बहू नहीं, बेटी बनकर आई थी राधिका
संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी राधिका बचपन से ही बहुत शांत, समझदार और संस्कारी लड़की थी। उसके घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई और उनके बच्चे मिलाकर लगभग पंद्रह लोग रहते थे। घर हमेशा लोगों से भरा रहता था। किसी के आने की आहट होती तो बच्चे दौड़कर दरवाजे तक पहुँच जाते और किसी के जाने पर पूरा घर कुछ देर के लिए शांत हो जाता।
राधिका अपने माता-पिता की सबसे बड़ी बेटी थी। उसके बाद दो छोटे भाई और एक बहन थी। बड़ी होने के कारण घर की जिम्मेदारियों को समझना उसने बहुत कम उम्र में ही सीख लिया था।
दादी को दवा देने से लेकर छोटे भाई को पढ़ाने तक, राधिका हर काम में आगे रहती थी।
दादी अक्सर अपनी पोती को देखकर कहतीं,
“राधिका, तू लड़की नहीं है, हमारे घर की किस्मत है। जिस घर में जाएगी, वहाँ भी सबका दिल जीत लेगी।”
राधिका मुस्कुराकर कहती,
“दादी, मैं कहाँ इतनी अच्छी हूँ?”
दादी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहतीं,
“अपनों के लिए जीना ही सबसे बड़ी अच्छाई है।”
राधिका को दादी की यह बात हमेशा याद रहती थी।
समय बीतता गया और राधिका विवाह योग्य हो गई। उसके माता-पिता ने उसके लिए एक अच्छा रिश्ता ढूँढ़ना शुरू किया। कुछ समय बाद उन्हें एक परिवार पसंद आया।
लड़का विवेक था। वह एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। उसके पिता गोविंद प्रसाद रिटायर्ड शिक्षक थे और माँ कमला देवी गृहिणी थीं। परिवार में विवेक की छोटी बहन काजल भी थी।
घर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन परिवार के लोग एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
राधिका का विवाह विवेक से तय हो गया।
विवाह के बाद जब राधिका पहली बार अपने ससुराल आई तो उसका स्वागत पूरे परिवार ने प्यार से किया।
कमला देवी ने बहू की आरती उतारी और कहा,
“बहू, इस घर को अपना घर समझना। यहाँ रिश्ते खून से नहीं, दिल से निभाए जाते हैं।”
राधिका ने झुककर उनके पैर छुए और बोली,
“माँजी, मैं कोशिश करूँगी कि कभी आपको मुझसे शिकायत न हो।”
कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।
“मुझे कोशिश नहीं चाहिए बहू, बस अपनेपन की जरूरत है।”
राधिका धीरे-धीरे घर के काम सीखने लगी।
लेकिन इस घर में एक बात उसे सबसे ज्यादा अच्छी लगती थी।
गोविंद प्रसाद जी अपनी बेटी काजल से बहुत प्यार करते थे।
काजल भी अपने पिता की बहुत लाडली थी।
वह अपने पापा की छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखती थी।
गोविंद प्रसाद जी को चाय थोड़ी कम चीनी वाली पसंद थी। काजल बिना पूछे उनके लिए वैसी ही चाय बना देती।
उन्हें अखबार पढ़ने की आदत थी तो अखबार आने से पहले ही काजल उसे उनके कमरे में रख देती।
अगर पिताजी बाहर से आते और थके हुए होते तो काजल तुरंत उनके लिए पानी लेकर आती।
कभी उनके पैरों में दर्द होता तो वह तेल लगाकर उनके पैर दबाने बैठ जाती।
गोविंद प्रसाद जी कई बार उसे रोकते हुए कहते,
“अरे बेटी, रहने दे। तू कब तक मेरे पीछे लगी रहेगी?”
काजल हँसकर कहती,
“जब तक आप मुझे अपनी बेटी कहेंगे, तब तक मैं आपका ख्याल रखती रहूँगी।”
यह सुनकर गोविंद प्रसाद जी की आँखें भर आतीं।
एक दिन राधिका ने काजल से पूछा,
“तुम पापा का इतना ख्याल रखती हो, कभी थकती नहीं?”
