गिनाए।


किसी ने समाज की मर्यादा समझाई।


लेकिन आदित्य की माँ ने सबको एक ही जवाब दिया,


“जिसने दुख सहा है, उसे जीने का अधिकार सबसे पहले है।”


धीरे-धीरे लोगों की बातें बंद हो गईं।


एक दिन नीलिमा ने आदित्य से पूछा,


“तुमने मेरा इतने वर्षों तक इंतजार क्यों किया?”


आदित्य ने कहा,


“क्योंकि मुझे भरोसा था।”


नीलिमा ने हैरानी से पूछा,

“किस बात का?”


आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“कि अगर हमारे बीच जो था वह केवल आकर्षण नहीं था, तो समय उसे खत्म नहीं कर पाएगा।”


नीलिमा की आँखें नम हो गईं। उसने कुछ क्षण चुप रहने के बाद पूछा,

“और अगर मैं कभी वापस नहीं आती?”


आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“तो भी तुम्हारी खुशी के लिए प्रार्थना करता।”


नीलिमा ने कहा,


“अब समझ में आया कि तुम्हारी चुप्पी इतनी लंबी क्यों थी।”


आदित्य मुस्कुराया।


“और मुझे समझ आया कि तुम्हें मेरी बात समझने में इतना समय क्यों लगा।”


नीलिमा ने उत्सुकता से पूछा,

“क्यों?”


आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“क्योंकि कुछ बातें कानों से नहीं, जिंदगी से सुनाई देती हैं।”


नीलिमा उसके पास बैठ गई।


“तो अब भी हम वही हैं?”


आदित्य ने कहा,


“नहीं।”


नीलिमा ने हैरानी से पूछा,

“क्यों?”


आदित्य ने धीरे से उसका हाथ थामते हुए कहा,

“अब हम पहले से ज्यादा हैं।”


नीलिमा ने उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“कैसे?”


आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

“अब हमारे बीच केवल प्रेम नहीं है।”


नीलिमा ने धीरे से पूछा,

“और?”


आदित्य ने आरव की ओर देखते हुए कहा,

“जिम्मेदारी है, विश्वास है, परिवार है और एक बच्चा है, जो हमें हर दिन याद दिलाता है कि जिंदगी को दूसरी बार भी जिया जा सकता है।”


नीलिमा ने आरव की ओर देखा।


वह किताब लेकर बैठा था।


माँ आँगन में पौधों को पानी दे रही थीं।


घर में वर्षों बाद हँसी की आवाज थी।


नीलिमा ने धीरे से कहा,


“शायद यही मेरी मंजिल थी।”


आदित्य ने पूछा,


“और मेरी?”


नीलिमा मुस्कुराई।


“तुम तो पहले से यहीं खड़े थे।”


आदित्य ने उसकी तरफ देखा।


“हाँ।”


नीलिमा ने उत्सुकता से पूछा, “किसका इंतजार कर रहे थे?”


आदित्य ने कहा,


“तुम्हारा नहीं।”


नीलिमा चौंकी।


“फिर?”


आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ नीलिमा की आँखों में देखते हुए कहा,

“उस दिन का, जब तुम्हें खुद समझ आए कि तुम्हें कहाँ लौटना है।”


नीलिमा की आँखें भर आईं।


उसने आदित्य का हाथ पकड़ लिया।


इस बार दोनों के बीच कोई सवाल नहीं था।


कोई शर्त नहीं थी।


कोई अधूरा वादा नहीं था।


केवल एक लंबी प्रतीक्षा थी, जो आखिरकार अपने घर लौट आई थी।



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