वो ख़त जो कभी भेजा नहीं गया
“माँ, ट्रेन कितनी देर और लेट होगी?”
अनन्या ने मोबाइल की स्क्रीन देखते हुए पूछा।
“घोषणा तो यही हुई है कि करीब दो घंटे और लगेंगे।”
सामने बैठी उसकी माँ ने प्लेटफॉर्म पर चारों तरफ देखते हुए कहा।
स्टेशन पर रात गहराती जा रही थी। दिसंबर की ठंडी हवा प्लेटफॉर्म पर घूम रही थी। चाय, कॉफी और मूंगफली बेचने वालों की आवाजें अब पहले से कम हो गई थीं।
अनन्या ने अपनी शॉल ठीक की और बैग से एक किताब निकाल ली।
उसका पति निखिल शहर में उसका इंतजार कर रहा था। बच्चों की परीक्षाएँ चल रही थीं, इसलिए इस बार वह अकेली ही मायके आई थी।
माँ की तबीयत कुछ दिनों से ठीक नहीं थी। डॉक्टर को दिखाने के बाद वह वापस लौट रही थी।
ट्रेन के आने में अभी काफी समय था।
अनन्या ने किताब खोली ही थी कि अचानक सामने से आती आवाज उसके कानों से टकराई—
“माफ कीजिएगा… क्या ये सीट नंबर 42 है?”
अनन्या ने सिर उठाया।
सामने करीब पचास साल का एक व्यक्ति खड़ा था।
हल्की दाढ़ी, चश्मा, हाथ में पुराना चमड़े का बैग और चेहरे पर वही परिचित सी मुस्कान।
अनन्या कुछ पल उसे देखती रही।
फिर अचानक उसके हाथ से किताब नीचे गिर गई।
“राघव?”
वह व्यक्ति भी जैसे पत्थर का हो गया।
“अनन्या?”
दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे।
बीस साल का समय जैसे अचानक गायब हो गया था।
कॉलेज का वह छोटा सा कैंपस…
लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ…
बरसात में कैंटीन की चाय…
और वह लड़का जो हर बात पर कहता था—
“तुम्हें इतना गुस्सा क्यों आता है?”
और लड़की हमेशा जवाब देती—
“क्योंकि तुम मुझे गुस्सा दिलाते हो।”
राघव धीरे से मुस्कुराया।
“तुम बिल्कुल नहीं बदलीं।”
अनन्या ने हल्की हँसी के साथ कहा,
“झूठ बोलना अभी भी नहीं आया तुम्हें। बाल तो देखो अपने।”
दोनों हँस पड़े।
माँ ने अनन्या की तरफ देखा।
“कौन है बेटा?”
अनन्या कुछ कहती, उससे पहले राघव ने हाथ जोड़कर कहा,
“नमस्ते आंटी। मैं अनन्या का कॉलेज का दोस्त हूँ।”
माँ ने उसे गौर से देखा।
“अच्छा… वही राघव?”
अनन्या चौंक गई।
“माँ, आपको याद है?”
अनन्या ने हैरानी से अपनी माँ की तरफ देखते हुए पूछा।
माँ कुछ पल राघव को गौर से देखती रहीं। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“कुछ चेहरे भूलते नहीं हैं।”
माँ मुस्कुरा दीं।
राघव थोड़ी देर उनके पास बैठ गया।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो पता ही नहीं चला कि कब आधा घंटा गुजर गया।
“तुम्हारी शादी कब हुई?”
राघव ने पूछा।
अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया—
“तेईस साल पहले।”
राघव ने अगला सवाल किया—
“बच्चे?”
अनन्या बोली—
“दो। बेटा आरव और बेटी मीरा।”
अनन्या ने भी मुस्कुराते हुए पूछा—
“और तुम्हारे?”
राघव ने जवाब दिया—
“एक बेटी है, तारा। दिल्ली में पढ़ती है।”
अनन्या ने थोड़ी झिझक के साथ पूछा—
“और तुम्हारी पत्नी?”
राघव ने मुस्कुराकर कहा,
“सुनीता। बहुत अच्छी है।”
अनन्या ने सिर हिलाया।
“अच्छा है।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर राघव ने पूछा,
“तुम खुश हो?”
