एक छोटी-सी बिंदी ने बदल दी सोच
“माँ, आज आप फिर मेरी चोटी बना दो न… दादी तो बहुत कसकर बनाती हैं।”
छोटी-सी काव्या अपनी माँ के पास आकर बैठ गई।
नंदिनी ने उसकी ओर देखा और हल्का-सा मुस्कुराने की कोशिश की।
“अच्छा बेटा, इधर आओ।”
उसने काव्या को अपने पास बिठाया और बड़े प्यार से उसके बालों में कंघी करने लगी।
पास ही बैठा उसका छोटा भाई आरव अपनी किताब खोले चुपचाप पढ़ने का नाटक कर रहा था। असल में उसकी नजर बार-बार अपनी माँ के चेहरे पर जा रही थी।
नंदिनी के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों के नीचे छाई थकान साफ दिखाई दे रही थी।
उसकी जिंदगी को बदले हुए अभी छह महीने ही हुए थे।
छह महीने पहले तक यही घर हँसी से भरा रहता था।
उसका पति समीर बच्चों के साथ खूब मस्ती करता था। काव्या के बाल खुद बनाता, आरव को स्कूल के लिए तैयार करता और जाते-जाते नंदिनी से कहता—
“तुम बस बच्चों का ध्यान रखना, बाकी दुनिया की चिंता मुझे करने दो।”
लेकिन एक सड़क दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया।
समीर चला गया।
इतनी कम उम्र में नंदिनी विधवा हो गई।
काव्या ने पिता को खो दिया।
आरव ने अपना सबसे अच्छा दोस्त खो दिया।
और समीर के माता-पिता सुरेश और कमला ने अपना जवान बेटा।
घर में सब लोग जीवित थे, लेकिन किसी की जिंदगी पहले जैसी नहीं रही थी।
नंदिनी ने कई दिनों तक खुद को कमरे में बंद रखा था।
उसे लगता था कि अब उसके जीवन में कुछ बचा ही नहीं।
लेकिन एक दिन काव्या ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा था—
“मम्मी, आप रोओगी तो पापा वापस कैसे आएँगे?”
नंदिनी उस मासूम सवाल का जवाब नहीं दे पाई थी।
उसने बेटी को सीने से लगा लिया था और बहुत देर तक रोती रही थी।
उस दिन के बाद उसने खुद को संभालने की कोशिश शुरू कर दी।
वह जानती थी कि समीर वापस नहीं आएगा।
लेकिन उसके बच्चों को अभी उसकी जरूरत थी।
उन्हें स्कूल जाना था।
उन्हें खाना खाना था।
उन्हें बीमारी में दवा चाहिए थी।
उन्हें कोई ऐसा चाहिए था जो रात को डर लगने पर उनका हाथ पकड़ सके।
इसलिए नंदिनी ने धीरे-धीरे अपने आँसू छिपाना सीख लिया।
उसने पति की तस्वीर के सामने बैठकर रोना कम कर दिया।
बच्चों के सामने मुस्कुराना शुरू कर दिया।
कभी-कभी वह हल्के रंग की साड़ी पहन लेती।
माथे पर छोटी-सी बिंदी लगा लेती।
बस यही बात घर की एक रिश्तेदार विमला बुआ को बिल्कुल पसंद नहीं थी।
विमला बुआ समीर के पिता सुरेश जी की बड़ी बहन थीं।
वह पुराने विचारों की महिला थीं।
उनके लिए विधवा स्त्री का जीवन मानो सारी खुशियों से दूर रहना था।
उन्हें लगता था कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी को रंगीन कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
चूड़ियाँ नहीं पहननी चाहिए।
माथे पर बिंदी नहीं लगानी चाहिए।
हँसना भी कम कर देना चाहिए।
वह मानती थीं कि जितना अधिक कोई स्त्री अपने दुख को दिखाएगी, उतना ही समाज उसे सम्मान देगा।
एक दिन विमला बुआ ने नंदिनी को हरे रंग की साड़ी में देखा।
उसके माथे पर छोटी-सी लाल बिंदी थी।
हाथों में बहुत साधारण-सी काँच की चूड़ियाँ थीं।
विमला बुआ का चेहरा तुरंत बदल गया।
उन्होंने नंदिनी को ऊपर से नीचे तक देखा।
फिर बिना कुछ कहे आगे बढ़ गईं।
लेकिन उनके मन में बहुत कुछ चल रहा था।
कुछ देर बाद वह कमला जी के पास जाकर बोलीं—
“बहू को समझाओ।”
कमला जी ने पूछा—
“क्या हुआ दीदी?”
विमला बुआ ने आवाज धीमी कर ली।
“तुम्हें दिखाई नहीं देता क्या? नंदिनी कैसे सज-संवरकर घूम रही है?”