काजल मुस्कुराकर बोली,
“भाभी, पापा ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। बचपन में जब मुझे डर लगता था तो मैं उनके पास जाकर सो जाती थी। स्कूल में कोई परेशानी होती थी तो पापा मेरे साथ खड़े रहते थे। अब मेरी बारी है।”
राधिका कुछ नहीं बोली।
उसके मन में अपनी शादी के बाद अपने पिता की याद आ गई।
उसे लगा कि बेटी चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, पिता के लिए उसके मन में बचपन कभी खत्म नहीं होता।
कुछ समय बाद काजल के लिए भी रिश्ता आया।
लड़का अच्छा था। परिवार भी अच्छा था। गोविंद प्रसाद जी को रिश्ता पसंद आ गया, लेकिन बेटी की विदाई का ख्याल आते ही उनका मन बैठ जाता।
काजल के जाने के बाद घर की जिम्मेदारियों का बोझ तो किसी तरह संभल जाता, लेकिन उन्हें अपनी बेटी की चिंता रहती।
एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी कमला देवी से कहा,
“काजल चली जाएगी तो घर बहुत खाली हो जाएगा।”
कमला देवी ने समझाते हुए कहा,
“बेटी को तो एक दिन विदा करना ही होता है।”
गोविंद प्रसाद जी चुप हो गए।
कुछ देर बाद बोले,
“मुझे अपनी बेटी की शादी से खुशी है, लेकिन डर लगता है कि उसके जाने के बाद मैं खुद को कैसे संभालूँगा।”
कमला देवी ने कहा,
“हम हैं ना।”
गोविंद प्रसाद जी हल्का सा मुस्कुराए।
लेकिन मन में उनकी चिंता बनी रही।
काजल ने भी अपने पिता की परेशानी समझ ली थी।
एक दिन वह उनके पास बैठी और बोली,
“पापा, अगर मैं आपके पास नहीं रहूँगी तो क्या आप मुझे भूल जाएंगे?”
गोविंद प्रसाद जी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“पागल लड़की, बेटी को कोई भूल सकता है क्या?”
काजल की आँखें नम हो गईं।
“तो फिर मुझे दूर मत भेजना पापा।”
गोविंद प्रसाद जी का गला भर आया।
“बेटा, बेटी को घर में रोक लेना आसान है, लेकिन उसकी जिंदगी को रोक देना ठीक नहीं। तू जहाँ भी रहेगी, मेरी दुआ तेरे साथ रहेगी।”
काजल ने अपने पिता के कंधे पर सिर रख दिया।
“लेकिन आपका ख्याल कौन रखेगा?”
गोविंद प्रसाद जी ने उसकी तरफ देखा और बोले,
“जिस घर में तू जाएगी, वहाँ तू किसी की बेटी बनेगी। और यहाँ तेरी भाभी है। मुझे विश्वास है, वह मेरा ख्याल रखेगी।”
काजल ने तुरंत राधिका की तरफ देखा।
राधिका मुस्कुरा रही थी।
लेकिन उस दिन उसने मन ही मन एक फैसला कर लिया।
वह सिर्फ अपने ससुर की बहू बनकर नहीं रहेगी।
वह उन्हें पिता का सम्मान देगी।
कुछ ही दिनों बाद काजल का विवाह हो गया।
विदाई के समय काजल अपने पिता से लिपटकर रो रही थी।
“पापा, अपना ध्यान रखिएगा।”
गोविंद प्रसाद जी कुछ बोल नहीं पाए।
उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ रखा और बस इतना कहा,
“तू खुश रहना बेटा।”
काजल अपने पति के साथ विदा हो गई।
घर लौटने के बाद गोविंद प्रसाद जी बहुत देर तक उस कमरे के बाहर खड़े रहे जहाँ काजल बैठा करती थी।
कमला देवी ने उन्हें देखा तो उनकी आँखें भी भर आईं।
राधिका दूर खड़ी सब देख रही थी।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस चुपचाप रसोई में चली गई।
अगले दिन गोविंद प्रसाद जी जब नहाने के लिए गए तो उन्हें उनका साफ कुर्ता-पायजामा पहले से ही बाथरूम के बाहर रखा मिला।
वह कुछ पल उसे देखते रहे।
उन्होंने सोचा,
“काजल तो चली गई है… फिर यह किसने रखा?”