सवाल बहुत साधारण था।
लेकिन अनन्या के भीतर जैसे कुछ देर के लिए सब शांत हो गया।
उसने सामने देखा।
फिर मुस्कुराकर कहा,
“हाँ। बहुत।”
राघव ने उसकी आँखों में देखा।
“सच?”
अनन्या ने इस बार बिना हिचकिचाए कहा,
“सच।”
राघव ने राहत की साँस ली।
“तो फिर अच्छा है।”
कुछ देर बाद ट्रेन आने की घोषणा हुई।
राघव ने अपना बैग उठाया।
“लगता है मेरी ट्रेन आ गई।”
अनन्या ने पूछा,
“तुम कहाँ जा रहे हो?”
राघव ने अपने बैग की तरफ इशारा करते हुए कहा,
“जयपुर। एक मीटिंग है।”
अनन्या ने उत्सुकता से पूछा,
“तुम अभी भी वही काम करते हो?”
राघव हल्के से मुस्कुराया और बोला,
“नहीं। अब अपनी कंपनी है।”
राघव की बात सुनकर अनन्या ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और हँसते हुए कहा,
“वाह! कॉलेज का वह लड़का, जो महीने के आखिरी सप्ताह में कैंटीन वाले से उधार चाय पीता था, आज कंपनी चला रहा है।”
राघव हँस पड़ा।
“और वह लड़की जो हर महीने मेरी किताबें लेकर कभी वापस नहीं करती थी, आज दो बच्चों की माँ है।”
अनन्या ने तुरंत सफाई देते हुए कहा,
“मैं किताबें वापस करती थी।”
राघव हँस पड़ा और शरारत से बोला,
“हाँ, दो साल बाद।”
दोनों फिर हँस पड़े।
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी।
राघव ने हाथ बढ़ाया।
“चलो, अनन्या। अच्छे रहना।”
अनन्या ने उसका हाथ थाम लिया।
“तुम भी।”
राघव कुछ कहना चाहता था।
शायद बहुत कुछ।
लेकिन फिर उसने सिर्फ इतना कहा—
“कभी-कभी लगता है, जिंदगी ने हम दोनों को बहुत दूर भेज दिया।”
अनन्या मुस्कुराई।
“शायद इसलिए कि हम जहाँ हैं, वहाँ खुश रहें।”
राघव ने सिर झुका दिया।
“शायद।”
ट्रेन चल पड़ी।
अनन्या काफी देर तक उसे जाते हुए देखती रही।
माँ ने धीरे से पूछा,
“पुरानी बात याद आ गई?”
अनन्या ने सिर उनकी गोद में रख दिया।
“हाँ।”
“प्यार करते थे एक-दूसरे से?”
अनन्या कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“शायद।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“और कभी बताया नहीं?”
अनन्या ने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
“नहीं।”
माँ ने उसके चेहरे को गौर से देखा और फिर पूछा,
“क्यों?”
अनन्या मुस्कुराई।
“पता नहीं माँ। शायद डर था कि अगर कह दिया तो जो दोस्ती है, वह भी चली जाएगी।”
माँ ने कुछ नहीं कहा।
रात भर अनन्या सो नहीं सकी।
राघव की बातें बार-बार उसके कानों में गूंजती रहीं।
सुबह घर पहुँची तो निखिल दरवाजे पर खड़े थे।
“बहुत थक गई होगी।”
उन्होंने उसका बैग पकड़ लिया।
“पहले चाय पी लो। मीरा ने तुम्हारे लिए आलू के पराठे बनाए हैं।”
अनन्या ने उन्हें देखा।
“मीरा ने?”
निखिल ने आश्चर्य से पूछा।
“हाँ। बोली, ‘मम्मा आएंगी तो उन्हें अपने हाथ से खिलाऊंगी।’”
अनन्या ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
अनन्या मुस्कुरा दी।
अंदर जाते ही आरव ने माँ को गले लगा लिया।
“मम्मा, नानी कैसी हैं?”