कमला जी कुछ क्षण चुप रहीं।
“दीदी, उसने कौन-सा बहुत श्रृंगार किया है? बस छोटी-सी बिंदी ही तो लगाई है।”
विमला बुआ ने तुरंत जवाब देते हुए कहा—
“बात बिंदी की नहीं है, कमला।”
विमला बुआ ने थोड़ी नाराजगी के साथ आगे कहा—
“बात समाज की है। लोग क्या कहेंगे? अभी समीर को गए कितना समय हुआ है? और बहू के हाथों में चूड़ियाँ, माथे पर बिंदी...”
कमला जी ने गहरी साँस ली और कुछ क्षण चुप रहने के बाद बोलीं—
“दीदी, लोगों ने हमारे बेटे को वापस लाकर दिया क्या?”
विमला बुआ चुप हो गईं।
लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ दिनों बाद वह सीधे सुरेश जी के पास पहुँच गईं।
“भैया, मुझे आपसे एक बात कहनी है।”
सुरेश जी ने उनकी ओर देखा।
“कहो विमला।”
विमला बुआ ने कुछ पल रुककर कहा—
“आप नंदिनी को थोड़ा समझाइए।”
सुरेश जी ने हैरानी से पूछा—
“क्यों? क्या हुआ?”
विमला बुआ ने गंभीर स्वर में कहा—
“उसे अब अपनी मर्यादा समझनी चाहिए। समीर को गए छह महीने हो गए हैं। लेकिन वह ऐसे रहती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।”
सुरेश जी का चेहरा गंभीर हो गया।
“तुमने ऐसा कब देखा कि उसे अपने बेटे की मौत का दुख नहीं है?”
विमला बुआ बोलीं—
“मैंने यह नहीं कहा कि उसे दुख नहीं है।”
“लेकिन विधवा होकर इस तरह सजना-संवरना ठीक नहीं लगता।”
सुरेश जी कुछ देर तक उन्हें देखते रहे।
फिर उन्होंने धीमी आवाज में कहा—
“विमला, क्या तुमने कभी उसकी आँखों में झाँककर देखा है?”
“क्या मतलब?”
“जिस औरत का पति जवान उम्र में चला गया हो, उसके चेहरे पर बिंदी देखकर तुम उसके दिल का दर्द कैसे तय कर सकती हो?”
विमला के पास कोई जवाब नहीं था।
लेकिन उन्होंने फिर भी कहा—
“भैया, समाज भी तो कुछ होता है।”
सुरेश जी की आँखें भर आईं।
“समाज?”
उन्होंने हल्की-सी हँसी हँसी।
“जब मेरा बेटा अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच लड़ रहा था, तब यही समाज कहाँ था?”
विमला चुप रहीं।
“जब डॉक्टर ने कहा कि समीर नहीं बच सका, तब यही समाज कहाँ था?”
सुरेश जी की आवाज काँपने लगी।
“जब नंदिनी ने अपने पति का चेहरा आखिरी बार देखा और बेहोश होकर गिर पड़ी, तब कौन उसके पास बैठा था?”
विमला की नजरें नीचे झुक गईं।
“जब मेरे दोनों पोते रात-रात भर अपने पिता को याद करके रोते थे, तब कौन उन्हें चुप कराता था?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुरेश जी ने आँखों के आँसू पोंछे।
“कमला और मैं थे। नंदिनी थी। बस हम लोग थे।”
विमला धीरे से बोलीं—
“लेकिन भैया... लोग बातें तो बनाएँगे।”
इस बार कमला जी बोल उठीं।
“दीदी, लोगों का काम बात बनाना है। हमारा काम अपने परिवार को संभालना है।”
विमला ने उनकी ओर देखा।
कमला जी की आँखों में भी आँसू थे।
“आप जानती हैं दीदी, समीर की मौत के बाद नंदिनी कई दिनों तक कुछ नहीं खाती थी। कई बार बच्चों को देखकर खुद को संभालती थी।”
“एक रात मैंने उसे समीर की तस्वीर के सामने बैठे देखा था।”
“वह तस्वीर से कह रही थी—‘समीर, मैं बहुत थक गई हूँ। लेकिन तुम्हारे बच्चों के लिए मुझे मजबूत बनना पड़ेगा।’”
कमला की आवाज भर्रा गई।
“उस रात से मैंने तय कर लिया कि अब नंदिनी मेरे लिए बहू नहीं, बेटी है।”
विमला के चेहरे पर थोड़ी नरमी आई।
लेकिन वह अभी भी पूरी तरह नहीं बदली थीं।
उन्होंने कहा—
“मैं उसकी भलाई चाहती हूँ।”
कमला ने मुस्कुराकर कहा—
“अगर सच में उसकी भलाई चाहती हैं, तो उसे यह मत सिखाइए कि दुखी दिखना जरूरी है।”
विमला बिना कुछ बोले वहाँ से चली गईं।
लेकिन असली बदलाव अभी बाकी था।
कुछ दिनों बाद स्कूल में काव्या का वार्षिक कार्यक्रम था।
काव्या ने नृत्य में हिस्सा लिया था।
उसने अपनी माँ से कहा था—
“मम्मी, आप मेरे साथ स्कूल जरूर चलना।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—
“बिल्कुल चलूँगी।”
कार्यक्रम वाले दिन नंदिनी ने हल्की गुलाबी साड़ी पहनी।
माथे पर छोटी-सी बिंदी लगाई।
काव्या ने उसे देखते ही खुशी से कहा—
“मम्मी, आप बहुत सुंदर लग रही हो।”
नंदिनी की आँखें भर आईं।
“सच?”
