जिस माँ को वह बोझ समझता था

 

Emotional Indian mother and son reunion in a hospital after he realizes her unconditional love and sacrifice.


“माँ, आप हर बार मेरे कमरे में आकर यही क्यों कहती रहती हैं कि खाना खा लो? मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ।”


अमन ने लैपटॉप से नजरें हटाए बिना अपनी माँ सावित्री से कहा।


सावित्री दरवाजे पर खड़ी कुछ पल अपने बेटे को देखती रही। उसके हाथ में गरम खाना रखा हुआ था।


उसने धीमे से कहा—


“बेटा, छोटा तो नहीं है तू, लेकिन माँ के लिए बेटा कभी बड़ा नहीं होता।”


अमन ने झुंझलाकर कहा—


“माँ, प्लीज! मुझे काम करने दो। हर वक्त पीछे मत पड़ा करो।”


सावित्री चुपचाप खाना मेज पर रखकर बाहर चली गई।


दरवाजा बंद होते ही उसकी आँखें नम हो गईं।


जिस बेटे को उसने अपनी गोद में लेकर दुनिया से बचाया था, आज उसी बेटे को उसकी छोटी-सी चिंता भी बोझ लगने लगी थी।


अमन एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी करता था। शहर में उसका अपना सुंदर फ्लैट था। अच्छी गाड़ी थी, अच्छे कपड़े थे और दोस्तों का बड़ा दायरा था।


लेकिन इन सबके बीच उसकी माँ सावित्री के लिए उसके पास समय नहीं था।


सावित्री गाँव के एक छोटे से घर में पली-बढ़ी थी। उसने बहुत कम पढ़ाई की थी, लेकिन जिंदगी ने उसे बहुत कुछ सिखाया था।


अमन के पिता का निधन तब हो गया था, जब अमन सिर्फ दस साल का था।


उस वक्त घर में न जमा पूँजी थी, न कोई बड़ा सहारा।


सावित्री चाहती तो अपने मायके चली जाती।


लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।


उसने अपने बेटे को सीने से लगाया और कहा था—


“तेरे पिता चले गए हैं बेटा, लेकिन तेरी माँ अभी जिंदा है। जब तक मेरी साँस चलेगी, तुझे किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगी।”


उस दिन से सावित्री की जिंदगी का एक ही मकसद था—अमन।


उसने लोगों के घरों में सिलाई की।


कपड़े धोए।


दूसरों के लिए खाना बनाया।


कई बार खुद आधा पेट खाकर बेटे को पूरा खाना खिलाया।


अमन के स्कूल की फीस भरने के लिए उसने अपनी शादी की आखिरी बची हुई चूड़ी तक बेच दी थी।


जब अमन कॉलेज जाना चाहता था, तो सावित्री ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया।


अमन को कभी पता ही नहीं चला कि उसकी माँ ने उसके लिए कितने त्याग किए थे।


क्योंकि सावित्री ने कभी उसे बताया ही नहीं।


वह हमेशा यही कहती—


“माँ-बाप बच्चों के लिए जो करते हैं, उसका हिसाब थोड़ी रखते हैं।”


अमन पढ़-लिखकर शहर आ गया।


नौकरी लग गई।


पहली तनख्वाह मिली तो उसने माँ के लिए एक महंगी साड़ी खरीदी।


सावित्री की खुशी का ठिकाना नहीं था।


उसने साड़ी को अपने सीने से लगाकर कहा—


“मेरा बेटा बड़ा हो गया।”


लेकिन धीरे-धीरे अमन बदलने लगा।


उसके नए दोस्त थे।


नई जिंदगी थी।


उसे अपनी माँ का साधारण पहनावा पसंद नहीं आता था।


एक दिन उसने कहा—


“माँ, जब मेरे ऑफिस के लोग घर आएँ तो आप थोड़ा अच्छे कपड़े पहन लिया करो।”


सावित्री ने मुस्कुराकर पूछा—


“मेरे कपड़े इतने खराब हैं क्या?”


अमन ने हिचकिचाते हुए कहा—


“ऐसा नहीं है... बस... आप गाँव जैसी लगती हो।”


सावित्री कुछ नहीं बोली।


उसने अगले दिन अपनी पुरानी साड़ी अलमारी के सबसे नीचे रख दी।


कुछ समय बाद अमन की शादी हो गई।


उसकी पत्नी नेहा पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी।


शुरुआत में सब ठीक रहा।


लेकिन धीरे-धीरे नेहा को भी सावित्री की आदतें पसंद नहीं आने लगीं।


सावित्री सुबह जल्दी उठकर घर की सफाई करती।


नेहा से कहती—


“बहू, तुम आराम कर लो, मैं कर देती हूँ।”


नेहा कहती—


“माँ जी, मैंने नौकरानी रखी है। आपको इतना काम करने की जरूरत नहीं।”


सावित्री मुस्कुराकर कहती—


“मुझे काम करने में खुशी मिलती है।”