अनन्या ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“अब ठीक हैं।”
निखिल रसोई से आवाज लगाते हुए बोले,
“तुम बैठो। बाकी मैं देखता हूँ।”
अनन्या वहीं खड़ी उन्हें देखती रही।
इतने वर्षों में पहली बार उसने अपने पति को जैसे किसी नई नजर से देखा।
निखिल ने कभी बड़े-बड़े वादे नहीं किए थे।
उन्होंने कभी उसे महँगे उपहारों से नहीं भरा।
लेकिन जब वह बीमार हुई थी, रात-रात भर उसके सिरहाने बैठे थे।
जब आरव का जन्म हुआ था, उन्होंने नौकरी से छुट्टी लेकर महीनों घर संभाला था।
जब मीरा को स्कूल में कोई परेशानी हुई थी, तब सबसे पहले स्कूल पहुँचने वाले वही थे।
और पिछले तेईस सालों में जब भी अनन्या ने अपने सपनों को पीछे रखा था, निखिल ने हमेशा कहा था—
“तुम्हारे सपने भी इस घर के हैं।”
उस रात अनन्या ने अलमारी खोली।
पुरानी चीजों के बीच उसे एक छोटा सा डिब्बा दिखाई दिया।
उसमें कुछ पुराने कागज थे।
उसने एक कागज खोला।
वह राघव को लिखा गया एक पत्र था।
बीस साल पुराना।
उसमें लिखा था—
“राघव,
शायद मैं तुम्हें कुछ कहना चाहती हूँ।
लेकिन डरती हूँ।
तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो।
कहीं ऐसा न हो कि मेरे कहने से हमारी दोस्ती भी खत्म हो जाए।
इसलिए जो बात मैं तुम्हें कहना चाहती हूँ, उसे इस कागज पर लिखकर रख रही हूँ।
शायद कभी तुम्हें दूँगी।
शायद कभी नहीं।
तुम मुझे अच्छे लगते हो।
बहुत अच्छे।
लेकिन अगर तुम्हें ऐसा कुछ महसूस नहीं होता तो कोई बात नहीं।
मैं तुम्हारी दोस्त बनी रहना चाहती हूँ।
—अनन्या”
पत्र पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं।
इतने सालों से वह पत्र उसी डिब्बे में पड़ा था।
कभी भेजा नहीं गया।
कभी बताया नहीं गया।
उसने पत्र वापस रख दिया।
उसी समय निखिल कमरे में आए।
“क्या हुआ?”
अनन्या ने तुरंत डिब्बा बंद कर दिया।
“कुछ नहीं।”
निखिल ने उसकी आँखों में देखा।
“रो क्यों रही हो?”
अनन्या ने कुछ क्षण सोचा।
फिर पहली बार उसने वह पुराना पत्र निखिल के सामने रख दिया।
“ये मैंने शादी से पहले लिखा था।”
निखिल ने पत्र उठाया।
पूरा पढ़ा।
फिर कुछ देर शांत रहे।
अनन्या का दिल तेजी से धड़क रहा था।
उसे डर था कि निखिल के मन में क्या चल रहा होगा।
लेकिन निखिल ने पत्र मेज पर रखा और पूछा,
“राघव से प्यार करती थीं?”
अनन्या ने सच बोल दिया।
“हाँ।”
निखिल कुछ देर तक उसे देखते रहे।
“और उसने?”
अनन्या ने धीमे स्वर में जवाब दिया, “पता नहीं। शायद वह भी करता था।”
निखिल ने उसकी ओर देखते हुए अगला सवाल किया, “आज मिले उससे?”
अनन्या ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
निखिल कुर्सी पर बैठ गए।
कुछ देर तक कमरे में बिल्कुल सन्नाटा रहा।
फिर उन्होंने पूछा,
“उसने तुम्हें वापस चलने को कहा?”
“नहीं।” अनन्या ने धीरे से जवाब दिया।
“तुमने उससे कुछ कहा?” निखिल ने फिर पूछा।
“नहीं।” अनन्या ने सिर झुका लिया।
“फिर?” निखिल ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
अनन्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
“कुछ नहीं हुआ निखिल। सिर्फ पुराने दिन याद आए।”
निखिल ने गहरी साँस ली।
“मुझे तुम पर भरोसा है।”
अनन्या ने उनकी तरफ देखा।
“इतना आसान है?”