जब वह बाहर आए तो कुर्ता-पायजामा पहने से पहले ही इस्त्री किया हुआ रखा था।
उन्होंने आवाज लगाई,
“कमला!”
कमला देवी बाहर आईं।
गोविंद प्रसाद जी ने पूछा,
“यह कपड़े किसने रखे?”
कमला देवी मुस्कुराईं।
“राधिका ने।”
गोविंद प्रसाद जी कुछ नहीं बोले।
उन्हें पहली बार लगा कि किसी ने उनकी बेटी की जगह खाली नहीं रहने दी।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
जब वह बाहर से घर लौटे तो राधिका उनके लिए पानी लेकर आई।
फिर चाय का कप उनके हाथ में देते हुए बोली,
“पिताजी, चाय कम चीनी वाली है। आपने काजल से कहते हुए कई बार बताया था कि आपको ऐसी ही चाय पसंद है।”
गोविंद प्रसाद जी ने चाय का कप हाथ में लिया।
उनकी आँखें अचानक नम हो गईं।
उन्होंने राधिका को गौर से देखा।
उन्हें कुछ पल के लिए लगा जैसे काजल उनके सामने खड़ी हो।
उन्होंने धीमी आवाज में पूछा,
“बहू, तुम्हें कैसे पता कि मुझे चाय ऐसी पसंद है?”
राधिका मुस्कुराई।
“काजल दीदी ने बताया था। वह कहती थीं कि पापा की चाय में चीनी ज्यादा हो जाए तो उनका मूड खराब हो जाता है।”
गोविंद प्रसाद जी हँस पड़े।
कई दिनों बाद उनके चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई थी।
उन्होंने कहा,
“काजल ने जाते-जाते तुम्हें अपना काम भी सिखा दिया।”
राधिका ने तुरंत कहा,
“नहीं पिताजी, उन्होंने अपना काम नहीं दिया। उन्होंने मुझे अपना प्यार दिया है।”
यह सुनकर गोविंद प्रसाद जी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
कमला देवी भी पास खड़ी थीं।
उन्होंने अपने पति से कहा,
“देखा आपने? बेटी चली गई, लेकिन भगवान ने घर में बेटी की कमी नहीं रहने दी।”
गोविंद प्रसाद जी ने राधिका की ओर देखकर कहा,
“बहू, तुमने आज मुझे बहुत बड़ा सहारा दिया है।”
राधिका ने उनके पैर छूते हुए कहा,
“पिताजी, मुझे बहू मत कहिए। अगर आपको अच्छा लगे तो मुझे बेटी कह सकते हैं।”
गोविंद प्रसाद जी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।
“आज से तू मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।”
राधिका की आँखें भी भर आईं।
कुछ दिनों बाद खाने का समय हुआ।
घर के सभी लोग खाने के लिए बैठ गए।
गोविंद प्रसाद जी अपनी थाली लेकर बैठ चुके थे।
उन्होंने अचानक राधिका को आवाज लगाई,
“राधिका बेटा, इधर आओ।”
राधिका उनके पास आकर बैठ गई।
गोविंद प्रसाद जी ने अपनी थाली से रोटी का टुकड़ा तोड़ा और राधिका की तरफ बढ़ाते हुए बोले,
“काजल के साथ तो मैं हमेशा एक ही थाली में खाना खाता था। आज से तुम मेरे साथ बैठकर खाना खाओगी।”
राधिका थोड़ी झिझकी।
“पिताजी, सब लोग क्या सोचेंगे?”