लेकिन नेहा को लगता था कि सावित्री जरूरत से ज्यादा घर के कामों में दखल देती है।


एक दिन नेहा ने अमन से कहा—


“अमन, मुझे लगता है हमें अलग रहना चाहिए।”


अमन चुप रहा।


नेहा ने कहा—


“मैं माँ जी की इज्जत करती हूँ, लेकिन हर बात में उनका तरीका अलग है। मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है।”


अमन ने अपनी माँ की तरफ देखा।


सावित्री दूसरे कमरे में बैठी थी।


शायद उसने सारी बात सुन ली थी।


कुछ देर बाद वह खुद अमन के पास आई।


उसने कहा—


“बेटा, अगर मेरी वजह से तुम्हें परेशानी हो रही है तो मैं गाँव चली जाऊँगी।”


अमन चौंक गया।


“माँ, आप कहाँ जाओगी?”


सावित्री ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—


“जहाँ से आई थी, वहीं चली जाऊँगी।”


“लेकिन माँ...”


सावित्री ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।


“तू खुश रहना बेटा। माँ को अपने बच्चे की खुशी से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।”


अमन ने उस वक्त माँ को रोकने की कोशिश नहीं की।


उसे लगा—


“कुछ दिन गाँव में रहेंगी तो ठीक रहेगा।”


सावित्री अपने पुराने घर में चली गई।


वही घर जहाँ अमन ने बचपन बिताया था।


वही आँगन।


वही नीम का पेड़।


वही पुरानी दीवार पर टंगी उसके पिता की तस्वीर।


लेकिन अब उस घर में अमन नहीं था।


सावित्री फिर भी हर दिन बेटे के लिए दुआ करती थी।


अमन को माँ की याद कभी-कभी आती, लेकिन वह खुद को समझा लेता—


“माँ वहाँ खुश हैं।”


एक दिन अमन का फोन आया।


“माँ, आप ठीक हो?”


सावित्री की आवाज में खुशी आ गई।


“हाँ बेटा, बिल्कुल ठीक हूँ। तू बता, तू कैसा है?”


“मैं ठीक हूँ।”


“खाना खा लिया?”


अमन मुस्कुराया।


“हाँ माँ।”


“ठीक से खाना खाना। बहुत काम मत किया कर।”


“हाँ माँ।”


फोन कट गया।


सावित्री कुछ देर फोन को देखती रही।


उसके चेहरे पर मुस्कान थी।


उसे सिर्फ इतना ही काफी था कि बेटे ने उसे फोन किया।


कुछ महीनों बाद अमन को ऑफिस के काम से दूसरे शहर जाना पड़ा।


वापसी के दौरान उसकी कार का एक्सीडेंट हो गया।


अमन गंभीर रूप से घायल हो गया।


उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।


नेहा उस समय अपने मायके गई हुई थी।


अमन के दोस्तों ने अस्पताल में उसके परिवार को फोन किया।


जब सावित्री को खबर मिली, तो उसके हाथ से फोन गिर गया।


वह बिना कुछ सोचे अस्पताल के लिए निकल पड़ी।


उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे।


लेकिन उसने अपनी पुरानी संदूकची खोली।


उसमें कुछ बचत रखी थी।


वही पैसे जो उसने कई सालों से अपने बेटे के लिए बचाकर रखे थे।


अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर ने कहा—


“ऑपरेशन करना पड़ेगा। खर्च काफी आएगा।”


सावित्री ने बिना एक पल सोचे कहा—


“मेरे बेटे को बचा लीजिए डॉक्टर साहब। पैसे की चिंता मत कीजिए।”


डॉक्टर ने पूछा—


“आप रिश्ते में कौन हैं?”


सावित्री ने काँपती आवाज में कहा—


“मैं उसकी माँ हूँ।”


अमन का ऑपरेशन शुरू हुआ।


सावित्री अस्पताल के बाहर बैठी भगवान से प्रार्थना करती रही।


उसने खाना नहीं खाया।


पानी तक ठीक से नहीं पिया।


हर बार ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुलता, वह घबराकर खड़ी हो जाती।


कई घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए।


उन्होंने कहा—


“ऑपरेशन सफल रहा है, लेकिन अगले कुछ दिन बहुत महत्वपूर्ण हैं।”


सावित्री की आँखों से आँसू निकल आए।


उसने हाथ जोड़कर कहा—


“भगवान का लाख-लाख शुक्र है।”


अमन को होश आया तो उसने खुद को अस्पताल के कमरे में पाया।


उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।


उसकी नजर सामने बैठी एक बूढ़ी औरत पर पड़ी।


बाल बिखरे हुए थे।


चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं।


आँखें लाल थीं।


वह सावित्री थी।


अमन कुछ पल उसे पहचान ही नहीं पाया।


फिर अचानक उसके मन में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।


माँ का हाथ पकड़कर स्कूल जाना।


माँ का खुद भूखा रहकर उसे खाना खिलाना।


माँ का रात भर सिलाई करना।


माँ का फीस के लिए अपनी चूड़ियाँ बेचना।


माँ का उसके बीमार होने पर पूरी रात सिरहाने बैठना।


और फिर उसे अपना वह व्यवहार याद आया—


“माँ, मेरे पीछे मत पड़ा करो।”


“माँ, आप गाँव जैसी लगती हो।”


“माँ, आप अलग रहो तो अच्छा है।”


अमन की आँखों से आँसू बहने लगे।


उसने कमजोर आवाज में कहा—


“माँ...”