निखिल मुस्कुराए।
“नहीं। आसान नहीं है।”
अनन्या ने हैरानी से उनकी ओर देखा।
“फिर?” उसने धीरे से पूछा।
निखिल ने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “तेईस सालों में मैंने तुम्हें जितना जाना है, उसके सामने बीस साल पुरानी एक कहानी बहुत छोटी है।”
अनन्या रोते हुए बोली,
“लेकिन मैं कुछ दिनों से खुद को अजीब महसूस कर रही थी।”
निखिल ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा, “क्यों?”
अनन्या कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखें नम हो गईं।
“शायद इसलिए कि पहली बार मुझे पता चला कि जिसे मैं कभी चाहती थी, वह भी मुझे चाहता था,” उसने भर्राई हुई आवाज़ में कहा।
निखिल ने धीरे से कहा,
“इंसान को अधूरा छोड़ देने वाली चीज हमेशा प्यार नहीं होती। कभी-कभी सिर्फ एक अनुत्तरित सवाल होता है।”
अनन्या चुप रही।
निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हारे मन में इतने सालों से एक सवाल था कि शायद राघव ने तुम्हें कभी पसंद ही नहीं किया। अब उसका जवाब मिल गया।”
अनन्या ने नम आँखों से निखिल की ओर देखा और धीमे स्वर में बोली—
“हाँ।”
निखिल ने उसके हाथ पर अपनी पकड़ थोड़ी मजबूत करते हुए कहा—
“तो अब उस सवाल को भी जाने दो।”
अनन्या ने पूछा,
“तुम्हें जलन नहीं हो रही?”
निखिल हँस पड़े।
“थोड़ी हो रही है।”
अनन्या भी हल्का सा मुस्कुरा दी।
“बहुत?”
निखिल हँसते हुए बोले,
“इतनी कि कल से तुम्हारे कॉलेज के सारे दोस्तों से मुझे भी मिलना है।”
दोनों हँस पड़े।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ दिनों बाद अनन्या के मोबाइल पर एक संदेश आया।
राघव का।
“तुमसे मिलकर अच्छा लगा। एक बात कहनी थी। शायद उस समय हम दोनों बहुत डरते थे। मैं तुम्हें पसंद करता था, लेकिन कह नहीं पाया। बाद में जिंदगी आगे बढ़ गई। आज तुम्हें खुश देखकर अच्छा लगा। सुनीता को तुम्हारे बारे में बताया है। वह कह रही थी कि तुम्हें घर बुलाओ। अगर तुम और निखिल कभी आओ तो अच्छा लगेगा।”
अनन्या ने संदेश पढ़ा।
कुछ पल तक उसे लगा कि वह फिर बीस साल पीछे चली गई है।
लेकिन तभी पीछे से निखिल की आवाज आई—
“किसका मैसेज है?”
अनन्या ने मोबाइल उनकी तरफ बढ़ा दिया।
निखिल ने पढ़ा।
फिर बोले,
“जवाब दो।”
“क्या?”
“जो सच है।”
अनन्या ने लिखा—
“राघव, तुम्हें और सुनीता को भी शुभकामनाएँ। अब कभी मिलेंगे तो चारों साथ बैठेंगे। पुराने दिनों को याद करेंगे, लेकिन अपने आज को भूलेंगे नहीं।”
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
“यही बेहतर होगा।”
कुछ महीनों बाद रविवार की शाम अनन्या और निखिल राघव के घर पहुँचे।
सुनीता ने दरवाजा खोला।
“आप अनन्या हैं?”
अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया—
“हाँ।”
सुनीता ने उसे गले लगा लिया।
“बहुत सुना है आपके बारे में।”
निखिल ने हँसते हुए कहा,
“मैंने भी।”
पीछे से राघव आया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
इस बार आँखों में कोई अधूरापन नहीं था।
सिर्फ पुरानी दोस्ती थी।
राघव ने निखिल के कंधे पर हाथ रखा।
“आपसे शिकायत है।”
निखिल ने मुस्कुराते हुए पूछा—
“क्यों?”
राघव ने अनन्या की तरफ देखते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा—
“इतनी अच्छी पत्नी को इतने साल कैसे संभाल लिया?”