“हाँ!”
काव्या ने उसके गले में बाँहें डाल दीं।
“पापा होते तो वो भी बोलते कि मेरी मम्मी सबसे सुंदर हैं।”
नंदिनी का चेहरा अचानक बुझ गया।
लेकिन उसने बेटी को गले लगाकर कहा—
“हाँ बेटा, तुम्हारे पापा भी यही कहते।”
उसी समय दरवाजे के बाहर विमला बुआ खड़ी थीं।
उन्होंने सब सुन लिया।
उन्होंने देखा कि नंदिनी अपनी आँखों के आँसू छिपाकर बेटी के सामने मुस्कुरा रही थी।
वह पहली बार सोचने लगीं—
“क्या मैं सच में इसे समझ पाई हूँ?”
लेकिन उसी रात उन्हें इसका जवाब और गहराई से मिला।
काव्या को तेज बुखार हो गया।
नंदिनी पूरी रात उसके सिर पर पानी की पट्टी रखती रही।
आरव भी अपनी बहन के पास बैठा था।
सुरेश जी दवा लेने गए।
कमला जी रसोई में कुछ बना रही थीं।
विमला बुआ भी वहीं थीं।
रात के काफी समय बाद काव्या की आँख खुली।
उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।
“मम्मी... आप सोई नहीं?”
नंदिनी मुस्कुराई।
“नहीं बेटा, तुम्हें बुखार था ना।”
काव्या ने माँ के थके हुए चेहरे को देखते हुए मासूमियत से कहा—
“आप थक गई होंगी।”
नंदिनी ने अपनी बेटी को प्यार से सीने से लगाते हुए कहा—
“माँ अपने बच्चों से कब थकती है?”
काव्या ने कुछ देर माँ को देखा।
फिर बोली—
“मम्मी, आप हमेशा खुश रहा करो।”
नंदिनी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“क्यों बेटा?”
“क्योंकि जब आप खुश होती हो ना, तो मुझे लगता है पापा हमें ऊपर से देखकर खुश हो रहे होंगे।”
यह सुनते ही नंदिनी ने बेटी को सीने से लगा लिया।
विमला बुआ दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थीं।
उनकी आँखें भी भर आईं।
अगले दिन उन्होंने नंदिनी को अपने पास बुलाया।
नंदिनी थोड़ी घबराई हुई थी।
उसे लगा शायद बुआ फिर उसकी बिंदी को लेकर कुछ कहेंगी।
लेकिन विमला बुआ ने उसके माथे की ओर देखा और कहा—
“बहू... एक बात पूछूँ?”
“जी बुआ जी।”
“यह बिंदी तुम अपने लिए लगाती हो या बच्चों के लिए?”
नंदिनी कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—
“शायद बच्चों के लिए।”
“कैसे?”
नंदिनी ने धीमी आवाज में कहा—
“बुआ जी, पहले मैं आईने में खुद को देखकर डर जाती थी। मुझे लगता था कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई।”
“फिर एक दिन काव्या ने मेरे माथे पर बिंदी लगाई और कहा—‘मम्मी, अब आप अच्छी लग रही हो।’”
“उस दिन पहली बार मुझे लगा कि शायद मुझे पूरी जिंदगी रोते हुए नहीं बितानी चाहिए।”
“समीर को खोने का दुख मेरे अंदर हमेशा रहेगा। कोई बिंदी उसे मिटा नहीं सकती। कोई रंगीन साड़ी मेरे दिल से उसका नाम नहीं निकाल सकती।”
“लेकिन अगर मेरे चेहरे की छोटी-सी मुस्कान मेरे बच्चों को जीने की हिम्मत देती है, तो मैं मुस्कुराऊँगी।”
विमला बुआ की आँखों से आँसू बहने लगे।
नंदिनी ने तुरंत कहा—
“बुआ जी, अगर आपको बुरा लगता है तो मैं बिंदी नहीं लगाऊँगी।”
विमला ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं बहू।”
नंदिनी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
विमला बोलीं—
“तुम बिंदी लगाओ।”
“रंग पहनना चाहो तो रंग पहनो।”
“चूड़ियाँ पहनना चाहो तो चूड़ियाँ पहनो।”
“और जब मन करे तो हँसो भी।”
नंदिनी की आँखें भर आईं।
“लेकिन बुआ जी... समाज?”