सावित्री तुरंत उठकर उसके पास आई।


“क्या हुआ बेटा? दर्द हो रहा है?”


अमन ने सिर हिलाया।


“नहीं माँ...”


सावित्री ने उसके माथे पर हाथ रखा।


“डॉक्टर ने कहा है ज्यादा बात मत करना।”


अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“आपने मेरे लिए इतना सब क्यों किया?”


सावित्री मुस्कुराई।


“क्योंकि तू मेरा बेटा है।”


“लेकिन माँ... मैंने आपके साथ बहुत बुरा किया।”


सावित्री कुछ पल चुप रही।


फिर बोली—


“बच्चे कभी-कभी माँ-बाप की बात समझ नहीं पाते। इसमें कोई नई बात नहीं है।”


अमन फूट-फूटकर रोने लगा।


“मुझे माफ कर दो माँ।”


सावित्री ने उसके आँसू पोंछ दिए।


“माँ अपने बच्चों से नाराज रह सकती है बेटा, लेकिन उन्हें छोड़ नहीं सकती।”


अमन ने माँ का हाथ अपने सीने से लगा लिया।


उसकी आवाज काँप रही थी।


“माँ, मैंने आपको बोझ समझ लिया था। जिस माँ ने मेरी जिंदगी बनाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दे दी, मैं उसी माँ के लिए अपने घर में जगह नहीं बना पाया।”


सावित्री की आँखें भी भर आईं।


अमन ने कहा—


“आपने मुझे कभी नहीं बताया कि आपने मेरे लिए क्या-क्या किया।”


माँ मुस्कुराई।


“माँ अगर अपने त्याग का हिसाब बच्चों को सुनाने लगे, तो वह त्याग कहाँ रह जाएगा बेटा?”


यह बात अमन के दिल में उतर गई।


कुछ दिनों बाद अमन अस्पताल से घर आया।


घर का दरवाजा खुलते ही उसने सबसे पहले अपनी माँ का हाथ पकड़ा।


नेहा भी वहाँ मौजूद थी।


अमन ने नेहा से कहा—


“नेहा, यह घर सिर्फ मेरा नहीं है। यह मेरी माँ का भी है। जिस माँ ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया, उसे इस घर में रहने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं।”


नेहा की आँखें झुक गईं।


वह सावित्री के पास गई और बोली—


“माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको समझने की कोशिश ही नहीं की।”


सावित्री ने उसे गले लगा लिया।


“बहू, घर रिश्तों से बनता है। गलती सबसे होती है।”


अमन ने अपनी माँ को देखकर कहा—


“माँ, अब आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”


सावित्री ने मुस्कुराकर पूछा—


“क्यों?”


अमन ने उनका हाथ पकड़कर कहा—


“क्योंकि अब मुझे समझ आ गया है कि घर की सबसे जरूरी चीज फर्नीचर, पैसा या बड़ा कमरा नहीं होता। घर की असली पहचान माँ की मौजूदगी से होती है।”


सावित्री की आँखों से आँसू निकल आए।


उसने बेटे के सिर पर हाथ रखा।


“खुश रह बेटा।”


अमन ने माँ को गले लगा लिया।


उस पल उसे महसूस हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत वह नहीं थी जो उसने अपनी नौकरी से कमाई थी।


उसकी सबसे बड़ी दौलत तो वही थी, जिसे वह कभी बोझ समझ बैठा था।


उसकी माँ।


दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि माता-पिता की कीमत तब मत समझिए, जब वे अस्पताल के कमरे में आपके लिए दुआ कर रहे हों। उनकी कीमत तब समझिए, जब वे आपके पास स्वस्थ होकर मौजूद हों।


जिस माँ-बाप ने हमारी छोटी-सी जरूरत के लिए अपनी बड़ी-बड़ी खुशियाँ छोड़ दीं, उनके बुढ़ापे में उन्हें हमारी जरूरत होती है।


पैसा दोबारा कमाया जा सकता है, घर दोबारा बनाया जा सकता है, लेकिन माँ-बाप का चला हुआ समय और उनका साथ दोबारा नहीं मिलता।


इसलिए जब तक वे हमारे पास हैं, उनका हाथ थामकर रखिए। क्योंकि दुनिया में बहुत से रिश्ते मतलब से जुड़ते हैं, लेकिन माँ का रिश्ता सिर्फ प्रेम से जुड़ा होता है।



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