निखिल ने हँसते हुए कहा,
“बहुत आसान है। बस समय पर चाय और समय पर माफी माँगनी पड़ती है।”
अनन्या ने तुरंत कहा,
“और कभी-कभी मेरी बातें भी सुननी पड़ती हैं।”
सुनीता हँस पड़ी।
“तो फिर निखिल जी, आपकी ट्रेनिंग अच्छी हुई है।”
चारों की हँसी से घर भर गया।
कुछ देर बाद राघव अपनी बेटी तारा को बुलाकर लाया।
“ये मेरी बेटी है।”
अनन्या ने उसे प्यार से देखा।
“बहुत प्यारी है।”
तारा ने पूछा,
“पापा, आप और आंटी कॉलेज में साथ पढ़ते थे?”
राघव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—
“हाँ बेटा।”
तारा ने फिर उत्सुकता से पूछा—
“क्या आप दोनों अच्छे दोस्त थे?”
राघव ने अनन्या की तरफ देखा।
“बहुत अच्छे दोस्त।”
अनन्या ने मुस्कुराकर कहा,
“और बहुत झगड़ते भी थे।”
तारा हँस पड़ी।
रात को लौटते समय कार में निखिल चुप थे।
अनन्या ने पूछा,
“क्या सोच रहे हैं?”
निखिल कुछ क्षण चुप रहे, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—
“यही कि आज अगर तुमने बीस साल पहले वह पत्र भेज दिया होता तो?”
अनन्या कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“शायद जिंदगी कुछ और होती।”
“और?” निखिल ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
“पता नहीं,” अनन्या कुछ पल चुप रही, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली।
निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन जो है, वह कम सुंदर नहीं है।”
अनन्या ने खिड़की के बाहर देखा।
सड़क पर स्ट्रीट लाइटें एक के बाद एक पीछे छूटती जा रही थीं।
उसने धीरे से कहा,
“हाँ। शायद जिंदगी हमें हमेशा वह नहीं देती जिसकी हम कभी इच्छा करते हैं। लेकिन कभी-कभी वह हमें उससे भी ज्यादा दे देती है, जिसकी हमें जरूरत होती है।”
निखिल मुस्कुराए।
“तो मैडम, आज बहुत समझदार बातें हो रही हैं।”
अनन्या हँस पड़ी।
“आज पुराने दोस्त से मिलने का असर है।”
निखिल ने मजाक में कहा,
“पुराने दोस्त से मिलना ठीक है, बस पति को भी साथ लेकर।”
अनन्या हँसते हुए बोली—
“अब हर बार साथ ही चलूँगी।”
दोनों हँस पड़े।
घर पहुँचकर अनन्या ने वही पुराना पत्र निकाला।
कुछ क्षण उसे देखा।
फिर उसे फाड़ा नहीं।
जलाया भी नहीं।
बस वापस उसी डिब्बे में रख दिया।
क्योंकि वह पत्र अब किसी अधूरे प्रेम की निशानी नहीं था।
वह उसकी जिंदगी के उस हिस्से की याद था जहाँ उसने पहली बार किसी को चाहा था।
और अब वह जान चुकी थी—
हर प्यार को पा लेना जरूरी नहीं होता।
कुछ रिश्ते हमारी जिंदगी में सिर्फ यह सिखाने आते हैं कि हम प्यार करने की क्षमता रखते हैं।
कुछ अधूरी कहानियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं ताकि हमारी पूरी कहानी किसी और के साथ लिखी जा सके।
और कभी-कभी पुराने प्रेम से दोबारा मिलना इसलिए नहीं होता कि हम अतीत में लौट जाएँ…
बल्कि इसलिए होता है कि हम अतीत को सम्मान के साथ विदा कर सकें।
उस रात अनन्या ने डिब्बा बंद किया और अलमारी में रख दिया।
फिर कमरे की लाइट बंद करके निखिल के पास आकर लेट गई।
निखिल ने नींद में ही उसका हाथ पकड़ लिया।
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
उसके मन में अब कोई सवाल नहीं था।
न कोई शिकायत।
न कोई अधूरापन।
सिर्फ एक शांत सा एहसास था—
जो प्यार कभी मिला नहीं, वह एक खूबसूरत याद था।
और जो प्यार जिंदगी भर साथ रहा, वही उसका असली घर था।

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