विमला हल्का-सा मुस्कुराईं।
“समाज की चिंता मैंने बहुत की है बहू।”
“अब समझ आया कि समाज हमारे आँसू पोंछने नहीं आता।”
“और अगर कोई तुम्हारे कपड़े, बिंदी या मुस्कान पर सवाल करेगा, तो इस बार मैं उसके सामने खड़ी होऊँगी।”
नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
विमला ने उसे गले लगा लिया।
“मुझे माफ कर देना बहू।”
नंदिनी कुछ बोल नहीं पाई।
उसने बस विमला के कंधे पर सिर रख दिया।
कुछ देर बाद काव्या वहाँ आई।
उसने देखा कि उसकी माँ और बुआ एक-दूसरे को गले लगाए रो रही हैं।
वह बोली—
“बुआ, आप मम्मी को क्यों रुला रही हो?”
विमला ने आँसू पोंछते हुए कहा—
“नहीं बिटिया, आज से तुम्हारी मम्मी को कोई नहीं रुलाएगा।”
काव्या मुस्कुराई।
फिर उसने अपनी माँ के माथे की बिंदी को छुआ और बोली—
“देखा मम्मी, मैंने कहा था ना, आप पर बहुत अच्छी लगती है।”
कमरे में पहली बार सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
सुरेश जी दरवाजे पर खड़े यह सब देख रहे थे।
उन्होंने धीरे से अपनी पत्नी से कहा—
“आज समीर होता तो बहुत खुश होता।”
कमला जी ने आँखें पोंछते हुए कहा—
“हाँ... क्योंकि उसने हमेशा यही तो चाहा था कि उसके जाने के बाद भी उसके बच्चे खुश रहें।”
सुरेश जी ने नंदिनी और दोनों बच्चों को देखा।
उन्हें लगा जैसे उनके उजड़े घर में फिर से थोड़ी रोशनी लौट आई हो।
उस दिन के बाद नंदिनी ने अपने पति को भुलाया नहीं।
बल्कि उसने उसके नाम से बच्चों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली।
उसने घर पर सिलाई का काम शुरू किया।
धीरे-धीरे उसने अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा।
काव्या पढ़ाई में आगे बढ़ने लगी।
आरव भी पिता का सपना पूरा करने के लिए मन लगाकर पढ़ने लगा।
और विमला बुआ?
वह जब भी नंदिनी को देखतीं, उसके माथे की बिंदी को देखकर मुस्कुरातीं।
एक दिन किसी रिश्तेदार ने उनसे कहा—
“विमला, बहू को इतना खुला छोड़ दिया है? लोग क्या कहेंगे?”
विमला ने बिना झिझक जवाब दिया—
“लोगों को जो कहना है कहने दो।”
“जिस स्त्री ने अपना पति खोया है, उसे जिंदगी भर सजा देना हमारा अधिकार नहीं है।”
“दुख मनाने का तरीका हर इंसान का अलग होता है।”
“किसी के माथे की बिंदी देखकर उसके दिल का दर्द मत नापो।”
फिर उन्होंने नंदिनी की ओर देखा।
“क्योंकि कई बार सबसे ज्यादा टूटा हुआ इंसान ही अपने बच्चों के लिए सबसे ज्यादा मुस्कुराता है।”
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
उसने दूर आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे समीर कहीं से उसे देखकर कह रहा हो—
“नंदिनी, तुम सही कर रही हो।”
उसने अपने माथे की बिंदी को हाथ से छुआ।
और पहली बार उसे यह बिंदी श्रृंगार नहीं लगी।
उसे लगा जैसे यह उसके माथे पर लिखी एक छोटी-सी प्रतिज्ञा है—
“मैं टूटूँगी नहीं।
मैं अपने बच्चों के लिए जीऊँगी।
और अपनी जिंदगी को फिर से जीने की कोशिश करूँगी।”
सीख:
किसी इंसान के कपड़ों, मुस्कान या चेहरे को देखकर उसके दिल का दर्द तय नहीं किया जा सकता। हर व्यक्ति दुख को अलग तरीके से सहता है। किसी विधवा स्त्री की जिंदगी का फैसला समाज को नहीं, उसे खुद करने का अधिकार होना चाहिए।
दुख का मतलब यह नहीं कि इंसान जिंदगी भर खुश रहना छोड़ दे। कभी-कभी एक छोटी-सी मुस्कान भी किसी टूटे हुए परिवार को दोबारा जीने की वजह दे देती है।

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