गोविंद प्रसाद जी हँसते हुए बोले,
“जिसे जो सोचना है सोचने दो। बेटी के साथ खाना खाने के लिए किसी की अनुमति नहीं चाहिए।”
कमला देवी की आँखों में खुशी के आँसू थे।
राधिका ने वह निवाला खा लिया।
उस दिन उसे पहली बार सच में लगा कि ससुराल में उसे एक पिता मिल गया है।
समय बीतता गया।
राधिका गोविंद प्रसाद जी का वैसे ही ध्यान रखने लगी जैसे काजल रखा करती थी।
लेकिन उसने कभी काजल की जगह लेने की कोशिश नहीं की।
वह हमेशा कहती,
“पिताजी, आपकी बेटी काजल की जगह कोई नहीं ले सकता। मैं तो बस उसकी कमी में आपका साथ देने की कोशिश कर रही हूँ।”
एक दिन काजल अपने मायके आई।
घर में आते ही वह अपने पिता के कमरे की तरफ गई।
लेकिन वहाँ उसे कुछ बदला-बदला सा लगा।
पिताजी के कपड़े करीने से रखे थे।
चश्मा सही जगह रखा था।
दवाइयाँ समय के हिसाब से अलग-अलग डिब्बों में रखी थीं।
काजल के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
तभी राधिका उसके लिए पानी लेकर आई।
काजल ने भाभी का हाथ पकड़ लिया।
“भाभी, आपने पापा को संभाल लिया।”
राधिका बोली,
“नहीं दीदी, मैंने कुछ नहीं किया। आपके पापा ने मुझे बेटी बना लिया।”
काजल ने अपनी भाभी को गले लगा लिया।
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
“भाभी, मुझे सबसे ज्यादा डर इसी बात का था कि मेरे जाने के बाद पापा अकेले हो जाएंगे।”
राधिका ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा,
“अब आप बेफिक्र रहिए। आपके पापा सिर्फ आपके नहीं हैं। अब मेरे भी हैं।”
काजल ने मुस्कुराकर कहा,
“और आप सिर्फ मेरी भाभी नहीं हैं। आप मेरी बड़ी बहन हैं।”
दोनों एक-दूसरे से लिपट गईं।
तभी पीछे से गोविंद प्रसाद जी की आवाज आई,
“अरे बेटियों, मुझे भी कोई पूछेगा या दोनों बहनें आपस में ही बातें करती रहेंगी?”
दोनों हँसते हुए उनके पास चली गईं।
रात को भोजन के समय गोविंद प्रसाद जी ने अपनी थाली लगाई।
काजल उनके पास बैठ गई।
राधिका भी आने लगी तो गोविंद प्रसाद जी ने कहा,
“राधिका, आज तुम भी यहीं बैठो।”
अब एक तरफ काजल थी और दूसरी तरफ राधिका।
गोविंद प्रसाद जी दोनों बेटियों को देखकर मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा,
“मुझे लगता था बेटी की शादी के बाद पिता का घर खाली हो जाता है। लेकिन आज समझ आया कि बेटी घर से जाती है, रिश्ते से नहीं।”
काजल ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।
“पापा, मैंने कहा था ना, मैं आपको छोड़कर नहीं गई।”
गोविंद प्रसाद जी ने कहा,
“और तू सच कह रही थी। तू एक बेटी बनकर गई थी और दूसरी बेटी को मेरे पास छोड़ गई।”
राधिका ने मुस्कुराते हुए कहा,
“पिताजी, एक बात मैं भी कहूँ?”
“हाँ बेटा, बोलो।”
“बेटियाँ विदा नहीं होतीं। बस उनके घर बदल जाते हैं। और कभी-कभी भगवान एक बेटी को विदा करके दूसरी बेटी को उसी घर में भेज देता है।”
गोविंद प्रसाद जी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने दोनों बेटियों के सिर पर हाथ रख दिया।
“भगवान हर पिता को ऐसी बेटियाँ दे।”
कमला देवी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“और हर बहू को ऐसा परिवार मिले, जो उसे बहू नहीं बेटी समझे।”
पूरा परिवार उस बात पर मुस्कुरा उठा।
उस दिन काजल के मन से वह डर हमेशा के लिए निकल गया कि उसके जाने के बाद उसके पिता अकेले हो जाएंगे।
उसे समझ आ गया था कि रिश्ते सिर्फ जन्म से नहीं बनते।
कभी-कभी कोई लड़की बहू बनकर घर में आती है और अपने प्यार, सम्मान और अपनापन से उस घर की बेटी बन जाती है।
सीख:
बेटी की विदाई सिर्फ उसके मायके से होती है, उसके रिश्तों से नहीं। और एक बहू को अगर सम्मान और अपनापन दिया जाए, तो वह भी उस घर के माता-पिता को अपने माता-पिता की तरह प्यार कर सकती है। रिश्ते खून से नहीं, विश्वास, सम्मान और सच्चे अपनापन से मजबूत होते हैं।

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